करोलबाग (नई दिल्ली) : दिल्ली मेट्रो के करोलबाग स्टेशन पर खड़ा हूँ। द्वारका से नोएडा/वैशाली की ओर जाने वाली गाड़ी की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। सामने से तीन दृष्टि से दिव्यांग युवकों को आते देख कोई 45-वर्ष पूर्व बिहार के भागलपुर जेल में हुई अमानवीय घटना - अंखफोड़बा कांड - और बाद में भारत के न्यायिक व्यवस्था को उन भुक्तभोगियों को मिली "न्याय" मानस-पटल पर छ गया। सोचने लगा कि कि आज़ादी के 79 वर्ष बाद भी आँख वाले लोग नेत्रहीनों को वह सम्मान नहीं दे सके जिसके वे हकदार थे, आज भी हैं।
गति की दिशा में मेट्रो स्टेशन के प्लेटफॉर्म के बाएं हाथ सामने भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए अधिकारियों को 'तैयार' करने वाली एक शैक्षणिक संस्थान का बोर्ड देख रहा था। उसपर 'दृष्टि' शब्द लिखा था। विगत दिनों दिल्ली के समाचार पत्रों में इस संस्थान का नाम भी ख़बरों में प्रकाशित हुआ था। सामने 'दृष्टि' को बोर्ड और सामने आते तीन दृष्टिहीन युवकों-युवतियों को देखकर मन में एक ख़याल आया कि क्या दिल्ली मेट्रो के साथ-साथ देश के अन्य शहरों में चलने वाली मेट्रो रेल में 'दृष्टि से दिव्यांग' व्यक्तियों के लिए किसी भी प्रकार की रियायत है अथवा नहीं? चाहिए तो यह कि शहरों की जीवन रेखा मानी जाने वाली मेट्रो ट्रेन अपनी यात्रा के दौरान नेत्रहीनों का स्वागत भी करें और उनकी यात्रा भाड़ा में रियायत भी दे।
दिल्ली में दिल्ली मेट्रो का पहला परिचालन शाहदरा और तीस हज़ारी कोर्ट के बीच 25 दिसंबर, 2002 को हुआ। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी यात्री के रूप में बिना किसी तामझाम के सफर किये थे। आज दिल्ली मेट्रो के परिचालन का 23 वर्ष से अधिक होने वाला है। दिल्ली मेट्रो में नित्य औसतन 50 लाख से अधिक लोग यात्रा करते हैं। किसी खास अवसर पर यह संख्या अस्सी लाख तक भी गयी है। दिल्ली मेट्रो की कितनी कमाई होती है, यह तो अगली कहानी में, लेकिन इस बात की तकलीफ जरूर है कि नेत्रहीनों के लिए आज तक दिल्ली मेट्रो ही नहीं, देश के किसी भी शहर में चलने वाली मेट्रो रेल में नेत्रहीनों के लिए कोई रियायत नहीं है।
भागलपुर जेल में जिस समय अंखफोड़बा काण्ड की घटना घट रही थी, उस समय रामसुंदर दास बिहार के मुख्यमंत्री थे। राम सुन्दर दास 21 अप्रैल, 1979 को मुख्यमंत्री के पद पर आसीन हुए थे और 17 फरवरी, 1980 तक कुल 302 दिन विराजमान रहे। उस समय तक यह जुल्म प्रारम्भ हो गया था कमोवेश, लेकिन प्रकाश में नहीं आ पाया था। फरवरी 17, 1980 से राष्ट्रपति शासन लगा और शासन 8 जून, 1980 को समाप्त हुआ, जब प्रदेश का कमान डॉ जगन्नाथ मिश्र के हाथों आया। इन दिनों भागलपुर में आँख फोड़ने और उसमें तेज़ाब डालने की प्रक्रिया चल रही थी। खासकर जब प्रदेश में राष्ट्रपति शासन था, पुलिस की शक्ति भी उत्कर्ष पर थी, जिसका फायदा उसने उठाई थी, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति ने पुनर्वास के लिए भी आदेश दिए। पीड़ितों के नाम से 30-30 हज़ार रुपये स्टेट बैंक में जमा कराये गए और मुआवजे के तौर पर उन्हें, उनके परिवार को 750/- रुपये प्रतिमाह देने का आदेश दिया गया। मानवीय दृष्टि से वह सब कुछ हुआ – परन्तु वह नहीं हुआ जो होना चाहिए था – क़ानूनी तौर पर न्याय यानी अपराधियों को सजा देना कानून का काम है लेकिन अपराधियों के लिए खुद के हाथों में अपराध लेना, ये कहीं से उचित नहीं है।
