गया / नई दिल्ली : आज से दस वर्ष पूर्व शिक्षक दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि बोधगया शहर को देश की आध्यात्मिक राजधानी बननी चाहिए जो भारत और विश्व के बौद्ध समुदाय को जोड़ सके। प्रधानमंत्री के मुख से यह निकला नहीं कि पटना ही नहीं, बिहार ही नहीं, दिल्ली से लेकर भारत के कोने-कोने से प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं, टीवी चैनलों पर सम्मानित मोदी जी छा गए। केंद्रीय मंत्रिमंडल से लेकर प्रदेशों की सरकारों में बैठे उनके शुभचिंतक इस बात की चर्चाएं आम करने लगे कि सम्मानित प्रधानमंत्री का विचार कितना महत्वपूर्ण है।
भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं से लेकर, सरकार में उनके सहयोगियों तक, सभी के चेहरे 'ख़ुशी' से 'लाल' थे। बिहार के तत्कालीन लाट साहब (इस तस्वीर में सम्मानित प्रधानमंत्री के पीछे चल रहे हैं) से लेकर प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनके अनुयायीगण ताली ठोकने में कोई कसर नहीं छोड़े। हाथ दुखने तक, हाथ टूटने तक ताली बजाये। कई लाख अख़बारों में, टीवी चैनलों पर बहस भी हुई। बहसकर्ताओं के साथ साथ श्रोतागण, दर्शकगण भी पक्षधर थे। स्वाभाविक भी था।
तारीख था 5 सितम्बर और 2015 साल। प्रधानमंत्री अपने पहले कालखंड में बिहार के बोधगया में उपस्थित थे। उक्त दिवस को सम्पूर्ण राष्ट्र महान विद्वान और शिक्षक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती पर शिक्षक दिवस मना रहा था और प्रधान मंत्री इस बात का उल्लेख कर रहे थे। उन दिनों रामनाथ कोविंद, जो प्रदेश के राज्यपाल थे, उक्त अवसर पर उपस्थित थे।

उनके अलावे मंगोलिया के खम्बा लामा डेम्बरेल, ताइवान के मिंग क्वांग शी, वियतनाम के थिक थिन टैम, रूस के तेलो तुल्कु रिन्पोचे, श्रीलंका के बनागला उपातिस्सा के अतिरिक्त लामा लोबज़ेंग, किरेन रिजिजु, भूटान के मंत्री लियोनपो नाम्गे दोरजी, मंगोलिया के मंत्री ब्यारसैखान सैकड़ों गणमान्य लोग उपस्थित थे। प्रधानमंत्री ने यह भी स्वीकारा था कि पंडित जवाहर लाल नेहरू और श्री अटल बिहारी वाजपेयी के बाद मुझे इस पवित्र स्थान पर आने का मौका मिला है।
प्रधानमंत्री ने कहा था : "मैं समझता हूँ कि कैसे बौद्ध दुनिया भर में बोधगया को तीर्थस्थल के रूप में देखते हैं। हम भारत के लोग बोधगया को इस तरह विकसित करना चाहते हैं ताकि यह भारत की आध्यात्मिक राजधानी बने और एक ऐसा बंधन बने जो भारत एवं बौद्ध समुदाय की सभ्यता को आपस में जोड़े। भारत सरकार बौद्ध धर्म के पवित्रतम स्थान (भारत) से पड़ोसी बौद्ध राष्ट्रों को उनकी आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हर संभव सहायता प्रदान करेगी।"
प्रधानमंत्री ने यह भी कहा था: "मैं बौद्ध धर्म और आध्यात्मिक नेताओं की घोषणा को पढ़कर प्रसन्न हूं। यह घोषणा कड़े परिश्रम एवं व्यापक वार्ता का परिणाम है और इसलिए यह एक पथ-प्रदर्शक आलेख है जो हमें आगे का रास्ता दिखाएगा। मैं भी जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे की उस बात का समर्थन करता हूँ जिसमें उन्होंने सहिष्णुता के महत्व, विविधता की प्रशंसा, करुणा और भाईचारे की भावना के महत्व पर प्रकाश डाला था। इस श्रद्धास्पद सभा को उनके संदेश और इस पहल को आगे बढ़ाने के लिए उनका निरंतर समर्थन हम सभी के लिए मजबूती एवं शक्ति का स्त्रोत है।"

