कश्मीरी गेट (पुरानी दिल्ली) : कभी मन करे तो लाल किला के सामने चांदनी चौक की ओर मुख कर खड़े हो जाएँ । फिर मन ही मन शोध करें। मुग़ल सम्राट शाहजहां 1628 से 1658 तक दिल्ली सल्तनत का सम्राट थे। तख़्त पर बैठने के कोई दस साल बाद लाल किले बनने, बनाने की सोच का जन्म हुआ। साल शायद 1638 था। यह सांतवी दिल्ली सल्तनत की बात थी। इससे पहले पहली दिल्ली किला राय पिथौरा (मेहरौली) बनी। इसके बाद 1304 के आस-पास दूसरी दिल्ली सिरी फोर्ट बनी। सिरी फोर्ट के कोई 17 साल बाद तुग़लकाबाद 1321-1323 बना। चौथी दिल्ली चौदहवीं शताब्दी में जहांपनाह के रूप में विख्यात हुआ। इसके बाद पांचवी दिल्ली 1354 में फिरोजाबाद और 1543 में छठी दिल्ली दीनपनाह (पुराना किला के पास) बनी। 17 वीं शताब्दी में शाहजहानाबाद बना और फिर नई दिल्ली।
लाल किले के सामने चांदनी चौक को देखते अपने दाहिने हाथ बढ़ते चलें। आगे आने पर आज की लालबत्ती से जो रास्ता सामने चांदनी चौक के सामानांतर चली है दिल्ली स्टेशन के लिए, उस स्टेशन का निर्माण 1864 में हुआ। आप स्टेशन के तरफ नहीं जाकर आज के बस अड्डे की ओर बढ़ें। जैसे ही आपके सर के ऊपर से पुरानी दिल्ली की ओर आती-जाती ट्रेन निकलेगी, आपके दाहिने हाथ एक डाकघर मिलेगा जहाँ से आप दिल्ली स्टेशन आती-जाती रेलगाड़ी को देख सकते हैं। इस डाकघर का निर्माण 1885 में हुआ है।

इस डाकघर से आगे बढ़ने पर दाहिने तरफ ही संत जेम्स चर्च आज भी खड़ा मिलेगा जिसका निर्माण 1836 में हुआ था। इस चर्च से आगे बाएं हाथ कश्मीरी गेट है, जो आज भी खड़ा है अपने अस्तित्व को बचाकर। कश्मीरी गेट के दाहिने हाथ कोने पर आज के रिंग रोड से आती सड़क के नुक्कड़ पर नोकोलसन सिमेट्री हैं जहाँ दिल्ली पर धाबा के दौरान इशाई समुदाय के जिन लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दिए, चीर निद्रा में सोये हैं। निकोल्सन सिमेट्री से आगे दाहिने हाथ जंगल में आज भी मार्टियर्स मेमोरियल, भले उपेक्षित है, खड़ा है जिसका निर्माण 1863 में हुआ था उन सभी लोगों के सम्मानार्थ जो इस इलाके में एक सैनिक के रूप में युद्ध करते मृत्यु को प्राप्त किये थे। साल सन 1857 था।
आँख मूंदकर ही कल की यमुना नदी के बारे में सोचिये। आपको यमुना नदी की धारा लाल किले के आस-पास दिखेगी और सामने दूर-दूर तक जंगल, पगडण्डी जैसा रास्ता, विशालकाय वाटिका जिसमें तरह-तरह के फूल, फल, आयुर्वेदिक पौधे दिखेंगे। आज की तारीख में यहाँ तीस हज़ारी के नाम से जिला अदालत है। इससे पहले दिल्ली का जिला अदालत कश्मीरी गेट के सामने यमुना की ओर (आज भी है) श्रीमती फोर्स्टर के मकान में थे। उन दिनों उस मकान में सिर्फ आठ कमरे थे। बाद में 1899 में अब्दुल रहमान अतुल रहमान भवन में कुछ कमरे बनाये गए। कश्मीरी गेट का पुराना भवन 1949 में असुरक्षित घोषित कर दिए गए। इसके बाद 1953 में दो सिविल सबोर्डिनेट कोर्ट्स हिन्दू कालेज भवन (1, स्किनर्स हॉउस) में हस्तांतरित किये गए जहाँ वह दो अदालत 31 मार्च, 1958 तक कार्य किये।
