अशोक राजपथ (पटना) : मुग़ल सल्तनत और ब्रितानिया हुकूमत वाले कालखंड को छोड़ दें, अंतरिम सरकार से लेकर साझेदारी वाली सरकार तक, यानी श्रीकृष्ण सिन्हा से लेकर नीतीश कुमार तक पटना शहर की मुद्दत से प्रदूषित हवाओं को साफ़ करने के लिए निर्लोभ खड़ा सैकड़ों वृक्ष आज भी अपने जमीन के अंदर, अपने जड़ों के अंदर इतिहास को समेटे है। वह बोल नहीं सकता, छल-प्रपंच नहीं कर सकता, अपने प्राकृतिक गुणों को तिरस्कृत नहीं कर सकता, आज की मतदाता की तरह, आज के नेताओं, लोगों और समाज के तथाकथित संभ्रांतों की तरह, इसलिए नहीं कि वह मूक बधिर है; बल्कि इसलिए कि उसकी बातों को समझने के लिए प्रदेश में मानसिकता की किल्लत है। यह स्थिति सिर्फ पाटलिपुत्र की राजधानी पटना की ही नहीं, बल्कि देश से हज़ारों शहरों की है, या फिर तथाकथित विकास के नाम पर खेतों को, जंगलों के साथ प्राकृतिक संहार कर, समाप्त कर नए उभरते शहरों की हो रही है।
श्रीकृष्ण सिन्हा (15 अगस्त, 1947-31 जनवरी, 1961) और दीपनारायण सिंह (1 फरवरी, 1961 से 18 फरवरी, 1961) को मैं नहीं देखा। लेकिन नोवेल्टी एण्ड कंपनी के संस्थापक के श्री तारानंद झा के कारण बिनोदानंद झा, कृष्ण बल्लभ सहाय, महामाया प्रसाद सिन्हा, 8 फरवरी, सतीश प्रसाद सिंह, बीपी मंडल, भोला पासवान शास्त्री, हरिहर सिंह, दारोगा प्रसाद राय, कर्पूरी ठाकुर, केदार पाण्डेय, अब्दुल ग़फ़ूर, जगन्नाथ मिश्र, राम सुन्दर दास, चंद्रशेखर सिंह, बिंदेश्वरी दुबे, भागवत झा आज़ाद, सत्येंद्र नारायण सिन्हा, लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, जीतन राम मांझी, नीतीश कुमार जैसे लोगों को मुख्यमंत्री कार्यालय में आते भी देखा और जाते भी देखा। कुछ मुस्कुराते गए, कुछ ह्रदय पर पत्थर रखकर ऐसे निकले की समयांतराल जमीन से भी उठ गए।
आम तौर पर जो भी सत्ता के करीब रहे, स्वयं को भगवान मान लिए और यह सोच लिए की उनके बिना प्रदेश चल ही नहीं सकता। तत्कालीन लोगों ने, पत्रकारों ने, लेखकों ने, यहाँ तक कि पटना सचिवालय से लेकर पटना विश्वविद्यालय या प्रदेश के अन्य विश्वविद्यालयों के जमीन से जुड़े वृक्षों ने अनवरत समझाते रहा - सत्ता को अपना जागीर नहीं समझो, कुर्सी को अपना बपौती नहीं समझो - लेकिन वे सभी कब सुनने वाले थे, सत्ता की मादकता और उसकी नशा के कारण हैं। तत्कालीन पत्रकारों ने, सम्पादकों ने अनेकों कहानियां लिखे, सम्पादकीय प्रकशित किये । बिम्बिसार, अजातशत्रु, उदायिन, सिसुन्गा, कलासोका, महापद्मनंद, धनानंद जैसे मगध के राजाओं ही नहीं, जरासंघ जैसे शासक भी मिट्टी में मिल गए। चंद्रगुप्त ने मौर्य वंश का नींव रखा। लेकिन आज राजगृह, पावापुरी, नालंदा, वैशाली सभी इतिहास के पन्नों में चले गए।