उन दिनों अख़बार में नौकरी किये पांच वर्ष हो गया था। भागलपुर से निजी सम्बन्ध होने के कारण आना-जाना अधिक होता था। कुछ वर्ष पूर्व भी गया था जब भागलपुर कारावास के प्रवेश द्वार पर लिखा देखा था: “भटकाव कोई अपराध नहीं है और सुधार हमारा प्रयास है। घृणा अपराध से करो, अपराधी से नहीं।"
भागलपुर के आपराधिक इतिहास के मद्दे नजर कोई भी व्यक्ति इसे दो दृष्टि से देखेगा । एक: पैतालीस वर्ष पूर्व भागलपुर की पुलिस जिस तरह अपने जिले का 33 लोगों की आखों को फोड़कर, उसमें तेज़ाब डालकर, उनके अपराधों की सजा (सभी अपराधी नहीं थे और न्यायालय द्वारा अपराध सिद्ध भी नहीं हुआ था) दी थी – उसका एक पश्चाताप है। यह 17-शब्द इस बात का प्रमाण भी है कि भागलपुर पुलिस के कप्तान साहेब मनोविज्ञान के मर्मज्ञ हैं जो ‘अपराध’, ‘अपराधी’ में ‘शाब्दिक’ और ‘मौलिक’ भेद को समझते हैं और प्रत्येक अपराधी को, चाहे उन्हें भारत का न्यायालय ‘अपराधी’ घोषित किया हो अथवा नहीं, उन्हें दुस्तस्त कर उनके परिवार की, समाज की विकास की मुख्यधारा में जोड़ने का अथक प्रयास कर रहे हैं। जो एक बेहतरीन प्रयास है।
दो: इन 17 -शब्दों को केंद्रीय कारा के प्रवेश द्वार पर उद्धृत देखकर यह भी सोच सकता है कि यह महज एक दिखावा है और चारदीवारी के अंदर सन 1861 में बने पुलिस एक्ट और 1862 में लार्ड थॉमस बैबिंगटन मैकॉले की अध्यक्षता में लॉ कमीशन ऑफ़ इण्डिया की अनुशंसा पर बने भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) के तहत, साथ ही, सन 1974 से लागू दंड प्रक्रिया संहिता ( Code of Criminal Procedure) में जितने प्रकार के “दंड” संभव हो सकते हैं, उसे प्रयोग में लाकर चारदीवारी के अंदर बंद भारत के नागरिक को दण्डित करना है – न्यायालय चाहे वैसी दण्डित किया हो अथवा नहीं । खैर।

करोलबाग मेट्रो स्टेशन पर खड़े-खड़े सामने संस्थान के बोर्ड को पढ़कर सोच भी रहा हूँ कि यह संस्था भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को विगत 27 वर्षों से 'तैयार' कर रहा है लेकिन कोई भी अधिकारी 'दृष्टिहीनों' के लिए चूं तक नहीं किये। वैसे साल 1996 में भारत सरकार दिल्ली मेट्रो प्रोजेक्ट का अनुमति दी थी और दिल्ली मेट्रो का निर्माण कार्य पहली अक्टूबर, 1998 से प्रारम्भ हुआ। इन खलखंडों में न तो दिल्ली मेट्रो या दिल्ली सरकार या भारत सरकार दृष्टि से हीन लोगों के लिए किसी भी प्रकार की रियायत की बात की दिल्ली मेट्रो में यात्रा करने को लेकर । दोनों पर सरकार का नियंत्रण है। दोनों यात्रा ही कराती है। फिर दृष्टिहीनों के लिए यह सौतेला व्यवहार क्यों?
