रायसीना पहाड़ (नई दिल्ली) : देश को आज़ाद हुए महज नौ वर्ष हुए थे। साल 1954 था। उस वर्ष तत्कालीन बिहार का कलापानी नाम से कुख्यात पूर्णिया जिला के औरहि हिंगना गाँव में जन्म लिए फणीश्वरनाथ रेणु का मैला आँचल उपन्यास प्रकाशित हुआ था। रेणु जी अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा पटना के मछुआ टोली स्थित रामधारी सिंह दिनकर के आवास से कोई दो सौ कदम दूर राजेंद्र नगर गोलंबर से ठीक सटे गोल मार्केट के पास पीआरडी क्वार्टर के ब्लॉक-2 के फ्लैट में गुजारे थे।
मैला आँचल की कहानी स्वातंत्र्योत्तर भारत के गांवों में जन्मे राजनीतिक चेतना, वचनवद्धता, वेदना, संवेदना का अंतर्विरोध दर्शाता है। आज आज़ादी के 78 वर्ष बाद भी वह अंतर्विरोध समाप्त नहीं हो पाया। आज भी अख़बारों के पन्नों पर, पत्रिकाओं में, टीवी के स्क्रीनों पर यहपढ़ा जाता है, देखा जाता है कि देश में कई महत्त्वपूर्ण प्रावधानों की मौजूदगी और अनेक पहलों के बावज़ूद भारत में हाथ से मैला ढोने की प्रथा आज भी जारी है और आज भी इस कार्य में लगे लोग कार्य के दौरान अपने जीवन का अंतिम सांस लेते हैं। अंतर्द्वंद की बात, मौत की बात हम नहीं, भारत सरकार का आंकड़ा करता है।
वैसे, भारत के संविधान द्वारा अभिनिश्चित तथा अंतर्राष्ट्रीय संधियों में निर्मित व्यक्तिगत अधिकारिओं का संरक्षक के रूप में गठित भारत का राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग अपने स्थापना (12 अक्टूबर, 1993) के 32 साल बाद भी भले वातानुकूलित कक्षों में बैठकर मानवाधिकार की बात करें, गोष्ठी, संगोष्ठी, चर्चाएं करे - हकीकत तो यही है कि आज आज़ादी के 78 वर्ष बाद भी समाज का एक वर्ग अमानवीय कार्य करता है, अमानवीय जीवन जी रहा है और कार्य के दौरान मृत्यु को भी प्राप्त कर रहा है।
संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में यह कथन था कि संयुक्त राष्ट्र के लोग यह विश्वास करते हैं कि कुछ ऐसे मानवाधिकार हैं जो कभी छीने नहीं जा सकते; मानव की गरिमा है और स्त्री-पुरुष के समान अधिकार हैं। इस घोषणा के परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र संघ ने 10 दिसम्बर 1948 को मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणा अंगीकार की।यूडीएचआर इस सिद्धांत को दर्शाता है कि सभी मनुष्य स्वतंत्र और समान पैदा होते हैं, उन्हें जीवन, स्वतंत्रता और सुरक्षा, कानून के समक्ष समानता और विचार, विवेक, धर्म, राय तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। यह सिद्धांत भारत के संविधान और मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम (पीएचआरए), 1993 में भी परिलक्षित होता है
भारत का संविधान का अनुच्छेद 46 कहता है कि राज्य समाज के कमज़ोर वर्गों मुख्य रूप से अनुसूचित जाति और जनजाति की सामाजिक अन्याय से रक्षा करेगा और उन्हें हर तरह के शोषण का शिकार होने से बचाएगा। महात्मा गाँधी और डॉ. अम्बेडकर दोनों ने ही हाथ से मैला ढोने की प्रथा का पुरजोर विरोध किया था। यह प्रथा संविधान के अनुच्छेद 15, 21, 38 और 42 के प्रावधानों के भी खिलाफ है।
लेकिन केंद्र सरकार का सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के आंकड़े भी यह कहते हैं पिछले पांच सालों में हाथ से मैनुअल स्कैवेंजिंग से किसी कामगार की मौत नहीं हुई है। हालांकि सरकार ने एक आंकड़े के जरिए ये जरूर बताया है कि पिछले 5 वर्ष में सीवर और सेप्टिक टैंक में काम करते हुए 419 लोगों की मौत हो चुकी है। आंकड़ों के अनुसार, सीवर और सेप्टिक टैंक में काम करते हुए तमिलनाडु से 67, महाराष्ट्र से 63, उत्तर प्रदेश से 49, गुजरात से 49 और दिल्ली से 34 मौते हुई हैं. ये ऐसे राज्य है जहां सीवर और सेप्टिक टैंक मौतों की संख्या सबसे अधिक है।