इतना ही नहीं, पटना रेलवे स्टेशन के सामने स्थित केंद्रीय कारावास, जिसमें बिहार के सैकड़ों नेताओं ने सत्ता पाने के लिए अपने-अपने युद्ध काल में बंद रहे, वह कारावास भी समाप्त हो गया। आज वहां बुद्ध विराजमान हो गए। शायद पटना की आधी आबादी वहां कभी कारावास था, नहीं जानती है; उसी तरह, जैसे चंद्रशेखर सिंह, भोला पासवान शास्त्री, अब्दुल गफूर, रामसुंदर दास जैसे लोग भी कभी प्रदेश का नेतृत्व किये, नहीं जानते हैं। कल आप सभी 'स्वयंभू नेता भी भूत हो जायेंगे और कल की पीढ़ी भी आपको कोई महत्व नहीं देगी। बशर्ते आप 'ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, चमार, कुर्मी, कोइरी, यादव, पासी, दुसाध, रविदास, मुसहर, भूमिहार, मल्लाह, बनिया, कायस्थ जाति के हों, और तत्कालीन राजनीतिक बाजार में आपका मोल हो, आपके समुदाय के लोगों का मत महत्वपूर्ण हो। फिर कोई नया नेता जन्म लेगा, लेकिन जमीन से नहीं, हवा में।
इसका ज्वलंत दृष्टान्त यह है कि जो व्यक्ति सत्य और अहिंसा के अधीन, जाति और वर्ण व्यवस्था से मीलों दूर रहकर भारत के लोगों को आपस में मिलकर रहना सिखाया, देश को आज़ादी दिलाया, बिहार में राजनीतिक लाभ उठाने के लिए वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महात्मा गांधी के जन्मदिन पर, यानी 2 अक्टूबर, 2023 को अपने प्रदेश में कराई गई जाति आधारित गणना के आंकड़े को सार्वजनिक कर दिया। रिपोर्ट के मुताबिक अति पिछड़ा वर्ग 27.12 प्रतिशत, अत्यन्त पिछड़ा वर्ग 36.01 प्रतिशत, अनुसूचित जाति 19.65 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति 1.68 प्रतिशत और अनारक्षित यानी सवर्ण 15.52 प्रतिशत हैं। इतना ही नहीं, इस जातिगत सर्वे से बिहार में आबादी का धार्मिक आधार भी पता लगा लिया। सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में हिंदू 107192958 (कुल आबादी का 81.9%), मुसलमानों 23149925 (कुल आबादी 17.7%), ईसाई 0.05 प्रतिशत, बौद्ध 0.08 प्रतिशत, और जैन 0.009 प्रतिशत हैं। इसको जाति का राजनीतिकरण या फिर राजनीति का जातीयकरण भी कह सकते हैं।

आश्चर्य की बात तो यह है कि बिहार विधानमंडल ने 18 फरवरी 2019 को राज्य में जाति आधारित जनगणना (सर्वे) कराने का प्रस्ताव पारित किया था। इसके बाद 2 जून, 2022 को बिहार मंत्री परिषद ने जाति आधारित जनगणना कराने का फ़ैसला किया. ये दो चरणों में होनी थी। पहले चरण में ये मकान के जरिए होनी थी। इसके तहत 7 जनवरी 2023 से 31 जनवरी 2023 तक मकानों का नंबरीकरण किया गया और लिस्ट बनाई गई। दूसरे चरण में राज्य के सभी व्यक्तियों की जनगणना का काम 15 अप्रैल 2023 को शुरू किया गया। खैर।
