पटना / नई दिल्ली: उस दिन गांधी मैदान की मिट्टी से बात करा रहा था। कभी हंस रहा था, कभी दोनों के कंठ अवरुद्ध हो रहे थे – लेकिन दोनों के चेहरों पर कोई मलिनता नहीं दिख रहा था। आज इस गांधी मैदान और मैदान में लोगों के पदों से बनी यह पगडंडी जब देखता हूँ तो ऐसा लगता है कि यह पगडण्डी नहीं बल्कि गांधी मैदान की मिट्टी की कहानी है, उसकी हस्त रेखाएं हैं जिसने अनंत लोगों के भाग्यों का निर्माण की।
मैं नहीं कह सकता कि कोई पलटकर गांधी मैदान की इन रेखाओं से रूबरू हुए अथवा नहीं, लेकिन मैं मन और आत्मा से उस दिन भी जीवित था, आज भी जीवित हूँ। अगर यह रेखाएं, गांधी मैदान की मिट्टी उस दिन मुझे नहीं अपनाती, तो शायद पटना के अशोक राजपथ से कलकत्ता के चौरंगी और धनबाद के हीरापुर के रास्ते दिल्ली के राजपथ पर पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने पैरों का निशान नहीं बना पाता - सच तो यही है
इस तस्वीर में बहुत पीछे जिस भवन को आप देख रहे हैं यह भवन बाकरगंज के बाएं नुक्कड़ से रीजेंट सिनेमा गृह के बीच गंगा की ओर बहने वाली एक विशालकाय नाला के तट पर स्थित है। बाकरगंज रोड के दाहिने नुक्कड़ पर उन दिनों गाँधी मैदान थाना एक फूस/खपड़ैल घर में हुआ करता था। थाना के बाएं हाथ कुछ खाली जगह, फिर कालीदास रंगालय और फिर एक गहरा तालाब। इस तालाब के बाएं छोड़ पर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन का लाल रंग का मकान और सामने कूड़े का आम्बार और उसके सामने से आती एक कच्ची सड़क गाँधी मैदान के चारो तरह घूमती सड़क से मिलकर बिलीन हो जा
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के बाएं कोने पर एक पीला रंग का कोठी होता था, जो बहुत बड़े अहाते में था। फिर भारतीय रिजर्व बैंक और एग्जिविशन रोड। इस सड़क के दाहिने हाथ नुक्कड़ पर महान समाज शास्त्री, सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक (दिवंगत) पद्मभूषण बिंदेश्वर पाठक (उन दिनों डॉक्टर की उपाधि से या देश विदेश के सम्मानों से अलंकृत नहीं थे) ‘सुलभ शौचालय’ के नाम से समाज सेवा शुरू किये थ
वैसे तो पटना शहर भी गंगा तट पर ही अवस्थित है, लेकिन ‘अपना बाज़ार’ के पीछे वाला नाला पटना के इतिहास का चश्मदीद गवाह है। चाहे तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री कृष्णबल्लभ सहाय के कालखंड में या देश में तथाकथित ‘सम्पूर्ण क्रांति’ के सूत्रधार जयप्रकाश नारायण के कालखंड में पटना पुलिस द्वारा ठांय ठांय ठांय गोली कांड या लाठी चार्ज हो।
इस भवन के बाएं हाथ रीजेंट सिनेमा के तरफ से उस ज़माने में जहाँ ‘अपना बाजार’ समाप्त होता था, एक सोडा फाउंटेन होता था। इस सोडा फाउंटेन पश्चिमी कोने पर एक कुआँ होता था। सोडा फाउंटेन उन दिनों अपने यौवन के उत्कर्ष पर था। बहुत खूबसूरत। लेकिन पटना शहर में खूबसूरत होना ‘अभिशाप’ है, नजर लग जाती है – चाहे सोडा फाउंटेन हो या सुन्दर बालाएं।
