नई दिल्ली : पिछले दिनों चंडीगढ़ स्थित पंजाब राज्यपाल भवन में भारत के उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन के सदस्यों से बातचीत करते हुए जब यह कहा "आज की सरकार लाचार है। वह FIR दर्ज नहीं कर सकती क्योंकि एक न्यायिक आदेश बाधा है। और वह आदेश तीन दशक से भी अधिक पुराना है। वह लगभग अभेद्य सुरक्षा प्रदान करता है। जब तक न्यायपालिका के सर्वोच्च स्तर पर कोई पदाधिकारी अनुमति नहीं देता, FIR दर्ज नहीं की जा सकती।" सुनकर अत्यंत दुःख हुआ। साथ ही, जब उन्होंने यह भी कहा कि "मैं स्वयं से एक सवाल पूछता हूँ - पीड़ा में, चिंता में, व्याकुलता में - कि वह अनुमति क्यों नहीं दी गई? यह तो न्यूनतम कदम था, जो सबसे पहले उठाया जाना चाहिए था," तो मन में उपराष्ट्रपति के प्रति विश्वास और अधिक बढ़ गया।
उन्होंने आगे कहा, “मैंने यह मुद्दा उठाया है। अंततः, अगर किसी न्यायाधीश को हटाने का प्रस्ताव आता है - क्या वही इसका उत्तर है? अगर कोई ऐसा अपराध हुआ है, जो लोकतंत्र और कानून के शासन की नींव को हिला देता है, तो उसे दंड क्यों नहीं मिला? हम तीन महीने से अधिक समय खो चुके हैं और जांच की शुरुआत भी नहीं हुई। जब भी आप अदालत जाते हैं, वे पूछते हैं - FIR में देरी क्यों हुई? क्या न्यायाधीशों की समिति को संवैधानिक या वैधानिक मान्यता प्राप्त है? क्या उसकी रिपोर्ट से कोई ठोस कार्यवाही हो सकती है? अगर संविधान में न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया लोकसभा या राज्यसभा में प्रस्ताव द्वारा ही निर्धारित है, तो यह समिति उस प्रक्रिया या FIR का विकल्प नहीं हो सकती। अगर हम खुद को लोकतंत्र का दावा करते हैं, तो हमें यह मानना होगा कि राष्ट्रपति और राज्यपालों को ही केवल कार्यकाल के दौरान अभियोजन से छूट है, किसी और को नहीं। अब अगर ऐसा कोई कृत्य - जो अपराध है - सामने आता है और उसके पीछे नकदी की बात सुप्रीम कोर्ट द्वारा सामने लाई जाती है, तो उस पर कार्यवाही क्यों नहीं?”
इस वार्तालाप में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन के अध्यक्ष सरतेज सिंह नरूला तो थे ही, उनके संघ के अन्य साथी भी उपस्थित थे। उपराष्ट्रपति कहते हैं: “मैं पाकर प्रसन्न हूं कि देशभर की बार एसोसिएशन इस मुद्दे को उठा रही हैं। मुझे आशा है कि FIR दर्ज होगी। अनुमति पहले दिन दी जा सकती थी - दी जानी चाहिए थी। रिपोर्ट के बाद तो कम से कम दी ही जानी थी। क्या यह अनुमति न्यायिक पक्ष से दी जा सकती थी? न्यायिक पक्ष में जो हुआ है - वह सबके सामने है। मैं पूर्व मुख्य न्यायाधीश का आभार व्यक्त करता हूँ कि उन्होंने दस्तावेजों को सार्वजनिक किया। हम यह कह सकते हैं कि नकदी की जब्ती हुई, क्योंकि रिपोर्ट कहती है और रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक की। हमें लोकतंत्र के विचार को नष्ट नहीं करना चाहिए। हमें अपनी नैतिकता को इस कदर गिराना नहीं चाहिए। हमें ईमानदारी को समाप्त नहीं करना चाहिए।”
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन के सदस्यों से बातचीत करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा, “हमारी न्याय प्रणाली एक अत्यंत पीड़ादायक घटना से जूझ रही है - जो मार्च मध्य में दिल्ली में एक कार्यरत न्यायाधीश के निवास पर हुई थी। वहाँ नकदी बरामद हुई, जो स्पष्ट रूप से अवैध, बेहिसाब और अपवित्र थी। यह जानकारी 6-7 दिन बाद सार्वजनिक हुई। कल्पना कीजिए, यदि यह बाहर नहीं आती, तो क्या होता? तो हमें यह भी नहीं पता चलता कि यह एकमात्र मामला है या और भी हैं। जब भी इस तरह की बेहिसाब नकदी मिलती है, तो हमें यह जानना चाहिए - यह पैसा किसका है? इसकी मनी ट्रेल क्या है? क्या इस पैसे ने न्यायिक कार्य में प्रभाव डाला? यह सब केवल वकीलों की चिंता नहीं, आम जनता की भी चिंता है। मैं इस बात से संतुष्ट हूं कि बार एसोसिएशन इस पर काम कर रही हैं। लेकिन जनता का विश्वास सभी संस्थाओं में अत्यंत आवश्यक है। मैं केवल इतना कहता हूं कि यह सोचकर कि यह मामला ठंडा पड़ जाएगा, या मीडिया का ध्यान नहीं रहेगा, यह गलत होगा। जो लोग इस अपराध के लिए जिम्मेदार हैं - उन्हें बख्शा नहीं जाना चाहिए। केवल गहन, वैज्ञानिक और निष्पक्ष जांच ही जनता का विश्वास बहाल कर सकती है।”
