पटना / नई दिल्ली : स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास में चार तारीखों का अपना महत्व है। 15 अगस्त, 1947 को राष्ट्र अंग्रेजी सत्ता से मुक्त हुआ। 26 जनवरी, 1950 को देश अपना संविधान स्वीकार कर गणतंत्र राष्ट्र घोषित हुआ। आज़ादी के 26 वर्ष 10 महीने बाद पटना के जयप्रकाश नारायण 5 जून, 1974 को सत्तारूढ़ कांग्रेस के खिलाफ आज़ादी का दूसरा जंग छेड़ा 'सम्पूर्ण क्रांति' के रूप में और इस क्रांति से निकले, छात्र से नेता और फिर नेता से मुख्यमंत्री बने लालूप्रसाद यादव बिहार की आर्थिक व्यवस्था ही नहीं, स्वतंत्र भारत की आर्थिक नींव को, सम्पूर्ण क्रांति के 22 -साल बाद, हिला दिया। तारीख था 19 जनवरी, 1996 जब बिहार ही नहीं, भारत ही नहीं, विश्व के सभी अख़बारों में, टीवी पर, पत्रिकाओं में 950-करोड़ रूपये का चारा घोटाला काण्ड प्रकाशित होना शुरू हुआ।
सम्पूर्ण क्रांति में पटना के गांधी मैदान से दिल्ली के रामलीला मैदान तक राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की जिस कविता - 'सिंहासन खाली करो कि जनता आ रही है' - का शंखनाद किया गया, उस क्रांति के बिगुल बजने के दो दशक बाद ही, जयप्रकाश नारायण के सबसे करीबी लालू प्रसाद यादव 'सरकारी खजाना खाली करो की लालू आ गया है”, कविता पाठ करते बिहार की अर्थव्यवस्था को एक सोची-समझी साजिश के तहत लूटना प्रारम्भ किया। इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि तत्कालीन अविभाजित बिहार के सरकारी खजाने को लूटने के लिए तत्कालीन 38 सरकारी मंत्रालयों/विभागों में 37 को छोड़कर, पशुपालन विभाग और उसके अधिकारियों का विशाल झुण्ड बनाया गया।
इस कार्य में लालू प्रसाद यादव के अलावे, कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र, शर्मा, आर.के. राणा, ध्रुव भगत, भोला राम तूफानी, विद्यासागर निषाद, बेक जूलियस, बृजनन्दन शर्मा, जीतेन्द्र कुमार श्रीवास्तव, शशि भूषण वर्मा, शैलेन्द्र कुमार सिन्हा, अशोक कुमार यादव, गुलशन लाल आज़मानी, अधिप चंद्र चौधरी जैसे राजनेताओं, भारतीय और बिहार प्रशासनिक सेवाओं के अधिकारियों, चिकित्सकों सहित करीब 124 अभियुक्त न्यायालय के कठघरे में खड़े हुए। सभी प्रदेश के विकास का नारा दे रहे थे, विकसित ख़ुद हो रहे थे।

कोई 27-वर्ष तक न्यायालय में चलने वाला यह मुकदमा, न केवल तत्कालीन मुख्यमंत्री, जो वित्त मंत्रालय के भी स्वामी थे, लालू प्रसाद यादव को 'सिंहासन खाली करो कि न्यायालय का आदेश आ गया है,' 89 अभियुक्तों को अनेक तरह से न्यायालय से दण्डित किया गया, जबकि 35 आरोपियों को बरी कर दिया गया। कई आरोपी मुकदमे के दौरान मृत्यु को प्राप्त किये। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारतीय मुद्रा की लुढ़कती मोल पर भी, तत्कालीन 950-करोड़ (आज के मोल पर करीब 35-40 हज़ार करोड़) सरकारी कोष को लूटने के लिए 'काल्पनिक पशुओं, काल्पनिक सेवाओं, उपकरणों की काल्पनिक खरीददारी इत्यादि के अलावे, जाली बिल, जाली आदेश, जाली कोष-निर्गत का आदेश का कई टन दस्तावेज तैयार किये गए थे।
लालू यादव पटना विश्वविद्यालय के छात्रनेता से पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन हुए थे, परिणाम यह हुआ कि निर्वाचित नेताओं के साथ-साथ भारत और प्रदेश के प्रशासनिक अधिकारियों, विभागों के छोटे-छोटे पदों पर आसीन (परन्तु महत्वपूर्ण कुर्सियां) कर्मियों का एक विशाल फ़ौज तैयार किया गया, जो प्रदेश को लूट सके, और लुटे भी। इस चारा घोटाला काण्ड में कुल 53 मुकदमें दायर हुए थे।