साल सन 1973 था। अगली सुबह पटना से प्रकाशित ‘आर्यावर्त’, ‘इण्डियन नेशन’, ‘सर्चलाइट’, ‘प्रदीप’ अखबार खूब बेचे थे। सुबह-सवेरे पटना के गांधी मैदान में पटना से बाहर जाने वाले बस यात्रियों के हाथों तो बेचे ही थे, गांधी मैदान से पटना विश्वविद्यालय के रानी घाट प्राध्यापक आवासीय क्षेत्र तक इतने अखबार बेचे थे कि जेब में ‘रेजकी’ (खुदरा पैसा) दोनों तरफ इस कदर लटक गया था, जैसे बारह वर्ष की आयु में ‘हाइड्रोसील’ बिमारी हो गया हो। बुशर्ट से ‘सेप्टिपिन’ निकालकर जेब में लगा लिया था ताकि मेहनत की कमाई सड़क पर न गिरे। साईकिल की गति भी धीमी गति की समाचार जैसी हो गयी थी। कहने के लिए तो “छात्रों का कमाल” था, लेकिन भीड़ में “छात्र को पहचानना’ मुश्किल ही नहीं ‘नामुमकिन’ उस दिन भी होता था।
भारत के लाल किले पर 15 अगस्त को झंडोत्तोलन होने से कोई तीन माह पूर्वं, यानी 12 मई, 1947 को पटना के गांधी मैदान के पास तत्कालीन ‘एलिफिंस्टन और रीजेंट सिनेमा हॉल’ के बीच दाहिने कोने पर सत्यनारायण झुनझुनवाला एक खुला रेस्तरां खोले। इस रेस्तरां के खुले गार्डननुमा मैदान में टेबुल-कुर्सी लगी होती थी। शाम के समय पटना के लोग बाग़, संभ्रांत महामानव सहित, यहाँ सपरिवार आकर जलपान, चाय, काफी, या अन्य भोज्य पदार्थों का आनंद लेते थे।
पटना शहर में एक विशेष जगह बन गया था यह स्थान। झुनझुनवाला साहेब लन्दन से एक मशीन मंगाए थे – नाम था सोडा फाउंटेन – और उसी मशीन के नाम पर इस रेस्तरां का नामकरण हो गया। बाद में गांधी मैदान के इस छोड़पर ‘सोडा फाउंटेन’ और ‘खादी ग्रामोद्योग’ दोनों ‘विशेष’ बन गया था।
उस दिन 27 अगस्त, 1973 था। रात में झुनझुनवाला साहेब पूरे दिन की बिक्री का हिसाब-किताब कर ‘गद्दी’ से उतड़े अगली सुबह दूकान खोलने की तैयारी करने के लिए। अगली सुवह भी सब ठीक-ठाक था। लेकिन इधर सूर्यदेव जैसे-जैसे ब्रह्माण्ड में ऊपर चढ़ रहे थे, ‘सोडा फाउंटेन’ का अस्तित्व खतरे की ओर उन्मुख हो रहा था – शांति पूर्वक। कहीं कोई आभास नहीं था अगले पल क्या होने वाला है। मैं एक अखबार विक्रेता था और टी के घोष अकादमी मेनवमीं कक्षा में पढता था।
'सोडा फाउंटेन’ में खचाखच ग्राहक थे। खुले गार्डेन में गरमा-गरम समोसे, पकौड़ियाँ हरी-हरी चटनियों के साथ लोग बाग़ आनंद ले रहे थे। तभी ‘गद्दी’ (कैश काउंटर) पर बैठे सज्जन की आवाज धीरे-धीरे ऊँची होने लगी थी और सामने खड़े चार-पांच छात्रों की आवाज उस आवाज को दबाते, ऊपर उठ रहा था। मामला महज ‘साढ़े-सात’ रुपये पिछले बकाये राशि की थी जिसे गद्दी पर बैठे महानुभाव सामने खड़े ग्राहक से मांग रहे थे। देखते ही देखते वह ‘साढ़े सात रुपये की राशि सोडा फाउंटेन के लिए साढ़े साती बन गया। पहले मुंह चल रहा था, फिर हाथ चला, फिर हॉस्टल के कमरों में लगी मच्छरदानी का डंडा, फिर असली डंडा, फिर हौक्की का डंडा, फिर तोड़-फोड़, फिर माचिस की एक छोटी तिल्ली ने सोडा फाउंटेन का नामोनिशान मिटा दिया।
‘सोडा फाउंटेन’ के पास एक घटना सं 1973 की घटना से भी अधिक कष्टदायक थी जब साथ चल रहे एक छात्र के सिर पर बिहार की पुलिस गोली अचानक टकराती है। गोली अपना काम कर जाती है। कुछ सेकेण्ड पहले हँसते छात्र का शरीर ‘पार्थिव’ हो जाता है। तक़रीबन 59 राउंड गोलियां चलाई गई थी तत्कालीन बिहार पुलिस के द्वारा और बुद्ध – महावीर – गुरु गोविन्द सिंह – चाणक्य – चन्द्रगुप्त – कुंवर सिंह के बिहार का नेतृत्व कर रहे थे बाबू कृष्ण बल्लभ सहाय और साल सन 1967 था और जनवरी महीना का 5 तारीख । कहते हैं इस गोली कांड के बाद बाबू कृष्ण बल्लभ सहाय यानी केबी सहाय कभी राजनीतिक गलियारे में नहीं दिखे, सत्ता और शासन की बात तो मीलों दूर।
