वैसे दिल्ली, कलकत्ता, मुंबई, चेन्नई, लखनऊ, चंडीगढ़, जयपुर, कोलकाता, गौहाटी, शिमला, अहमदाबाद, रांची, चंडीगढ़, गंगटोक, रायपुर, कोहिमा, भुवनेश्वर, पटना आदि - यानी राष्ट्रीय राजधानी से लेकर देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यालयों से प्रकाशित समाचार पत्र और पत्रिकाओं के संपादक, संवाददाता और संस्थान के मालिक 'अंचल में काम करने वाले पत्रकारों को कोई भाव नहीं देते', लेकिन हकीकत यह है कि 'आंचलिक पत्रकारिता' ही भारतीय पत्रकारिता की रीढ़ कल भी थी, आज तो है ही और कल भी रहेगी। लेकिन 'रीढ़' होने के वावजूद आंचलिक पत्रकारों की स्थिति 'पीपली लाइव' के संवाददातों जैसी ही है। प्रत्येक संवाददाता 'नत्था' है और 'जवाहर' देकर आंचलिक समस्याओं को पंचायत के नेता से लेकर संसद में बैठे लोगबाग दबाना चाहते हैं। धन्यवाद के पात्र है वे सभी जो पत्रकारिता को 'पत्रकारिता की नजर से नहीं, अलबत्ता व्यवसाय की नजर से देखते हैं, रूबरू होते हैं - कुछ अपने फायदे के लिए, कुछ अपने राजनीतिक आकाओं को फायदा दिलाने के लिए।" अगर ऐसा नहीं होता तो देश में, खासकर बिहार का 'अपना अखबार मृत्यु को प्राप्त नहीं करता और राष्ट्रीय स्तर के व्यवसायियों का अखबार प्रदेश में अपना खुट्टा नहीं गाड़ता। विगत पांच दशक में देश की पत्रकारिता का क्या हश्र हुआ है यह एक गहन शोध का विषय है।
पटना की सडकों पर अखबार बेचने नज़र लेकर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से प्रकाशित राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक में विशेष संवाददाता बनने तक, यानी सन 1965 से 2000 और उसके बाद अगले चार साल तक, किसी भी कहानी में पहले की बातों को जोड़ने के लिए दो ही विकल्प थे। एक: अपना निजी संकलन और दो: दफ्तर का पुस्तकालय। मैं बहुत भाग्यशाली था और आज भी हूँ कि मेरे पास अपना संकलन भी है और सन 1988 से अब तक किसी भी प्रकार की जानकारी की जरुरत होती है तो कलकत्ता का आनंद बाजार पत्रिका का पुस्तकालय तक्षण उपलब्ध करा देता है। इसके अलावे पटना में गणेश स्वरुप बैठे मित्र श्री लव कुमार मिश्र। मिश्र बाबा एक चलता-फिरता पुस्तकालय हैं।
गूगल महाशय का 'सर्च इंजिन' भारत में श्रमिक दिवस पखबाड़े के अंतिम दिन (मई 15) सं 2004 साल में अवतरित हुए। उनके आगमन के साथ ही औसतन अस्सी से अधिक फीसदी पुस्तकालय की आवश्यकता लोगों को कम हो गई है। जिस दिन गूगल महाशय का अवतार हुआ था, वे 'संज्ञा' बनकर आये थे। समयांतराल लोग मानसिक रूप से इतने 'समर्पित' हो गए 'उनके प्रति', वे भारत सरकार के बाल श्रमिक जैसा अल्प आयु में 'संज्ञा' से 'क्रिया' जो गए। आज भारत ही नहीं, विश्व के 90 से अधिक फीसदी लोग 'गूगल करते' है।

अख़बारवाला001 के लिए कहानी के क्रम में हम भी आज गूगल महाशय के प्रांगण में चहलकदमी कर रहे थे। वैसे बिहार की पत्रकारिता पर लिखने की कूबत तो मुझमें नहीं है, सैकड़ों, हज़ारों, लाखों 'महात्मन' हैं जो लिख रहे हैं, लेकिन जिन शब्दों का विन्यास एक अखबार विक्रेता के कालखंड में पटना से प्रकाशित अख़बारों - आर्यावर्त, इण्डियन नेशन, सर्चलाइट, प्रदीप और कौमी आवाज - में देखता था, पढता था, आज तो 'पुस्तकालयों में भी ढूंढने से नहीं मिल रहा है। तभी किसी एक कहानी में अपना नाम दिखा। यह कहानी 27 मई, 2020 को श्री आनंद वर्धन साहब 'न्यूजलौंड्री' में लिखे थे। कहानी का शीर्षक था "WHATEVER HAPPENED TO BIHAR'S BOLD LOCAL PRESS? Newsstands today are dominated by states editions of national giants." श्री आनंद वर्धन साहब एक बेहतरीन इंसान तो हैं ही, लिखने में किसी का मुख नहीं देखते कि कौन गोरा है या कौन काला है? स्पष्ट लिखने में कोताही नहीं करते और उनकी कहानी का शीर्षक, चाहे मुख्य शीर्षक हो या द्वितीय, इस बात का स्पष्ट प्रमाण है "Newsstands today are dominated by states editions of national giants.'
