राज तिलक उद्यान (कोरोनेशन पार्क), उत्तरी दिल्ली : आप विश्वास करें अथवा नहीं आपकी मर्जी। लेकिन सच यही है। कोई 51.90 वर्ग किलोमीटर लम्बाई और 48.48 वर्ग किलोमीटर चौड़ाई में, 11-जिलों (उत्तर, उत्तर-पूर्व, उत्तर-पश्चिम, पश्चिम, दक्षिण, दक्षिण-पूर्व, दक्षिण-पश्चिम, नई दिल्ली, मध्य दिल्ली, शाहदरा और पूर्व दिल्ली) में फैले भारत की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में रहने वाले तक़रीबन 33807000 + लोगों में शायद दस फीसदी और उससे भी कम लोगों को मालूम होगा कि दिल्ली में आज भी राजतिलक उद्यान (कोरोनेशन पार्क) है जो ब्रिटिश सत्ता के उत्थान और पतन का पर्यायवाची तो है ही, स्वतंत्र भारत के लोगों की 'दरिद्र मानसिकता' का भी परिचायक है।
कहते हैं कि 28 अगस्त, 2017 को अमेरिकन हिस्टोरिकल एसोसिएशन ने चार्लोट्सविले में श्वेत वर्चस्ववादियों द्वारा किए गए हिंसक विरोध प्रदर्शन के मद्देनजर एक बयान जारी किया था, जिसमें शहर में कॉन्फेडेरसी के सबसे महत्वपूर्ण जनरल रॉबर्ट ई. ली की प्रतिमा को हटाने की योजना का विरोध किया गया था। सार्वजनिक संस्कृति के लिए इतिहास के महत्व पर जोर देते हुए, बयान में तर्क दिया गया है कि कॉन्फेडरेट मूर्तियों को हटाने का प्रस्ताव "न तो इतिहास को बदलेगा, न ही इसे मिटाएगा" बल्कि यह इस बात पर पुनर्विचार था कि कौन से स्मारक और उनमें निहित कौन से इतिहास नागरिक सम्मान के योग्य हैं। एसोसिएशन ने प्रस्ताव दिया कि कॉन्फेडरेट मूर्तियों को ऐतिहासिक कलाकृतियों के रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए। आदर्श रूप से, उन्हें अन्य स्थानों पर ले जाया जाना चाहिए जहाँ वे सुरक्षित रहें, साथ ही आने वाली पीढ़ियों को उसके बारे में जानकारी प्राप्त हो सके। एसोसिएशन द्वारा दुनिया के अन्य हिस्सों से दो उदाहरणों का अनुमोदनपूर्वक उल्लेख किया गया है: बुडापेस्ट, हंगरी में मेमेंटो पार्क, जिसमें पुरानी कम्युनिस्ट मूर्तियाँ और पट्टिकाएँ हैं, और उत्तरी दिल्ली में कोरोनेशन पार्क।
परन्तु, एसोसिएशन भले उत्तरी दिल्ली के इस राजतिलक उद्यान (कोरोनेशन पार्क) का जिक्र कर दिया हो, ब्रिटिश कालीन यहाँ रखी सभी मूर्तियां न तो सुरक्षित हैं और ना ही उन मूर्तियों के बारे में पर्याप्त की तो बात ही नहीं करें, कुछ भी जानकारी उपलब्ध नहीं है। इतना ही नहीं, उन मूर्तियों को जिस भव्यता के साथ जमीन से कोई पंद्रह-बीस फुट ऊँचा रखा गया है, नीचे काला पत्थर चिपका दिया गया है। उन पत्थरों पर न तो उन मूर्तियों का नाम अथवा उसके बारे में कोई शब्द लिखा है। हां, उद्यान के मध्य में बने ऐतिहासिक गुम्बद पर उन इतिहासों को अवश्य उल्लिखित किया गया है जिसके लिए इस स्थान का महत्व है। दिल्ली में न तो इतिहासकारों की किल्लत है, ना ही समाजशास्त्रियों की और ना ही समाज सेवा करने वाले, पुरातत्वों की देखभाल करने वाले लोगों और संस्थानों की किल्लत है। परन्तु इस स्थान को देखकर ऐसा नहीं लगता कि प्रदेश के प्रशासन या राजनेताओं के प्राथमिकता की सूची में यह स्थान दर्ज है।
यह स्थान एक पार्क है। लोगों के प्रवेश पर कोई नियंत्रण नहीं है। यह क्षेत्र बिलकुल एकांत और अलग है। यह अलग बात है कि दिल्ली के पारिवारिक अदालतों में लाखों मुकदमें वर्षों से, दशकों से लंबित हैं जो 'पति-पत्नी' के 'सम्बन्ध विच्छेद' से संबंधित है। लेकिन यह स्थान दिल्ली के तथाकथित 'प्रेमी-प्रेमिकाओं', 'युगल-जोड़ियों' के लिए 'स्वर्ग' के सामान है। बेख़ौफ़, बेरोक रोक। शेष आप पाठक ज्ञानी हैं। सुरक्षा के लिए निजी क्षेत्र के कर्मी तैनात हैं, लेकिन 'प्रेमालाप' के आगे वे भी 'नतमस्तक' हैं। देखते हैं तो आंख मूंद लेते। मैं कई लोगों से, महिलाओं से, पुरुषों से, युवकों से, युवतियों से पूछा कि 'कोरोनेशन पार्क' का ऐतिहासिक महत्व क्या है? सभी दांत निपोड़ दिए। निर्लज्जता अपने उत्कर्ष पर था। वे कहते हैं: "हम कोरोना का नाम तो सुने जो पूरे नेशन को दबोचा था, यह कोरोनेशन नहीं जानते और ठिठियाने लगे। शैक्षिक और सामाजिक स्थिति इससे बेहतर नहीं है।