उस गोलीकांड का चश्मदीद गवाह थे तत्कालीन ‘दी इण्डियन नेशन’ अखबार के संवाददाता श्री जनार्दन ठाकुर, असित सेन और किशोर जी। असित सेन और किशोर जी ‘छायाकारी’ का भी कलाकारी जानते थे। कितने लोग मरे उस गोली कांड में, यह तो ‘माँ गंगा’ भी नहीं बता सकी जिनके आँगन में तत्कालीन प्रशासन के प्रशासक पार्थिव शरीरों को उठाकर गंगा को समर्पित कर रहे थे। लेकिन असित सेन और किशोर जी’ का कैमरा सब कुछ देख रहा था।
उस समय टी के घोष अकादमी में नवमीं कक्षा में पढ़ने वाले श्री अशोक जी कहते हैं कि वे उस दिन अपने मित्र के साथ बात करते चले जा रहे थे। आस-पास कुछ भीड़-भाड़ अवश्य थी, काफी संख्या में लोग एकत्रित भी थे, खासकर खादी ग्रामोद्योग के पास, लेकिन उस क्षण तक यह अंदाजा नहीं था कि कुछ क्षण बाद क्या होने वाला है। अचानक भगदड़ हुई। खादी ग्रामोद्योग को अग्नि को सुपुर्द कर दिया गया। तभी उनके साथ चलते मित्र का शरीर खून से लथपथ जमीन पर गिर गया। उसके माथे में गोली लगी थी। सभी भाग रहे थे। अशोक जी भी अपने बाए हाथ भागे जो आगे एक बड़ा नाला की ओर जाता था।
उस समय किसी को भी यह होश नहीं था कि नाले की गहराई कितनी है। पूरा शरीर नाले की गंदगी से तर-बतर था। कई घंटों के बाद बाकरगंज की पतली गली के रास्ते, उस समय के इंडियन मेडिकल एसोसिएशन भवन के पीछे से, गलियों से रोते-बिलखते एग्जिविशन रोड के नुक्कड़ पर पहुंचे थे। फिर बाएं हाथ लालजी टोला के लिए बढे, वहीँ रहते थे अशोक जी। लालजी टोला में नुक्कड़ पर भारतीय वायु सेना का दफ्तर था और गली आगे जहाँ बाएं मुड़ती थी, ‘पैरागाओं ड्रिंक्स’ का दफ्तर थ ा।
गोली कांड का प्रभाव पूरे पटना शहर पर अब तक हो गया था। पूरा शहर पुलिस की गिरफ्त में थी तो जरूर, लेकिन उपद्रवकारियों का क्रिया कलाप भी कम नहीं था। आज इस नाले पर पुस्तकें बिकती हैं। बाइक भी तो कैसे नहीं – जिस प्रदेश में नवमी कक्षा फेल प्रदेश का नेतृत्व करे, शिक्षक-प्राध्यापक जीवन पर्यन्त महाविद्यालय/विश्वविद्यालय परिसर से अवकाश लेकर राजनीति करें, नाम के आगे ‘प्रोफ़ेसर’, ‘डॉ’ लगाए, अंतिम सांस से पहले अपने प्रारंभिक सेवा संस्था में ‘हस्ताक्षर’ कर ‘पेंसन का हकदार’ बने – वहां नाला पर ही तो किताब बिकेगा।
उस दिन 5 जनवरी था और साल सन 1967-आज भी उस घटना का चश्मदीद गवाह हैं छायाकार इश्तियाक अहमद साहब जो पटना में मौर्या के सामने ‘डेफोडिल्स स्टूडियो’ का मालिक हैं। अहमद साहेब बनारस के रहने वाले हैं और वे फोटोग्राफी बनारस के धर्मवीर जी से सीखे थे। वे सन् 1964 में मैं बनारस से पटना आये । पटना आने के बाद एक कार्यक्रम में इण्डियन नेशन अखबार के रिपोर्टर केशव कुमार जी से मुलाकात हो गई। एक क्षण में ही वे घुलमिल गए और कहा कि इण्डियन नेशन में फोटो दोगे ?
