तत्कालीन संपादकों को ज्ञात होता था कि उनके शब्दों के मोल तभी हैं जब अख़बार पाठकों के हाथ पहुँचता है, वह भी 'समय' पर ..... खैर चलिए कुत्तों की बात करते हैं