बहरहाल, भारत सरकार का विश्व स्तरीय राजनीतिक सम्बन्ध और भी अधिक मजबूत करने के लिए, खासकर ब्रिटेन के साथ, जहाँ न केवल भारतीय मूल के श्री ऋषि सुनक प्रधानमंत्री हैं और जहाँ करीब 694,000 भारतीय और भारतीय मूल के लोग इंग्लैंड में रहते हैं; भारत सरकार को उत्तरी दिल्ली स्थित कल का 'दिल्ली दरबार' स्थल और आज का 'कोरोनेशन पार्क' पर एक नजर डालनी होगी। नजर के साथ साथ, वहां अंग्रेजी कालखंड की पांच ऐतिहासिक मूर्तियों को भी देखनी होगी। आज जो स्थिति है वह उसके योग्य नहीं है।
कहते हैं दिल्ली में तीन दरबार लगे अंतिम दिल्ली दरबार से पूर्व। पहला दरबार 1 जनवरी,1877 में लगा जब महारानी विक्टोरिया को भारत की सम्राज्ञी घोषित किया गया। उन का जश्न समारोह मनाने के लिए इस दरबार के लिए जगह ढूंढी गई यमुना नदी के तट पर। हम जब किंग्सवे कैंप चौक से दाहिने हाथ निरंकारी कॉलोनी और बुराड़ी की ओर बढ़ते हैं, बाहरी रिंग रोड से पहले एक स्थान है। आज हम सभी कोरोनेशन पार्क के रूप में जानते हैं। लोग माने अथवा नहीं, लेकिन भारतीय राजनीतिक इतिहास की बुनियाद यही हैं। उस कालखंड में भारत के वाइसरॉय लियट्टन थे। इस दरबार में महारानी विक्टोरिया तो नहीं आई पर वाइसरॉय लियट्टन ने प्रतिनिधित्व किया था। ब्रिटिश सरकार के गणमान्य व्यक्ति, सरकार के प्रतिनिधि और राजघराने के लोगों के अतिरिक्त सेना के महत्वपूर्ण व्यक्ति और अनेकानेक लोग उपस्थित थे।
दूसरा दरबार इसी कोरोनेशन पार्क में 1 जनवरी 1903 में आयोजित हुआ। उस समय वाइसरॉय लॉर्ड कर्जन थे। यह आयोजन एडवर्ड सप्तम को इंडिया का सम्राट घोषित करने की खुशी में किया गया था। देशी जमींदारों, रियासतों के राजाओं और सामंतों को भी इसमें आमंत्रित किया गया था। कहा जाता है कि लोगों के आवागमन के लिए एक विशेष छोटी रेल लाइन बिछाई गई थी उन दिनों। तम्बुओं का एक पूरा अस्थाई शहर बसा दिया गया जिसमें देसी रियासतों के राजा-महाराजा और ब्रिटिश सरकार के अन्य महत्वपूर्ण व्यक्तियों को शाही शानो शौकत से ठहराया गया था। पोस्ट ऑफिस, टेलीग्राम और फोन की व्यवस्था की गई थी। रंगारंग कार्यक्रम हुए थे। यह भी कहा जाता है कि इस की शान शौकत का मुकाबला न तो पुराना दरबार कर सका और न ही आने वाला 1911 का दरबार। इसमें एडवर्ड सप्तम तो नहीं आ सके बल्कि उनके भाई ड्यूक ऑफ कनॉट ने इसका प्रतिनिधित्व किया।
इतिहास को हम चाहे कितना भी मिटने का प्रयास करें, लेकिन सच तो यही है कि तीसरा दरबार ब्रिटिश काल में 12 दिसम्बर, 1911 में इसी कोरोनेशन पार्क में लगा जब जॉर्ज पंचम का राज्याभिषेक हुआ। इस दरबार में वह स्वयं उपस्थित हुए। इसी दरबार में भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा की गई। इसी दरबार में यह भी निर्णय लिया गया था कि एक नई राजधानी का स्वरूप खड़ा किया जाए। बहुत सारे राजनितिक, प्राकृतिक कारणों के अलावे एक खास वजह यह थी कि इससे पूर्व हिंदू , मुस्लिम और मुगल साम्राज्य के दौरान शाहजहानाबाद दिल्ली ही देश की राजधानी थी। लोगों के मन में दिल्ली दरबार का एक आकर्षण और महत्व हमेशा से रहा था। अंग्रेज भी इस परंपरा को निभा कर अपनी ताकत और वैभव का प्रदर्शन करना चाहते थे और ब्रिटिश सरकार उस महत्व को भी बनाए रखना चाहती थी। दिल्ली में कोरोनेशन पार्क में विशाल खुले मैदान में कोरोनेशन दरबार आयोजित करने का निर्णय मुगल साम्राज्य की पूर्व राजधानी के रूप में दिल्ली के ऐतिहासिक महत्व पर जोर देने के लिए एक कदम था ।