इतना ही नहीं, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 'व्यक्तियों की गरिमा और स्वतंत्रता - 'मैनुअल स्कैवेंजरों के अधिकार' विषय पर विगत दिनों खुली चर्चा का आयोजन किया था। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग अध्यक्ष, न्यायमूर्ति श्री वी. रामसुब्रमण्यम ने सीवेज और खतरनाक अपशिष्ट की मैनुअल सफाई बंद करने के कानूनी प्रावधानों के बावजूद सफाई कर्मचारियों की मौतों की निरंतर घटनाओं पर चिंता भी जताई। वे सीवर लाइनों और सेप्टिक टैंकों की सफाई के लिए प्रौद्योगिकी/रोबोट का उपयोग करके पायलट परियोजना चलाने की आवश्यकता पर बल दिया, साथ ही, यह भी स्वीकार किया कि इसे एक राज्य से शुरू किया जाएगा और बाद में देश के दूसरे हिस्सों में भी लागू किया जायेगा।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के महासचिव श्री भरत लाल ने कहा कि आयोग विभिन्न राज्यों द्वारा मशीनो के उपयोग से सफाई कार्यान्वयन अपनाये जाने का अनुसरण कर रहा है। वे विभिन्न सुझावों द्वारा एसबीएम और नमस्ते योजनाओं के तहत जागरूकता अभियानों और बजट विश्लेषण, मैनुअल स्कैवेंजिंग डेटा तथा सीवर मृत्यु रिपोर्टिंग में पारदर्शिता पर जोर दिया गया। इन सभी बातों पर चर्चा विगत दिनों 'व्यक्तियों की गरिमा और स्वतंत्रता- मैनुअल स्कैवेंजरों के अधिकार' विषय पर किया गया था।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग अध्यक्ष ने कहा कि मैनुअल स्कैवेंजिंग एक ऐसा क्षेत्र है जिसे कानूनी रूप से निपटाया जा रहा है, इस काम को प्रबंधित किया जा रहा है और इसे बंद कराने के लिए न्यायिक रूप से निगरानी की जा रही है। हालांकि, यह चिंताजनक है कि सीवेज और खतरनाक कचरे की मैनुअल सफाई को बंद किये जाने के क़ानूनी प्रावधानों के बावजूद अभी भी सफाई कर्मचारियों की मौतें हो रही हैं। न्यायमूर्ति रामसुब्रमण्यन ने कहा कि इस समस्या के निपटने के उपाय सुझाने के लिए इसके कारणों का अध्ययन और उन्हें समझाना आवश्यक है।
मैनुअल स्कैवेंजर्स का रोज़गार और सूखे शौचालय निर्माण (निषेध) अधिनियम, 1993 के तहत लोगों के मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोज़गार पर प्रतिबंध लगा दिया गया। यानी, यह अधिनियम हाथ से मैला ढोने को रोज़गार के तौर पर प्रतिबंधित करता है। इस अधिनियम में हाथ से मैला साफ कराने को संज्ञेय अपराध मानते हुए आर्थिक दंड और कारवास दोनों ही आरोपित करने का प्रावधान है। इस अधिनियम के बनने के दस साल बाद एक दूसरा अधिनियम आया "मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोज़गार का निषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम" के रूप में जिसके तहत मैनुअल स्कैवेंजर्स के तौर पर किये जा रहे किसी भी कार्य या रोज़गार का निषेध करता है। यह हाथ से मैला साफ करने वाले और उनके परिवार के पुनर्वास की व्यवस्था भी करता है और यह ज़िम्मेदारी राज्यों पर आरोपित करता है। इतना ही नहीं, इस अधिनियम के तहत मैनुअल स्कैवेंजर्स को प्रशिक्षण प्रदान करने, ऋण देने और आवास प्रदान करने की भी व्यवस्था की गई है।
