मेरा मानना है कि भारत के किसी भी पत्रकार को एक बार इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता अख़बार में पत्रकारिता के लिए कलम अवश्य रगड़ने की इच्छा अवश्य होती होगी। यह अलग बात है कि अब कलम से पत्रकार ना ही डायरी पर टीपते हैं और ना ही कहानी लिखते हैं। चाहे पत्रकार सम्मलेन हो या विशेष अन्तर्वीक्षा की बात। आज तो सीधा शरीर के ऊपरी हिस्से वाले वस्त्र में गर्दन के नीचे एक यंत्र लटका देते हैं और मोबाइल जिन्दाबाद का नारा लगाते शेष सभी कार्य मोबाइल कर देता है। हाँ, दफ्तर आने पर सुनकर सीधा कंप्यूटर पर लिखते चले जाते हैं। कम्प्यूटर महाशय शब्दों की गिनती भी कर देते हैं, कहानी का संपादन भी कर देते हैं, शीर्षक भी बता देते हैं। यही स्थिति आज के सभी समाचार पत्रों की है।
यह नब्बे के ज़माने तक नहीं था, खासकर इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता पत्र समूह में। आज के इंडियन एक्सप्रेस को तो दिल्ली सल्तनत में रायसीना पहाड़ी पर बैठे मठाधीशों की पार्टियों के सहयोगी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जैसे नेता लोकार्पण करते हैं, स्वाभाविक है आज अख़बार का वह तेवर नहीं होगा। लेकिन, अपवाद छोड़कर, उस ज़माने के जो पत्रकार इन अख़बारों की भाषा को, भाषा की तेवर को, शब्दों के विन्यास को, शब्दों के कटाक्ष को ग्राह्य कर लिए वे बन गए संजय कुमार सिंह।
संजय कुमार सिंह को नब्बे के पूर्वार्ध से जानता हूँ। जनसत्ता अखबार के संपादकीय विभाग में संवाददाताओं द्वारा लिखित समाचारों का अपनी कलम से शल्य चिकित्सा करते थे। कहानियों का अंग-प्रत्यंग इस कदर काटते-छांटते थे, तेवर और आक्रामक शब्दों का प्रयोग इस कदर करते थे कि प्रातः संस्करण में जब संवाददाता अपनी कहानी देखता था तो उसे अगली कहानी लिखने में शब्दों का चयन, प्रयोग, विन्यास के सौ तरीके सीखने को मिलता था।
जमशेदपुर में पले-बढ़े और पढ़े, वहीं से पत्रकारिता शुरू करके 1987 में जनसत्ता से जुड़े, संजय कुमार सिंह ने 2002 में वीआरएस ले लिया था। घर चलाने के लिए उन्हें पत्रकारिता की नौकरी से बेहतर अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद का काम लगा।
अनुवाद कम्युनिकेशन के संस्थापक के रूप में और इससे पहले भी संजय ने खूब अनुवाद किये हैं और इनमें कई प्रतिष्ठित व महत्वपूर्ण किताबें हैं। नौकरी छोड़ने के बाद अपनी पहली पुस्तक, पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना और समझा के बाद संजय ने जीएसटी को समझने में खूब माथापच्ची की और एक किताब, जीएसटी : 100 झंझट लिखकर बताया कि इसके रहते छोटे स्तर पर काम करना मुश्किल है।
अपने अनुभव से संजय को पता था कि जीएसटी के जाल में नहीं फंसना है और वे बच गये। बाद में इस तरह के काम को जीएसटी पंजीकरण से मुक्त किया गया। इस बीच अनुवाद का काम कम होने लगा और अब जब कंप्यूटर और एआई से अनुवाद हो जाता तो संजय बेरोजगार और रिटायर हो गये हैं। पेंशन मिलनी नहीं तो तीसरी किताब लिखी। ईवीएम पर यह किताब, ईवीएम वाशिंग मशीन में धुली – इन दिनों चर्चा में है।

जब यह किताब आई तभी यह खबर आई कि सरकारी, यूनियन बैंक ने 7.25 करोड़ रुपये में "इंडिया@100" की 1.8 लाख से अधिक प्रतियां खरीदने के लिए एडवांस दिया है और यह पुस्तक मुफ्त में बांटी जानी थी। यह पुस्तक देश के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति वी सुब्रमण्यन की है और इसका पूरा नाम है "इंडिया@100: एनविज़निंग टुमॉरोज़ इकोनॉमिक पावर हाउस"। यूनियन बैंक का ऑर्डर प्रकाशन से पहले का है और इसका खुलासा किताब के लोकार्पण के बाद हुआ।
इससे पहले, 6 अगस्त 2024 की एक खबर के अनुसार, "इंडिया@100" का लोकार्पण केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता पीयूष गोयल ने किया था। खबर के अनुसार यह एक उच्च स्तरीय कार्यक्रम था और यह पुस्तक 2047 तक भारत की आर्थिक प्रगति को दर्शाता है। विमोचन को भारत के आर्थिक विकास और स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष तक एक विकसित राष्ट्र बनने की आकांक्षाओं पर चर्चा में एक महत्वपूर्ण क्षण कहा गया था। जो भी हो, अंग्रेजी में छपी सरकार का प्रचार करने वाली 995 रुपये की इस किताब को सरकारी प्रायोजक मिल गया पर हिन्दी में ईवीएम का सच और उससे जुड़े तथ्य बताने वाली अपनी किताब की कीमत कम रखने के लिए लेखक-प्रकाशक को तमाम कोशिशें करनी पड़ीं क्योंकि प्रायोजक तो मिलने से रहा।
लेखक का कहना है, डेमोक्रेसी ऐट रिस्क (2010) से इंडिया @ 100 (2024) तक पुस्तक प्रायोजन और प्रकाशन के साथ की राजनीति को हिन्दी में समझने के लिये "ईवीएम वाशिंग मशीन में धुली"; (2025) से अच्छी पुस्तक शायद ही हो। पूरी तरह शोध पर आधारित यह पुस्तक लेखक की तीसरी रचना है और बहुत मेहनत से लिखी गई है जो उनके जैसे पत्रकारीय अनुभव के बिना शायद ही लिखी जा सके। यह हमारी निर्वाचन प्रणाली के प्रमाणिक होने पर न केवल शक करती है बल्कि उसे बेहतर बनाने के सुझाव भी देती है। एक मशीन जो बीजेपी के विपक्ष में रहते संदिग्ध थी और सत्ता में आते ही "लाड़ली बहना"; हो गई उसकी कहानी है।