इस बीच उस बगीचे में कोई 71-एकड़ भूमि में एक अदालत का बनना प्रारम्भ हुआ साल था सं 1953 इस भवन के निर्माण पर कोई 80 लाख रूपये खर्च हुए। वही भवन तीस हज़ारी अदालत के रूप में नामकरण हुआ जिसका उद्घाटन तत्कालीन पंजाब उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए एन भंडारी ने किया। आज आज़ादी के 77 साल बाद यकीन कीजिये दिल्ली सल्तनत की साढ़े तीन करोड़ आवादी में शायद पांच हज़ार लोग भी नहीं होंगे जो तीस हज़ारी जिला अदालत का नाम तीस हज़ारी क्यों पड़ा, बता सकते हों। यह अलग बात है कि यह सन 1953 से आज 2024 तक यह अदालत (न्यायिक क्रियाकलापों को यदि छोड़ भी दें) न जाने कितने लाख, करोड़ लोगों के लिए रोजी-रोटी का माध्यम रहा है, आज भी है। दुर्भाग्य यह है कि लोग इसका नाम तीस हज़ारी क्यों पड़ा नहीं बता सकते हैं।

बहरहाल, जश्ने आज़ादी के 75 वे वर्षगाँठ में दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री (अब पदच्युत) अरविन्द केजरीवाल दिल्ली शहर को 'तिरंगों का शहर' बनाने पर आमादा थे। उन्होंने पुरे सल्तनत में 500 से अधिक तिरंगा लहराने, फहराने का फैसला लिया। जश्ने आज़ादी के 75 वर्ष पुरे होने पर पुरे सल्तनत में 75 तिरंगों को लहराया गया। शहर में 115 फुट ऊँचा तिरंगा के अतिरिक्त राजीव गाँधी स्टेडियम, एम्स चौराहा, धौलाकुआं एंक्लेव-2, प्रीतमपुरा, बाहरी रिंगरोड, आज़ादपुर, सिग्नेचर ब्रिज, मॉडल टाउन मेट्रो स्टेशन, इंदिरा गांधी अस्पताल, नेल्सन मंडेला मार्ग, राजघाट आदि स्थानों पर तिरंगा लहराया गया, आज भी लहरा रहा है। केजरीवाल दिल्ली सल्तनत में 500 राष्ट्र ध्वज के लिए 104.37 करोड़ रुपये का आवंटन किये थे।
तत्कालीन मुख्यमंत्री का कहना था कि दिल्ली शहर के किसी भी कोने में रहने वाले लोग जब अपने घर से बाहर निकलें तो गगन में लहराते, फहराते तिरंगे को देखकर खुश हो जाएँ। वे दिन में कोई तीन-चार बार लहराते-फहराते तिरंगे को जरूर देख सकें ताकि उनमें देशभक्ति की भावना अधिक से अधिक जागृत हो सके। उन लोगों के प्रति सम्मान और समपर्मण जागृत हो सके जो मातृभूमि की आज़ादी के लिए अपने प्राणों को उत्सर्ग किये थे। केजरीवाल की सोच बहुत अच्छी थी या यूँ भी कहें कि राष्ट्र के लोगों की यह सोच बहुत बेहतर है।
परन्तु यह सभी बातें तब की थी जब केजरीवाल और उनके मंत्रिमंडल के कई लोग, यहाँ तक कि उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और अन्य भ्रष्टाचार के मामले में ऐतिहासिक तिहाड़ कारावास नहीं गए थे। दिल्ली की सड़कों पर गणतंत्र दिवस और स्वाधीनता दिवस पर तिरंगा का व्यापार होता है। अगर 25 फीसदी लोग भी इस अवसर पर अपने हाथों में, घरों में तिरंगा लहराते, फहराते हैं तो कोई 700+ करोड़ का व्यापार होता है तिरंगा, अगर तिरंगे की कीमत महज 10/- रूपये आँका जाय। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का धज्जी उड़ाते दिल्ली शहर के व्यापारी प्लास्टिक से बने तिरंगे को भी अब दस रूपये में नहीं बेचते और खादी से बने तिरंगे तक लोग पहुंचना नहीं चाहते - पैदल चलकर। यह अलग बात है की उन दिनों देश की आज़ादी के लिए अपने कंधे पर तिरंगा पकड़े हज़ारो लोग मातृभूमि की रक्षा करते करते अपने प्राणों को उत्सर्ग किये।
वैसे दिल्ली विधानसभा में मुख्यमंत्री, उप-मुख्यमंत्री और अन्य गणमान्य नेताओं, मंत्रियों, संतरियों, अधिकारियों, पदाधिकारियों के दफ्तरों के बाहर दरवाजे के साथ जंगे आज़ादी में फांसी पर लटके, प्राणों की आहुति दिए क्रांतिकारियों की तस्वीरों का 'फोटो-फ्रेम' इस कदर लटकाये हुए हैं जैसे स्वतंत्र भारत में इन लोगों के दफ्तरों के बाहर चपरासी बैठते हैं। जबकि हकीकत यह है कि आज गणतंत्र और स्वाधीनता दिवस की 'संख्या' को लेकर लोग 'असमंजस्य' में हो जाते हैं। तिरंगा के समस्त नियमों को दर किनार कर राजनितिक उद्येश्य की पूर्ति की जाती है।