वैसे बिहार सरकार यह दावा करती है कि उनके प्रदेश में कुल 7380.79 वर्ग किलोमीटर में वन क्षेत्र हैं जिसमें सबसे अधिक कैमूर, पश्चिम चम्पारण, रोहतास, गया, और औरंगाबाद में वन क्षेत्र हैं, जबकि शेखपुरा में सबसे कम, 1.19 वर्ग किलोमीटर में ही वन है। सरकार यह भी दावा करती है कि वर्तमान वन क्षेत्र तो 15 फीसदी है, उसे बढ़ाकर 17 फीसदी किये जाने का प्रयास कर रहीं है। इसी उद्देश्य से एक हरियाली मिशन की भी शुरुआत की गयी कुछ वर्ष पहले। इस मिशन के तहत अन्य पौधों के अलावे आम, नीम, पीपल, महुआ, बांस, टीक, सेमल, साल, अमला और जामुन के पौधों को अधिकाधिक लगाया जा रहा है । विगत 2021-22 वर्ष में प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विश्व पर्यावरण दिवस पर कहा था कि 'जल-जीवन-हरियाली' कार्यक्रम के तहत करीब 5.5 करोड़ पौधों का सैंपलिंग लगाने का आदेश दिया गया। इतना ही नहीं करीब 50 लाख सैंपलिंग किसानों को भी वितरित किया जाएगा उन्हें पौधे को लगाने के तीन वर्ष तक उसके देखभाल के लिए प्रति पौधा 60 रुपये दिया जायेगा। इसके अलावे 20 लाख से अधिक सैंपलिंग प्रदेश के निजी क्षेत्र के संकायों और गैर-सरकारी संस्थानों को दिया जाएगा, साथ ही, 15 लाख सैंपलिंग आम नागरिकों को मोबाईल वाहन के माध्यम से दिया जायेगा।
वन और पर्यावरण के देखभाल के लिए मंत्रालय, मंत्री, विभाग, अधिकारी, पदाधिकारी, चपरासी, ठेकेदार और न जाने कितने लोग हैं। लेकिन अंत में एक ही सवाल उठता है कि पौधे से अधिक तो हरे भरे प्रदेश के वन और पर्यावरण विभाग के आला अधिकारी से लेकर चपरासी तक, मंत्री से ठेकेदार तक हो रहे हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि आज शायद कोई भी वृक्ष ऐसा नहीं है जो प्रदेश के मुख्यमंत्रियों को याद रख सके। अब मुख्यमंत्रियों को क्या, प्रदेश के मंत्रियों को पेड़-पौधे, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड से क्या लेना-देना है? एक बार कुर्सी पर चिपके तो स्वयं को इतना हरा-भरा कर लिए कि जीवन में पेड़ की हरियाली की जरूरत ही नहीं होगी। किसान-मजदूर को अपने घर और दफ्तर के प्रवेश द्वार से साढ़े तीन कोस दूर रखेंगे। प्रत्येक पांचवे साल में दूर से, जैसे मतदाता अछूत हो और उसका मत पूज्यनीय, अवतरित होंगे ताम झम के साथ, और फिर नदारत। खैर। आगामी शरद ऋतु में प्रस्तावित चुनाव में कितने नेताओं को प्रदेश के सूखे वृक्षों, उसके कटे टहनियों, जमीन पर गिरे पत्तों का श्राप लगेगा और वे भी विधान सभा के बाहर गिरे दिखेंगे यह तो वृक्ष ही जानता है।
बहरहाल, विगत दिनों जब हमारा उस ज़माने का सबसे प्रिय मित्र, शरण देने वाला वृक्ष का पार्थिव शरीर पटना के अशोक राजपथ पर गिरा (ब्रह्मस्थान), तो उन वृक्षों के बारे में हाल-चाल लेना जरुरी हो गया जो उसके हम-सफर थे, हम-उम्र थे, मुझे अपनी जीवन-यात्रा के प्रारंभिक दिनों में हाथ थामा था। सन 1968 से 1975 तक पटना के गांधी मैदान से पटना विश्वविद्यालय के अन्तिम छोड़, यानि पटना लॉ कालेज होते हुए, रानी घाट तक कोई धीरे-धीरे दो सौ से अधिक अख़बार लोगों के घरों में डालता था। आज भी मेरे तरह भारत में अनेकानेक अखबार बेचने वाले लोगबाग होंगे। लेकिन विगत दिनों अशोक राज पथ पर स्थित ब्रह्म-स्थान का 150+ वर्ष पुराना पीपल वृक्ष के गिरने से पटना के गाँधी मैदान से रानी घाट तक, वे सभी वृक्ष मानस पटल पर तैरने लगे, जैसे कह रहे हों - "यशुभाई !!! मैं भी था !! मैं भी आपकी उस जीवन-यात्रा का चश्मदीद गवाह हूँ।"
