साल 1971 में शाम होते ही सायरन बज जाता था। ओंओंओंओंओंओंओंओंओं ..... और फिर गली-मोहल्ला-सड़क-बाजार में सन्नाटा। सड़कों पर चलने वाली गाड़ियों की बत्तियां का जमीन से उठना, यानी दंड का भागीदार होना था। उन दिनों पटना शहर में यातायात के डीएसपी थे श्री बनबारी बाबू। उनके जीप के पिछले हिस्से में काला पेंट और ब्रश के साथ एक पुलिस कर्मी हमेशा तैनात रहता था, ताकि किसी भी वाहन के हेड-लाइट से रोशनी आसमान की ओर नहीं जाय। रिक्शावाला भी अपने हैंडिल के आगे या फिर अगला पहिया के नीचले हिस्से में लटके ढ़िबरी के शीशा का ऊपरी हिस्सा काल कर दिया था - राष्ट्रहित में, राष्ट्र के सम्मान में। मजाल था कि कानून का उलंघन हो जाय।
पटना शहर में श्री बनवारी बाबू का और देश में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी का बोलबाला था। लोग बाग भले श्रीमती गाँधी को, यहाँ तक की उनकी पार्टी के लोग भी, आलोचना करें; हकीकत यह था और आज भी है कि देश में दूसरी कोई सशक्त महिला नहीं हुई जो पुरुषों को बांध सके। आज पुरुष समुदाय भले महिला सशक्तिकरण के नाम पर राजनीति करें, कौन, किसे, कितना सशक्त होने देना चाहता है, यह तो वे जानते हैं क्योंकि पुरुष तो सशक्त होते ही हैं - मन से भी और शरीर से भी। इसके बारे में चर्चा आगे करेंगे अगली कहानी में।
https://www.youtube.com/watch?v=CYnLZy_c1mA&t=901s
श्रीमती गांधी की अगुवाई में 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध का परिणाम आ गया था। 26 मार्च 1971 को पाकिस्तान से अलग अस्तित्व मिल गया था बांग्लादेश को। पाकिस्तान की सेना समर्पण करने के बाद 16 दिसंबर, 1971 को बांग्लादेश को सम्पूर्ण आज़ादी मिल गई थी। वह युद्ध इस बात पर प्रमाण हो गया था कि दक्षिण एशिया के देशों में भारत का मुकाबला कोई नहीं कर सकता। इधर बांग्लादेश के गठन के बाद दिल्ली ही नहीं, देश के अन्य राज्यों में भी इंदिरा गांधी के विरुद्ध, उन्हें सत्ता से पदच्युत करने की साज़िश शुरू हो गयी थी। समय साल 1974 की ओर अग्रमुख था।
जिस वर्ष बांग्लादेश का गठन हुआ था, उसी वर्ष ऋषिकेश मुखर्जी के निर्माण और निर्देशन में धर्मेंद्र, भादुरी, उत्पल दत्त, एके हंगल, असरानी, केस्टो मुखर्जी अभिनीत एक सिनेमा भारत के छवि गृहों में आया। उस सिनेमा का नाम था 'गुड्डी' । जो आज 45-वर्ष उम्र पार किये होंगे, शायद उस कालखंड में सिनेमा घरों में गुड्डी सिनेमा देखने के लिए परिवारों की भीड़ को देखें होंगे। बालकोनी, ड्रेस सर्किल वर्गों के टिकटों का मारामारी, कालाबाजारी भी याद करेंगे। जाया भादुरी का वह फ्रॉक, दोनों तरफ की चोटी और धर्मेंद्र के सामने शर्माता हुआ चेहरा, लेकिन समर्पण और मुहब्बत वाला, जो छोटे कक्षाओं में पढ़ने वाली छात्राओं को होता था, और आज भी होता है।

गुड्डी सिनेमा में अनेक कर्णप्रिय गीतों में एक गीत था "हमको मन की शक्ति, देना मन विजय करें ...... " जिसे आधुनिक भारत की मीरा कही जाने वाली श्रीमती वाणी जयराम ने गया था। वाणी जी दक्षिण भारतीय सिनेमा में एक गायिका के रूप में हस्ताक्षर थीं। उनकी आवाज को देश के सभी संगीतकार पसंद करते थे। ईश्वर के प्रति समर्पण वाले इस गीत के गीतकार गुलजार साहब हैं और संगीत दिया था वसंत देसाई ने। जिस दिन भारत के तक़रीबन 54.8 करोड़ लोग अपनी आज़ादी का 24 वां वर्षगाँठ मन रहा था, उसी दिन, यानी 15 अगस्त, 1971 को गुड्डी सिनेमा चलचित्र गृहों में प्रदर्शित हुआ।