इश्तियाक साहब की वही स्थिति थी कि एक भूखा आदमी को एक रोटी और एक गिलास ठंडा पानी मिल जाय। वे जहाँ भी जाते थे, मुझे मिलाते थे, ताकि आने वाले समय में अगर उन्हें तस्वीर से सम्बंधित कोई कार्य पड़े, मुझे याद करें। डॉ एस एन उपाध्याय, डॉ ए एन पाण्डे, डॉ बी मुखोपाध्याय, डॉ लाला सूर्यनन्दन सभी लोगों से उन्होंने ही मिलवाया और मैं भी जीवन पर्यन्त उनका सेवक बने रहे।
बहरहाल, विगत दिनों पटना पहुँच कर उस दिन पटना मार्केट के सामने से गांधी मैदान में प्रवेश लिया था। शरीर का रोम-रोम कम्पित था गांधी मैदान की जमीन पर पैर रखते।अगर आप मन और आत्मा से जीवित हैं तभी आप उस क्षण को सोचकर विह्वल होंगे । जैविक शास्त्र में ‘मिट्टी’ को ‘जननी’ भी कहा गया है। यही जननी भी होती है और यही स्वयं में पार्थिव शरीर को समाहित भी कर लेती है। अनंतकाल से वह अपने स्थान से विचलित नहीं होती। हाँ, लोगबाग उसे त्यागकर अपने-अपने जीवन-निर्माण के ख़ातिर दूर अवश्य हो जाते हैं। खैर।
आज तो माता-पिता, सगे-सम्बन्धी, जो जीवन दिया, जिसने जीवन का निर्माण किया, वजूद दिया, उन तमाम लोगों की मृत्यु के साथ ही उसका नाम भी समाप्त हो जाता है। जीवित अवस्था में जिस शरीर का ‘नाम’ होता है, लोग उस ‘नाम’ से उसे सम्बोधित करते हैं, करोड़ों की भीड़ में उस ‘नाम’ को सुनते ही शरीर चंचलायमान हो जाता है; सांस रुकते ही वह ‘बॉडी’ हो जाता है, चाहे माता-पिता का ही पार्थिव शरीर क्यों न हो। ‘पार्थिव’ भी नहीं जोड़ते। अंतिम यात्रा में जाने के क्रम में लोगबाग एक दूसरे को देखने लगते हैं, साथ जाना है अथवा नहीं, सोचने लगते हैं। कहीं-कहीं तो पुरुषों को अपनी पत्नियों को उस क्षण आखों-आखों में बात करते, अनुमति मांगते, अनुमति निरस्त होते देखा हूँ।
अनेकों बार उस क्षण का भी गवाह बना हूँ जब सगे-सम्बन्धियों के पार्थिव शरीर को अग्नि को सुपुर्द करते शमशान में उपस्थित लोग अपनी-अपनी घड़ी देखने लगते हैं। “अब क्या काम हैं?”, विसर्जित ‘कलश’ करते हैं, लेकिन शमशान में लोगों के मुख से सैकड़ों बार सुना हूँ ‘अस्थियां तो बाद में मिलेंगी।’ गाँव की बात तत्काल समय के लिए छोड़ भी दें, शहरों में तो शमशानों में सरकारी पदाधिकारी’ जो महाकाल के स्वरुप होते हैं, लोगों के चेहरे के भाव को पढ़कर मुस्कुराते रहते हैं क्योंकि उनकी अपेक्षाएं इससे अधिक नहीं होती जिनका शरीर उस समय तक “बॉडी” नहीं हुआ होता है।
मैं भी अपने गाँव की सीमा लांघ दिया था बहुत अल्पायु में। छह-सात साल की आयु कहीं प्रवासित होने की होती है। आज ही नहीं, कल भी सोचता था और आने वाले कल भी सोचूंगा अगर गाँव की सीमा नहीं लांघता तो शायद आज नामोनिशान समाप्त हो गया होता। जिस दिन गाँव की सीमा-रेखा को लाँघ रहा था, अपने गाँव के रेलवे स्टेशन ‘लोहना रोड’ से पश्चिम की और आने वाली छुक-छुक गाडी से लोहना रोड, मनीगाछी, सकरी, ककरघट्टी, तार सराय होते मिथिला के राजा का स्टेशन दरभंगा पहुंचा था।