इतना ही नहीं, उन्होंने याद भी दिलाया, “सरवान सिंह बनाम पंजाब राज्य, 1957 का एक प्रसिद्ध मामला है - जिसमें सच्चाई और अनुमानित सच्चाई के बीच बहुत पतला फर्क था। लेकिन यह फर्क विश्वसनीय साक्ष्यों से ही तय किया जा सकता है। मैं किसी को दोषी नहीं ठहरा रहा हूं। लेकिन यह तय है - एक ऐसा अपराध हुआ है, जिसने न्यायपालिका और लोकतंत्र की नींव हिला दी है। मुझे आशा है, इसका संज्ञान लिया जाएगा। मैं राजस्थान उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन का पूर्व अध्यक्ष रहा हूँ। शायद यह पहला मौका है जब हम इस तरह एकत्र हुए हैं। लोकतंत्र में वकीलों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। और जब न्याय प्रणाली खतरे में हो — बार के सदस्यों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।”
श्री धनखड़ ने आगे कहा, “पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय की बार एसोसिएशन पूरे देश में अद्वितीय है - दो राज्य, एक केंद्र शासित प्रदेश - बहुत ही महत्वपूर्ण बार। मैंने राजस्थान में अध्यक्ष पद निभाया, लेकिन यह सिर्फ जयपुर पीठ तक था। यहाँ पूर्ण क्षेत्राधिकार है। जब भी मैंने इस अदालत में बहस की है, मुझे हमेशा यहाँ आना आनंददायक लगा — क्योंकि यह बार समृद्ध परंपरा वाली है। स्वतंत्रता संग्राम के समय, वकीलों ने अपनी आय और पेशे को छोड़कर राष्ट्र को समर्पित किया। अगर कानून के समक्ष समानता और शासन का सिद्धांत कुछ लोगों के लिए समाप्त हो जाए — अगर कुछ लोग कानून से ऊपर, जांच से परे हों — तो यह लोकतंत्र को गंभीर रूप से कमजोर करता है।”
उन्होंने कहा, “मुझे विश्वास है कि भारतीय नागरिकों की सबसे बड़ी शक्ति है - तब तक निर्दोष माने जाना, जब तक दोष सिद्ध न हो। इसलिए मैं किसी को दोषी नहीं ठहरा रहा। लेकिन जांच अवश्य होनी चाहिए। क्योंकि जब परदा उठेगा, हमें नहीं पता कितने लोग सामने आएंगे। यदि यह पैसे न्यायिक कार्य से जुड़े हुए हैं, अगर निर्णय पैसे से प्रभावित होते हैं — तो वह दिन कम से कम मैं नहीं देखना चाहता, और कोई सांसद देखना नहीं चाहेगा — जब तक कि वह स्वयं उसमें शामिल न हो।”
अंत में उपराष्ट्रपति ने कहा, “मैं विश्वभर में गया हूँ। बुद्धिमत्ता और परिश्रम में हमारे न्यायाधीश सर्वश्रेष्ठ हैं। जब जनता का अन्य संस्थाओं से विश्वास उठ जाता है — कार्यपालिका से भी — तब भी वे न्यायपालिका पर भरोसा करते हैं। क्योंकि वे मानते हैं कि न्यायाधीश ईश्वर के अवतार हैं, जो न्याय करेंगे। और वहाँ भी — एक कार्यरत न्यायाधीश की सार्वजनिक धारणा, एक शपथबद्ध न्यायाधीश से अधिक प्रभावशाली मानी जाती है।”
विधि विशेषज्ञों का माना है कि किसी कार्यरत न्यायाधीश के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करना न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए संवैधानिक और प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों के अधीन है। के. वीरस्वामी बनाम भारत संघ (1991) [(1991) 3 एससीसी 655] में ऐतिहासिक निर्णय ने इस मुद्दे को विस्तार से संबोधित किया। सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि भारत के राष्ट्रपति (भारत के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से) की पूर्व स्वीकृति के बिना सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के कार्यरत न्यायाधीश के विरुद्ध एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती। यह सुरक्षा सुनिश्चित करती है कि न्यायाधीशों के विरुद्ध ऐसी तुच्छ शिकायतें न की जाएँ जो उनके न्यायिक कार्यों में हस्तक्षेप कर सकती हैं।
न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायपालिका को ऐसी कष्टप्रद आपराधिक कार्यवाही से बचाया जाना चाहिए जो उसकी स्वतंत्रता को कमजोर कर सकती है। न्यायाधीश को कानूनी उत्पीड़न के डर के बिना निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए। जबकि न्यायाधीशों को कुछ प्रतिरक्षा प्राप्त है, वे कानून से ऊपर नहीं हैं। यदि प्रथम दृष्टया कदाचार या आपराधिकता का मामला है, तो मामले को उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए निपटाया जाना चाहिए। पूर्व मंजूरी का प्रावधान कानूनी कार्रवाई शुरू करने से पहले आरोपों की गंभीरता का आकलन करने के लिए एक फिल्टरिंग तंत्र के रूप में कार्य करता है।