पटना के गाँधी मैदान से अपनी 20-इंच की साईकिल के आगे हैंडिल पर और पीछे कैरियर में जब अख़बारों को लेकर (उम्र के साथ क्रमशः) अपने गंतव्य की ओर सेबह-सवेरे मंदिर में घंटी बजने या फिर मस्जिद में अज़ान पढ़ने या गिरिजाघरों में घंटा बजने या गुरुद्वारों से वाहे गुरूजी का आवाज आने से पहले सर्वप्रथम डॉ एस के बोस, तत्कालीन प्राचार्य, बी एन कालेज के घर पर चार अखबार - आर्यावर्त, इन्डियन नेशन, सर्चलाइट, प्रदीप और जनशक्ति देने रुकता था, तो साईकिल को सहारा देने हेतु उनके घर के मुख्य द्वार पर, सड़क के दाहिने तरफ वह विशालकाय नीम का वृक्ष अपना हाथ बढ़ाता था। जैसे उसे मेरी समय-सारिणी पता हो। और हो भी कैसे नहीं - आखिर पटना विश्वविद्यालय के एक विख्यात महाविद्यालय के प्राचार्य के देख-रेख में पला-बढ़ा है न। उस ज़माने में शिक्षकों का शैक्षिक-आध्यात्मिक चरित्र भी बहुत मानवीय होता था, संवेदनशील होता था। वहां अखबार देकर, इस नीम के वृक्ष को मुस्कुराकर धन्यवाद देते आगे निकल जाता था। यह वृक्ष डॉ बोस के आवास के प्रवेश द्वार के बाहर ठीक गेट के दाहिने खड़ा था। इस वृक्ष के साथ ही कॉलेज में प्रवेश के लिए गेट था।
बी एन कालेज परिसर के बाद सड़क पर महामहिम कुत्तों को नमस्कार करते आगे बढ़ते जाता था। उस दिनों भी समाज में कुत्ते थे, आज तो भरे पड़े हैं। हाँ, बदलाव इतना अवश्य हुआ है कि उन दिनों कुत्तों को मालिक-मालकिन की गोद में खेलने-खाने-सोने का अवसर नहीं के बराबर था, इस स्थान पर मानव के बच्चे हुआ करते थे। समयांतराल, जैसे-जैसे प्रकृति में परिवर्तन होता गया, "नीम" के पेड़ पर "करैले" चढ़ते गए, मानव के बच्चों का स्थान कुत्तों के बच्चों ने ले लिया। खैर मुझे क्या। बी एन कॉलेज में प्रवेश के लिए दो गेट थे। एक अशोक राज पथ से जुड़ा था और दूसरा अशोक राज पथ से बाएं तिवारी बाबा की पान की दूकान से महेन्द्रू घाट, अंटा घाट के लिए (गाँधी मैदान की ओर से आने पर) जाने वाली सड़क पर। आम तौर पर अशोक राज पथ वाला गेट बंद होता था। इसी गेट पर चार और नीम के विशाल वृक्ष थे जो अंग्रेजी हुकूमत के ज़माने से खड़े थे भारतीय क्रांतिकारियों के हौसले मजबूत करने के लिए। यहाँ अक्सरहां रेडी पर कुछ भोज्य पदार्थ बिका करता था।