बिहार में पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन का लम्बा कालखंड उद्धृत किया है उन्होंने यह दृष्टान्त देने के लिए कि कल जो बिहार का अपना अखबार था, बिहार के लोगों के लिए, पाठकों के लिए नेतृत्व दे रहा था, आज राष्ट्रीय स्तर के समाचार पत्रों के मालिकों के लिए महज एक बाजार बन गया है। मेरा मानना है कि आज भारत के सभी राष्ट्रीय संस्करण बिहार के गली-कूचियों से प्रकाशित हो रही हैं लाभ कमाने के लिए। उन्हें किसी भी स्तर पर बिहार से कोई मतलब नहीं है। अख़बार के साथ-साथ विगत पांच दशकों में जो नेता अवतरित हुए हैं, वे भी इसी श्रेणी में आते हैं। अख़बार का प्रकाशन अथवा वितरण 'राजनीतिक' भी है। कौन अखबार किस राजनीतिक पार्टी और उनके लोगों के लिए लिखेगा यह अख़बार के संपादक नहीं, अख़बारों के मालिक करते हैं। आप दिल्ली के संसद से प्रदेश के विधानसभा और विधान परिषद तक नजर घुमा लें, उत्तर स्वयं मिल जायेगा।

अख़बारों की भाषा तो पूछिए ही नहीं। जिस प्रदेश में राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह, आचार्य शिव पूजन सहाय, रामवृक्ष बेनीपुरी, फणीश्वर नाथ रेनू, रामधारी सिंह दिनकर, आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री, केदार नाथ मिश्र 'प्रभात', मोहन लाल महतो, हंस कुमार, आरसी प्रसाद सिंह, कलक्टर सिंह 'केसरी', कुमार विमल जैसे हिंदी साहित्य के धनुर्धरों ने हिंदी भाषा को नयी दिशा दिया, आज इन अख़बारों को जब बच्चे पढ़ते हैं तो घर के बुजुर्ग हाथ से ले लेते। कहते हैं "मत पढ़ो, भाषा बिगड़ जाएगी।'
इसका ज्वलंत दृष्टान्त देता हूँ। विगत दिनों आचार्य रामलोचन शरण के पुस्तक भंडार में उनके पुत्र श्री राम बाबू से बात कर रहा था । सत्तर के दशक में लाल बाबू, श्याम बाबू. लल्ली बाबू और रामबाबू हमारे चार अख़बारों के क्रेता थे। सुबह सवेरे कोई पांच बजे गोविन्द मित्र रोड के अंतिम छोड़ पर दाहिने हाथ एक बड़े लोहे के प्रवेश द्वारा पर इन अख़बारों के साथ दस्तक देते थे। प्रवेश के साथ बाएं हाथ एक कुटिया में एक वृद्ध करते थे और सामने दीवार पर आचार्य श्री रामलोचन शरण की तस्वीर टंगी होती थी। आचार्य 14 मई, 1971 को अनंत यात्रा पर निकले। पुस्तक भण्डार के चारो मालिकों (भाइयों) की एक और विशेषता थी - सभी बहुत मानवीय थे। मैं उन दिनों पटना के टी.के.घोष अकादमी में पढ़ता था। विद्यालय स्तर पर माध्यमिक कक्षा तक पुस्तक भंडार से प्रकाशित सभी पुस्तकें मुझे 'मुफ्त' में मिलती थी। साथ ही, महीने के अंत में जब अख़बारों की कीमत भुगतान के लिए कागज़ देता था तो न्यूनतम दो रूपये अधिक मिलते थे - कागज, पेन्सिल खरीदने के लिए।