कानून के जानकारों के अनुसार, जबकि सामान्य नियम यह है कि पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता होती है, कुछ अपवादात्मक मामले हैं जहाँ न्यायाधीश के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई इसके बिना भी आगे बढ़ सकती है: यदि कोई न्यायाधीश रिश्वतखोरी या भ्रष्टाचार जैसे आपराधिक कृत्य में रंगे हाथों पकड़ा जाता है, तो कानून प्रवर्तन एजेंसियाँ बाद की न्यायिक समीक्षा के अधीन तत्काल कार्रवाई कर सकती हैं। यदि कोई सेवानिवृत्त न्यायाधीश शामिल है, तो सुरक्षा लागू नहीं होती है, और नियमित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जा सकता है। यदि कथित अपराध व्यक्तिगत क्षमता में किया गया है और न्यायिक कर्तव्यों से संबंधित नहीं है, तो सामान्य कानूनी प्रक्रियाएँ लागू होती हैं।
के. वीरस्वामी के अलावा, अन्य महत्वपूर्ण मामलों ने इस विषय पर स्पष्टता प्रदान की है। मसलन, लालू प्रसाद यादव बनाम बिहार राज्य (2003) में सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात की पुष्टि की कि न्यायिक अधिकारियों पर उनके खिलाफ आपराधिक प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए पूर्व मंजूरी के बिना मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है। अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023) इस मामले ने न्यायपालिका के भीतर जवाबदेही के लिए संस्थागत अखंडता और तंत्र के महत्व को रेखांकित किया। इसी तरह, पी.डी. दिनाकरन केस (2011): सिक्किम उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी.डी. दिनाकरन पर भ्रष्टाचार और भूमि हड़पने के आरोपों की जांच की गई थी। हालांकि महाभियोग प्रक्रिया शुरू की गई थी, लेकिन उन्होंने इसके समापन से पहले ही इस्तीफा दे दिया, जिससे मौजूदा न्यायाधीशों पर मुकदमा चलाने में चुनौतियों पर प्रकाश डाला गया।
न्यायमूर्ति सी.एस. कर्णन केस (2017) में सर्वोच्च न्यायालय ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सी.एस. कर्णन को न्यायालय की अवमानना के लिए छह महीने के कारावास की सजा सुनाई, जो न्यायिक जवाबदेही का एक अभूतपूर्व उदाहरण है। बहरहाल, आंतरिक जवाबदेही की आवश्यकता को समझते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने इन रे: के. वीरस्वामी मामले में न्यायाधीशों के विरुद्ध शिकायतों से निपटने के लिए एक आंतरिक प्रक्रिया की नींव रखी। इस तंत्र को 1997 में न्यायमूर्ति एम.एन. वेंकटचलैया की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों के आधार पर औपचारिक रूप दिया गया था।
क़ानूनी विषेशज्ञों के अनुसार, किसी भी मौजूदा न्यायाधीश के विरुद्ध किसी भी शिकायत की सबसे पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश या संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा जांच की जाती है। यदि शिकायत तुच्छ या निराधार पाई जाती है, तो इसे इस स्तर पर खारिज कर दिया जाता है। जांच समिति का गठन: यदि शिकायत में दम पाया जाता है, तो वरिष्ठ न्यायाधीशों की एक आंतरिक समिति बनाई जाती है। इस समिति में सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के मौजूदा न्यायाधीश शामिल हो सकते हैं। गोपनीय जांच: समिति गोपनीय जांच करती है, संबंधित न्यायाधीश से साक्ष्य और जवाब मांगती है। गवाहों की जांच की जा सकती है, और दस्तावेजी साक्ष्य की समीक्षा की जाती है।
अपने निष्कर्षों के आधार पर, समिति CJI को एक रिपोर्ट प्रस्तुत करती है। यदि कोई कदाचार नहीं पाया जाता है, तो शिकायत खारिज कर दी जाती है। यदि गलत काम साबित हो जाता है, तो उचित कार्रवाई की सिफारिश की जाती है। परिणाम: यदि कदाचार पाया जाता है, तो न्यायाधीश को स्वेच्छा से इस्तीफा देने की सलाह दी जा सकती है। यदि न्यायाधीश इस्तीफा देने से इनकार करते हैं, तो संविधान के अनुच्छेद 124(4) और अनुच्छेद 217(1)(बी) के तहत महाभियोग की कार्यवाही के लिए मामला आगे बढ़ाया जा सकता है। यदि आरोपों में आपराधिकता शामिल है, तो न्यायिक सिफारिशों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जा सकती है। खैर।