गीत कुछ ऐसे थे:
हमको मन की शक्ति, देना मन विजय करें
दूसरों की जय से पहले खुद की जय करें
हमको मन की शक्ति, देना मन विजय करें
दूसरों की जय से पहले खुद की जय करें
भेद-भाव अपने दिल से साफ़ कर सकें
दूसरों से भूल हो तो माफ़ कर सकें
झूठ से बचे रहें, सच का दम भरें
दूसरों की जय से पहले खुद की जय करें
हमको मन की शक्ति, देना मन विजय करें
दूसरों की जय से पहले खुद की जय करें
मुश्किलें पड़े तो हम पे, इतना कर्म करें
साथ दे तो धर्म का, चलें तो धर्म पर
खुदपे होसला रहे, बदी से ना डरें
दूसरों की जय से पहले, खुद को जय करें

कल, जब अखबारवाला001 यूट्यूब के लिए एक कहानी कर रहा था तो मन-ही-मन गुड्डी सिनेमा का यह गीत गुनगुना रहा था और गुलजार साहब के शब्दों को आधुनिक भारत के राजनेताओं द्वारा गठित राजनीतिक पार्टियों के झंडों के मद्दे नजर सोच रहा था। सोच रहा था कि व्यावहारिक तौर पर क्या राजनेताओं के लिए उनके अपने-अपने राजनीतिक पार्टियों के झंडे उनके लिए सर्वोपरि है या राष्ट्रध्वज? यहाँ तो भारत माँ की जय से पहले खुद की जय करो वाली बात है। यहाँ तो विभिन्न झंडों के नीचे पलने वाले, फूलने वाले एँड़ी, घुटने कद के नेताओं से लेकर आदमकद के नेताओं तक सभी पहले अपना और अपनी पार्टी की 'जयनाद' चाहते हैं, उस पार्टी के झंडे का जयनाद चाहते हैं - राष्ट्रध्वज का जयनाद बाद में। या यूँ भी कह सकते हैं कि भारत के राष्ट्रध्वज के तले अपनी-अपनी राजनीतिक पार्टियों के ध्वजों का विकास और विस्तार चाहते हैं।
हम राष्ट्रीय ध्वज को मजबूत करने की बात तब करते हैं जब उनकी पार्टियों के ध्वज मजबूत होंगे। यह फिर व्यावहारिक तौर पर राष्ट्रीय राजधानी में स्थित सभी राजनीतिक पार्टियों के कार्यालयों में आप भ्रमण-सम्मेलन करके स्वयं आश्वस्त हो लें - बिरले आपको राजनीतिक पार्टियों के दफ्तरों में भारत का राष्ट्रीय ध्वज लहराता-फहराता मिलेगा। अगर आप उन पार्टियों के कार्यालयों में बैठे लोगों से बात करेंगे तो गुलजार साहब के वह बोल 'भेद-भाव अपने दिल से साफ़ कर सकें - दूसरों से भूल हो तो माफ़ कर सकें - झूठ से बचे रहें, सच का दम भरें" का भावार्थ अलग-अलग मिलेगा। वैसे अंतिम शब्द भेद-भाव मिटने पर ही खत्म करते हैं, लेकिन 24वें स्वाधीनता दिवस से 78वें स्वाधीनता दिवस तक कितना भेद-भाव काम हुआ, कितना सच का सामना हुआम कितने झूठ से बच पाए - यह तो पंचायत से लेकर विधानसभा, विधान परिषद्, लोकसभा और राज्यसभा में चुनाव से पूर्व चुनाव अधिकारी या भारतीय चुनाव आयोग के सामने प्रस्तुत हलफनामा जीता-जागता दृष्टान्त है।