कहते हैं फरवरी 1985 में, भारत के तत्कालीन नियंत्रक और महालेखा परीक्षक टी.एन. चतुर्वेदी ने बिहार राज्य कोषागार और विभागों द्वारा मासिक खाता प्रस्तुत करने में देरी का नोटिस लिया और तत्कालीन बिहार के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर सिंह को पत्र लिखकर उन्हें चेतावनी दी कि यह अस्थायी गबन का संकेत हो सकता है। उसने कई मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल में बिहार सरकार के प्रधान महालेखाकार (पीएजी) और सीएजी द्वारा गहन जांच और चेतावनियों की एक सतत श्रृंखला शुरू की, लेकिन चेतावनियों को इस तरह से नजरअंदाज किया गया, जो बिहार सरकार में अत्यंत वरिष्ठ राजनीतिक और नौकरशाही अधिकारियों द्वारा एक पैटर्न का संकेत था।
1992 में, राज्य की भ्रष्टाचार विरोधी सतर्कता इकाई के एक पुलिस निरीक्षक बिधु भूषण द्विवेदी ने उसी सतर्कता इकाई के महानिदेशक जी नारायण को चारा घोटाले और मुख्यमंत्री स्तर पर संभावित संलिप्तता को रेखांकित करते हुए एक रिपोर्ट सौंपी कथित प्रतिशोध में द्विवेदी को सतर्कता इकाई से हटाकर प्रशासन की एक अलग शाखा में स्थानांतरित कर दिया गया और फिर उन्हें उनके पद से निलंबित कर दिया गया। उन्हें जांच में भाग न लेने के लिए उनके आवास पर बम फेंकने की भी धमकी दी गई। हालांकि बाद में घोटाले को अन्य अधिकारियों और हितधारक व्यक्तियों द्वारा उठाया गया।

यह भी कहा जाता है कि बिहार पशु चिकित्सा संघ ने पहली बार पशुपालन माफिया का पर्दाफाश 1985 में अपने प्रेस कॉन्फ्रेंस में किया था। 1990 में बिहार पशु चिकित्सा संघ की कार्यकारिणी बदल दी गई और डॉ दिनेश्वर प्रसाद शर्मा को बीवीए का महासचिव बनाया गया। एक बार जब माफिया ने संघ पर नियंत्रण कर लिया, तो उन्होंने पूरी ताकत झोंक दी। उस समय, डॉ धर्मेंद्र सिन्हा और डॉ बीरेश प्रसाद सिन्हा (बीवीए के पूर्व पदाधिकारी) ने माफिया के इस पूरे अनैतिक व्यवहार के खिलाफ जानकारी इकट्ठा करना शुरू किया।
बहरहाल, मुद्दत बाद कल जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति और आपातकाल के दौरान पटना का जिलाधिकारी रहे, और बाद में अविभाजित बिहार के के कई शीर्षस्थ पदों पर कार्य करने वाले विजय शंकर दुबे से बात कर रहा है। बात की शुरुआत पटना के डाकबंगला चौराहे के दाहिने हाथ स्थित भारत कॉफी हाउस की काफी, डोसा, उत्थप्पम और परिवेश से हुई, जो अंत में बिहार पशुपालन विभाग के रास्ते, प्रदेश के वित्त मंत्रालय, बजट विभाग, अकाउंटेंट जनरल का कार्यालय होते, सरकार के ट्रेजरी तर्क पहुंची - जो अंततः स्वतंत्रता मिलने के बाद पहली बार राजनेताओं-नौकरशाहों-सरकारी कर्मचारियों की सांठ-गाँठ से ऐतिहासिक चारा घोटाला काण्ड को जन्म दिया था। उस घोटाले के अभियुक्तों को न्यायालय के रास्ते कारावास में भेजा था।
आज दुबे जी की आयु क़रीब 82 वर्ष की हो गयी है। लेकिन जो उन्हें पटना के जिलाधिकारी के रूप में देखे होंगे, उनकी आवाज को सुने होंगे, आज अगर फिर देखेंगे तो शायद यह निर्णय नहीं ले पाएंगे की इस उम्र में आवाज में आज भी वह दम है, प्रशासन की बातों में वही कड़क है, स्वाभिमान और अनुशाशन उतना ही उत्कर्ष पर है।