चलिए आगे चलते हैं।
भारत में तक़रीबन 1,99,404.76 लोगों पर एक अदालत है। अदालतों में हम जिला अदालत से लेकर भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक मानते हैं। भारत में कुल 25 उच्च न्यायालय हैं और कुछ केंद्र शासित प्रदेशों का न्यायिक भार एक से अधिक उच्च न्यायालयों पर है। देश में तक़रीबन 672 जिला न्यायालय हैं और एक सर्वोच्च न्यायालय। यानी 698 न्यायालय। देश की आवादी अगर हम 134 करोड़ माने तो इस संख्या के आधार पर और देश में उपलब्ध न्यायालयों की संख्या के आधार पर देश के कुल 199404.76 लोगों को न्यायिक न्याय दिलाने का भार एक न्यायालय पर है। देश में तक़रीबन 14 लाख ‘निबंधित’ सम्मानित अधिवक्तागण हैं। लेकिन दिल्ली में जिस कदर न्यायालय ‘सुरक्षा कवच’ के अधीन है, अथवा कुछ ख़ास प्रदेश के मुख्यालयों में स्थित न्यायालयों को जो ‘सुरक्षा-कवच’ के अधीन रखा गया हैं; को छोड़कर देश के अन्य न्यायालयों में उपलब्ध सुरक्षा व्यवस्था – एक शोध का विषय है, आप माने अथवा नहीं।
विगत दिनों रामप्रसाद बिस्मिल, अस्फाकुल्लाह खान, रोशन सिंह, प्रेम कृष्णा खन्ना, बनवारी लाल, हरगोविंद, इंद्रभूषण, जगदीश, बनारसी इत्यादि जैसे क्रांतिकारियों, जिन्होंने मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए कुछ भी कर गुजरने को सज्ज थे, किये; उनके ही शहर शाहजहांपुर में एक 57-वर्षीय अधिवक्ता को ‘भूमि विवाद’ में अदालत के प्रांगण में ढ़िशूम-ढ़िशूम कर दिया गया। अधिवक्ता मृत्यु को प्राप्त किये। मोहनदास करमचंद गाँधी के चम्पारण में, जहाँ से गाँधी भारत की आज़ादी और अंग्रेजी अफसरानों के अत्याचार के खिलाफ अपना आंदोलन प्रारम्भ किये थे, कुछ अपराधी किस्म के लोग अदालत परिसर में ही एक कर्मचारी को ठांय-ठांय कर मृत्यु को प्राप्त करा दिए। इसी तरह पंजाब के सोलान के एक अदालत में एक कैदी को, जब उसे एक मुकदमें की सुनवाई के लिए अदालत में पेश किया जा रहा था, ढ़िशूम-ढ़िशूम कर दिया और वह वहीँ अंतिम सांस लिया। आपको याद भी होगा कि विगत दिनों दिल्ली के रोहिणी अदालत में दो दिल्ली पुलिसकर्मी सहित एक अधिवक्ता पर बेतहाशा गोलियों की बारिश की गयी। तीन व्यक्ति वहीँ मृत्यु को प्राप्त किये। तीन महिला विधवा हो गई। तीनों के बच्चे अनाथ हो गए। जब घटना घटी, सम्मानित न्यायमूर्ति अदालत में उपस्थित थे।
अगर आप दिल्ली में रहते हैं तो किसी भी दिन आप एक या तो अपनी गाड़ी अथवा तीन-पहिया पर बैठकर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के साथ-साथ दिल्ली उच्च न्यायालय और दिल्ली के सभी सात जिला न्यायालयों – तीस हज़ारी, पटियाला हॉउस, करकरडूमा कोर्ट, रोहिणी कोर्ट, द्वारका कोर्ट, साकेत कोर्ट और राउज एवेन्यू कोर्ट का चक्कर लगाएं। आज दिल्ली स्थित अदालतों में चतुर्दिक दिल्ली पुलिस के सुरक्षा कर्मियों के साथ-साथ गृह मंत्रालय के अधीनस्थ वाली संस्थाओं के सुरक्ष कर्मी दीखते हैं। क्या ऐसी ही सुरक्षा व्यवस्था देश के अन्य जिला अदालतों में है? एक और भी महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि अगर देश का न्यायिक व्यवस्था स्वयं सुरक्षा-कवच में है तो फिर देश के लोगों के साथ-साथ उन चार करोड़ सात लाख मुकदमों के ‘वादियों-प्रतिवादियों’ का क्या होगा जिनके मुकदमें मुद्दत से न्यायालयों में ‘लाल वस्त्रों’ में बंधे हैं ‘न्याय’ की प्रतीक्षा में ? वैसे, दिल्ली के रोहिणी अदालत की घटना के बाद भारत के सर्वोच्च न्यायालय में, दिल्ली उच्च न्यायालय में एक आवेदन दायर किया गया और न्यायालय से यह गुजारिश किया गया कि न्यायालयों में पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था हो। उचित है।