बहरहाल, देश के राजनेता गण, राजनीतिक पार्टियों के सम्मानित लोग बाग़ यह कहते नहीं थकते थे कि भारत का राष्ट्रध्वज का सम्मान करना किसी भी भारतीय के लिए उनसे जीवन से अधिक महत्वपूर्ण है। सत्य वचन है। और यह भी उतना ही सत्य है कि भारत का आम नागरिक भारतीय तिरंगा के लिए, उसके सम्मान के लिए कुछ भी कर सकता है, करता है, किया है - इतिहास गवाह है। भारत की सैन्य व्यवस्था, अर्ध-सैनिक व्यवस्था और उस मैन-इन-यूनिफॉर्म से जुड़े लोग इसका जीता-जागता दृष्टांत है। आज भारत की सैन्य व्यवस्था के आंकड़े, उसमें अपना योगदान देने वाले कर्मियों का अगर जांच किया जाय तो शायद ही भारत का कोई गाँव ऐसा होगा जहाँ के सपूत मातृभूमि की सुरक्षा के लिए, तिरंगा की रक्षा और सम्मान के लिए अपना योगदान नहीं दे रहे हैं। हां, अगर आपको एक भी दृष्टान्त नहीं मिलेगा तो वह यह कि किसी भी भारतीय नेताओं, राजनेताओं के परिवार से कोई भी सदस्य भारत के सैन्य व्यवस्था में (अपवाद छोड़कर) नहीं मिलेंगे।
भारत के संविधान के अनुसार अथवा भारत के निर्वाचन आयोग की शर्तों के मुताबिक, यदि कोई पंजीकृत राजनीतिक पार्टी तीन विभिन्न राज्यों में लोकसभा की कुल सीटों की कम से कम २% सीटें हासिल करती हैं, चार अलग अलग राज्यों में लोकसभा या विधानसभा चुनाव में कम से कम चाह प्रतिशत मत प्राप्त करती हैं और लोकसभा में न्यूनतम चार सीटें हासिल करती हैं और कम से कम चार या उससे अधिक राज्यों में राज्यीय दल की मान्यता प्राप्त होती है, राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी के रूप में मान्यता प्राप्त हो सकती है। भारत में संघीय व्यवस्था है जिसमें नई दिल्ली यानी रायसीना हिल पर केन्द्र सरकार तथा विभिन्न राज्यों व केंद्र शासित राज्यों में राज्य सरकार होती है। और यही कारण है कि देश में राष्ट्रीय या क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों का वर्गीकरण उनके क्षेत्र में उनके प्रभाव के अनुसार किया जाता है।
निर्वाचन आयोग के अनुसार भारत में आठ राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियां हैं और 54 क्षेत्रीय पार्टियां हैं जो उनके अधीन निबंधीत हैं। राष्ट्रीय अथवा क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी का 'दर्जा' प्रदान करते समय निर्वाचन आयोग या फिर भारत का संविधान शायद यह कहीं नहीं कहता है कि राजनीतिक पार्टियां, चाहे राष्ट्रीय स्तर की हों अथवा क्षेत्रीय स्तर की, अपने कार्यालय में अपनी राजनीतिक पार्टी के ध्वज के अलावे राष्ट्र का राष्ट्रीय ध्वज नहीं लहरा सकती है, फहरा सकती है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने भारत के राष्ट्रीय ध्वज को आम नागरिक के घरों तक पहुँचा दिया है - सम्मान के साथ, साथ ही, लोगों से आग्रह भी किया है कि वे अपने राष्ट्र का ध्वज राष्ट्रीय ध्वज नियमों का सम्पूर्णता के साथ पालन करते अपना-अपना सम्मान व्यक्त कर सकते हैं। हो भी कैसे नहीं। आखिर भारत राष्ट्र भारत के 130+ करोड़ लोगों का ही तो है।
लेकिन अपवाद छोड़कर, दिल्ली स्थित किसी भी राजनीतिक पार्टियों के कार्यालयों में भारत का राष्ट्रीय ध्वज नहीं दीखता है। हाँ, उस राजनीतिक पार्टी विशेष का ध्वज हवाओं में लहराते, फहराते अवश्य दीखते हैं - दूर से। अब सवाल यह है कि ऐसा क्यों? क्यों राजनीतिक पार्टियां अपने-अपने कार्यालयों में, कार्यालय के भवनों पर, परिसरों में राष्ट्रीय ध्वज क्यों नहीं लहराते, फहराते 24 x 7 x 365 - क्या राष्ट्रध्वज से ऊँचा है उनके पार्टी का ध्वज?