यहाँ से आगे बाएं सड़क पर साईकिल की पैडिल दौड़ने लगती थी जो महेन्द्रू घाट की ओर स्वतः मुड़ जाती थी। एक चाय वाले मेरे ग्राहक थे। कोई 35+ वर्ष के रहे होंगे। वे एक मिस्त्री भी थे। वे प्रदीप अख़बार मुझसे लेते थे। उन दिनों छह नए पैसे दाम थे प्रदीप अखबार के। मेरी मुलाकात एक दिन सुवह-सुवह बस अड्डे पर हुयी थी जब वे डाल्टेनगंज वाली बस लेने वहां आये थे। मुझे देख वे अखबार ख़रीदे और नित्य एक अखबार देने को कहा - वे इसलिए हमसे आकर्षित हुए क्योंकि मैं पटना के टी के घोष में पढता था और उनका बेटा मिलर स्कूल में। उनकी दूकान सड़क के दाहिने तरफ थी। यहाँ कोई छः-सात विशालकाय नीम और पीपल का वृक्ष था। नीचे मोटर-गाड़ियों के लिए मिस्त्री की दुकानें। यहीं लड़कियों के लिए एक विख्यात स्कूल था - संत जोसेफ़ कान्वेंट। इस स्कूल से और इन वृक्षों के छाया तले न जाने कितने हज़ार-लाख पटना की लड़कियां अपनी भविष्य का निर्माण की होंगी। अपने जीवन की जड़ों को इन्ही वृक्षों की जड़ों के तरह गहरा किया होगा।
महेन्द्रू घाट से विश्वविद्यालय की ओर जाने वाली सड़क अशोक राजपथ पर पटना चिकित्सा महाविद्यालय परिसर तक वृक्षों की संख्या सड़क पर नहीं के बराबर थी। हाँ, मुख्य डाकघर के बाएं हाथ जो रास्ता महेन्द्रू घाट के लिए जाता था और सोमवारी मेला के लिए विख्यात था, सड़क के नुक्कड़ कर नीम का विशालकाय वृक्ष था। अंदर रास्ते में भी अनेकानेक वृक्ष थे - सभी नीम के और पीपल के। यहाँ से आगे चिकित्सा महाविद्यालय परिसर में अधिकाधिक वृक्ष थे - मूलतः नीम, बरगद और पीपल का। इस परिसर के अंदर चिकित्सकों द्वारा अपने-अपने आवासीय परिसर में आम, लीची, निम्बू, केला, इत्यादि के पेड़ लगाए गए थे। अशोक राजपथ पर वृक्षों की उपस्थिति की एक सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि सभी वृक्ष सड़क के बायीं ओर ही था। दाहिने तरफ गांधी मैदान से लेकर पटना साइंस कॉलेज के प्रवेश द्वार तक कोई भी वृक्ष दाहिने हाथ नहीं था। साइंस कॉलेज के सामने जो रास्ता अंदर - अंदर भिखना पहाड़ी की ओर जाता था, दाहिने हाथ पहला वृक्ष था और दूसरा उससे कोई पांच सौ कदम आगे अशोक राजपथ जहाँ मंदिर के पास से अपने बाएं हाथ नीचली सड़क के लिए एक मार्ग छोड़ता था, वहां एक नीम और पीपल का वृक्ष था। इन वृक्षों के नीचे एक मंदिर भी।
जब चिकित्सा महाविद्यालय से आगे जब निकलता था को बिहार यंगमेंस इंस्टीच्यूट के सामने सड़क के दाहिने तरफ मुझे अपने स्कूल के एक शिक्षक श्री रामनरेश झा साहेब को चार अखबार देने होते थे। ये जिस मकान में रहते थे वे दवाई का एक गोदाम था। इस मकान के ठीक सामने, यानि सड़क की बायीं ओर बिहार यंगमेंस इंस्टीच्यूट के प्रवेश द्वार पर एक नीम का पेड़ था। इसी नीम के पेड़ के नीचे एक छोटा सा मंदिर भी था। चूँकि उन दिनों मंदिरों का व्यापारीकरण नहीं हुआ था, धर्म के नाम पर आस्था का बंटवारा नहीं हुआ था - क्योंकि इस मंदिर में समाज के सभी वर्गों के लोगों को, उनके बच्चों को नमन करते देखता था जो आगे या तो पढ़ने के लिए जाते थे या फिर यंगमेंस इंस्टीच्यूट में टेबुल-टेनिस खेलने।
