जब दिल्ली आया था उन दिनों सीजीओ काम्प्लेक्स रंगबिरंगा नहीं हुआ था, न भवनों के मामले में और ना ही उन भवनों में कार्य करने वाले मोहतरमाओं और मोहतरमों के मामले में। आम तौर पर दयाल सिंह कॉलेज के पास या फिर इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर के पास दिल्ली परिवहन निगम के बसों से उतरकर पाऊं-पैदल, पसीनों को पोछते केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो के कार्यालय में दस्तक देता था। उन दिनों सुरक्षा कर्मी भी चतुर्दिक ट्रिंग-ट्रिंग करने वाले यंत्र ठूंसकर आस्वस्त नहीं होते थे, बल्कि मुस्कुराकर, चेहरे को देखकर आगे बढ़ने की इजाजत दे देते थे।
सीजीओ काम्प्लेक्स स्थित गेरुआ रंग वाले मकान में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के निदेशक थे श्री विजय कर्ण साहब। उसी भवन में प्रवेश के साथ ही हिस्सों का बंटवारा कुछ ऐसे था जैसे आज के ग़ालिब की हवेली का । इस भवन में बाएं हाथ प्रवेश द्वार सीबीआई का था और दाहिने हाथ इंडो-बर्मा-तिब्बत बल का। पगडण्डी से मुड़कर दाहिने हाथ जब भी कोई आगंतुक आगे बढ़ता था, सीबीआई और आईटीबीपी के सुरक्षाकर्मी देखने लगते थे, सोचने लगते थे की मेरा अतिथि है - तो - मेरा अतिथि है। आते-जाते वे भी पहचान गए होते थे अपने अतिथियों को।
उन दिनों आनंद बाजार पत्रिका समूह के संडे पत्रिका में था जिसका दफ्तर आईएनएस बिल्डिंग रफ़ी मार्ग में था। कहानियों के क्रम में सीजीओ काम्प्लेक्स आना-जाना आम था। विजय कर्ण सीबीआई के 12वें निदेशक थे। पहला निदेशक डीपी कोहली थे, जिनके नाम से आज भी व्याख्यान माला चल रहा है। खैर।
उन दिनों सीबीआई कार्यालय में 'बिहारीपंथी' नहीं हुआ था। बिहारी लोग निदेशक बनने के लिए मारा-मारी नहीं करते थे। एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप नहीं करते थे। वैसे सीबीआई कार्यालय में भी दो तरह के अधिकारी थे - एक जो फुसफुसाकर खबर दे देते थे और दूसरे कचहरी में कागज दिखा देते थे। मोबाईल का जमाना आ गया था, लेकिन न अधिकारियों की औकात थी और पत्रकारों की औकात तो थी ही नहीं। एक-आध जो 'जिनकी पहचान उन लोगों से थी', मोबाईल पर हेल्लो-हेल्लोकरते थे। इतना ही नहीं, अपनी व्यस्तता को सार्वजानिक करने अथवा यह जताने की उन्हें कितने लोग जानते हैं, अपने ही घर से लैंड-लाइन से मोबाईल पर घंटी बजबा देते थे।
हम लोगों जैसे गरीब-गुरबा पत्रकारों के कमर में महिला के आभूषण जैसा कमर में पेजर बंधा होता था। जो अधिकारी फुसफुसकाकर खबर देते थे वे प्रथम पृष्ठ पर होते थे, लेकिन जिनसे कचहरी में मुलाकात होती थी, उनकी खबर अख़बारों में फ्लायर होता था। ऐसे दर्जनों फ्लायर अपने नाम करा लिया था इण्डियन एक्सप्रेस अखबार में।
उन दिनों सीबीआई कार्यालय में गर्मागर्मी का माहौल होता था। वजह भी था राजनेताओं से लेकर, अधिकारीयों, पदाधिकारियों, मंत्रियों, संत्रियों, व्यापारियों, दलालों, सन्यासियों, पुजारियों, संभ्रांतों से जुड़े दर्जनों 'स्कैम्स' देश के विभिन्न न्यायालयों में चल रहे थे। यानी आटा-चावल से लेकर नमक-तेल जैसा स्केम था। नित्य देश के कोने-कोने में सीबीआई का छापा पद रहा था। बैंक खाता बर्फ जैसा जम रहे थे। माहौल 'गजबे' का था। तभी एक दिन सोच कि क्यों न सीबीआई कार्यालय में सभी कर्मियों के लिए हंसी का माहौल बनाया जाय।