राजधानी दिल्ली के उत्तर में 52 एकड़ (21 हेक्टेयर) में फैला एक भूखंड है, जहाँ लगभग 200 वर्षों के ब्रिटिश शासन की स्मृति में बनाया गया है। पड़ोसी राज्य हरियाणा की सीमा के निकट नई दिल्ली के बुराड़ी क्षेत्र में स्थित यह भूदृश्य स्थल स्मारकों, पक्के रास्तों, पौधों और पेड़ों से भरा हुआ है। प्रवेश द्वार पर एक बड़ा भारतीय तिरंगा झंडा आगंतुकों का निःशुल्क प्रवेश के साथ स्वागत करता है। कोरोनेशन पार्क का नाम तीन ब्रिटिश सम्राटों - 1877 में रानी विक्टोरिया, 1903 में किंग एडवर्ड VII और 1911 में किंग जॉर्ज V - के भारत के शासक के रूप में “राज्याभिषेक” से लिया गया है।
1960 के दशक में नई दिल्ली के इलाकों से औपनिवेशिक मूर्तियों को हटाने के लिए एक तेज़ आंदोलन हुआ था। उनमें से कुछ, जिनमें सबसे प्रमुख जॉर्ज पंचम की मूर्ति थी जो इंडिया गेट के पास एक 'छतरी' के नीचे खड़ी थी, को हटाकर इस जगह पर रख दिया गया। पार्क के बीच में जो स्तंभ है वह 1911 राज्याभिषेक दरबार के वास्तविक स्थल की याद दिलाता है। औपनिवेशिक प्रतिमाएं नई औपनिवेशिक राजधानी में बिखरी पड़ी थीं और उन्हें “तोड़-फोड़ की जा रही थी, वे मौसम के प्रभाव में थीं और क्षतिग्रस्त हो रही थीं। इसलिए, INTACH ने दिल्ली सरकार को सुझाव दिया कि 1960 के दशक से वहां पड़ी कलाकृतियों को संरक्षित किया जाए और इसके आसपास एक पार्क विकसित किया जाए और लैंडस्केप बनाया जाए। इसने आगंतुकों को इस स्थल के इतिहास और महत्व के बारे में जानने में मदद करने के लिए एक व्याख्या केंद्र स्थापित करने का भी सुझाव दिया। लैंडस्केप आर्किटेक्ट मोहम्मद शहीर द्वारा बनाए गए पार्क के डिजाइन की दृष्टि मूर्तियों के मूल संदर्भ को जगाने की अपनी क्षमता में अद्भुत है, जबकि आगंतुक को इस बात में कोई संदेह नहीं है कि पार्क एक अलग, नई जगह है।
दूसरा दिल्ली को राजधानी बनाने की एक वजह और थी - सुरक्षा की दृष्टि से भी दिल्ली बहुत महत्वपूर्ण थी। 1857 में अंग्रेजों के विरुद्ध जो विद्रोह हुआ था, उसमें अंग्रेजों की जानमाल की सुरक्षा दिल्ली में ही हुई थी। बहुत सारे अंग्रेज लोगों ने विश्वविद्यालय के रिज़ क्षेत्र में जहां फ़्लैग स्टाफ बना हुआ है वहां आकर शरण ली थी। दिल्ली में विद्रोह को दबा दिया गया था। ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि वाइसरॉय यहीं रिज क्षेत्र में रह रहे थे। वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय का कुलपति कार्यालय ही उस समय वाइसरॉय का रेजिडेंस था।नई राजधानी और वाइसरॉय का निवास बनाने के लिए जो क्षेत्र चुना गया वह यही क्षेत्र था। स्वाभाविक है कि नई राजधानी के कार्यालय भी यहीं बनते।
नई राजधानी और राज निवास बनाने के लिए एक स्मृति पत्थर लगाया गया पर अफसोस कि उसके बाद इस जगह को बदल दिया गया। नई राजधानी और वायसराय का नया निवास (वर्तमान में राष्ट्रपति भवन) रायसीना की पहाड़ियों पर स्थानांतरित कर दिया गया। बहुत सारे कारण रहे होंगे इसको स्थानांतरित करने का, लेकिन कहा जाता है कि इस स्थान से यमुना नदी की दूरी बहुत कम थी जहां बाढ़ आने पर पानी भर जाने का खतरा था। अगर प्राकृतिक आपदा का डर न होता तो आज का यह उत्तरी क्षेत्र, कोरोनेशन पार्क, किंग्सवे कैम्प, सिविल लाइंस और उस के आसपास का क्षेत्र इंडिया की राजधानी नई दिल्ली होता।