उस ज़माने में लोग खेल को खेल भावना से ही खेलते थे। खैर, यहाँ भी मेरी साईकिल की रक्षा महामहिम नीम का वृक्ष ही करता था। यहाँ से आगे निकलने पर जैसे ही हम खुदाबक्श पुस्तकालय के पास पहुँचते थे, जहाँ से एक रास्ता बाएं चिकित्सा महाविद्यालय परिसर होते गंगा नदी में मिलता था, दूसरा खजांची रोड की और जाता था। यह वही खजांची रोड है जहाँ पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री डॉ बिधान चंद्र रॉय साहेब का जन्म हुआ था। खजांची रोड में स्थित राजा राममोहन रॉय सेमिनरी स्कूल में बाहर सारे नीम के बृक्ष थे, खासकर प्रवेश द्वार पर ही। यहीं एक पत्थर का शिलालेख भी होता था जिस पर राम मोहन रॉय सेमिनरी के उस छात्र का नाम लिखा होता था जो 11 अगस्त 1942 को पटना सचिवालय के सामने राष्ट्रध्वज फहराने के क्रम में वीरगति को प्राप्त किये। अपने सीने को अंग्रेजी हुकूमत की गोली से छल्ली होने दिया - ताकि देश आज़ाद हो।
खजांची रोड में ही जैसे ही हम तिमुहानी पर पहुँचते थे, जहाँ से खजांची रोड आगे नया टोला (बारी रोड) से मिलने के लिए निकलता था और एक सड़क बी एम दास रोड के रूप में वहां से बाएं निकलती थी, इस सम्पूर्ण सड़क पर कहीं कोई वृक्ष नहीं था। यही रास्ता आगे एनी बेसेंट रोड होते अशोक राजपथ की ओर निकलती थी, जबकि बी एम दास रोड आगे निकलकर मुस्लिम स्कूल होते रमना रोड से मिलती थी, वृक्ष नहीं के बराबर। जो रास्ता नया टोला जाता था, इस तिमुहानी से कोई पांच सौ कदम पर एक महान व्यक्ति के जन्मभूमि को नित्य नमन करता था - पश्चिम बंगाल के प्रथम मुख्य मंत्री श्री विधानचन्द राय साहेब के जन्मस्थान को। राय बाबू टी के घोष विद्यालय में ही पढ़े थे और मैं भी उन्ही के पदचिन्हों पर अग्रसर था उसी स्कूल में। इस तिमुहानी पर विशाल पीपल का वृक्ष था और बृक्ष के नीचे पवन पुत्र हनुमान जी का उग्रमंदिर।
खजांची रोड जब अशोकराज पथ से मिलता था, सामने ख़ुदा बक्श पुस्तकालय के पास भी नीम का एक विशाल बृक्ष था। इसके बाद अशोकराज पथ पर पटना कालेज के मुख्य द्वार से 20-कदम पहले ब्रह्म-स्थान में ही पीपल का बृक्ष था जो विगत दिनों अपने अस्तित्व को उखाड़कर फेंक दिया। यह वृक्ष सन 1974 आंदोलन का चश्मदीद गवाह था। यह जानता था की तत्कालीन नेताओं ने छात्र-छात्राओं के एक विशेष वर्ष को, जो प्रदेश-देश की राजनीतिक पार्टियों से सम्बन्ध रखते थे, को बरगलाया है, उकसाया है - स्वहित के लिए। इस क्रांति को जयप्रकाश नारायण नेतृत्व कर रहे थे।
प्रकाश नारायण के "सम्पूर्ण क्रान्ति" के गर्भाधान से बिहार में कुकुरमुत्तों के तरह राजनेता पैदा लिए, मन्त्री बने, मुख्य मंत्री बने। पटना के सर्पेन्टाइन रोड से दिल्ली के राजपथ तक लोगों ने बिहार के लोगों को बरगलाया। बिहार की जनता को बरगलाते हुए, कोई खेतीहर मजदूर से बिहार की सम्पूर्ण जमीनों का मालिक बन बैठे, तो कोई किसी सरकारी आउट-हॉउस से दिल्ली-कलकत्ता-मुंबई-चेन्नई-कानपूर-नागपुर जैसे शहरों में सैकड़ों व्यावसायिक संस्थानों का/मॉलों का मालिक बने। कोई हाथ में एक पतली सी अभ्यास-पुस्तिका लिए, पैर में