हीरापुर चौराहा (धनबाद) : कलिंग युद्ध के समय सम्राट अशोक की सेना मगध से छोटानागपुर-संथाल परगना के रास्ते ही युद्ध स्थल पर पहुंची थी। इतिहास साक्षी है कि इस युद्ध में कोई डेढ़ लाख से अभी अधिक सैनिक मृत्यु को प्राप्त किये थे। इतिहास इस बात का भी साक्षी है कि इस युद्ध के बाद मगध के सम्राट चक्रवर्ती अशोक युद्द में हुए भीषण रक्तपात को देख बौद्ध धर्म को स्वीकार लिए थे। आज भी बोध गया के खंभों पर इस बात का उल्लेख मिलता है।
लेकिन आज कल के अविभाजित बिहार और आज के विभाजित बिहार के झारखंड प्रदेश के धनबाद जिले के सरायढ़ेला इलाके में ऐसा कोई आलेख उल्लिखित नहीं मिलता है जो कल के शासक, जो समयांतराल कोयला माफिया शब्द से अलंकृत हुए, के सकारात्मक पहलुओं की गवाही देता हो। यहाँ 262-261 ई.पू. लड़े गए युद्ध और भारतवर्ष को आज़ाद होने के 78 वर्ष बाद आज भी सत्ता और वर्चस्वता के लिए एक ही परिवार के सभी सदस्यों को एक-दूसरे से लड़ने, मारने का बेतहाशा प्रमाण मिलता है। दुखद है।
आज से पचास वर्ष पहले के कालखंड में जो सत्ता और आधिपत्य के लिए रक्तपात किये थे, आज दुनिया में नहीं हैं, मृत्यु को प्राप्त कर लिए, या फिर प्रशासन द्वारा निर्मित कारावास के अधीन हैं, लेकिन सत्ता और पैसे के प्रति भूख आज भी कमी नहीं आयी है, जबकि तीसरी पीढ़ी का आगमन हो चूका है । सरायढ़ेला स्थित सन 1980 में निर्मित सिंह मैंशन, जो सूर्यदेव सिंह की निशानी थी, और है भी, आज उस मैंशन की तत्कालीन एकता खंड-खंड में विभाजित हो गया है। सूर्यदेव सिंह अपने जीवन काल में जहाँ अपने भाइयों, परिवारों की एकता को सूत्रबद्ध किये रहे; उनके अंतिम सांस के साथ ही एकता छिन्न-भिन्न हो गया। आज कौन अपना है, कौन पराया है, कौन रक्त का प्यासा है - एक गहन शोध का विषय हो गया हैं।
वैसे, विगत दिनों कहने के लिए अगली पीढ़ियां रक्तपात की परंपरा को विराम देने के लिए शांति पथ का अख्तियार करने की बात करना प्रारम्भ की हैं, युद्ध नहीं बुद्धम् शरणम् गच्छामि का पाठ गुनगुनाते हैं; लेकिन वहीँ आयुधों की भी पूजा अर्चना करते हैं। बन्दुक और पिस्तौल की सफाई भी करते हैं। जहाँ तक व्यावहारिकता का प्रश्न है कई सौ करोड़ सालाना अवैध आय के स्रोत पर इतनी आसानी से कोई अपना कब्ज़ा कैसे त्याग सकता हैं। खैर।
चलिए सत्तर के दशक में चलते हैं। कर्पूरी ठाकुर पहली बार सन् 1970-1971 में दारोगा प्रसाद राय और भोला पासवान शास्त्री के बीच पांचवें विधानसभा के कालखंड में 162 दिनों के लिए मुख्यमंत्री बने थे। दूसरी बार का कालखंड था 1977-1979 और यह सातवें विधानसभा का समय काल था। पहले एक वर्ष 301 दिनों के लिए कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री बने फिर आ गए रामसुंदर दास 302 दिनों के लिए। यह एक ऐसा दौड़ था जब बिहार ही नहीं, देश में राजनीतिक परिस्थियाँ बदल रही थी, साथ ही, अपराधियों का राजनीतिकरण भी प्रारम्भ हो गया था। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि राजनीति का अपराधीकरण का श्रीगणेश हो गया था।

तत्कालीन अविभाजित बिहार के अपराधी, जो सत्ता की गलियारों में कमर कसने लगे थे, उन्हें इस बात का एहसास हो गया था कि राजनीति उनके बिना नहीं चल सकती है और राजनेता उनके सहयोग के बिना, खासकर आर्थिक सहयोग, के बिना ‘राजनीति में डकार’ नहीं ले सकते हैं । यह सोच ‘पैसे’ के कारण हो गयी थी, जिसे तत्कालीन स्वार्थी राजनेताओं ने तुल भी दिया और भुनाया भी।
सत्तर के दशक के प्रारंभिक वर्षों में जब अखबार बेचा करता था, सुबह-सवेरे पटना से प्रकाशित अख़बारों में मोटे-मोटे, काले-काले, बड़े अक्षरों में पटना के बिहार के तत्कालीन राजनेताओं और तत्कालीन दक्षिण बिहार के कोयला सरगनाओं की खबरें प्रमुखता से प्रकाशित होती थी। अखबार और रेडियो के अलावे संचार का कोई साधन नहीं था। जैसे ही अख़बार के बण्डल बस अड्डे पर आते थे, अख़बारों का शीर्षक देखकर, अख़बार बेचना प्रारम्भ हो जाता था। वह समय होता था पटना बस अड्डा से धनबाद, रांची, डाल्टेनगंज, हज़ारीबाग, गिरिडीह, पलामू जमशेदपुर के लिए बसों का निकलना। माफिया शब्द का जन्म नहीं हुआ था। कोयला सरगना आम तौर पर लिखा जाता था।
उन दिनों कर्पूरी ठाकुर का प्रदेश के समाज में अच्छा स्थान था। यह बात अलग थी कि शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षित व्यक्ति कर्पूरी ठाकुर के व्यवहार से खुश नहीं थे, तथापि कर भी क्या सकते थे। क्योंकि शिक्षित व्यक्ति को आरंभिक काल से मूकदर्शक रहा है। दक्षिण बिहार के ‘दर्जनों कोयला सरगना’ मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए एक साथ कमर कस कर तैयार हो गए थे। पटना की सड़कों पर, तीन-सितारा होटलों में (पांच सितारा होटल नहीं था), डाक बंगला में अपना-अपना ठिकाना बनाकर सरकार गिराने को सज्ज थे। वजह था कर्पूरी ठाकुर कोयला सरगना और उसके साथ हाथ मिलाने वाले सभी लोगों की ‘तथाकथित ताकत को चुनौती दिए थे।” यानी कर्पूरी ठाकुर और कोयला सरगनाओं के साथ इस पार और उस पार की प्रशासनिक लड़ाई छिड़ गयी थी।

इतना ही नहीं, समयांतराल, वही कोयला माफिया एक बार फिर कोयला क्षेत्र के मजदूर संघ के नेता, जो प्रदेश के मुख्यमंत्री भी बने थे, बिंदेश्वरी दुबे के खिलाफ भी मोर्चा गोलबंद किया था। दुबे, जो 1985-1988 में दो साल 338 दिनों के लिए मुख्यमंत्री कार्यालय में थे और कोई साढ़े चार दशक तक कोयला क्षेत्र में मजदूरों का प्रतिनिधित्व किया था। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उन सभी गोलबंदी का प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से नेतृत्व डॉ जगन्नाथ मिश्र कर रहे थे।
डॉ. मिश्र 1975-1977 (दो साल 19 दिन), 1980-1983 (3 साल 67 दिन) और 1989-1990 (94 दिन) के लिए मुख्यमंत्री कार्यालय में भी बैठे थे। इतना ही नहीं, उन दिनों डॉ. मिश्र की आवाज तत्कालीन अख़बारों में बहुत ही प्रमुखता के साथ प्रकाशित भी हुई थी जब उन्होंने कहा था कि ‘उनका उद्देश्य न केवल बिंदेश्वरी दुबे को मुख्यमंत्री कार्यालय से बाहर निकलना है, बल्कि कोयला क्षेत्र में उनके प्रभुत्व को भी नेश्तोनाबूद कर देना है।’ उन दिनों बिहार के कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव टी अन्जाइहा थे, जो बिहार के प्रभारी भी थे। दुबे ने कांग्रेस आलाकमान को पत्र लिखकर यह सूचित भी किया था कि प्रदेश में कुछ राजनीतिक नेता और कोयला माफिया एक साथ मिलकर हमारी सरकार को गिराने की कोशिश कर रहे हैं।
साल 1977 का अप्रैल महीना का अंतिम दिन था और प्रदेश राष्ट्रपति शासन के अधीन चला गया था 30 अप्रैल से 24 जून 1977 तक, जब सातवीं विधान सभा में कर्पूरी ठाकुर 24 जून, 1977 को 11 वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लिए थे। वे दो बार प्रदेश का नेतृत्व किये और कुल 829 दिन मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान रहे। कर्पूरी ठाकुर कोयला माफियाओं के खिलाफ लड़े। राजनीतिक गलियारे में उन्हें ‘जननायक’ कहा जाता है। कर्पूरी ठाकुर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को आरक्षण का लाभ प्रदान करने में अग्रणी थे क्योंकि वे मुख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान मुंगेरी लाल आयोग की सिफारिशों को लागू किया था।

कर्पूरी ठाकुर के मुख्यमंत्री पद का शपथ लेने के दो महीने बाद धनबाद के उपायुक्त बने देवदास छोटराय जो कर्पूरी ठाकुर द्वारा ही धनबाद से बाहर भी निकले है और उनके स्थान पर आठ महीने के लिए स्थापित हुए भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी के डी सिन्हा। छोटराय का जाना इसलिए आवश्यक हो गया कि पटना सचिवालय या प्रदेश के राजनीतिक गलियारे में नीली आँख वाले अधिकारी होने के बाद भी, तत्कालीन कोयला मजदूर या फिर कोयलांचल का दबंग बी पी सिन्हा को उनके घर पर ही गोलियों से छल्ली कर दिया गया।
बी पी सिन्हा का जमीन पर ढ़ेर होना और सूर्यदेव सिंह का आसमान में उड़ने का मार्ग प्रसस्त किया और वे दर्जनों कोयला के क्षेत्र में सरगनाओं की उपस्थिति में भी कोयला माफिया के रूप में पटना ही नहीं, बिहार ही नहीं, राष्ट्र ही नहीं, विदेशी अख़बारों, पत्रिकाओं में भी सुर्खियों में आने लगे। उत्तर प्रदेश के बलिया से आकर एक साधारण कोयला मजदूर के रूप में काम शुरू करने वाले सूर्यदेव सिंह ने कोयला मजदूरों की ट्रेड यूनियन की अगुवाई कर इतनी शोहरत हासिल की कि धनबाद की धरती पर पत्ता भी उनकी इक्षा के बिना नहीं हिलता था। जितने दबंग, उतने ही सामाजिक कार्यों में रुचि दिखाने वाले सूर्यदेव सिंह की लोकप्रियता का आलम रहा।
चंद्रशेखर अब तक प्रधान मंत्री बने नहीं थे और जब प्रधानमंत्री बने तब भी सूर्यदेव सिंह को अपना परम-मित्र ही माना और कहा भी। चंद्रशेखर से नजदीकी के कारण उनका राजनीतिक रसूख परवान पर था। 1977 में सूर्यदेव सिंह पहली बार झरिया से विधायक बने। उनका झरिया विधानसभा सीट पर कब्ज़ा कांग्रेस की करारी हार थी। वे तत्कालीन श्रमिक नेता एस के राय को पराजित किया था। सं 1977 के बाद 1980, 1985 व 1990 में भी जीत दर्ज की।
कहते हैं 1977 के विधानसभा चुनाव में जनता पार्टी का टिकट मिलने के बाद भी पहली बार चुनाव लडऩे से सूर्यदेव सिंह घबरा रहे थे। उन्होंने अपने साथियों से अपनी स्थिति के बारे में साफ कहा था कि ऐसी स्थिति में हमें कोई वोट क्यों देगा। वे कोलियरी से अधिक बाहर नहीं निकले । इसके बाद हमेशा उनके साथ रहनेवाले राजनंदन सिंह, रामनाथ सिंह, बलराम सिंह मास्टरजी आदि ने आत्मविश्वास जगाया। क्योंकि सूर्यदेव सिंह के पास बाहुबल के साथ साथ पिसा भी था। परिणाम यह हुआ कि तत्कालीन विरोधी नेताओं के खासमखास कई लोग एच एम लांडे, देवनंदन ग्वाला, सीताराम, जयंती प्रसाद, सुभाष ठाकुर, अवधेश राय, सुरेश राय आदि सूर्यदेव सिंह के साथ हो गए।
उन दिनों मैं धनबाद में टेलीग्राफ अखबार का संवाददाता था। सूर्यदेव सिंह के 50वें जन्मदिन से एक माह पूर्व उनके राजनीतिक गुरु, मित्र, सहयोगी, विश्वासी चंद्रशेखर देश के नौवें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लिए। कोई 223 दिनों तक प्रधानमंत्री कार्यालय में बैठने वाले चंद्रशेखर विश्वनाथ प्रताप सिंह से पदभार लिए थे। एक युवा प्रधानमंत्री के रूप में गैर-कांग्रेसी चंद्र शेखर से देश को बहुत उम्मीद थी। लेकिन प्रधानमंत्री का शपथ लेने के कुछ दिन बाद चंद्रशेखर 27 दिसंबर, 1939 को जन्म लिए अपने गाँव के मित्र सूर्यदेव सिंह के धार धनबाद में सिंह मैंशन पधारे। मैं उनके साथ था।

वजह भी था। मेरी भले कोई वजूद नहीं थी, लेकिन जिस अखबार का मैं प्रतिनिधित्व कर रहा था, उसके शब्द देश की राजनीतिक गलियारे में अमित छाप छोड़ता था। जब चंद्रशेखर से सूर्यदेव सिंह के सामने पूछा कि "सूर्यदेव सिंह को कोयला माफिया कहा जाया है, इनके ऊपर अनेकों आपराधिक मामले हैं, और एक प्रधानमंत्री के रूप में आप इनके घर पर है?" मेरी बात सुनकर दोनों मुस्कुराये। मैं जानता था 'गुस्सा अवश्य हुआ होगा", लेकिन चंद्रशेखर तक्षण कहते हैं: "माफिया जनम से तो नईखे ने बा। पहिले मित्र। इसलिए इनके जन्मदिन की बधाई देने आया हूँ।"
चंद्रशेखर ही एकमात्र राजनेता नहीं थे, जिनके क़दमों के निशान सं 1980 के दशक में निर्मित राष्ट्रीय राजमार्ग-32 पर स्थित सिंह मैंशन में पड़ते थे। स्थानीय नेताओं से लेकर पटना, कलकत्ता और दिल्ली के सैकड़ों नेता थे जो सिंह मैंशन में सर झुकाकर प्रवेश लेते थे। वजह भी था - काले कोयले की काली कमाई और सफेदपोश लोग। उस दौर में पटना के सचिवालय अथवा दिल्ली के कोयला मंत्रालय और कलकत्ता के कॉल इण्डिया में बैठे नेता और अधिकारी भले इस बात से खुश को कि वे कोयला क्षेत्र का राजा हैं, हकीकत तो यह था कि पुरे कोयलांचल में वास्तविक शासन सूर्यदेव सिंह का था। इतना ही नहीं, उस कालखंड में बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र, बिंदेश्वर दुबे जैसे नेता भी तत्कालीन कोयला माफिया डॉन के यहाँ खुलान भले नहीं, लेकिन अन्तःमन से हाजरी जरूर लगते थे। वजह - पैसा और दबंगता। उन दिनों धनबाद में प्रस्थापित जिला उपायुक्त हमेशा मुख्यमंत्री के गर्म लाइन से जुड़े होते थे। आज भी स्थिति बदली नहीं है। सिर्फ स्थान बदल गया है - अपना पटना सचिवालय के स्थान पर रांची सचिवालय हो गया है।
अगर ऐसा नहीं होता तो सं 1956 से अब तक धनबाद समाहरणालय में कोई 54 उपायुक्तों का नाम पीतल के अक्षरों में गोदना के तरह नहीं गोदाया होता। अब आप ही सोचिये, कि एक उपायुक्त अपने जिले में एक साल दो महीने में क्या कर लेगा? इतना ही नहीं, सं 1985 में जब ए के उपाध्याय जी उपायुक्त थे, उस समय से लेकर कोयला क्षेत्र में आधिकारिक शब्दों से अलंकृत कोयला माफिआओं की समाप्ति तक और झारखण्ड राज्य के निर्माण तक 14 उपायुक्त की लम्बी सूची नहीं बनती। बाबू सूर्यदेव सिंह की ठेंघुने और कमर कमजोर होते देख धनबाद से पटना और दिल्ली तक सैकड़ों लोग खुश हो रहे थे।
झरिया स्थित बिहार भवन, बिहार टॉकीज, उस परिसर में स्थित अन्य दुकानों को खाली कराये जाने की कार्रवाई पूरी हो गई थी।सूर्यदेव सिंह कहते रहे वे सन 1976 में उक्त भवन को 35 लाख में क्रय किये थे, लेकिन तत्कालीन उपायुक्त मदन मोहन झा, धनबाद और पटना में बैठे आला अधिकारी कहते नहीं थक रहे थे कि उस भवन और परिसर पर सूर्यदेव सिंह का अवैध कब्ज़ा है। सालों लम्बा न्यायिक से लेकर प्रशासनिक युद्ध लड़ा गया था। सवाल सिर्फ 'झरिया पर कब्ज़ा' का था।
सूर्यदेव सिंह 4 भाई थे। विक्रमा सिंह अपने पैतृक गाँव बलिया में ही रह गये। जबकि राजन सिंह (अब दिवंगत), बच्चा सिंह (अब दिवंगत) और रामधीर सिंह (आजीवन कारावास) सूर्यदेव सिंह (अब दिवंगत) के साथ रहे। उन दिनों सूर्यदेव सिंह पर प्रशासन अपनी पकड़ बना रही थी, उसी काल खंड में सूर्यदेव सिंह आरा लोक सभा से चुनाव लड़ने लगे। उधर चन्द्रमा सिंह बलिया लोक सभा से निर्दलीय चुनाव लड़ने को ठान लिए। उन दिनों बलिया में सूर्यदेव सिंह के राजनीतिक गुरु चंद्रशेखर चाहते थे कि चन्द्रमा सिंह अपनी उम्मीदवारी वापस ले ले। वजह यह था कि बलिया में चंद्रशेखर के अभ्यर्थी चुनावी मैदान में थे। चंद्रशेखर सूर्यदेव सिंह को बात-बार कहे कि चन्द्रमा सिंह को उम्मीदवारी वापस लेने को कहो। सूर्यदेव सिंह के कहने पर भी चन्द्रमा सिंह ऐसा नहीं किये। बाद में जब सूर्यदेव सिंह चंद्रशेखर से बात करना चाहे तो चंद्रशेखर बात करने से मन कर दिए और यहीं अंत हो गया सूर्यदेव सिंह का सूर्य।