यह तमाम बातें यहाँ इसलिए लिख रहा हूँ कि उत्तरी दिल्ली के कश्मीरी गेट स्थित बस अड्डे से तीस हज़ारी अदालत की ओर जाने वाली सड़क के दाहिनी ओर अगर आज भी किसी कोने में परतंत्र से स्वतंत्र भारत होने का इतिहास दीखता है, तो सड़क की बायीं ओर इतिहास का नामोनिशान तक नहीं है। सड़क की बायीं ओर रहने वाले लाखों लोग, चाहे अतिक्रमण कर ही, दिल्ली नगर निगम और दिल्ली पुलिस के अधिकारियों को 'खुश' रखकर ही रोजी-रोटी कमा रहे हैं, सड़क के अंतिम छोड़ पर दिल्ली की एक पुरानी अदालत का नाम तीस हज़ारी क्यों पड़ा, नहीं जानते हैं।

तीस हज़ारी न्यायालय में भी न्यायिक पेशा में जुड़े लोगों में शायद पांच फीसदी लोग भी नहीं होंगे तो उस अदालत का नाम तीस हज़ारी क्यों है, जानते होंगे। अलबत्ता, परिसर के बाहर या परिसर के अंदर दो, तीन, चार, छह पहिया वाहनों की इतनी भीड़ है कि वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा में मुकदमा लड़ रहे लोगों को अब पैर रखने का स्थान भी नहीं दीखता है। हालात तो अब यह है कि अदालत के पिछले हिस्से में एक-एक इंच स्थान के लिए अधिवक्ताओं को बैठने के लिए, उनकी कुर्सियों के लिए, दफ्तरों के लिए तरसना पर रहा है। यहाँ तक कि अब तो शौचालय से दो-हाथ की दूरी पर इस पेशे में आने वाले लोग पेट की क्षुधा शांत करते हैं। एक पेड़ के नीचे सैकड़ों नहीं, हज़ारों लोगों को खाते देखा। अगले हिस्से से भले अदालत देखने में आकर्षक लगे, पिछले हिस्से की हालत दर्दनाक है। खैर।
कश्मीरी गेट से तीस हज़ारी अदालत के अंदर-बाहर सैकड़ों लोगों से पूछा कि 'तीस हज़ारी अदालत' का नाम 'तीस हज़ारी' क्यों है? कोई नहीं बता सके। जबकि कभी भारत के इतिहास से जुड़े इस सम्पूर्ण इलाके के पूर्वी छोड़ स्थित कश्मीरी गेट को ध्वस्त करने पर आमादा है। आश्चर्य तो यह है कि सन 1857 विद्रोह के दौरान कश्मीरी गेट पर धाबा बोला गया था। उस ज़माने में हज़ारों-हज़ार भारतीय सैनिकों, लड़ाकुओं, क्रांतिकारियों ने मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति दिए थे इस स्थान पर। आज भारत के नागरिक, दिल्ली सल्तनत के मतदाता स्थानीय प्रशासन के लोगों, राजनेताओं, अधिकारियों, पदाधिकारियों के साथ मिलकर स्वहित में कश्मीरी गेट के इतिहास को मिटाना चाहते हैं। वहां की स्थिति को देखकर कहीं ऐसा नहीं लगा कि प्रशासन इसे रोकने के लिए मुस्तैद है। कश्मीरी गेट से तीस हज़ारी अदालत तक क्षेत्र का बायां हाथ वीरान ही नहीं, बल्कि प्रशासन के लोगों के साथ, पुलिस के साथ, नगर निगम के साथ मिलीभगत कर अतिक्रमित है। अरबों-खरबों प्रतिवर्ष का व्यवसाय बन गया है यह इलाका - लेकिन तीस हज़ारी अदालत का नाम तीस हज़ारी क्यों हैं? कोई नहीं जानते।
इतिहासकार स्टीफन पी. ब्लेक अपनी किताब ‘शाहजहानाबाद: द सॉवरिन सिटी इन मुगल इंडिया 1639-1739’ में तीस हजारी का जिक्र करते हैं। उन्होंने तीस हजारी के खूबसूरत बाग का जिक्र करते हुए लिखा है कि शाहजहां ने लाल किले के काबुली दरवाजे के ठीक पीछे एक आलीशान बाग बनवाया था, जो तीस हजारी बाग कहलाता था। इसमें आम, नीम, कीकर, बरगद जैसे पेड़, तमाम मनमोहक फूल, फव्वारे और नहर हुआ करता था। आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के शासनकाल में अंग्रेजों ने दिल्ली से कलकत्ता तक रेलवे लाइन बिछाने की योजना बनाई थी। वे चाहते थे कि रेल की पटरी लाल किले के करीब से बिछे।