उस दिन मैं शहज़ाद मुहम्मद खान (एसएम खान) के सामने बैठा था। घर-द्वार, बीबी-बच्चा के बारे में बात हो रही थी। इसी बीच खान साहेब कहते हैं: "शिवनाथ आपकी मूंछ लाजबाब है। हमारे एक अधिकारी की भी मूंछ कुछ घनी है, लेकिन आपकी जैसी नहीं है।" और हम दोनों चाय की चुस्की लेने लगे। साल 2001 था और निदेशक के कमरे में पीसी शर्मा जी बैठ गए थे कुछ माह पहले। उन दिनों मैं दी स्टेट्समैन अखबार में था और उस अखबार के मालिक सी.आर.ईरानी थे। ईरानी साहब का सत्ता के गलियारे में बहुत दूर तक पहुँच थी।शर्मा साहेब को उस कुर्सी पर बैठने में मेरी एक कहानी काम कर गयी थी। मेरी कहानी के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी सीबीआई निदेशक के लिए अनुशंसित उम्मीदवारों की सुच को रद्द कर नयी सूची बनाने का आदेश दिए थे। पूर्व की सूचि में तत्कालीन सीवीसी एन विठ्ठल राजनीति कर दिए थे। खैर।
ईरानी साहब का CAVEAT मशहूर था The Statesman । खान साहेब की मूँछ वाली बात पर शोध किया रास्ते भर और दफ्तर आकर सीबीआई के तीन अधिकारियों को, जो बाद में निदेशक भी बने, एक कहानी के लिए चुना। कहानी उनके प्रशासनिक व्यक्तित्व पर नहीं, अपितु उनके शारीरिक भाव-भंगिमा पर थी। वे तीन अधिकारी थे - श्री पीसी शर्मा, श्री उमाशंकर मिश्र और श्री विजय शंकर।
श्री पीसी शर्मा 'देवानंद' वाली कला-सफ़ेद चेक वाला "टोपी" पहनते थे। कभी-कभार पीले रंग की। वैसे सीबीआई के अधिकारी होने के नाते दूसरों को टोपी पहनाने में महारत थे, लेकिन सर पार बाल नहीं होने के कारण, आम तौर पर वे टोपी पहनते थे। टोपी उनके व्यक्तित्व में निखार ला देती थी। यदा-कदा वे अपनी टोपी को भी उस तरह उतारते थे, जैसे देव साहेब। दफ्तर में उनकी टोपी की प्रशंसा तो होती थी, लेकिन सीबीआई कार्यालय में अपनी टोपी के लिए विख्यात नहीं हुए थे तब तक। जब हम किसी अन्य अधिकारी से बात करते थे तो बातचीत के दौरान बिना निदेशक का नाम लिए टोपी का इशारा कर देते थे और हम सभी समझ भी जाते थे।
जब पीसी शर्मा निदेशक के पद से अवकाश लिए तब उनकी कुर्सी पर आये थे श्री उमाशंकर मिश्र। श्री उमा बाबू 6 दिसंबर, 2003 से 6 दिसंबर,2005 तक निदेशक रहे। मिश्रा साहेब को "पान" बेहद पसंद था। हो भी क्यों नहीं उड़ीसा के जो थे। वे पान खाते थे। उनके कई निकटतम मित्र जब उनसे मिलने जाते थे तो उनके लिए बेहतरीन पान ले जाते थे, खासकर कनॉट प्लेस के ओडियन सिनेमा हॉल या बंगाली मार्किट से। कुछ लोग खान मार्किट के प्रवेश द्वार बे बाएं हाथ पेड़ के नीचे तिवारी जी की दूकान से भी लेते थे। कई मर्तबा वे इस दूकान पर पान खाते अवलोकित होते थे। वे निहायत शरीफ आदमी थे। शांत आदमी थे। शर्मा जी का मिश्रा जी के साथ बहुत मधुर सम्बन्ध था। अतः जब शर्मा जी जाने लगे और निवर्तमान निदेशक को अपने अगले निदेशक का नाम प्रेषित करना होता है कार्मिक विभाग/सरकार को, शर्मा जी 'पान वाले मिश्र जी' का नाम लिखने में तनिक भी बिलम्ब नहीं किये।
अब जब मिश्र जी का जाने का समय आया वे "मूंछ" वाले का नाम अनुशंसित करते गए। ये मूंछ वाले थे श्री विजय शंकर तिवारी। तिवारी जी 12 दिसंबर, 2005 से 31 जुलाई, 2008 तक सीबीआई के निदेशक रहे। श्री विजय बाबू की आवाज अमीन सायानी वाली आवाज थी, बेहद मधुर लेकिन दमदार, रौबदार। ये तीनों अधिकारी एक दूसरे के अभिन्न मित्र भी थे और अच्छे मनुष्य भी। अगले दिन 750 शब्दों में एक कहानी प्रकाशित हुई - टोपी वाला, पानवाला, मूँछवाला और सीबीआई।" वैसे The Statesman दिल्ली में कम बिकता था, लेकिन उस दिक् कुछ अलग हो गया। टोपीवाला, पानवाला, मूँछवाला दिल्ली सल्तनत रहने वाले अधिकारियों के बीच सेंघ' मार दिया। दोपहर बाद दफ्तर में फोन की घंटी टनटनाने लगी।

उन्हीं फोन में एक फोन था खान साहब का। खान साहब कहते हैं: "यार !!! शिवनाथ जी !!! आप तो आज सीबीआई कार्यालय में उन लोगों के चेहरे पर भी हंसी ला दिए जो मुद्दत से कभी हँसे नहीं थे। आपको बहुत बधाई। दफ्तर का माहौल ही बदल गया है।"