भारत सरकार के एक आंकड़े के अनुसार भारत के विभिन्न अदालतों में – सर्वोच्च न्यायालय से जिला न्यायालयों तक – कुल चार करोड़ सात लाख मुकदमें लाल रंग के वस्त्रों में बंधे हैं। इसमें तक़रीबन 87.4 फीसदी सबॉर्डिनेट कोर्ट्स में लंबित हैं। करीब 12.4 फीसदी उच्च न्यायालयों में लंबित हैं। इसी तरह कुल 71,411 मुकदमें देश के सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं। सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मुकदमों में कुल 56,365 सीविल मुकदमें हैं और 15,076 आपराधिक मुकदमें लंबित हैं। इतना ही नहीं, करीब 10,491 लंबित मुकदमें ‘डिस्पोजल’ के लिए दशकों के पड़े हैं। इसी तरह देश के सभी 25 उच्च न्यायालयों में कुल 59,55,907 मुकदमें, जिसमें 42,99,954 सिविल मुकदमे हैं और 16,55,953 आपराधिक मुकदमे हैं। कई मुकदमे ऐसे हैं जिसमें “आदेश” नहीं लिखा गया है और “लंबित” हैं।
न्यायिक व्यवस्था से जब भी आवाज उठती है सरकार अपना पल्लू झाड़ने की कोशिश करती है। अगर न्यायिक व्यवस्था यह कहती है कि अन्य कई कारणों के अलावे न्यायमूर्तियों की कमी के कारण अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या उत्तरोत्तर बढ़ रही है, सरकार तुरंत कहती है: “मैंने सर्वोच्च न्यायालय में 46 न्यायमूर्तियों को नियुक्त किये, उच्च न्यायालयों में 769 न्यायधीशों की नियुक्ति किये और 619 अतिरिक्त न्यायमूर्तियों को पदोन्नति दिए, उच्च न्यायालयों में न्यायधीशों की सख्या बढ़ा दिए हैं, नीचली अदालतों में भी न्यायधीशों की संख्या 24,613 कर दिए, सेंट्रली स्पॉन्सर्ड स्कीमों के निष्पादन के लिए अब तक 9013. 21 करोड़ रुपये आवंटित किये … इत्यादि-इत्यादि।” लेकिन कभी किसी भी न्यायालयों से सम्बंधित कार्यकारिणी के सम्मानित लोग, निजी तौर पर देश की न्यायिक व्यवस्था को किस कदर वादी-प्रतिवादी के बीच ‘फ्रेंडली’ बनाया जाय, अपने-अपने कक्षों से बाहर निकलकर देश के न्यायालयों में आये, शायद नहीं।
इतना ही नहीं, पिछले दिनों भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आयोजित संविधान दिवस समारोह में बोलते कही थी देश में एक अखिल भारतीय न्यायिक सेवा हो सकती है जो प्रतिभाशाली युवाओं का चयन कर सकती है और उनकी प्रतिभा को निचले स्तर से उच्च स्तर तक पोषित और बढ़ावा दे सकती है। राष्ट्रपति महोदया यह भी कही कि बेंच की सेवा करने की इच्छा रखने वालों को देश भर से चुना जा सकता है ताकि प्रतिभाओं का एक बड़ा समूह बनाया जा सके। ऐसी प्रणाली कम प्रतिनिधित्व वाले सामाजिक समूहों को भी अवसर प्रदान कर सकती है। बहुत बेहतर विचार है सम्मानित राष्ट्रपति महोदया का।
संविधान के अनुच्छेद 312 में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) की स्थापना का प्रावधान है, जिसमें जिला न्यायाधीश से कमतर कोई पद शामिल नहीं होगा। संवैधानिक प्रावधान जिला न्यायाधीश स्तर पर AIJS के निर्माण को सक्षम बनाता है। सरकार के विचार में, समग्र न्याय वितरण प्रणाली को मजबूत करने के लिए एक उचित रूप से तैयार अखिल भारतीय न्यायिक सेवा महत्वपूर्ण है। यह एक उचित अखिल भारतीय योग्यता चयन प्रणाली के माध्यम से चयनित उपयुक्त रूप से योग्य नई कानूनी प्रतिभाओं को शामिल करने का अवसर प्रदान करेगा और साथ ही समाज के हाशिए पर पड़े और वंचित वर्गों को उपयुक्त प्रतिनिधित्व प्रदान करके सामाजिक समावेशन के मुद्दे को संबोधित करेगा।
राष्ट्रपति ने कहा कि आज हम संविधान में निहित मूल्यों का जश्न मनाते हैं और राष्ट्र के दैनिक जीवन में उन्हें बनाए रखने के लिए खुद को फिर से समर्पित करते हैं। न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्य वे सिद्धांत हैं जिन पर हम एक राष्ट्र के रूप में खुद को संचालित करने के लिए सहमत हुए हैं। इन मूल्यों ने हमें स्वतंत्रता हासिल करने में मदद की। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि इनका प्रस्तावना में विशेष उल्लेख है और ये हमारे राष्ट्र निर्माण प्रयासों का मार्गदर्शन करना जारी रखते हैं। उनका कहना था कि न्याय का उद्देश्य सबसे बेहतर तरीके से तभी पूरा हो सकता है जब इसे सभी के लिए सुलभ बनाया जाए। इससे समानता भी मजबूत होती है। हमें खुद से पूछना चाहिए कि क्या हर नागरिक न्याय पाने की स्थिति में है। आत्मनिरीक्षण करने पर हमें पता चलता है कि इस राह में कई बाधाएं हैं। लागत सबसे महत्वपूर्ण कारक है। भाषा जैसी अन्य बाधाएं भी हैं, जो अधिकांश नागरिकों की समझ से परे हैं।