वरिष्ठ पत्रकार जिया-उस-सलाम लिखते हैं कि मुगलों के जमाने में यहां के खूबसूरत गार्डन में 30000 पेड़ हुआ करते थे, इसी कारण इसका नाम तीस हजारी पड़ा। एक दवा और है और वह यह कि 1783 में मुगल बादशाह शाह आलम (द्वितीय) के कार्यकाल में सिख सैन्य जनरल सरदार बघेल सिंह की अगुवाई में 30000 सिखों की फौज ने यहां डेरा डाले थे। उनकी मांग थी कि दिल्ली में सिखों के धर्मगुरुओं से जुड़ी जगह को तलाश कर वहां गुरुद्वारा बनाने की इजाजत मिले। कोई चार साल रस्साकशी चलती रही और आखिरकार शाह आलम को सिखों की बात माननी पड़ी। यहाँ माना जाता है कि तीस हज़ारी शायद उस नाम का की अलंकरण है।
यह भी कहा जाता है कि बघेल सिंह ने न केवल शाह आलम से दिल्ली में सिखों के ऐतिहासिक गुरूद्वारों के निर्माण की आज्ञा का फरमान हासिल किया बल्कि राजधानी में गुरूद्वारों के निर्माण के लिए सिख सेना के चार साल रहने और उसके खर्च को भी मुगलों से वसूला। उन्होंने दिल्ली में सात ऐतिहासिक सिख धार्मिक स्थलों का निर्माण किया, जिनमें माता सुंदरी गुरुद्वारा, बंगला साहिब, बाला साहिब, रकाबगंज, शीशगंज, मोती बाग, मजनू का टीला और दमदमा साहिब शामिल है।
“दिल्ली जो कि एक शहर है” के लेखक महेश्वर दयाल के मुताबिक, अंग्रेजों के जमाने में तीस हजारी बाग में रेलवे लाइन बिछाई गई। इंग्लैंड में राज्याभिषेक के बाद किंग जॉर्ज पंचम और क्वीन मैरी को भारत के सम्राट और साम्राज्ञी की पदवी देने के लिए जब सन् 1911 में दिल्ली दरबार का आयोजन हुआ तो तीस हजारी रेलवे स्टेशन परिवहन प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।
सन् 1911 में दस लाख पाउंड की धनराशि खर्च करके अंग्रेजों के तीसरे दिल्ली दरबार में पुरानी दिल्ली के आसपास चौबीस रेलवे स्टेशनों का निर्माण हुआ। इनमें से एक स्टेशन तीस हजारी का था, जहां अच्छी खासी संख्या में लोगों और यातायात की आवाजाही रही। रेल लाइन आने के बाद चारदीवारी के अंदर बसा शहर दो टुकड़ों में बंट गया। इस काम के लिए शहर की दीवार में बने काबुली गेट और लाहौरी गेट के बीच शहर की दीवार को तोड़ दिया गया। तीस हजारी और रोशनआरा बाग के बीच की हरियाली का एक बड़ा हिस्सा इस विकास की भेंट चढ़ गया।

कहा जाता है कि सन् 1911 के दिल्ली दरबार में शामिल होने के लिए उदयपुर के महाराजा (महाराणा मेवाड़) ने यहां पड़ाव डाला था और उन्होंने अपने पूर्वज महाराणा प्रताप की प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए दिल्ली में घुसने से पहले तीस हजारी में एक लघु दिल्ली बनवाई और उसे जीतने के बाद ही चारदीवारी वाले पुराने शहर में प्रवेश किया।
“ट्रीज ऑफ़ दिल्ली: एक फील्ड गाइड” नामक अपनी पुस्तक में प्रदीप कृष्ण लिखते हैं कि दिल्ली के पेड़ों को भी 1857 की जंगे आजादी की लड़ाई की कीमत चुकानी पड़ी। अंग्रेजों ने दिल्ली शहर पर कब्जे के बाद इसकी किलेबंदी की, जिससे उन्हें एक और संकट का सामना न करना पड़े। और इस तरह, शहर में किलेबंदी के नाम पर जमकर पेड़ो की कटाई हुई। सब्जी मंडी और उसके आसपास के इलाके में, जहां हिंदुस्तानी सैनिकों और अंग्रेजी सेना में भयंकर लड़ाई हुई थी, अंग्रेजों ने हजारों पेड़ काट डाले।