उन दिनों दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह के शरीर को पार्थिव हुए महज तीन साल हुआ था। साल था सन 1965 और लोग बाग़ कहते थे की अभी तक महाराजाधिराज के सिरा (जहाँ उनका दाह संस्कार हुआ था) पर अग्नि का तप और उनके शरीर का तेज समाप्त भी नहीं हुआ है, संतानहीन महाराजा के घर के लोग उनकी सम्पत्तियों को लूटने-खसोटने में लगे हैं। फिर पहले कुछ महीने के लिए गढ़बनैली पहुंचा और फिर मगघ के राजधानी पाटलिपुत्र।
कौन अपनी जमीन से अलग होना चाहता है। आज़ादी का महज 18 साल ही तो हुआ था। बिहार का राजनीतिक नेतृत्व श्री कृष्ण बल्लभ सहाय के हाथों था जबकि राष्ट्र का कमान श्री लाल बहादुर शास्त्री के हाथों था। नेहरू सन 1964 में मृत्यु को प्राप्त किये थे और उनके देहावसान से दो वर्ष पूर्व दरभंगा के महाराजाधिराज अंतिम सांस लिए थे।
उस दिन महज मैं ही नहीं अबोध बालक था जो अपने गाँव से पलायित हुआ था। गाँव में न पढ़ने का, न खाने का, न दबा-दारू का, न नौकरी-चाकरी का, न रोजी-रोटी का कोई भी अवसर था। उन दिनों से आज तक न जाने कितने करोड़ लोग, महिलाएं, पुरुष, बच्चे अपने-अपने गाँव से पलायित हुए। दीन दरिद्र होता गया और घुटने कद के नेता आदमकद के होते गए। अपनी राजनीतिक पैर को ज़माने के लिए जो गाँव की खेतों के आड़ों पर घास काटने वाली महिलाओं-पुरुषों से बीड़ी मांगकर पीते थे, आज धनाढ्यों की श्रेणीं में पक्तिबद्ध हो गए। लेकिन गरीब वहीँ का वहीँ रहा। वजह भी था – कोई भी नेता अथवा अधिकारी यह कभी नहीं चाहता कि उसके क्षेत्र के लोग शिक्षित हों। अगर वह शिक्षित हो जायेगा तो ‘अधिकार’ की बात करेगा। खैर।
उन दिनों माँ-बाबूजी और गाँव के अन्य बड़े-बुजुर्गों के मुख से सुना करते थे : “कोउ नृप होई हमै का हानि, चेरी छांड़ि कि होइब रानी” जिसका भावार्थ तो नहीं समझ पता था, लेकिन जब मगध की राजधानी पर चप्पल घिसने लगा, तब बाबूजी कहते है “एक शिक्षा ही तुम्हारे लिए अस्त्र-ब्रह्मास्त्र होगा जब तो अपनी गरीबी को अपने परिवार से मीलों दूर भगा सकते हो। तुम अपनी पहचान बना सकते हो। तुम स्वयं पर और समय पर अटूट विश्वास रखना। समय कभी ‘छल’ नहीं करता। छलते तो लोग हैं। हम-तुम राजा-महाराजा भले संपत्ति से नहीं हों, लेकिन मन और आत्मा को जीवित रखने से उनसे भी बड़े होंगे।”