सरकार की ओर से अगस्त 2023 तक मैनुअल स्कैवेंजिंग के काम को पूरी तरह से खत्म करने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया है. देश में अब भी कई जिलों में मैनुअल स्कैवेंजिंग का काम किया जाता है। आकंड़े के अनुसार, देश के कुल 766 जिलों में से 732 मैनुअल स्कैवेंजिंग मुक्त घोषित कर दिया गया है। लेकिन आज भी कई जगहों पर यह काम किया जा रहा है। सरकार द्वारा साल 2011 के आंकड़ों के मुताबिक 1.8 लाख परिवार मैन्युअल स्कैवेंजिंग पर जीवन जीते थे। वहीं भारत सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की 2023 की रिपोर्ट के मुताबिक देश में 5,80,98 मैनुअल स्कैवेंजर्स की पहचान की गई थी। आधिकारिक रिपोर्ट के हिसाब से 2021 में उत्तर प्रदेश मैनुअल स्कैवेंजिंग के काम में सबसे आगे था। रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में 37,379 लोग मैनुअल स्कैवेंजिंग का काम करते थे। इसके बाद महाराष्ट्र में 7,378 लोग शामिल थे। वहीं तीसरे नंबर पर उत्तराखंड था जिसमें 6,170 लोग शामिल थे।
चलिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग चलते हैं जहाँ तीन दशकों से अधिक की अवधि के दौरान आयोग ने कुल 23,14,794 मामले दर्ज किए और 23,07,587 मामलों का निपटारा किया, जिनमें 2,880 मामले स्वतः संज्ञान पर आधारित थे। आयोग ने अब तक मानवाधिकार उल्लंघन के पीड़ितों को मौद्रिक राहत के रूप में लगभग 256.57 लाख रुपये की सिफारिश की है। पिछले एक साल के दौरान, 1 दिसंबर, 2023 से 30 नवंबर, 2024 तक, एनएचआरसी ने 65,973 मामले दर्ज किए और 66,378 मामलों का निपटारा किया, जिनमें पिछले वर्षों से आगे बढ़ाए गए मामले भी शामिल हैं। आयोग ने 109 मामलों में स्वतः संज्ञान लिया और पिछले वर्ष की इस अवधि के दौरान मानवाधिकार उल्लंघन के पीड़ितों को 17,24,40,000/- रुपये की आर्थिक राहत की सिफारिश की। आयोग ने आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में एक शिविर भी लगाया।
आयोग यह दावा करता है कि नागरिक और राजनीतिक अधिकारों के साथ-साथ आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लगातार काम किया है। इसने सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों में मानवाधिकार-केंद्रित दृष्टिकोण को मुख्यधारा में लाने और विभिन्न पहलों के माध्यम से सार्वजनिक प्राधिकरणों और नागरिक समाज के बीच जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यह राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर मानवाधिकार चर्चाओं को बढ़ावा देता है और नागरिक समाज, गैर सरकारी संगठनों, मानवाधिकार रक्षकों, विशेषज्ञों, वैधानिक आयोग के सदस्यों, राज्य मानवाधिकार आयोगों और सरकारी अधिकारियों के साथ संवाद बनाए रखता है।
मानवाधिकारों की रक्षा और उन्हें बढ़ावा देने के लिए एनएचआरसी केंद्र तथा राज्य सरकारों, अर्ध-सरकारी संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों, गैर सरकारी संगठनों और मानवाधिकार रक्षकों के साथ हमेशा सहयोग करता है। इस वर्ष, आयोग ने आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अधिकारियों सहित अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों को संवेदनशील बनाने के लिए एक नया कार्यक्रम शुरू किया। इसका उद्देश्य अधिकारियों में मानवाधिकारों की गहरी समझ विकसित करना है ताकि वे अपने संबंधित संगठनों के भीतर इस समझ या ज्ञान को साझा कर सकें। एनएचआरसी ने कई मामलों में हस्तक्षेप किया है, जिनमें कार्यस्थल पर महिलाओं के उत्पीड़न की समस्या का समाधान करने के लिए खेल निकायों को नोटिस जारी करना, बेघर लोगों के लिए मुफ्त आवास की सिफारिश करना, सांप्रदायिक दंगों के पीड़ितों को मुआवजा देना और प्राकृतिक आपदाओं से विस्थापित लोगों के पुनर्वास में सहायता करना शामिल है। आयोग ने कर्ज में डूबे किसानों द्वारा आत्महत्या के मामलों में भी हस्तक्षेप किया है और हैनसेन रोग से पीड़ित लोगों के साथ भेदभाव करने वाले 97 कानूनों में संशोधन की सिफारिश भी की है।