चारा घोटाला पर बातों के अंत में जब उन्हें पूछा कि लालू यादव मुख्य मंत्री बनने के बाद जिस कदर तत्कालीन राजनेताओं-अधिकारियों-सरकारी कर्मचारियों के साथ मिलकर सरकारी खजाने को खाली किये था, आज अगर उनका पुत्र प्रदेश का नेतृत्व करने, के मुख्य मंत्री बनने के कतार में खड़ा है, तो आप क्या सोचते हैं? क्योंकि आप तेजस्वी यादव के पिता को छात्र के रूप में भी देखा है, नेता और मुख्यमंत्री के साथ साथ अभियुक्त के रूप में भी।

दुबे जी बिना क्षण गवाए कहते हैं: "मैं राजनितिक दृष्टि से लालू प्रसाद यादव के दोनों बेटों - तेज प्रताप यादव या तेजस्वी यादव को नहीं जानता हूँ। पिता की इच्छा अवश्य है कि वह प्रदेश का मुख्यमंत्री बने। लेकिन जिस माहौल में वह पला, बड़ा हुआ है, उसकी परवरिश हुई है, उस माहौल का असर के मद्दे नजर यह आशा करना कि वह प्रदेश में निष्पक्ष प्रशासन स्थापित कर पाएंगे, बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह है।"
अखबारवाला001.कॉम से बात करते हुए विजय शंकर दुबे कहते हैं कि 'चारा घोटाला काण्ड को हम 1987-1988 से 1995-1996 तक ले सकते हैं। लालू यादव 10 मार्च, 1990 को पहली बार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लिए। यह दसवां विधान कालखंड था। पांच साल 18 दिन प्रथम पाली में मुख्यमंत्री रहने के बाद 4 अप्रैल, 1995 को 11 वीं विधानसभा में फिर दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। लेकिन इसी कालखंड में चारा घोटाला काण्ड का पर्दाफास हो गया और अंततः उन्हें दो वर्ष 112 दिन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद 'सिंहासन खाली' करना पड़ा। तारीख था 25 जुलाई, 1997 और इस बार जब वे मुख्यमंत्री कार्यालय से बाहर निकले, कभी वापस नहीं आ पाए, क्योंकि आज़ादी के बाद हुए किसी भी घोटालों में सबसे बड़े घोटाले के मुख्य अभियुक्त के रूप में में न्यायलय और कारावास पहुँच गए थे।
वैसे यह नहीं कहा जा सकता है कि तत्कालीन सरकार के 38 विभागों को छोड़कर इस घोटाले का मंच लालू यादव बिहार पशुपालन विभाग को ही क्यों चुना? लेकिन आज भी उस कालखंड के लोग इस बात से इंकार नहीं करते कि पशुपालन विभाग की संपत्ति पर ही (वेटेरिनरी कालेज परिसर) उन्होंने छात्र से छात्र नेता बने थे, इस विभाग के लोगों, और बाद में मुख्यमंत्री बनने पर नेताओं और अधिकारियों पर उनकी पकड़ मजबूत बन गयी थी।
दुबे जी कहते हैं: "सरकारी नियमानुसार किसी भी सरकारी विभाग को बजट प्रावधान के अनुसार उसे उस वर्ष में कितनी राशि का आवंटन किया गया है, अलॉटमेंट लेटर निर्गत होता है। उस अलॉटमेंट लेटर के आधार पर ही वह ट्रेजरी में पेशकर ट्रेजरी से पैसा निकाल पता है खर्च के लिए। साल 1987-1988 में पशुपालन विभाग को 65 करोड़ रूपये का बजट प्रावधान था। लेकिन राजनेताओं, अधिकारियों की मिलीभगत से, बजट अधिकारी को मिलाकर पहले जाली अलॉटमेंट लेटर बनाया गया, जिसके आधार पर 89 करोड़ रूपये की निकासी की गयी। यह पहली चोरी थी।"
दुबे जी कहते हैं कि "जब पहली बार आसानी से जाली अलॉटमेंट लेटर भी बन गया, ट्रेजरी से निकासी भी हो गयी और किसी ने ऊँगली तक नहीं उठायी, फिर इस क्रिया-कलाप में जुड़े नेताओं, अधिकारियों को ