नई दिल्ली / पटना : विगत दिनों भारत महान विचारक बंगाल के ईश्वरचंद विद्यासागर के प्रपौत्र डॉ. नीलाद्रि बनर्जी भारत आये हुए थे। डॉ. बनर्जी इंग्लैंड में रहते हैं। बंगाल स्थित अपने पैतृक घर और लोगों का भ्रमण-सम्मेलन करने के बाद उनका एक महत्वपूर्ण उद्देश्य था - सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक डॉ. बिंदेश्वर पाठक से मिलना, संस्थान और सुलभ की कार्य-संस्कृति को देखना और फिर उसे गठरी बाँध कर इंग्लॅण्ड ले जाना, जहाँ वे एक विश्वविद्यालय में प्राध्यापक है, के छात्र-छात्राओं को अवगत करना।
सुलभ के लिए यह एक उत्सव का दिन था ईश्वरचंद्र विद्यासागर के वंशज का परिसर आना। उसी दिन मेरी पत्नी श्रीमती नीना झा, जो संत. थॉमस विद्यालय में विज्ञान की शिक्षिका हैं, विगत 25 वर्षों से पढ़ा रही हैं, अपने विद्यालय के बच्चों के साथ प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और सीबीएसई की नई शिक्षा नीति के तहत सुलभ का भ्रमण करना था।उस दिन कुछ पल के लिए ऐसा लगा कि शायद 'विद्यालयीय छात्र-छात्राओं का भ्रमण रुक न जाय। लेकिन श्री ईश्वरचंद विद्यासागर और डॉ. बिंदेश्वर पाठक, दोनों तो सामाजिक उत्थान के लिए ही कार्य किये/कर रहे थे, विद्यालय के बच्चे और शिक्षक सादर आमंत्रित रहे। आखिर बातों को तो अगली पीढ़ी ही आगे ले जाएगी।
डॉ. पाठक इस बात से भी खुश थे कि श्रीमती नीना झा शिवनाथ झा की पत्नी हैं। डॉ. पाठक मुझे सत्तर-अस्सी के ज़माने से जानते थे। वैसे, साल 2006 में जब भारत रत्न शहनाई उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के लिए कार्य कर रहा था, 'मोनोग्राफ ऑन उस्ताद बिस्मिल्लाह खान' प्रकाशित कर रहा था, तब श्रीमती नीना झा अनुरोध की थी कि बनारस के ऐतिहासिक हरहा सराय घर पर शहनाई सम्राट का सम्मान डॉ. पाठक के हाथों ही हो। डॉ. पाठक शहनाई सम्राट के साथ मिलकर 91 वां जन्मदिन मनाएं, 91 किलो का केक काटें, दो सम्राटों का मिलन हो - ऐसा ही हुआ था। बनारस के लोग, खासकर शहनाई सम्राट के घर के लोग, जो आज जीवित हैं, उस क्षण को याद कर हर्षित हो जाते हैं। यह अलग बात है कि शहनाई सम्राट उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के शरीर को पार्थिव होते ही सन 2006 के बाद भारत में शहनाई भी पार्थिव हो गया ।
जहाँ तक मुझे याद है स्वाधीनता प्राप्ति के बाद या फिर स्वतंत्र भारत को गणतंत्र घोषित होने के बाद विगत 26 जनवरी, 2024 एक ऐसा पहला दिवस था जब भारतवर्ष के महान समाजशास्त्री, सामाजिक वैज्ञानिक अपने संस्थान के परिसर में राष्ट्रध्वज नहीं लहरा रहे थे, फहरा रहे थे। यह दुखद था। वैसे संस्थान के लोग, परिवार के लोग वहां उनकी उपस्थिति महसूस अवश्य कर रहे थे, उनकी क्रिया-कलाप जो उस दिन हुआ करता था, आँखों के सामने देख रहे थे, याद कर रहे थे संस्थान के स्वामी के सम्मानार्थ, उनके प्रति श्रद्धांजलि स्वरुप।
लेकिन सुलभ कार्यालय से कोई 17 किलोमीटर दूर दिल्ली के रायसीना हिल पर डॉ. पाठक का नाम, उनकी कीर्तियों को उनके पर्यायवाचक के रूप में भारत के राष्ट्राध्यक्ष, प्रधानमंत्री और अन्य गणमान्य व्यक्तियों के मुख से उच्चारित हो रहा था। सभी खुश थे। वैसे भारत के लोग, मंत्रालय के लोग यह जानते थे कि डॉ. पाठक देश का इकलौता सामाजिक रत्न हुए जो भारत रत्न के हकदार थे। लेकिन मेरे बाबूजी कहते थे कि 'समय से बड़ा लेखक कोई नहीं होता इस पृथ्वी पर। शायद इस वर्ष डॉ. पाठक के पैतृक घर बिहार से कुछ दूर पितौझिया गाँव के कर्पूरी ठाकुर का नाम समय लिख दिया था। आखिर कर्पूरी जी भी गरीब-गुरबा के उत्थान के लिए ही कार्य किये थे।
2024 में भारत सरकार द्वारा जिन पांच महामानवों को राष्ट्र का उत्कृष्ट नागरिक सम्मान "पद्म विभूषण" से अलंकृत किया गया है उसमें चौथा नाम है "सामाजिक क्षेत्र में उत्कृष्ट भूमिका के लिए सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक संस्था बिहार के डॉ. बिंदेश्वर पाठक का । डॉ. पाठक को यह सम्मान उनके मृत्युपरांत अलंकृत किया गया है। अपने जीवन काल में वे "पद्मश्री", "पद्मभूषण" से अलंकृत हो चुके थे।
डॉ पाठक विगत साल 15 अगस्त को अपने कार्यालय में स्वतंत्र भारत का राष्ट्रध्वज फहराते, लहराते, जो उनके जीवन काल में उनके द्वारा सामाजिक क्षेत्र में उनका योगदान का भी प्रतिक था, धीरे-धीरे अंतिम सांस की ओर बढ़ रहे थे। उधर आसमान से राष्ट्रध्वज में बंधे पुष्प गुरुत्वाकर्षण के नियम के तहत जमीन पर आ रहे थे, उनके मस्तिष्क पर गिर रहे थे। उधर उनकी आत्मा समय के आदेशानुसार उनके शरीर से पृथक होकर ब्रह्माण्ड में विलीन हो रहा था। कल 26 जनवरी था 2024 साल का और पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण डॉ बिंदेश्वर पाठक सशरीर उपस्थित नहीं थे। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दें।
मेरी माँ डॉ. पाठक को पटना के दिनों से जानती थी। माँ को मेरे बाबूजी के पास पहुँचने के लिए अंतिम यात्रा पर निकले कोई 15 वर्ष हो रहा है । माँ कहती थी: ‘जब मनुष्य के शरीर की हड्डी से मांस लटकने लगे, त्वचाओं में झुर्रियां और शिराएं दिखने लगे, तो यह मत समझना कि वह मनुष्य वृद्ध हो गया है, अथवा वृद्ध हो रहा है । यह सोचकर समझने की कोशिश करनी चाहिए कि वह अपने जीवन के कितने वसंतों की पीड़ाओं को सहकर, स्वयं को उस मानसिक, शारीरिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक, शैक्षिक और मानवीय उत्कर्ष पर पहुंचा पाया है, जहाँ समाज के बिरले लोग पहुंच पाते हैं। वृद्ध तो सभी होते हैं लेकिन उसके शरीर के एक-एक नश, एक-एक शिराएं, त्वचा की झुर्रियां उसके जीवन का शब्दकोष होता है। डॉ पाठक उसके जिवंत दृष्टान्त थे। मुस्कुराने का वजह हो अथवा नहीं, सभी के लिए वे कहते थे - “मुस्कुराइए … आप सुलभ में हैं" और लोग मुस्कुराते थे।