भारत के करीब पचास लाख से अधिक दृष्टिहीन व्यक्ति भाग्यशाली हैं कि भारत सरकार के रेल मंत्रालय और रेलमंत्री की नजर नेत्र से दिव्यांग लोगों पर नहीं पड़ा। अन्यथा 'कुछ भी हो सकता है। भारतीय रेल में मिलने वाली सुविधाओं को भी तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जा सकता है। वैसे, शायद कुर्सी पर बैठे लोगों को यह ज्ञात नहीं हो कि भारत में दृष्टिहीनों को भारत को गणराज्य घोषित होने के 72-घंटे बाद ही छात्रों से लेकर अन्य नागरिकों को देश के किसी भी कोने में रहने वाले आम नागरिक, भारत सर्कार द्वारा रेल यात्रा में भाड़ा में रियायत की सुविधा प्रदान की गयी थी।

शायद दिल्ली मेट्रो में कार्य करने वाले करीब 14000+ कर्मियों के साथ-साथ देश के अन्य शहरों में चलने वाली मेट्रो कर्मचारियों को यह मालूम नहीं होगा कि भारत में अपना संविधान स्वीकार करने के महज पांचवे दिन भारत में रहने वाले नेत्रहीन लोगों के लिए - जिन्होंने भले देश की आज़ादी के लिए हुई क्रांति और क्रांतिकारियों को अपनी आँखों से नहीं देखा हो, लेकिन पर्यावरण में उनकी सुगंधों को महशुश अवश्य किये - के सम्मानार्थ और उनकी यात्रा को सुगम बनाने के लिए भारत सरकार रेल यात्रा में रियायत की घोषणा की थी।
यह निर्णय 30 जनवरी, 1950 को लिया गया था। भारत को गणतंत्र घोषित हुए महज चार दिन बीते थे। सरकारी क्षेत्र में कार्य करने वाले बड़े-बुजुर्ग जो आज अपने जीवन के अंतिम वसंत में सांस ले रहे हैं, कहते हैं कि "30 जनवरी, 1950 को यह निर्णय लेना महात्मा गांधी के प्रति समर्पण मान सकते हैं। गांधी की हत्या 30 जनवरी, 1948 को हुई थी। गांधी चाहते थे कि देश का नेत्रहीन मनुष्य भी अपनी आत्मा से देश की खुशहाली को देख सके, अपना योगदान दे। तत्कालीन शिक्षा विभाग द्वारा यह निर्णय, जिसे भारतीय रेल ने लागू किया, आज भी लागू है। लेकिन कभी-कभी डर लगता है आंख वालों की नजर न लग जाय नेत्रहीनों को मिलने वाली रियायत पर।
30 जनवरी, 1950 को भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय द्वारा निर्गत एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, "The Government of India have decided to grant certain railway concessions to the blind particularly to bonafide blind students of recognised educational institutions and to blind persons who are either on the staff of recognised educational institutions or industrial establishments or who are working independently to earn their own living. The object of these concessions is to make travelling easier and less expensive for the blind."
"The main feature of the concession is that a blind person and his seeing escort will henceforth be able to travel on the payment of a single fare. A somewhat similar concession has been granted to blind students studying in recognised educational institutions. Further details can be obtained on application from the ministry of education, government of india, नई दिल्ली."