विगत दिन भी एक चर्चा का आयोजन हुआ था जिसकी अध्यक्षता राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री वी. रामसुब्रमण्यन ने की। आयोग की सदस्य श्रीमती विजया भारती सयानी और न्यायमूर्ति (डॉ) बिद्युत रंजन सारंगी, महासचिव श्री भरत लाल और अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे। विभिन्न मंत्रालयों और राज्य सरकारों, गैर सरकारी संगठनों, मानवाधिकार रक्षकों, संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों, निजी संगठनों और शोध विद्वानों के प्रतिनिधि इस कार्यक्रम में शामिल हुए और उन्होंने मैनुअल स्कैवेंजरों के अधिकार और उनकी गरिमा सुनिश्चित करने से सम्बंधित प्रासंगिक मुद्दों पर चर्चा में योगदान दिया। चर्चा का एजेंडा तय करते हुए, आयोग के महासचिव, श्री भरत लाल ने कहा कि आयोग ने विभिन्न राज्यों द्वारा मशीनीकृत सफाई प्रक्रियाओं के कार्यान्वयन और इस सम्बंध में उनके द्वारा किये जा रहे उपायों के मुद्दे को उठाया है। विभिन्न राज्यों ने डॉ. बलराम सिंह बनाम भारत संघ और अन्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी दिशानिर्देशों के अनुसार सभी शहरी स्थानीय निकायों के लिए तीन साल का कार्यक्रम तैयार किया है। उन्होंने यह भी बताया की किस प्रकार और कैसे केवल कुछ जातियां और समुदाय इस मैला ढोने की प्रथा से असंगत रूप से प्रभावित हैं।
इससे पहले, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के संयुक्त सचिव, श्री देवेन्द्र कुमार निम ने ‘भारत में सेप्टिक और वेअर टैंकों में होने वाली मौतों के मुद्दे पर ध्यान देना’, ‘मैनुअल स्कैवेंजिंग पर पूर्ण प्रतिबंध की आवश्यकता’ और ‘मैनुअल स्कैवेंजरों के लिए पुनर्वास उपाय सम्मान और सशक्तीकरण की दिशा में रास्ता और आगे का रास्ता’ तीन तकनीकी सत्रों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा की मैनुअल स्कैवेंजिंग समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है, जिसे सामूहिक प्रयासों से ख़त्म करने की आवश्यकता है।
चर्चा में, राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी वित्त एवं विकास निगम के प्रबंध निदेशक श्री प्रभात कुमार सिंह, नई दिल्ली के सफाई कर्मचारी आंदोलनके राष्ट्रीय संयोजक श्री बेजवाड़ा विल्सन, यूनिसेफ इंडिया के वरिष्ठ धुलाई विशेषज्ञ श्री सुजॉय मजूमदार, भारत में यूनिसेफ के जल स्वच्छता और स्वास्थ्य विशेषज्ञ श्री यूसुफ कबीर, सीपीएचईईओ रोहित कक्कड़, केरल के जेनरोबॉटिक्स इनोवेशन, निदेशक श्री राशिद करिंबनक्कल, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की बैशाली लाहिड़ी, राष्ट्रीय विधि विश्ववूयदयालय में मानवाधिकार और सबाल्टर्न अध्ययन केंद्र के विधि एवं निदेशक डॉ. विनोद कुमार, वेब फॉउण्डेशन की मनुला प्रदीप प्रदीप, तमिलनाडु की सोलिनास इंटीग्रिटी प्राइवेट लिमिटेड की सुश्री राज कुमारी, पुणे की फ्लेम यूनिवर्सिटी की प्रो. शीवा दुबे, काम-एविडा एनवायरो इंजीनियर्स प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक श्री एम. कृष्णा, नीति आयोग सलाहकार सुश्री स्मृति पांडे और अन्य वक्ताओं ने अपने विचार रखे।