माँ यह भी कहती थी तुम्हें तुम्हारे जीवन काल में समाज में वैसे जीतने भी जीवित प्राणी दिखें, उन्हें अन्तः मन से सम्मान करना क्योंकि वैसे मनुष्यों की माताएं ‘अशिक्षित’, ‘अनपढ़’, ‘निरक्षर’ ही मिलेंगी, मेरी तरह। वे सभी माताएं अपने बच्चों को शिक्षा के उत्कर्ष पर देखने के लिए खुद अशिक्षित रहना श्रेयस्कर समझती हैं । वे अपनी भाषाओँ को छोड़कर, किसी भी अन्य भाषाओँ को नहीं जानती हैं; नहीं पहचानती, नहीं पढ़ पाती। लेकिन अपने बच्चों के होठों की गतियों को, शारीरिक हलचलों को पढ़ना जानती हैं और समझ जाती हैं की आखिर उनका संतान क्या चाहता है। आने वाले समय में ऐसे मनुष्यों की किल्लत होगी। समाज में दृष्टान्त देना तो मुश्किल होगा ही। डॉ. पाठक भी अपने जीवन काल में अपनी माँ का दृष्टान्त हज़ारों बार दिए थे। कहते भी थे 'अगर उस दिन माँ यह बात नहीं कहती तो शायद यह होता भी नह
बहरहाल, विगत सप्ताह कबीर खान द्वारा निर्देशित और रणवीर सिंह, दीपिका पादुकोण, पंकज त्रिपाठी, बोमन ईरानी, ताहिर राज भसीन, जीवा, साकिब सलीम, जतिन सरना जैसे कलाकारों द्वारा अभिनीत “फिल्म 83” देखा। इस फिल्म को देखकर मैं अश्रुपूरित था। कपिल देव की गेंद मुझे अपने जीवन के चालीस वर्ष पीछे लेकर चला गया। वह दिन एक तरह से मेरे जीवन का मार्मिक दिन अवश्य था, लेकिन ‘सकारात्मक’ समय की शुरुआत के लिए – कपिल देव की तरह।
सन 1983 के जून महीने में 9 जून से 25 जून तक इंग्लैंड और वेल्स में वर्ल्ड कप के लिए मैच हो रहा था। सेमी फ़ाइनल में इंग्लैंड, पाकिस्तान, वेस्ट इंडीज और भारत आया था और 25 जून को लॉर्ड्स में भारत और वेस्ट इंडीज के बीच फ़ाइनल मैच खेले जाने वाला था। उन दिनों मैं पटना से प्रकाशित आर्यावर्त-इण्डियन नेशन अखबार में कार्य करता थाइण्डियन नेशन के सम्पादकीय विभाग में उप-संपादक के रूप में कार्यरत था। दफ्तर की आर्थिक स्थिति कमजोर होने लगी थी। कर्मचारियों को वेतन हेतु कैशियर के काउंटर पर पहुंचे महीनों बीत गए थे। कई लोगों के घरों में चूल्हे की आंच धीमी हो गयी थी। कई कर्मचारियों की बेटियों का विवाह तय होने के बाद भी, टूट गया था। बच्चों के विद्यालयों में शुल्क शैक्षिक-शुल्क की राशि भी उत्तरोत्तर बढ़ रही थी। पटना की सड़कों पर तापमान एक ओर जहाँ आसमान छू रहा था, हमारे दफ्तर में सामान्य कर्मचारियों का जीवन जमीन के अंदर दबा जा रहा था
उन दिनों हमारे दफ्तर में थे सुधाकर भाई (सुधाकर झा) जो संवाददाता तो थे ही, खेल-कूद, विशेषकर क्रिकेट में उन्हें बहुत अभिरुचि थी। उन दिनों अख़बारों में इलस्ट्रेशन दिल्ली से ‘केबीके’ का छपता था जो डाक से आने के कारण औसतन तीन दिन बाद आता था। उस दिन बृहस्पतिवार था और तारीख 23 जून। मैं 9 जून से उस तारीख तक वर्ल्ड कप में खेले गए सभी देशों की अंक-तालिका बना लिया था। मेरी इक्षा थी की जब फ़ाइनल मैच हो, उस दिन उस तालिका को प्रकाशित करेंगे ‘केबीके’ के आने से पहले। फ़ाइनल मैच में विजय देश का स्थान छोड़कर, एक बेहतरीन अंक तालिका बनाया। यह सोच लिया था जैसे ही खेल ख़त्म होगा, विजय देश का नाम लिखकर अंक तालिका का ब्लॉक बनाकर प्रकाशित करेंइस पूरे कार्य में सुधाकर भाई का पूरा सहयोग था।
उन दिनों पटना के दो-पहिये वाहन जैसे स्कूटर, मोटरसाइकिल आदि के अगले और पिछले हिस्से पर नंबर लिखा होना ‘बाध्यकारी’ हो गया था। ट्रैफिक डीएसपी थे बनवारी बाबू। एक बेहतरीन इंसान, लेकिन अनुशाषित। मैं 10 रुपये में अनंत लोगों की गाड़ियों पर नंबर लिखा। पैसे आने से घर में चूल्हे जलने में मदद मिलता था। सुधाकर भाई हमेशा हमारे कार्य में पीछे खड़े होते थे। जब तालिका बना लिया तब सोचा कि अगर कोई इसे ‘स्पॉन्सर’ कर दे तो ‘दो पैसे की आमदनी’ मुझे भी हो जाएगी और संस्थान को तो होगी ही। मैं तत्कालीन विज्ञापन व्यवस्थापक और मुद्रक तथा प्रकाशक गिरीन्द्र मोहन भट्ट (अब दिवंगत) के पास पहुंचा। तालिका दिखाया और मार्गदर्शन के लिए याचना किया। भट्ट जी मेरी आंखों में मेरी भावना को पढ़ लिए। आखिर वे भी तो एक पिता थे और भूख से होने वाली पेट-पीड़ा से वे भी अवगत थे। उन्होंने एक रास्ता बताया ‘आप सुलभ शौचालय के बिंदेश्वर पाठक जी के पास चले जाएँ, उन्हें दिखाएँ और कहें की भट्ट जी भेजे हैं।’ उन दिनों सुलभ ‘शौचालय’ ही था।
23 जून। वर्ल्ड कप फ़ाइनल से 48 घंटा पूर्व। पटना की सड़कों पर तापमान कोई 48+ डिग्री। और मैं उन्मुख था पाटलिपुत्र कॉलोनी स्थित बिंदेश्वर पाठक के आवास की ओर। सड़कों पर मुझ जैसे ‘अभागा’ ही चलते-फिरते दिख रहा था। कहीं कोई रिक्शावाला, तो कहीं ठेला पर सामन लिए मजदूर। बीच-बीच में अपने चेहरे को छुपाए स्कूटर, मोटर साईकिल पर लोग दिख रहे थे। सूर्यदेव सर के कुछ डिग्री पश्चिम गाल को सेक रहे थे। माँ-बाबूजी कहते थे: “समय परीक्षा की घोषणा नहीं करता। वह जीवन में कभी भी समय परीक्षा ले सकता है। इसलिए हमेशा सज्ज रहना।” माँ-बाबूजी की बातें हमारे लिए ‘ब्रह्मवाक्य’ था और हम भी सज्ज थे। मन में कई तरह की बातें आ रही थी लेकिन साईकिल अपनी दिशा की ओर उन्मुख थ
पाटलिपुत्र कालोनी में प्रवेश के बाद सड़क की बायीं ओर एक छोटे-मैदान के पास बिंदेश्वर पाठक का घर था। बाहर एक पेड़ में साईकिल को सिक्कड़ से बांधकर, चेहरे को पोछते, हनुमान चालीसा पढ़ते मैं दरवाजे पर दस्तक दिया। प्रवेश द्वार के दाहिने कोने पर स्थित ‘कॉल-बेल’ को दबाया – ट्रिंग – ट्रिंग। कुछ ही क्षण में दरवाजा खुला। दरवाजा खुलते ही अंदर से आलू-परवल की सब्जी, बासमती चावल, अरहर दाल और अन्य भोज्य पदार्थों का सुगंध एक ही बार नाक के रास्ते मस्तिष्क तक पहुंचा। माँ कहती थी ‘चाहे तुम कितना भी भूखा रहो, चेहरे पर शिकन नहीं आने देन
सामने एक सज्जन आये और उनके पीछे घर के अंदर डाइनिंग टेबल के पास हाथ पोछते बिंदेश्वर पाठक साहब दिखे। मैं सज्जन को कहा कि ‘मैं शिवनाथ हूँ और भट्ट जी भेजे हैं।’ पाठक जी तक्षण बाहर निकले और अंदर आने को कहा। मैं कोने पर ही खड़े-खड़े उन्हें पूरी बातें बताया, तालिका दिखाया और कहा कि ‘परसो विश्व कप का फ़ाइनल मैच है। यह तालिका उसी से सम्बंधित है। जो जीतेगा उसका नाम लिखकर, ब्लॉक बनाकर इसे दोनों अखबार में प्रकाशित करेंगेपाठक जी आर्यावर्त-इण्डियन नेशन संस्थान की स्थिति से अवगत थे। वे वहां के कर्मचारियों की स्थिति को भली-भांति जानते थे। मेरी भावना और उस गर्मी में सड़क नापने का उद्देश्य वे जानते थे। आखिर वे भी वे पिता थे। पाठक जी फिर पूछते हैं: “कौन जीतेगा?” मैं सहज शब्दों में कहा: कपिल देव।’
मेरे तालिका के पीछे उन्होंने हस्ताक्षर कर दिए और कहे कि भट्ट जी को कहियेगा कि बिल दफ्तर में भेज देंगे।’ फिर अपने कुर्ता के जेब में हाथ दिए और जो भी द्रव्य था (1600/- रुपये) वे मेरे हाथ में रखते कहते हैं: ‘यह आपकी मेहनत और सोचने की अलग दृष्टि का पुरस्कार है।” मैं भी उसे अपनी जेब में रखा लिया और उन्हें धन्यवाद देते, प्रणाम करते विदा लिया। बाहर आते ही जब सूर्यदेव पर नजर गयी तो ऐसा लगा कि सूर्यदेव मुस्कुरा रहे हैं। शायद उनकी नजर में मैं उत्तीर्ण था। मैं साईकिल का पैडल मारते सीधा अपने घर की ओर उन्मुख हो गया।
उन दिनों मैं पटना के भीखना पहाड़ी मोहल्ला के सैदपुर छात्रावास के सामने रहता था। सामने एक स्कूल और स्कुल परिसर में एक विशाल पीपल का बृक्ष और उस बृक्ष के नीचे हनुमान की प्रतिमा। सूर्यदेव अस्ताचल की ओर उन्मुख थे। तेज और तप दोनों कम हो गया था। माँ बीच वाले कमरे के दरवाजे का ओट लिए बैठी थी। दरवाजा खुला था। सूर्य की किरणें उसके चेहरे के साथ क्रीड़ा कर रही थी। पीपल के पेड़ के पत्तों के बीच से सूर्य की किरणें कभी-कभी छनकर आती थी। माँ मेरी साईकिल की घंटी से अवगत थी। उसे चिंता थी कि मुझे दफ्तर जाने का समय हो रहा है और मैं अब तक वापस नहीं आया हू
तभी साईकिल की ट्रिंग-ट्रिंग घंटी बजी। गली के नुक्कड़ से दरवाजे की दूरी महज 20 कदम था। माँ मेरे चेहरे को पढ़ ली। ‘नाउम्मीद’ मन आकाशमात उम्मीदों से भर गया। माँ समझ गई – कुछ अच्छा हुआ है। मैं साइकिल लगाकर माँ के हाथों में 1600/- रुपये रखा। अपनी आँचल की खूंट से अपनी आंखों को पोछते वे कहती हैं: “जुग-जुग जीबैथ बिंदेश्वर बाबू।” उस द्रव्य से कोई तीन महीने हम सभी ‘भर-पेट खाना खाये।ँ
उस घटना के कोई तीन दशक बाद जब भारत के पूर्व कप्तान और विश्व कप – 1983 के विजेता कपिल देव से नोएडा स्थित उनके नवनिर्मित गगनचुंबी अट्टालिका में भारतीय स्वाधीनता संग्राम के गुमनाम क्रांतिकारियों का वीर-गति प्राप्त सेनानियों के आज के वंशजों की खोज से संबंधित प्रयास को लेकर मिला और उन्हें पटना की उस घटना को बताया, बिंदेश्वर पाठक जी के बारे में बताया। मेरी बातों को वे बहुत धैर्य के साथ सुने। वे निःशब्द थे। लगता था वे मेरी भावना को पढ़ रहे हैं।।
उन दिनों मैं ऑस्ट्रेलिआ से उदघोषित स्पेशल ब्रॉडकास्टिंग सर्विस (एसबीएस रेडियो, हिंदी सेवा) के लिए कार्य करता था। मेरी बातों को सुनने के बाद भारत के कप्तान कहते हैं: “हमें उम्मीद कभी नहीं छोड़नी चाहिए। न मैं खेल के मैदान में उस दिन उम्मीद छोड़ा था और ना ही आज। आपकी बातें एक पाठ है आज को युवाओं के लिए। आप बहुत बेहतरीन कार्य कर रहे हैं। इस कार्य को सभी नहीं समझेंगे। मैं पाठक जी को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ। पाठक जी बहुत बेहतरीन इंसान हैं। आज़ाद भारत में वे एकमात्र व्यक्ति हैं जिन्होंने सफाई के समाजशात्र को पुनः परिभाषित किया। उन्होंने जो किया, आज तक किसी ने नहीं किया। आप भी उम्मीद नहीं छोड़ें। कोई नहीं जानता आपका अंतिम प्रयास ही आपको विश्वव्यापी बना दे
आज ही नहीं, कल भी “मेरी आवाज ही पहचान है” – ये पांच शब्द सुनते ही दिवंगत लता मंगेशकर जी याद आएँगी। “मिसाईल” सुनते ही महान वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति दिवंगत ए पी जे अब्दुल कलाम साहब याद आएंगे। क्रिकेट के मैदान में जब भी वर्ल्ड कप की चर्चा होगी पहले कपिल देव ही नाम लिया जायेगा। उसी तरह आज ही नहीं, कल भी और आने वाले समय में भी, जब भारत में स्वच्छता और भंगी-मुक्ति आंदोलन, यानी “सामाजिक बदलाव” और “मानवीय विकास” के अग्रणी का नाम लिया जायेगा, तो सबों के जुबान पर एक ही नाम आएगा ‘सुलभ’ और उनके संस्थापक डॉ बिन्देश्वर पाठक ।
जब भी ‘सोशियोलॉजी ऑफ़ सेनिटेशन’ पर चर्चा की जाएगी डॉ पाठक का नाम स्वतः मुख पर आ जायेगा। यही कारण है कि डॉ पाठक की तुलना इब्राहिम लिंकन से भी लोगों ने किया। जिस तरह लिंकन अमेरिका में काले-गोरों में भेदभाव को मिटाने के लिए याद किये जाते हैं, डॉ पाठक भारत में समाज के दबे-कुचले, समाज से उपेक्षित सर पर मैला ढोने वाले महिला-पुरुषों को समाज की मुख्यधाराओं में जोड़ने के लिए याद किये जायेंगे। और उन्ही यादों में ‘सोसिओलोजी ऑफ़ सेनिटेशन’ की रचना की गई डॉ हेतुकर झा के साथ।
जब डॉ. पाठक ने 1970 में बिहार में सुलभ शौचालय संस्थान के नाम से एक स्वयंसेवी और लाभ निरपेक्ष संस्था की आधारशिला रखें। वे गाँधी की विचारधाराओं, जिससे वे अधिक प्रभावित थे, को अक्षरसः व्यवहार में अनुवाद करेंगे । वे कमाऊ शौचालयों को कम लागत वाले फ्लश शौचालयों अर्थात् ‘सुलभ शौचालयों’ में बदलने का एक क्रान्तिकारी अभियान शुरू किया। उन दिनों परम्परागत कमाऊ शौचालय पर्यावरण को प्रदूषित करते थे और दुर्गन्ध फैलाते थे। साथ ही, उन्हें साफ करने के लिए सफाई कर्मियों की आवश्यकता पड़ती थी। कम लागत वाले सुलभ शौचालय उपयोग की दृष्टि से व्यावहारिक थे, आज भी हैं जो इसका उपयोग करने वालों के साथ ही सफाई कर्मियों के लिए भी वरदान सिद्ध हुआ है।