बहरहाल, वर्तमान में, भारत में अनुमानित 4.95 मिलियन दृष्टि से दिव्यांग हैं और 70 मिलियन दृष्टिबाधित व्यक्ति हैं, जिनमें से 0.24 मिलियन अंधे दृष्टिहीन हैं। भारत दुनिया का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला देश है और दुनिया की 20 प्रतिशत से ज़्यादा नेत्रहीन आबादी यहीं रहती है। दुर्भाग्य से, यह किसी भी देश में सबसे ज्यादा नेत्रहीन लोगों का निवास भारत में ही है। इसके अलावा, अमीर और गरीब के बीच की खाई लगातार बढ़ने के कारण आबादी का एक बड़ा हिस्सा बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रह जाता है। दृष्टि का न होना भी उन्हीं कारकों में एक है।
वैसे, विगत 19 मार्च को दुनिया के सबसे बड़े रेलवे नेटवर्कों में से एक होने के नाते, भारतीय रेलवे हमेशा से ही सभी यात्रियों, जिनमें दिव्यांग भी शामिल हैं, के लिए सुविधाजनक और आसान यात्रा सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास करने के लिए जाना जाता है। दिव्यांगजनों से जुड़ी समस्याओं और सामाजिक कलंक को ध्यान में रखते हुए, भारतीय रेलवे इन अतिरिक्त सेवाओं के साथ यात्रा को थोड़ा आसान और सुखद बनाने के लिए सुविधाजनक सुविधाएँ और रियायतें प्रदान करता है। ये प्रावधान देश के परिवहन ढांचे में और उसके पास अधिक समानता लाने की दिशा में काम करने की एक व्यापक पहल का हिस्सा हैं।

केंद्रीय रेल, सूचना एवं प्रसारण, तथा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने लोकसभा में प्रश्न का उत्तर देते हुए वरिष्ठ नागरिकों, महिलाओं और दिव्यांगजनों को निचली बर्थ की सुविधा प्रदान करने के लिए भारतीय रेलवे द्वारा किए जा रहे प्रयासों पर प्रकाश डाला। वरिष्ठ नागरिकों, 45 वर्ष या उससे अधिक आयु की महिला यात्रियों तथा गर्भवती महिलाओं को उपलब्धता के आधार पर स्वचालित रूप से निचली बर्थ आवंटित कर दी जाती है, भले ही बुकिंग के दौरान कोई विशिष्ट विकल्प न दर्शाया गया हो। मंत्री ने कहा कि स्लीपर क्लास में प्रत्येक कोच के लिए छह से सात निचली बर्थ का कोटा निर्धारित किया गया है। वातानुकूलित 3 टियर (3AC) में प्रति कोच चार से पांच निचली बर्थ। वातानुकूलित 2 टियर (2AC) में प्रति कोच तीन से चार निचली बर्थ। अधिकतम सुविधा सुनिश्चित करने के लिए यह प्रावधान ट्रेन में कोचों की संख्या के आधार पर उपलब्ध है।
इसके अलावे, दिव्यांगजनों के लिए आरक्षण कोटा की सुविधा सभी मेल/एक्सप्रेस ट्रेनों में लागू है, जिसमें राजधानी और शताब्दी जैसी ट्रेनें भी शामिल हैं, भले ही रियायती सुविधाएं ली गई हों या नहीं। स्लीपर क्लास में चार बर्थ (दो निचली बर्थ सहित)। 3 AC/3E में चार बर्थ (दो निचली बर्थ सहित)। आरक्षित द्वितीय सीटिंग (2एस) या वातानुकूलित चेयर कार (सीसी) में चार सीटें। यात्रा के दौरान निचली बर्थ खाली होने की स्थिति में वरिष्ठ नागरिकों, विकलांग व्यक्तियों और गर्भवती महिलाओं को प्राथमिकता दी जाती है, जिन्हें शुरू में मध्य या ऊपरी बर्थ आवंटित की गई होगी।
उनके अनुसार, भारतीय रेलवे इन समावेशी उपायों के माध्यम से निर्बाध और आरामदायक यात्रा अनुभव प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है। यात्रियों को सुरक्षित और सुविधाजनक यात्रा के लिए इन सुविधाओं का लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। विभिन्न प्रकार के विकलांग यात्रियों के लिए किराए में छूट उपलब्ध है। उदाहरण के लिए, द्वितीय श्रेणी, शयनयान, प्रथम श्रेणी, वातानुकूलित कुर्सीयान और तृतीय श्रेणी के एसी में, अस्थि विकलांग या पक्षाघात से पीड़ित व्यक्ति और उनके अनुरक्षक 75% छूट के पात्र हैं। द्वितीय श्रेणी, शयनयान और प्रथम श्रेणी में, दृष्टिहीन व्यक्ति और उनके अनुरक्षक 50% छूट के पात्र हैं। मानसिक रूप से विकलांग लोगों, जिन्हें यात्रा के लिए अनुरक्षण की आवश्यकता होती है, और मूक-बधिर लोगों के लिए भी इसी तरह की सुविधा उपलब्ध है।