सन 1975 में जब पटना जलमग्न हुआ था, आर्यावर्त और इण्डियन नेशन अख़बार पुस्तक भंडार छापाखाना में ही प्रकाशित होता था। बातचीत के दौरान श्री रामबाबू कहते हैं: "आप गोपाल जी के पुत्र हैं। आप हमें अख़बार देते थे। मुझे याद है आज भी। उन दिनों अख़बार में जो शब्द प्रकाशित होते थे, आज लुप्त हो गए हैं। आज न तो बेहतरीन अनुवादक हैं और ना ही बेहतरीन संशोधन कर्ता (प्रूफ रीडर) उपलब्ध है। भाषा का ज्ञान न तो लेखकों को है और ना ही पाठकों को। दर्दनाक स्थिति हैं और यह स्थित आने वाले दिनों में और ख़राब होगी।"

बहरहाल, आनंद वर्धन लिखते हैं कि आधुनिक इतिहास में, बिहार में पहला ज्ञात समाचार प्रकाशन 1856 में हुआ था। इससे पहले, जैसा कि द जर्नल ऑफ़ बिहार रिसर्च सोसाइटी में बताया गया था, 1850 में शाह कबीरुद्दीन अहमद द्वारा एक प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना की गई थी। हालांकि, यह अखबार प्रकाशित करने के लिए इसका उपयोग नहीं किया गया था। यह पहला समाचार पत्र ब्रिटिश सरकार का एक प्रयास था, जो प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए प्रकाशित किया गया था। उस समय पटना के कमिश्नर विलियम टेलर ने 3 सितंबर, 1856 को एक उर्दू समाचार पत्र, अख़बार-ए-बिहार का प्रकाशन शुरू करने की पहल की।
बिहार को इस क्षेत्र के शिक्षित लोगों के बीच पर्याप्त पाठक संख्या वाला पहला समाचार पत्र देखने में 16 साल और लग गए। 1872 में, बालकृष्ण भट्ट और केशवराम भट्ट द्वारा स्थापित एक हिंदी अखबार, बिहार बंधु ने कलकत्ता से प्रकाशन शुरू किया, लेकिन 1874 में अपना प्रेस पटना में स्थानांतरित कर दिया। मुंशी हसन अली इससे पहले संपादक थे। पटना में बिहार-आधारित अखबार बनने के बाद, बिहार बंधु ने कानून अदालतों में हिंदी की शुरुआत के लिए एक सफल अभियान शुरू किया। अगले दशकों में विभिन्न संपादकों के तहत, अखबार ने 20 वीं शताब्दी के दूसरे दशक तक अपनी यात्रा जारी रखी। जिस वर्ष बिहार के पहले हिंदी समाचार पत्र का जन्म हुआ, उसी वर्ष इसके पहले अंग्रेजी समाचार पत्र का भी आगमन हुआ। बिहार हेराल्ड की स्थापना 1872 में हुई थी। इसका संपादन गुरु प्रसाद सेन ने किया था और वह 1900 में अपनी मृत्यु तक उस भूमिका में बने रहे। हालांकि, यह अखबार बिहार में रहने वाले बंगालियों के हितों पर केंद्रित था और इसलिए, व्यापक नहीं था इसके कवरेज में.