नरेंद्र मोदी जब पहली बार प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लिए थे, उसके अगले वर्ष शिक्षक दिवस के अवसर पर बोध गया आये थे एक कार्यक्रम के सिलसिले में । बोध गया को ‘संस्कृति का शहर’ बनाने की बात हुई। सन 2015 से 2025 आ गया। बिहार के दूसरे राज्यपाल भी आये। नरेंद्र मोदी दूसरे और तीसरे बार प्रधानमंत्री कार्यालय में विराजमान हुए। लेकिन बोध गया की ‘संस्कृति’ आज भी ‘संस्कृति का शहर’ बनने के लिए प्रतीक्षा कर रही है। कोई सुनेगा या नहीं, यान ना तो बोध गया की ईंट, पत्थर, मिट्टी, पेड़-पौधे, बोधि वृक्ष जानता है और ना ही बिहार के लोग। हाँ, शहर के नाम पर राजनीति अवश्य होती है। खैर।
स्वामी विवेकानंद को उद्धृत करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था कि "जब बुद्ध का जन्म हुआ, उस समय भारत को एक महान आध्यात्मिक नेता, एक पैगंबर की आवश्यकता थी। बुद्ध न वेद, न जाति, न पंडित और न ही परम्परा, कभी किसी के आगे नहीं झुके। उन्होंने निर्भय होकर तर्कसंगत रूप से अपना जीवन बिताया। निर्भय होकर सच्चाई की खोज और विश्व में सभी के लिए अगाढ़ प्रेम रखने वाले ऐसे महामानव को विश्व ने पहले कभी नहीं देखा। बुद्ध किसी भी अन्य शिक्षक से अधिक साहसी और अनुशासित थे। बुद्ध पहले मानव थे जिन्होंने इस दुनिया को आदर्शवाद का एक पूरा तंत्र दिया। वे भलाई के लिए भले और प्रीत के लिए प्रीतिकर थे। बुद्ध समानता के बहुत बड़े समर्थक थे। प्रत्येक व्यक्ति को आध्यात्मिकता प्राप्त करने का समान अधिकार है – यह उनकी शिक्षा है। मैं व्यक्तिगत रूप से भारत को बौद्ध-भारत कहूंगा क्योंकि इस देश ने धार्मिक विद्वानों से बुद्ध द्वारा दिये गए सभी मूल्यों और शिक्षाओं को आत्मसात कर उन्हें यहाँ के साहित्य में दर्शाया।"
नरेंद्र मोदी ने तो यहाँ तक कहा था कि "बुद्ध उस भारत देश के रत्न जड़ित मुकुट हैं जो सभी धर्मों में की जाने वाली सभी तरह की पूजा-आराधना को को स्वीकार करता है। भारत में हिंदू धर्म की यह विशेषता उन महान आध्यात्मिक गुरूओं की देन है जिनमें बुद्ध सबसे प्रमुख हैं। और इसी ने भारत की धर्मनिरपेक्षता को सतत बनाये रखा है। बोध गया में बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई जिससे हिन्दुत्व का भी ज्ञानोदय हुआ।"

इन विगत वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीसरी बार देश का नेतृत्व कर रहे हैं। देश के लोगों ने उनपर अपना विश्वास जताया। रामनाथ कोविंद बिहार के राज्यपाल से देश के राष्ट्रपति भवन में राष्ट्र का प्रथम नागरिक बनने के सौभाग्य प्राप्त किये और पांच साल कार्यालय में रहने के बाद अवकाश भी प्राप्त किये। लेकिन बोधगया की भूमि, गौतम बुद्ध की भूमि आज भी उस वक्तव्य के अनुवादन का इंतज़ार कर रही है। क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वक् वक्तव्य महज "राजनीतिक" था ? यह कई करोड़ का प्रश्न है।