यह नरेंद्र मोदी की किताबी राजनीति की भी कहानी है। वह इसलिए कि जब इसकी शुरुआत हुई तो यह "खराब" थी। लोकतंत्र खतरे में था। इससे चुनाव हो ही नहीं सकते थे। यह ईवीएम पर 2010 में आई दो किताबों, सुब्रमण्यम स्वामी और एस कल्याणरमण की “इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन्स : अनकांस्टीट्यूशनल एंड टैम्परेबल” (असंवैधानिक और छेड़छाड़ योग्य) तथा दूसरी भाजपा नेता, जीवीएल नरसिम्हा राव की, “डेमोक्रेसी ऐट रिस्क! कैन वी ट्रस्ट आवर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन्स?” (लोकतंत्र खतरे में! क्या हम अपनी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर भरोसा कर सकते हैं?) की कहानी के साथ उसके बाद जो सब हुआ उसका क्रमवार वर्णन है। हालांकि इसमें किताबें लिखवाने और छपने से रोकने के मामलों का जिक्र नहीं है। वह अलग विषय है। उसपर भी एक किताब हो सकती है। सूत्र यह कि इमरजेंसी पर 2014 के बाद किसकी और कितनी किताबें आई हैं।
ईवीएम जब आई थी तो भाजपा सत्ता में नहीं थी पर सत्ता में आने के बाद भाजपा ने यू-टर्न लिया और उसका समर्थन करने लगी। अब यह वाशिंग मशीन में धुल चुकी है। इतनी कि इसमें कोई बुराई नहीं है। कोई सुनवाई नहीं है। पहले न सिर्फ किताबें थीं वीडियो थे, तकनीकी जानकार थे। सब अब भी हैं। पर ईवीएम धुल गई। उसी की कहानी है यह किताब। 320 रुपये में भरपूर मनोरंजन, पुराने मामले याद दिलाने वाली किताब आपको भाजपा के अलग चाल, चरित्र और चेहरे से रूबरू करायेगी।
हिन्दी के पाठकों के लिए इसमें बताया गया है कि ईवीएम पर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला की एक किताब 2019 में आई थी, एवरी वोट काउंट्स द स्टोरी ऑफ इंडियाज इलेक्शन में एक अध्याय ईवीएम पर भी है – “दि ईवीएम : अ कंट्रोवर्सी दैट रिफ्यूजेज टू डाई” (ईवीएम : एक विवाद जो खत्म होने का नाम नहीं लेता)। एसवाई कुरैशी पर निशिकांत दुबे के आरोपों को जानने के बाद अंग्रेजी की इन किताबों और ईवीएम का पूरा मामला हिन्दी में समझने का लिए इससे बेहतर
कोई तरीका नहीं हो सकता है।
पुस्तक की प्रस्तावना और भूमिका से पहले ईवीएम का मामला क्यों गंभीर में 15 बिन्दु हैं और विस्तार से बताया गया है कि इस किताब की जरूरत क्यों है। किताब पढ़कर आप जान सकेंगे कि ईवीएम हैक करके दिखाने की चुनाव आयोग की चुनौती क्या थी और कोई क्यों नहीं आगे आया। पूरे मामले में सबसे दिलचस्प यह तथ्य है कि भाजपा ही इसे पहले असंवैधानिक और छेड़छाड़ योग्य बता रही थी और अब इसका बचाव करती है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सीटें कम होने पर मैंने पूछा, "ईवीएम जिन्दा है कि मर गया"; कह कर उन्होंने इसका बचाव किया और हरियाणा व महाराष्ट्र केअविश्वसनीय नतीजे आने पर चुप रहे।

यही नहीं हरियाणा हाईकोर्ट ने चुना आयोग को हरियाणा चुनाव के फॉर्म 17सी और सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध कराने के आदेश दिये तो केंद्र सरकार ने कानून ही बदल दिया। यह पुस्तक के अगले संस्करण का भाग हो सकता है और यह पुस्तक का 18वां अध्याय होगा जो राहुल गांधी के हाल के लेख, चुनाव की चोरी का पूरा खेल समझिये और उसपर भाजपा की कथित प्रतिक्रिया और चुनाव आयोग के जवाब का सच होगा। पुस्तक की पठनीयता और नाम की सार्थकता इसी से समझिये कि सवाल चुनाव आयोग से पूछा जाता है परेशान भाजपा होती है। पुस्तक के प्रकाशक हैं, प्रवासी प्रेम पबलिशिंग, इंडिया और यह अमैजन तथा फ्लिप कार्ड पर भीउपलब्ध है।