हवाई-चप्पल पहने प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने का सपना दिखाकर सरकारी संस्थाओं को गंगा की बाढ़ में प्रत्येक वर्ष बहाते रहे और स्वयं तथा अपने परिवार-परिजनों की कमाई के लिए दर्जनों "निजी शैक्षणिक संस्थाएं" खोले। सबों ने इस वृक्ष के नीचे छाँह को "गलत मन से इस्तेमाल किये" - वह उन दगाबाजों, मुनाफाखोरों, अमानवीय लोगों के बीच अब वह वृक्ष नहीं रहा।
उन कुकुरमुत्तों जैसे राजनेताओं की ''कहनी-करनी'' में फर्क को बर्दास्त नहीं कर सका वह वृक्ष । मनुष्य तो मनुष्य - क्या गरीब, क्या निरीह, क्या अस्वस्थ, क्या अशिक्षित, क्या नंगे, क्या भिखमंगे समाज के सभी तबकों के लोगों को पिछले कई दसकों ये राजनेतागण दोखा देते आ रहे है, यह वृक्ष बर्दास्त नहीं कर सका उन असहाय लोगों की पीड़ा। इस वृक्ष और वृक्ष के नीचे "ब्रह्म" को साक्षी मानकर पाटलिपुत्र के लोगों से कई हज़ार-लाख वादे किये थे ये नेतागण, कितने सपने दिखाए थे ये सफेदपोश शुतुरमुर्ग - परन्तु किसी भी वायदे को पूरा नहीं कर सके। अन्ततः यह बृक्ष अपना अस्तित्व मिटा देना ही श्रेयस्कर समझा। कल तक लोगों की इक्षाएं-आकांक्षाएं पूरा होते देखने की आस को जमीन से कोई 100-फीट ऊंचाई से अपनी नजर से दसकों से देखता रहा; विगत दिन स्वयं को जमीन पर लाना श्रेयस्कर समझा - आज की पीढ़ी इस बृक्ष के दर्द को नहीं महसूस कर सकता है।
ब्रह्म स्थान बृक्ष की छाया में पला-बड़ा हुआ हूँ। सबसे पहले इस वृक्ष के रूबरू हुआ था अपने बाबूजी के साथ जब वे इसी वृक्ष के छाँह तले "बुक सेन्टर" नामक पुस्तक दूकान में कार्य करते थे। साल कोई सन 1965 था। यह दूकान उस समय दास स्टूडियो के बगल में था। बाद एक और किताब की दूकान थी। फिर खाली स्थान और उसके बाद टी के घोष एकेडमी। उस दिन मुझे तनिक भी एहसास नहीं हुआ की आज जिस वृक्ष के नीचे खड़ा हूँ, यह सभी दृष्टिकोण से मुझे अपने शरण में ले लिया है। तभी तो मैं अपने जीवन का बहुमूल्य समय इस वृक्ष के सानिग्ध में बिताया, टी के घोष एकेडमी शिक्षा प्राप्त किया। इसके जड़ से कोई 200-कदम पर लिफ्ट चलाया नोवेल्टी एंड कंपनी में, इसी सड़क पर वर्षों अखबार बेचा। जब भी मन में कोई कौतुहल, बेचैनी होता था, इस विशाल पीपल के वृक्ष के नीचे बने एक छोटे से बरामदे पर बैठकर बजरंगबली से, ब्रह्म से अन्तःमन से बातचीत जरूर करता था। समय सभी घाव को भर देता है, ब्रह्म और बजरंगबली भी हमेशा मेरे जीवन के सभी विघ्न-बाधाओं को हरते गए।
बिहार ही नहीं, विश्व के किसी कोने में अगर कोई भी व्यक्ति रहते होंगे और वे पटना कालेज या पटना विश्व विद्यालय के छात्र-छात्राएं रहे होंगे; इस ब्रह्म-स्थान को देखे ही होंगे। आज से कोई 157 वर्ष पूर्व 9 जनवरी, सन 1863 में स्थापित पटना कालेज का मुख्य द्वार अशोक राज पथ पर खुलता है तो दाहिने हाथ, करीब 20-कदम पर सड़क के बीचोबीच यह पीपल का वृक्ष था जिसके नीचे ब्रह्म थे। आज तक किसी ने भी इस पीपल के पेड़ की एक टहनी भी तोड़ने/काटने की हिम्मत नहीं किये।