अगले दो दशकों के दौरान, बिहार में तीन नए अंग्रेजी अखबारों ने अलग-अलग वर्षों में अपनी यात्रा शुरू की: इंडियन क्रॉनिकल (1881), बिहार टाइम्स (1894), और बिहार गार्जियन (1899)। उनमें से, बिहार टाइम्स ने बिहार को बंगाल प्रांत से अलग करने के एक स्थिर समर्थक के रूप में अपनी पहचान बनाई। बिहार टाइम्स की स्थापना 1894 में सच्चिदानंद सिन्हा द्वारा की गई थी, जब वह अपनी विश्वविद्यालय की शिक्षा पूरी करने के बाद अपने समकालीनों, महेश नारायण, विशेश्वर सिंह, सालिग्राम सिंह, महावीर सहाय और नंद किशोर लाल के साथ इंग्लैंड से लौटे थे। महेश नारायण इसके पहले संपादक थे और उन्होंने 1907 में अपनी मृत्यु तक इसका संपादन किया।

सच्चिदानंद सिन्हा उस समय बिहार की एक महत्वपूर्ण बौद्धिक आवाज थे, और उन्होंने अखबार का समर्थन किया। राष्ट्रीय आंदोलन में एक अत्यधिक सम्मानित व्यक्ति, जिन्होंने भारत की संविधान सभा के पहले अध्यक्ष की अस्थायी जिम्मेदारी संभाली, इससे पहले कि एक अन्य प्रतिष्ठित बिहारी डॉ. राजेंद्र प्रसाद उनकी जगह संविधान सभा के पूर्णकालिक अध्यक्ष बने। बिहार टाइम्स ने बिहार को बंगाल प्रांत से अलग करने के लिए एक संपादकीय अभियान चलाया, और इस मांग की पत्रकारिता में इसकी भूमिका को इतिहासकार सुमिता सिंह ने अलग बिहार के निर्माण में प्रेस की भूमिका (2012) अध्ययन में उद्धृत किया है। 19वीं सदी के आखिरी कुछ वर्षों और 20वीं सदी की शुरुआत में जातिगत संबद्धता पर आधारित एक अलग प्रकार का प्रकाशन भी बिहार में देखा जा सकता था। हालांकि, वे अनिवार्य रूप से सामुदायिक समाचार पत्र थे, समाचार पत्र नहीं, और इसमें पटना से कायस्थ गजट (1889), गया से कायस्थ मैसेंजर, क्षत्रिय समाचार, भूमिहार ब्राह्मण पत्रिका, तेली समाचार और रौनियार वैश्य शामिल थे।
कलकत्ता में सन 1872 में स्थापित बिहार बंधु का बिहार का पहला संस्करण 1874 में प्रारम्भ हुआ। इसके बाद बिहार में गुरु प्रसाद सेन ने एक अंग्रेजी दैनिक के रूप में सन 1875 में दी बिहार हेराल्ड प्रारम्भ किये। कोई छः साल बाद, सन 1881 में पटना से इंडियन क्रॉनिकल नाम का एक समाचार पत्र प्रकाशित हुआ। सन 1890 के आस-पास सर्व हितैषी नामक हिंदी दैनिक का प्रकाशन किया गया। 20वीं शताब्दी की शुरुआत में राष्ट्रवादियों द्वारा द मदरलैंड और बिहार स्टैंडर्ड नाम के अन्य समाचार पत्रों का प्रकाशन हुआ। सन 1903 में एक साप्ताहिक अखबार आया, नाम था बिहार टाईम्स, बाद में 1906 में भागलपुर से प्रकाशित बिहार समाचार से मिलकर एक अलग अख़बार अस्तित्य्व में आया, नाम द बिहारी पड़ा। बिहारी को सच्चिदानंद सिन्हा के संपादकीय कार्यकाल के साथ-साथ सैयद हसन इमाम के संपादकीय कार्यकाल में प्रकाशित किया गया था। 1913 में जब यह दैनिक बना तो इसके संपादक महेश्वर प्रसाद थे। लेकिन यह इस रूप में केवल चार साल तक चला और 1917 में बंद हो गया। हालाँकि, केवल एक साल बाद, सच्चिदानंद सिन्हा ने तुरंत ही पटना से एक और समाचार प्रकाशन, अंग्रेजी समाचार द्विसाप्ताहिक, सर्चलाइट शुरू करके शून्य को भर दिया।
1920 में यह त्रि-साप्ताहिक और फिर 1930 में दैनिक बन गया। कई लोगों ने सर्चलाइट शुरू करने के प्रयासों का समर्थन किया, जो एक प्रगतिशील राष्ट्रवादी संपादकीय दृष्टिकोण से प्रेरित था, जिसमें डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी शामिल थे, जो अखबार के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। जबकि सैयद हैदर हुसैन और महेश्वर प्रसाद सर्चलाइट के पहले दो संपादक थे, बाद के वर्षों में सीआर सौम्याजुलु और एस रंगा अय्यर जैसे संपादकों ने इस पेपर का संपादन किया। अगर बनैली राज का इतिहास देखा जाय तो सं 1930 में दी सर्चलाईट जिस अंग्रेजी दैनिक के रूप में पटना से प्रकाशन प्रारंभ किया, वह 15 जुलाई, 1918 से बिहार टाइम्स (1894) और द बिहारी (1906) के स्थान पर प्रकाशित होने वाला ही दी सर्चलाईट अखबार था, जिसे जीवंत स्वरूप बनैली के तत्कालीन राजा कीर्त्यानंद सिंह द्वारा संरक्षित, सम्पोषित था। इसके पहले कुछ दशकों में, मुरली मनोहर प्रसाद इसके सबसे लंबे समय तक सेवारत संपादक थे। बाद में, के रामाराव, एम शर्मा, डीके शारदा, टीजेएस जॉर्ज, एससी सरकार, एसके राव और आरके मक्कड़ अन्य उल्लेखनीय व्यक्ति थे जिन्होंने पटना में सर्चलाइट के संपादकीय कार्यालय का नेतृत्व किया।

असहयोग आंदोलन के दौरान मजहरुल हक़ साहब, जिनके नाम से आज पटना में पटना जंक्शन रेलवे स्टेशन से निकलने वाली सड़क ऐतिहासिक गांधी मैदान को जोड़ती है और पटना के लोग उसे ‘फ़्रेज़र रोड’ के नाम से भी जानते हैं; मातृभूमि अखबार का प्रकाशन प्रारम्भ किये। यह अखबार, आज की तरह सरकार, सत्ता का समर्थक नहीं, बल्कि तत्कालीन सरकार की कड़ी आलोचना करने के कारण दर्जनों बार मुकदमों का शिकार हुआ, दर्जनों बार कोर्ट-कचहरी हुआ और अंत में दम तोड़ दिया, बंद हो गया। उसी दौरान मोहम्मद यूनुस साहब दी पटना टाइम्स का प्रकाशन प्रारम्भ किया जो भारत छोडो आंदोलन के दो साल बाद तक और आज़ादी के तीन साल पूर्व तक प्रकाशित होता रहा।
पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार सुरेंद्र किशोर को उद्धृत करते आनंद वर्धन लिखते हैं कि "सर्चलाइट ने कई लेख छापे थे जिनमें पटना उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा की गई विभिन्न टिप्पणियों को अपमानजनक और हिंदू समुदाय की भावनाओं को आहत करने वाला बताया गया था। उच्च न्यायालय ने, जिसके मुख्य न्यायाधीश सर कर्टनी टेरेल थे, ऐसे लेखों को न्यायालय की अवमानना माना। सर्चलाइट के बचाव में, मोतीलाल नेहरू, सर तेज सप्रू और शरत चंद्र बोस जैसे प्रतिष्ठित वकील भी आरोप के खिलाफ बहस करने के लिए पटना आए। अखबार मुकदमा हार गया और उस पर 200 रुपये का जुर्माना लगाया गया। लेकिन बाद में, सचिदानंद सिन्हा के आवास पर, टेरेल ने उस समय अखबार के संपादक मुरली मनोहर प्रसाद से मुलाकात की और उनके रुख और विचारों से प्रभावित हुए। टेरेल ने एक भारतीय छद्म नाम अपनाया और सर्चलाइट में लेखों का योगदान देना शुरू किया। टेरेल ने अपने लेखन में भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन किया। अपने प्रमुख अंग्रेजी अखबार के साथ, सर्चलाइट ने हिंदी प्रेस में भी विविधता लाने की कोशिश की। 1947 में, पटना से प्रदीप के लॉन्च के साथ इसका हिंदी समकक्ष शुरू हुआ।
1930 में बिहार को एक नया अंग्रेजी अखबार इंडियन नेशन मिला। इसकी स्थापना दरभंगा के महाराजा द्वारा की गई थी, जिसने आंशिक रूप से बिहार के मिथिला क्षेत्र पर अखबार के अधिक फोकस को समझाया। यह इसके कर्मचारियों की संरचना में भी स्पष्ट था, क्योंकि कर्मचारियों का एक बड़ा हिस्सा मिथिला क्षेत्र का था। 1941 में इंडियन नेशन को दैनिक आर्यावर्त के रूप में एक सहयोगी हिन्दी प्रकाशन भी मिला। आज़ादी के बाद लगभग चार दशकों तक, इन दैनिक समाचार पत्रों ने बड़े राष्ट्रीय पत्रों की व्यापक पहुंच और संसाधनों के ख़िलाफ़ अपनी पकड़ बनाए रखी। विशेष रूप से, सर्चलाइट की रिपोर्टों में उच्च पदों पर भ्रष्टाचार को लेकर चर्चा की गई, कभी-कभी तो बहुत दूर तक जाने की भी बात की गई। 1960 के दशक में, बिहार की केबी सहाय के नेतृत्व वाली सरकार में भ्रष्टाचार पर इसकी रिपोर्ट, और इसे सरकारी ज्यादतियां मानने के खिलाफ रिपोर्ट के कारण इसके संपादक टीजेएस जॉर्ज को जेल जाना पड़ा। यहां तक कि इसका हिंदी प्रकाशन, प्रदीप, 1970 के दशक की शुरुआत में भ्रष्टाचार विरोधी जेपी आंदोलन के दौरान समाचारों का सबसे अधिक मांग वाला स्रोत था।
बिहार में अपना समाचार पत्रों का पतन 1980-90 के दशक से प्रारम्भ हो गया। आनद वर्धन लिखते हैं कि 'इस समय, बिड़ला समूह ने पहले ही सर्चलाइट और प्रदीप का अधिग्रहण कर लिया था। हालांकि, इसने पटना में उनके संपादकीय कामकाज और सामग्री निर्माण के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की। फिर 1986 में, बिड़ला समूह ने निर्णय लिया कि अब उनके राष्ट्रीय पत्रों - हिंदुस्तान टाइम्स और हिंदुस्तान - के लिए बिहार मीडिया बाजार में प्रवेश करने का समय आ गया है। अपने राष्ट्रीय पत्रों के लिए मार्ग प्रशस्त करने के लिए सर्चलाइट और प्रदीप को पूरी तरह से बंद कर दिया गया। अंग्रेजी अखबार क्षेत्र में टाइम्स ऑफ इंडिया ने जल्द ही इसका अनुसरण करते हुए 1980 के दशक के अंत में अपना पटना संस्करण शुरू किया। उसी समय, इंडियन नेशन और आर्यावर्त अपने घटती पाठक संख्या और यूनियन हड़तालों के कारण समस्या झेल रहा था । प्रिंट उत्पादन के तकनीकी उन्नयन में निवेश करने में उनकी विफलता ने उनकी परेशानियों को और बढ़ा दिया।
आनंद वर्धन लिखते हैं: नब्बे के दशक में इंडियन नेशन किसी तरह लड़खड़ाता रहा, लेकिन बीच-बीच में सामने आने के बाद दशक के अंत तक बंद हो गया। आर्यावर्त ने भी ऐसा ही किया। 1990 के दशक की शुरुआत में, विद्वान अरविंद एन दास ने लिखा था : “शहर ने लंबे समय से एक समृद्ध प्रेस का दावा किया है। अब हालांकि सर्चलाइट और प्रदीप जैसे प्रमुख स्थानीय समाचार पत्रों को विशाल हिंदुस्तान टाइम्स और हिंदुस्तान के आकार में राष्ट्रीय मीडिया प्रतिष्ठान में शामिल कर लिया गया है, इंडियन नेशन, आर्यावर्त और बिहार हेराल्ड जैसे अन्य लोग कठोर मोर्टिस, नए और बड़े प्रकाशनों से घिरे हुए हैं। राज्य में टाइम्स ऑफ इंडिया छपा है।”
हालाँकि, यह भी सवाल है कि 1980 के दशक के बाद से किस चीज़ ने राष्ट्रीय मीडिया खिलाड़ियों को बिहार की ओर आकर्षित किया। दास और मीडिया समीक्षक सेवंती निनान की पुस्तकों ने इसका उत्तर देने का प्रयास किया। दास ने टिप्पणी की, "यह आश्चर्य की बात नहीं है कि बहुत कम प्रति व्यक्ति आय वाले राज्य बिहार में समाचार पत्रों का संयुक्त प्रसार मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों की तुलना में कहीं अधिक होना चाहिए।" दास ने टिप्पणी की। पंद्रह साल बाद, निनान ने बिहार के अखबार बाजार में बड़े मीडिया खिलाड़ियों के निवेश के बारे में अपने तर्क में उसी क्षमता को पहचाना। हेडलाइंस फ्रॉम द हार्टलैंड में, निनान ने लिखा: “भारत के सबसे पिछड़े राज्य के रूप में अपनी छवि के बावजूद, बिहार एक अखबार के लिए एक अच्छा निवेश था। इसकी एक आबादी ऐसी थी जो साक्षरता कम होने के बावजूद राजनीतिक रूप से जागरूक थी।
यहां, यह देखना भी दिलचस्प है कि कैसे दास ने एक दुष्चक्र की ओर संकेत किया जिसने 1980 और 1990 के दशक में बिहार स्थित प्रमुख पत्रों को आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचाया होगा। स्थिर विज्ञापन राजस्व के कारण उनके पास प्रिंट उत्पादन तकनीक में निवेश करने के लिए बहुत कम पैसे बचे थे, और उनके संचालन की पुरानी तकनीक उन्हें संभावित विज्ञापनदाताओं के लिए आकर्षक नहीं बनाती थी। दास ने यह भी तर्क दिया कि पाठकों की कम क्रय शक्ति विज्ञापनदाताओं के उदासीन दृष्टिकोण के लिए जिम्मेदार है। उच्च श्रेणी के विज्ञापन के लिए सभी आवश्यकताएँ जो प्रकाशन के लिए आवश्यक माली मदद (सब्सिडी) प्रदान करती हैं, ”दास ने तर्क दिया। पाटलिपुत्र टाइम्स की तरह नये सिरे से अखबार शुरू करने की छिटपुट कोशिशें भी ज्यादा दिनों तक टिक नहीं सकीं। अभी भी कई हिंदी दैनिक और पत्रिकाएँ हैं जैसे अविनाश चंद्र मिश्रा की राजनीतिक समाचार पत्रिका, समकालीन तापमान (1997 में स्थापित), जो क्षेत्रीय समाचार क्षेत्र में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। पटना स्थित कुछ उर्दू समाचार प्रकाशनों को राज्य में अपने सीमित पाठक वर्ग मिल रहे हैं।

हालाँकि, ये पटना स्थित हिंदी और उर्दू प्रकाशन उस पहुंच और प्रभाव के आसपास भी नहीं हैं जो कभी बिहार स्थित समाचार प्रकाशनों के पास था। राज्य के मीडिया उद्यम प्रयास स्पष्ट रूप से या तो स्थानीय टेलीविजन समाचार चैनलों या डिजिटल स्पेस में स्थानांतरित हो गए हैं। डिजिटल उपस्थिति को राज्य की राजधानी में स्थित विशेष रूप से ऑनलाइन समाचार प्लेटफार्मों के प्रसार में देखा जा सकता है। कोई यह तर्क दे सकता है कि