राष्ट्रपति ने कहा कि बेंच और बार में भारत की अनूठी विविधता का अधिक विविध प्रतिनिधित्व निश्चित रूप से न्याय के उद्देश्य को बेहतर ढंग से पूरा करने में मदद करता है। इस विविधीकरण प्रक्रिया को तेज करने का एक तरीका एक ऐसी प्रणाली का निर्माण हो सकता है जिसमें न्यायाधीशों को योग्यता आधारित, प्रतिस्पर्धी और पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से विभिन्न पृष्ठभूमि से भर्ती किया जा सके। एक अखिल भारतीय न्यायिक सेवा हो सकती है जो प्रतिभाशाली युवाओं का चयन कर सकती है और उनकी प्रतिभा को निचले स्तर से उच्च स्तर तक पोषित और बढ़ावा दे सकती है। बेंच की सेवा करने की इच्छा रखने वालों को देश भर से चुना जा सकता है ताकि प्रतिभाओं का एक बड़ा समूह बनाया जा सके। ऐसी प्रणाली कम प्रतिनिधित्व वाले सामाजिक समूहों को भी अवसर प्रदान कर सकती है।
सर्वोच्च न्यायालय परिसर में एक वृक्ष
राष्ट्रपति ने कहा कि न्याय तक पहुँच को बेहतर बनाने के लिए हमें समग्र प्रणाली को नागरिक-केंद्रित बनाने का प्रयास करना चाहिए। हमारी प्रणालियाँ समय की देन हैं; अधिक सटीक रूप से कहें तो उपनिवेशवाद की देन हैं। इसके अवशेषों को मिटाने का काम जारी है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि हम अधिक सचेत प्रयासों से सभी क्षेत्रों में उपनिवेशवाद के उन्मूलन के शेष भाग को गति दे सकते हैं। राष्ट्रपति ने कहा कि संविधान दिवस मनाते समय हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि संविधान आखिरकार एक लिखित दस्तावेज ही है। यह तभी जीवंत होता है और जीवंत बना रहता है जब इसकी विषय-वस्तु को व्यवहार में लाया जाता है। इसके लिए व्याख्या की आवश्यकता होती है। उन्होंने हमारे संस्थापक दस्तावेज की अंतिम व्याख्याकार की भूमिका को बखूबी निभाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की सराहना की। उन्होंने कहा कि इस न्यायालय के न्यायाधीशों ने न्यायशास्त्र के मानकों को लगातार ऊंचा उठाया है। उनकी कानूनी सूझबूझ और विद्वता सर्वोत्कृष्ट रही है। हमारे संविधान की तरह हमारा सर्वोच्च न्यायालय भी कई अन्य देशों के लिए आदर्श रहा है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि एक जीवंत न्यायपालिका के साथ, हमारे लोकतंत्र का स्वास्थ्य कभी भी चिंता का विषय नहीं होगा।
अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) के गठन के लिए एक व्यापक प्रस्ताव तैयार किया गया था और नवंबर, 2012 में सचिवों की समिति द्वारा इसे मंजूरी दी गई थी। देश में कुछ बेहतरीन प्रतिभाओं को आकर्षित करने के अलावा, यह न्यायपालिका में हाशिए के वर्गों और महिलाओं से सक्षम व्यक्तियों को शामिल करने में भी मदद कर सकता है। अप्रैल, 2013 में आयोजित मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन में इस प्रस्ताव को एजेंडा आइटम के रूप में शामिल किया गया था और यह निर्णय लिया गया था कि इस मुद्दे पर आगे विचार-विमर्श और विचार-विमर्श की आवश्यकता है। प्रस्ताव पर राज्य सरकारों और उच्च न्यायालयों की राय मांगी गई थी। अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन पर राज्य सरकारों और उच्च न्यायालयों के बीच मतभेद था। जहाँ कुछ राज्य सरकारें और उच्च न्यायालय प्रस्ताव के पक्ष में थे, वहीं कुछ अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन के पक्ष में नहीं थे, जबकि कुछ अन्य केंद्र सरकार द्वारा तैयार किए गए प्रस्ताव में बदलाव चाहते थे।
जिला न्यायाधीशों के पदों पर भर्ती में सहायता करने तथा सभी स्तरों पर न्यायाधीशों/न्यायिक अधिकारियों की चयन प्रक्रिया की समीक्षा के लिए न्यायिक सेवा आयोग के गठन का मामला भी 3 और 4 अप्रैल, 2015 को आयोजित मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन के एजेंडे में शामिल किया गया था, जिसमें यह संकल्प लिया गया था कि जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए रिक्तियों को शीघ्रता से भरने के लिए मौजूदा प्रणाली के भीतर उपयुक्त तरीके विकसित करने के लिए संबंधित उच्च न्यायालयों को स्वतंत्र छोड़ दिया जाए । उच्च न्यायालयों तथा राज्य सरकारों से प्राप्त विचारों के साथ अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन का प्रस्ताव भी 5 अप्रैल, 2015 को आयोजित मुख्यमंत्रियों तथा उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के संयुक्त सम्मेलन के एजेंडे में शामिल किया गया था ।
अखिल भारतीय न्यायिक सेवा की स्थापना के प्रस्ताव पर 16 जनवरी 2017 को विधि एवं न्याय मंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक में पात्रता, आयु, चयन मानदंड, योग्यता, आरक्षण आदि बिंदुओं पर फिर से चर्चा की गई। इस बैठक में विधि एवं न्याय राज्य मंत्री, भारत के अटॉर्नी जनरल, भारत के सॉलिसिटर जनरल, न्याय विभाग, विधिक मामलों के विभाग और विधायी विभाग के सचिव उपस्थित थे। मार्च, 2017 में संसदीय परामर्शदात्री समिति और 22.02.2021 को अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों के कल्याण संबंधी संसदीय समिति की बैठक में भी एआईजेएस की स्थापना पर विचार-विमर्श किया गया। प्रमुख हितधारकों के बीच मौजूदा मतभेद को देखते हुए, वर्तमान में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा की स्थापना के प्रस्ताव पर कोई आम सहमति नहीं है।
क्या ऐसे विचार राजनीतिक क्षेत्र में लागू नहीं हो सकता है। पंचायत से संसद तक चुनाव पद्धति को समाप्त कर एक राज्यीय-राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा का आयोजन किया जा सकता है? पंचायत से लेकर विधान सभा, विधान परिषद के रास्ते लोकसभा और राज्यसभा में अपना स्थान प्राप्त करने के लिए अभ्यर्थियों को परीक्षा में बैठना और उत्तीर्ण करना आवश्यक और बाध्यकारी नहीं बनाया जा सकता ? जब भारत का निर्वाचन आयोग पर ही समय-समय पर ‘उंगलियां उठती’ रही है। राज्यपालों या राष्ट्रपति की नियुक्ति राष्ट्रीय मेधावी परीक्षा के आधार पर नहीं हो सकता है? अगर ऐसा होता है तो पंचायत से लेकर विधानसभा, विधान परिषद्, लोकसभा और राज्यसभा में सदस्यों की गुणवत्ता तो बढ़ेगी ही, इन संवैधानिक सभाओं में शिक्षित, विचारवान, संवेदनशील व्यक्तियों का जमघट होगा। इससे राष्ट्र का कल्याण तो होगा ही, समाज के प्रत्येक स्तर पर गुणवत्ता का स्तर भी बढ़ेगा।
चुनाव निगरानी संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के अनुसार, लोकसभा चुनाव 2024 में 8,337 उम्मीदवारों में से 20 प्रतिशत ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं। लगभग 14 प्रतिशत ने गंभीर आपराधिक मामले घोषित किए हैं जिनमें बलात्कार, हत्या, हत्या के प्रयास और महिलाओं के खिलाफ अपराध से संबंधित आरोप शामिल हैं। एडीआर ने इन आम चुनावों में 8,360 उम्मीदवारों में से 8,337 के स्व-शपथ पत्रों का विश्लेषण किया। इनमें से 1,333 उम्मीदवार राष्ट्रीय पार्टियों से, 532 उम्मीदवार राज्य पार्टियों से, 2,580 उम्मीदवार पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियों से और 3,915 उम्मीदवार स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ रहे हैं। एडीआर द्वारा विश्लेषण किए गए लोकसभा चुनाव 2024 में 8,337 उम्मीदवारों में से 1,643 (20 प्रतिशत) ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं।
एडीआर के अनुसार, लोकसभा चुनाव 2024 में चुनाव लड़ने वाले लगभग 1,191 (14 प्रतिशत) उम्मीदवारों ने गंभीर आपराधिक मामले घोषित किए हैं, जिनमें बलात्कार, हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण, महिलाओं के खिलाफ अपराध आदि से संबंधित आरोप शामिल हैं। पार्टियों में भारतीय जनता पार्टी के 440 उम्मीदवारों में से 191 (43 प्रतिशत), कांग्रेस के 327 उम्मीदवारों में से 143 (44 प्रतिशत), बसपा के 487 उम्मीदवारों में से 63 (13 प्रतिशत), बसपा के 487 उम्मीदवारों में से 33 (63 प्रतिशत) एडीआर की रिपोर्ट में कहा गया है कि सीपीआई (एम) द्वारा मैदान में उतारे गए 52 उम्मीदवारों और 3,903 निर्दलीय उम्मीदवारों में से 550 (14 प्रतिशत) ने अपने हलफनामों में अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं।
यह तो लोकसभा की बात हुई। एडीआर के अनुसार भारत भर में राज्य विधानसभाओं में लगभग 44 प्रतिशत विधायकों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं। विश्लेषण में देश भर में राज्य विधानसभाओं और केंद्र शासित प्रदेशों में वर्तमान विधायकों के स्व-शपथ पत्रों की जांच की गई। यह डेटा विधायकों द्वारा उनके हालिया चुनाव लड़ने से पहले दायर किए गए हलफनामों से निकाला गया था। विश्लेषण में 28 राज्य विधानसभाओं और दो केंद्र शासित प्रदेशों में सेवारत 4,033 व्यक्तियों में से कुल 4,001 विधायकों को शामिल किया गया। एडीआर ने कहा कि विश्लेषण किए गए विधायकों में से 1,136 या लगभग 28 प्रतिशत ने अपने खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले घोषित किए हैं, जिनमें हत्या, हत्या के प्रयास, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ अपराध से संबंधित आरोप शामिल हैं।
इतना ही नहीं, रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 2016-17 और 2021-22 के बीच 10,122.03 करोड़ रुपये के दान की घोषणा की, इसके बाद कांग्रेस (1,547.43 करोड़ रुपये) और तृणमूल कांग्रेस (823.30 करोड़ रुपये) का स्थान रहा। इसमें कहा गया है कि भाजपा द्वारा घोषित कुल चंदा अन्य सभी राष्ट्रीय दलों द्वारा घोषित कुल चंदे से तीन गुना से अधिक है। 4,614.53 करोड़ रुपये का दान, कुल का लगभग 28 प्रतिशत, कॉर्पोरेट क्षेत्र से प्राप्त हुआ और 2,634.74 करोड़ रुपये (16.03 प्रतिशत) अन्य स्रोतों से प्राप्त हुआ। एडीआर ने कहा कि 80 प्रतिशत से अधिक दान, लगभग 13,190.68 करोड़ रुपये, राष्ट्रीय दलों को और 3,246.95 करोड़ रुपये (19.75 प्रतिशत) क्षेत्रीय दलों को प्राप्त हुए।
काश !!! कभी देश में विधायकों और सांसदों पर ‘उनके विधानपालिका और संसदीय क्षेत्रों के विकास के नाम पर होने वाले खर्चों की तुलना उक्त क्षेत्रों में हुए विकासों से होता। लेकिन ऐसा नहीं होता। सरकारी आंकड़ों को यह जोड़-घटाव-गुणा करते हैं तो सं 2011-12 से लेकर आज तक देश के 4123 विधायकों और लोक सभा के 543 तथा राज्य सभा के 245 सांसदों को उनके कोष में 256100 करोड़ रुपयों का आवंटन किया गया है। राशियां पानी की तरह बहाया भी गया है। लेकिन शायद विकास का कार्य भी उसी पानी में बह गया। अगर ऐसा नहीं है तो आज भारत के विभिन्न राज्यों के सम्मानित विधायक और विभिन्न रेयान तथा केंद्र शासित प्रदेशों से दिल्ली में लोकसभा और राज्यसभा में बैठने वाले सांसद इतने अमीर कैसे होते? आज सैकड़ों विधायक और सांसद ऐसे हैं जिनके विरुद्ध भारत के विभिन्न न्यायालयों में मुकदमें चल रहे हैं, लंबित हैं।
लोक सभा के 543 और राज्य सभा के 245 सांसदों के अलावे देश से २८ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कुछ 4123 विधायक हैं। मसलन: आंध्र प्रदेश – 175, अरुणाचल प्रदेश – 60, असम – 126, बिहार – 243, छत्तीसगढ़ – 90, दिल्ली – 70, गोवा – 40, केरल – 140, मध्यप्रदेश – 288, मणिपुर – 60, मेघालय – 60, मिजोरम – 40, नागालैंड – 60, ओडिशा – 147, पुडुचेरी – 30, त्रिपुरा – 60, उत्तर प्रदेश – 403, उत्तराखंड – 70, पश्चिम बंगाल – 294, गुजरात – 182, हरयाणा – 90, हिमाचल प्रदेश – 68, जम्मू और कश्मीर – 90, झारखण्ड – 81, कर्नाटक – 224, पंजाब – 117, राजस्थान – 200, सिक्किम – 32, तमिल नाडु – 234, तेलंगाना – 119 – आंकड़ों के अनुसार राज्यों के विधायकों को उनके विधानपालिका क्षेत्र के विकास हेतु प्रत्येक वर्ष 3 करोड़ रुपये (3 करोड़ x 5 वर्ष = 15 करोड़) और सांसदों को 5 करोड़ प्रतिवर्ष (5 करोड़/वर्ष x 5 वर्ष = 25 करोड़) दिए जाते हैं। जिससे वे अपने क्षेत्र का विकास कर सकें। लेकिन आज जो स्थिति हैं वह सर्वविदित हैं।
वापस संविधान की बात करते हैं। आज़ादी के बाद और खासकर भारत का संविधान देश में लागू होने के बाद विगत 74 वर्षों में अब तक 103 संशोधन किये गए हैं संविधान में और इसके लिए 124 संविधान संशोधन विधेयक पारित किये गए।28 मार्च 1989 संविधान के 61 वें संशोधन कर मताधिकार के लिए उम्र 21 से घटाकर 18 किया गया, क्या जिस उद्देश्य से यह किया गया था, उस उद्येश्य को प्राप्त कर सका? 12 दिसंबर, 2002 को संविधान के 86 संसोधन के द्वारा चौदह वर्ष की आयु तक शिक्षा का अधिकार प्रदान किया गया। एएसईआर के एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 3-16 वर्ष की आयु के 50 से अधिक फीसदी बच्चे पढ़-लिक नहीं सकते। इतना ही नहीं 5 वर्ष से 16 वर्ष की आयु वाले बच्चों को गणितीय ज्ञान नहीं है। आकंड़ा तो यह भी कहता है की देश में 2021 तक 287 मिलियन भारतीय पढ़-लिख नहीं सकते।