पटना कालेज में संविधान सभा के प्रथम अध्यक्ष सच्चिदानंद सिन्हा, राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह, दूसरे मुख्यमंत्री अनुग्रह नारायण सिन्हा, हिंदी साहित्यकार रामधारी सिंह दिनकर, प्रसिद्ध इतिहासकार यदुनाथ सरकार, सीबीआई के पूर्व निदेशक त्रिनाथ मिश्रा जैसे होनहार छात्र निकले हैं। पटना कॉलेज से निकले हैं। अपने ज़माने में यह कॉलेज शिक्षा का लाइटहाउस था। यह ब्रेन कैपिटल था। पड़ोसी राज्यों से ही नहीं बल्कि हिमालयी क्षेत्रों से भी लोग उस समय यहां पढ़ने आते थे। बात सत्तर की दशक की है, यानी सन 1974 का आंदोलन ।
यहाँ से मेरी साइकिल पटना कॉलेज परिसर में प्रवेश लेती थी परिसर में स्थित प्राध्यापकों में रहने वाले छात्र-छात्राओं को अखबार देने। कालेज में प्रवेश के साथ मुख्य द्वार पर स्थित सुरक्षा-कर्मी के लिए बने कमरे के सटे पीछे दो विशालकाय पीपल वृक्ष हुआ करता था। जिसमें एक वृक्ष की टहनियां ब्रह्मस्थान के वृक्ष की टहनियों से 24-घंटा मेल-मिलाप करती थी। दुखदर्द बांटती थी। यही यह छोटा मैदान हुआ करता था। कालेज में प्रवेश के साथ जो सड़क आगे जाती थी वह मुख्य खेल मैदान के दाहिने कोने पर, जहाँ रास्ता अंग्रेजी विभाग की ओर निकलता था, दो बुजुर्ग पीपल के बृक्ष थे। अंग्रेजी विभाग के तरफ जाने वाले रास्ते पर भी दो और पीपल के वृक्ष थे, जो पटना कालेज की स्थापना के बाद लगे थे।
सीधी जाती सड़क, जो पटना कालेज के प्रशासनिक भवन के तरफ जाने वाली सड़क पर बाये तरफ दो और पीपल के पेड़ थे जहाँ आम-तौर पर छात्र-छात्राओं का जमघट होता था। वजह भी था - एक तो छात्रों के लिए "व्यायामशाला" और छात्राओं के लिए "मुख्य कॉमन-रूम" - दूसरा कॉमन-रूम अंग्रेजी विभाग के तरफ था (इसके बारे में अगली कहानी में लिखूंगा) । यहाँ से, यानि पटना कालेज परिसर के इस स्थान से पेड़ों का सिलसिला शुरू होता था - विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे, जिसमे पीपल, बरगद तो था ही, आम, लीची, जामुन, बेर, कदम, पलास इत्यादि के बड़े-बड़े पेड़ थे।
हमारी यात्रा यहाँ से कृष्णा घाट स्थित प्राध्यापकों के आवासों से, लड़कियों छात्रावास होते हुए पटना साइंस कालेज के रास्ते, इंजीनियरिंग कालेज, लॉ कालेज होते रानी घाट तक होता था। पेड़ों की उपस्थिति और वजूद पटना कालेज परिसर से रानीघाट तक था। इसमें नए पेड़ों को छोड़कर, जिसकी आयु 40- वर्ष से 70 वर्ष रहा होगा; अधिकांश पेड़ 200+ वर्ष पुराने थे। वजह भी था - गंगा तट पर स्थित होना, जमीन का नमी होना। कहते हैं न - ऊंचाई प्राप्त करने के लिए जड़ को जमीन के अंदर, बहुत अंदर रखना होता है। परन्तु तकलीफ इस बात की है कि अपने अंकुरण से पौधा - पेड़ - वृक्ष बनने के दौरान किसी ने कभी इसका सुध नहीं लिया।