माँ-बाबूजी यह भी कहते थे अपनी जीवन में जिस रास्ते से चलकर आगे बढ़ो, उस रास्ते की कभी उपेक्षा कभी नहीं करना। उसे कभी नहीं भूलना। तुम्हारे जीवन में अख़्तियार किये गए सभी रास्ते तुम्हारा इंतज़ार करेगी तुम्हारी वापसी की, वह भी मुस्कुराते, इसका ध्यान अवश्य रखना । समय और मिट्टी का सम्बन्ध इस सृष्टि का सबसे मजबूत और विश्वसनीय है। दोनों का वजूद उतना ही गहरा है जितनी इस पृथ्वी की मोटाई। दोनों का एक-दूसरे की नजर में बहुत सम्मानित हैं और यही कारण है कि अगर कोई इनमें से किसी एक के साथ कोई छल कर दिया, तो दूसरे बदला नहीं, सबक अवश्य सिखाता है, वह भी ‘शरीर’ को ‘बॉडी’ का नाम अलंकृत होने से पहले। मेरी बात गाँठ बाँध लो।”
बाबूजी कहते थे कि ‘इसका कारण यह है कि जब तुम उस रास्ते पर चलोगे तो तुम्हारे वजन से रास्ते की मिट्टी दबेगी, कुचली जाएगी; लेकिन वह उफ्फ तक नहीं करेगी। वह निर्जीव है। वह बोल नहीं सकती। भले तुम भूखे हो लेकिन तुम सजीव हो और तुम्हे सोचने-समझने की क्षमता ईश्वर ने जन्मजात दिया है। तुम्हें भी उस निर्जीव को मन और आत्मा से जीवित रखकर, उसके बारे में सोचना होगा।” बाबूजी की बातें उन दिनों समझ में नहीं आती थी। लेकिन समयांतराल उनके एक-एक शब्द का अर्थ और भावार्थ दोनों समझने लगा। आखिर वे उन बातों को अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर ही तो कहे थे।
बहरहाल, सन 1968 से सन 1975 तक इस ऐतिहासिक मैदान के दाहिने हाथ गंगा छोड़ की ओर स्थित बस अड्डा पर जब अखबार बेचते थे, यहाँ से अखबार लेकर अशोक राजपथ के रास्ते पटना विश्वविद्यालय परिसर में, पटना की सड़कों पर, श्री तरित बाबू (भारती भवन), श्री राम बाबू-श्री श्याम बाबू, लल्ली बाबू (पुस्तक भण्डार), श्री परमेश्वर बाबू (लक्ष्मी पुस्तकालय) आदि संस्थानों में ‘आर्यावर्त’, ‘दी इण्डियन नेशन’, ‘सर्चलाइट’, ‘प्रदीप’ अखबार देते, सड़कों पर बेचते, घर सँभालते, लिखते-पढ़ते आगे बढ़ते गए।
एक अखबार विक्रेता से अख़बार के संस्थान में कर्मचारी और फिर पत्रकारिता की बुनियाद रखकर अशोक राजपथ से धनबाद के हीरापुर, कलकत्ता के चौरंगी और दिल्ली के राजपथ पर अपने पैरों के निशान बनाये। यह सभी इसलिए संभव हुआ कि उस दिन पटना के गांधी मैदान की मिटटी को मैं भी रौंदा था। जिस दिन ‘आर्यवर्त’ ‘दी इण्डियन नेशन’ का वेबसाइट बनाया ताकि महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह (जिन्होंने इन अख़बारों की स्थापना किये थे) और श्री कुमार शुभेश्वर सिंह (जिन्होंने साढ़े चौदह वर्ष की आयु में नौकरी दिए थे), पटना का यह ऐतिहासिक गांधी मैदान और उसका सहस्त्र पगडंडियां मानस पटल पर विराजमान हो गया था जिसे अपने जीवन की शुरूआती दिनों में कुचलकर आगे बढ़ा था। आज मन ही मन उस वेबसाइट, यूट्यूब का #अख़बारवाला चैनेल समर्पित है गांधी मैदान के इन पगडंडियोको।
विगत दिनों जब इन पगडंडियों के रास्ते अपना बाज़ार के सामने से संत जेवियर, स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया, बिस्कोमान, जिलाधिकारी का निवास, एग्जिविशन रोड, फ़्रेज़र रोड की ओर अनंत काल से उन्मुख इन पगडंडियों को देखा, गांधी मैदान की जमीन और हम एक दूसरे से रूबरू हुए तो दोनों रो पड़े। यहाँ की मिट्टी को माथे में लगाते ह्रदय के अन्तः कोने से उसे अपनी वेदना और संवेदना दोनों बताये और यह भी बताये की अगर उस दिन आप मुझे चलने नहीं देती तो शायद मैं इस वहां पहुँच नहीं पाता।
उन दिनों एग्जिविशन रोड के सामने से आने वाली पगडण्डी को पार करते जब फ़्रेज़र रोड की ओर बढ़ा ही था, अचानक बैठ गया। सोचने लगा जब सन 1975 में दी इण्डियन नेशन में नौकरी की शुरुआत किया ही था और साल के उत्तरार्ध बाढ़ आयी थी, उन दिनों कैसे फ़्रेज़र रोड के ‘डिवाइडर’ को पकड़ते, आकाशवाणी के रास्ते, भारतीय नृत्य कला मंदिर, डॉ सी पी ठाकुर के घर के सामने से होते गांधी मैदान के चाहर दीवारी के रास्ते आईएमए भवन, अपना बाजार, रीजेंट, एलिफिंस्टन सिनेमा हॉल होते अशोक राज पथ से घर आते थे पटना कालेज क।े पास।
कभी कभी जब साईकिल पंचर हो जाता था, जेब में पैसे नहीं होते थे तो एलिफिंस्टन सिनेमा हॉल के सामने से चाहर दीवारी को लाँघ कर इस गांधी मैदान की मिट्टी को, घास को रौंदते फ़्रेज़र रोड के पास निकलते थे। कभी भी यहाँ की मिट्टी या घास “उफ्फ” तक नहीं की। उसे विश्वास था कि हम आगे बढ़ेंगे। उसका नाम रोशन करेंगे। एक दिन अपनी आंसू से उसकी वेदना-संवेदना को धोएंगे। वह जानती थी कि न हम हार मानने वाले हैं और ना ही वह साथ छोड़ने वाली है। गाँधी मैदान की मिट्टी से बात करा रहा था। कभी हंस रहा था, कभी दोनों के कंठ अवरुद्ध हो रहे थे – लेकिन दोनों के चेहरों पर कोई मलिनता नहीं दिख रह था ।
आज अपने पटना गांधी मैदान और मैदान में लोगों के पदचिन्हों से बना यह पगडंडी जब देखता हूँ तो ऐसा लगता है कि यह पगडण्डी नहीं बल्कि गांधी मैदान की मिट्टी की कहानी है, उसकी हस्तरेखा हैं जिससे अनंत लोगों के भाग्यों का निर्माण की। मैं नहीं कह सकता कि कोई पलटकर गांधी मैदान की इन रेखाओं से रूबरू हुए अथवा नहीं, लेकिन मैं मन और आत्मा से उस दिन भी जीवित था, आज भी जीवित हूँ।
उस दिन जब अपने शहर में स्थित गांधी मैदान की मिट्टी, ये पगडंडियां मुझे देखी तो क्षणम भर के लिए दोनों निःशब्द हो गए। फिर मुस्कुराये और रोने लगे फफक कर। अगर यह रेखाएं, गांधी मैदान की मिट्टी मुझे नहीं अपनाती तो शायद पटना के अशोक राजपथ से कलकत्ता के चौरंगी, धनबाद के हीरापुर के रास्ते दिल्ली के राजपथ पर पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने पैरों का निशान नहीं बना पाता। आप नमन स्वीकार करें उस बालक का जिसने बचपन में आगे बढ़ने के लिए आपको अपने पैरों तले रौंदा था और आप उफ्फ तक नहीं की थीं।