ओडिशा जैसे राज्यों में एक प्रभावी घरेलू स्थानीय प्रेस बनी हुई है क्योंकि उनकी मुख्य भाषा राष्ट्रीय मीडिया खिलाड़ियों के भाषाई कैनवास से बाहर है। महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के प्रति अपने दृष्टिकोण में टाइम्स समूह को छोड़कर, राष्ट्रीय मीडिया दिग्गजों ने आम तौर पर अंग्रेजी और हिंदी पाठकों पर ध्यान केंद्रित किया है। हिंदी पाठकों के एक हिस्से के रूप में, हालांकि चार अलग-अलग बोलियाँ और एक अलग भाषा का घर है, बिहार उनके भाषाई जलग्रहण क्षेत्र के अंतर्गत आता है। हालाँकि, यह स्पष्टीकरण न्यूज़स्टैंड की कमी को पूरा नहीं करता है।
अब सवाल यह है कि बिहार को वास्तविक रूप से बचाने के लिए कौन कृतसंकल्प है? कौन चाहता है बिहार की वास्तविक स्थिति के बारे में दो शब्द लिखना? कौन लिख सकता है ? शायद शून्यता है। शब्द कटु है, लेकिन सत्यता के उत्कर्ष पर है। प्रदेश में जहाँ बच्चों को विद्यालय आने के लिए सैकड़ों प्रलोभन दिए जाते हैं - कोई खिचड़ी खिला रहा है तो कोई आटा बाँट रहा है, कोई बस्ता दे रहा है तो कोई वस्त्र बाँट रहा है। पंचायत से लेकर संसद तक नेताओं और अधिकारियों का एक विशाल साम्राज्य चाटुकारिता में लगा है - नेताजी, मंत्री जी, मुख्यमंत्री जी, केंद्रीय मंत्रीजी, प्रधानमंत्री जी कैसे खुश रहेंगे, 24x7 सोचा रहा है। संसाधनों का बन्दर बाँट हो रहा है। सेक्स शिक्षा के नाम पर प्रदेश के नेतृत्व कर्ता सार्वजनिक रूप से विधान सभा में महिलाओं को बेइज्जतभी करता है और फिर माफ़ी भी मांगता है। विद्यालयों में 7 वीं से 12 वीं कक्षा तक मासिकधर्म से सम्बन्धी नैपकिन के लिए पैसे दिया जा रहा है। अरबों-खरबों-संखों-महासंखों में खर्च होने के बाद नदियों पर बना पुल धंस रहा है, टूट रहा है। आपराधिक स्थिति को थाना तक आने नहीं दिया जा रहा है - इन बातों को श्रृंखलावद्ध तरीके से, शोध कर कौन लिखेगा - लिखता तो वही जो प्रदेश का अपना होगा।
यहाँ तो राष्ट्रीय स्तर के व्यापारियों, व्यवसायियों का अख़बार, टीवी और संचार के अन्य साधन कब्ज़ा कर बैठे हैं। पूरा प्रदेश लोभ के गिरफ्त में है। सभी रातो-रात लखपति, करोड़पति बनना चाह रहे हैं। शिक्षा के अभाव में जो पंचायत के कार्यालय में नित्य सुबह-शाम बाल्टी से पानी भर रहा है, कल विधानसभा और संसद में बैठने के फिराक में बैठा है। पत्रकारिता का भयादोहन कर लोग बाग़ विधानसभा, विधान परिषद्, लोकसभा और राज्यसभा में बैठ रहे हैं। संपादक जी सत्ता के वरुद्ध जाने की ताकत नहीं रखते, न शब्दों से और ना ही मन से, जिससे लोगों की भलाई हो, लोगों को जागरूक किया जाय। रोयेगा तो वही जो आपका अपना होगा ।आज प्रदेश में स्थिति ऐसी है कि पार्थिव शरीर के अर्थी के साथ शमशान जाने के लिए भी लोगों के पास समय नहीं है और जो समय निकालते हैं वे काला चश्मा पहनकर भागीदार बनते हैं और यह भी देखते रहते हैं कि उनकी उपस्थिति दर्ज हुई या नहीं - क्योंकि इसका भी व्यवसाय करना है, इसकी भी राजनीति करनी है।