उन दिनों पटना विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में प्रोफ़ेसर मुसी राजा साहब, प्रोफ़ेसर सरदार देवनंदन सिंह साहब, प्रोफ़ेसर सतीश कुमार साहब, प्रोफ़ेसर आनंद कुमार साहब, प्रोफ़ेसर (श्रीमती) फुलोरा सिंह, प्रोफ़ेसर ज़ियाउद्दीन अहमद जैस समाजशात्र के महान हस्ताक्षर थे। सभी पटना में एक ऐसे संस्थान की स्थापना की जाय जो भविष्य में सामाजिक क्षेत्र के कार्यों पर शोध करने वाले शोधार्थी को मदद मिल सके – एक केंद्रीय संस्था के रूप में। लेकिन तत्कालीन व्यवस्था और हुकुमनानों के साथ ‘तालमेल नहीं बैठने के कारण पटना में स्थापित होने वाला वह संस्था दिल्ली आ गया।
कहते हैं डॉ पाठक का जन्म 1943 में बिहार के वैशाली जिले के एक गांव में एक रूढि़वादी ब्राह्णण परिवार में हुआ था। विगत चार दशकों और अधिक समय में पाठक जी से अनेकों बार सुना कहते : “जब मैं 6 वर्ष का था तो मैंने एक कथित अस्पृश्य महिला को छू दिया और रूढि़वादी अस्पृश्यता को मानने वाली मेरी दादी ने शुद्ध करने की बात कहकर जबरन मुझे गाय का गोबर और गौ मूत्र पिलाया, जिसका कड़वा स्वाद आज भी मेरे मुंह में है।”
डॉ पाठक के अनुसार वे जिस घर में पले -बढे उसमे वैसे नौ कमरे तो थे, परन्तु एक भी शौचालय नहीं था। जब वे सोते थे तो सुबह-सवेरे अर्धनिद्रा में कुछ आवाजें सुनते थे, कोई बाल्टी उठा रहा होता था, कोई पानी भर रहा होता था और महिलाएं सूर्योदय से पहले शौच के लिए बाहर जा रही होती थीं। कोई महिला बीमार पड़ जाती तो उसे एक मिट्टी के बर्तन में ही शौच करना पड़ता था। कई महिलाओं के सिर में दर्द रहता क्योंकि उन्हें दिनभर अपने शौच को रोककर रखना पड़ता था। यह कहानी महज उनके घर या गाँव की नहीं बल्कि यही कहानी भारत के 7,00,000 गांवों और सैकड़ों शहरों की थी। उनकी शिक्षा चार स्कूलों में हुई और दुर्भाग्य से किसी में भी शौचालय नहीं था।
पटना विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में स्नातक करने के बाद उन्हें 1968-69 में बिहार गांधी जन्म शताब्दी समारोह समिति के भंगी मुक्ति विभाग में काम करने का मौका मिला। समिति ने उन्हें सुरक्षित और सस्ती शौचालय तकनीक विकसित करने और दलितों के सम्मान के लिए काम करने को कहा ताकि उन्हें मुख्यधारा में शामिल किया जाय। ब्राह्मण परिवार के जन्म लिए एक व्यक्ति के लिए यह सबसे “नीच कार्य” समझा जाता था, परन्तु डॉ पाठक इसे सहर्ष स्वीकार किया – यह स्वीकार्यता न केवल उनके व्यक्तित्व में बदलाव लाया परन्तु उनके जीवन को एक नयी दिशा भी दिया। डॉ पाठक के जीवन में नया मोड़ तब आया, जब वे बेतिया की दलित बस्ती में तीन महीने के लिए उनके बीच रहने गए।
उस समय देश में जाति-प्रथा उत्कर्ष पर थी। उनके साथ रहते हुए डॉ पाठक ने जो देखा-सीखा-पीड़ा का अनुभव किया, वह सभी बातें इन्हे अपने जीवन को स्कैवेंजरों के लिए समर्पित करने की ओर उन्मुख कर दिया – पश्चिमी देशों में इस्तेमाल हो रही महंगी कलश और सीवर व्यवस्था के विकल्प के रूप में प्रभावी और सस्ती शौचालय व्यवस्था का विकास कैसे किया जाए, ताकि स्कैवेंजिंग प्रथा रोकी जा सके और उन्हें किसी दूसरे कार्य में पुनर्वासित किया जा सके। आज उन्होंने मानवीय सिद्धांतों के साथ तकनीकी नवाचार को मिलाकर संगठन शिक्षा के माध्यम से मानव अधिकारों, पर्यावरण स्वच्छता, ऊर्जा के गैर-पारंपरिक स्रोतों, अपशिष्ट प्रबंधन और सामाजिक सुधारों को बढ़ावा देने के लिए काम करता है। संगठन 50,000 स्वयंसेवकों की गिनती करता है।
उनका नाम ग्लोबल 500 रोल ऑफ़ ऑनर, स्टॉकहोम जल पुरस्कार, लीजेंड ऑफ़ प्लेनेट पुरस्कार, इंडियन अफेयर्स सोशल रिफॉर्मर ऑफ द ईयर 2017 का पुरस्कार, ऑर्डर पटेल अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार, न्यूयॉर्क शहर के मेयर बिल डी ब्लासियो ने 14 अप्रैल को बिंदेश्वर पाठक दिवस के रूप में घोषित किये। करीब पांच दशक जिस अभियान को शुरू किया गया था, वह एक विशाल आंदोलन के रूप में, सामाजिक क्रांति के रूप में, सामाजिक चेतना के रूप में विश्व में अवतरित हुआ।
बहरहाल, पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण डॉ. बिंदेश्वर पाठक आज नहीं हैं। सन 2014 में जब देश का कमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों आया था और कुछ वर्ष बाद जब वे अपने संसदीय क्षेत्र बनारस के विकास के लिए, गंगा की सफाई के लिए, बाबा विश्वनाथ मंदिर के उद्धार के लिए संकल्पित हुए, डॉ. पाठक उनके साथ खड़े थे। बनारस से, गंगा से, मणिकर्णिका से हमारा ताल्लुकात कई दशक से है। बाबूजी और दादाजी सभी बनारस के इसी स्थान पर दीक्षा पाए थे। शायद समय मेरे हाथों भी कुछ कराना चाहता था। शुरुआत कर दिया था - बिस्मिल्लाह खान माध्यम बने थे। हम "बनारस" पर कार्य कर रहे थे। जब डॉ. पाठक को अपनी सोच के अनुरूप कार्य कर दिखाया तो कहते हैं: "ईश्वर आपसे कुछ अलग कराना चाहता है। आप जरूर करें। हम साथ हैं।" अस्सी घाट से राजघाट तक गंगा की धाराओं अपनी सोच लेकर बहा। गंगा की सफाई हुई, गंगा के गहत चमके, विश्वनाथ मंदिर बना - शायद समय भी मेरे उस कार्य के लिए कोई मार्ग प्रशस्त कर रहा है।
हमारी कोशिश होगी कि हमारा प्रयास डॉ. पाठक को "रत्न" बना दे। हम सभी ईश्वर से कामना करते हैं कि डॉ. बिंदेश्वर पाठक की अर्धांगिनी को जीवन जीने की हिम्मत दें। उनके पुत्र-पुत्रवधू, पौत्री और परिवार के अन्य लोगों को, हिम्मत दे उनके सपनों को जीवित रखने, साकार करने में।