उधर सूर्यदेव सिंह की मृत्यु के बाद बच्चा सिंह झरिया के विधायक बने। उसके बाद सूर्यदेव सिंह की पत्नी कुंती सिंह और अभी उनके बेटे संजीव सिंह झरिया से विधायक बने। सन 1977 से 2014 तक के विधान सभा चुनाव में झरिया विधान सभा सीट पर हमेशा सिंह मेंशन परिवार का ही कब्ज़ा रहा। केवल 1995 में राजद के टिकट पर आबो देवी को इस सीट से जीत मिल सकी थी। सिंह मैंशन के तर्ज पर ‘सूर्योदय’ बना लिया और राजन सिंह का परिवार ने रघुकुल। रामधीर सिंह का बलिया-धनबाद आना-जाना लगा रहा, लेकिन उनकी पत्नी इंदू देवी और बेटा शशि सिंह मेंशन में ही रहती रही। सूर्यदेव सिंह की मृत्यु के बाद ‘सूर्योदय’ 'रघुकुल' और ‘सिंह मैंशन’ में कभी मधुर सम्बन्ध नहीं रहा, जहाँ तक नयी पीढ़ियों का सवाल है। जून 15 सन 1991 में हार्ट अटैक से हुई उनकी मौत के बाद परिवार के बीच ही विवाद हो गया और सभी भाइयों के बीच वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई।
कोयलांचल में आठ बड़े गैंग में चार सौ करोड़ रुपए से भी अधिक की रंगदारी को लेकर खूनी खेल चलता रहता है। पिछले तीन दशकों में 350 से भी ज्यादा लोगों की हत्याएं माफियाओं ने कर दी, जबकि छोटे-छोटे प्यादे तो लगभग रोज ही मारे जाते हैं। कोयलांचल में 40 वैध खदाने हैं, जबकि इससे कहीं अधिक अवैध खनन। इन वैध खदानों से लगभग 1.50 लाख टन कोयले का उत्पादन होता है, जबकि इस उत्पादन में लोडिंग, अनलोडिंग और तस्करी में लगभग 400 करोड़ रुपए की रंगदारी माफिया के गुर्गे करते हैं। वैसे पिछले 50 साल से कोयलांचल में वर्चस्व की लड़ाई चल रही है, हर रोज एक छोटा गैंग उभरकर सामने आ जाता है। उन दिनों हुई कई हत्याओं के बाद लाशें भी नहीं मिल पाईं। इन्हें बेदर्दी से जलती आग में फेंक दिया गया।
बहरहाल, धनबाद जिला के स्वतंत्र गठन के बाद से अब तक साढ़े चार दर्जन उपायुक्त काली कुर्सी पर बिछे सफ़ेद तौलिये पर विराजमान हुए। वैसे सरकारी आंकड़ों के मुताबिक झारखण्ड में करीब 23,56,678 वरिष्ठ नागरिक हैं, जिनकी आयु 60 वर्ष से अधिक है। जिसमें धनबाद जिले का योगदान करीब 1,64,511 है। यानी इतने लोग धनबाद जिला के स्थापना काल से यहाँ की राजनीति, चाहे समाहरणालय की राजनीति हो या कोयला खदान की, भारत कोकिंग कॉल लिमिटेड की या फिर कोयला माफियाओं की, चसगंदीद गवाह रहे हैं। धनबाद की आबादी करीब 17 लाख है और इसमें वरिष्ठ नागरिकों की संख्या नग्न है। स्वाभाविक है शहर पर, कोयला क्षेत्रों में, खदानों पर चाहे भूमिगत हो या खुले आसमान के नीचे- नई पीढ़ी के लोग कब्ज़ा जमाना चाहते हैं। कुछ प्रत्यक्ष और कुछ परोक्ष रूप से अपनी-अपनी भागीदारी दे रहे हैं। 
लेकिन धनबाद के सभी 1209 गावों में, 54 वार्डों में या बाघमारा, बालिएपुर, धनबाद, गोविंदपुर, निरसा, तोपचांची, टुंडी, पूर्वी टुंडी, इगरकुंड और कलिआसोले ब्लॉकों में रहने वाले लोगों का मानना है कि आज धनबाद या कोयलांचल में वह बात नहीं रही, जो कल थी। पीढ़ियों में बदलाव है।
तस्वीर: इंटरनेट से
क्रमशः ………….
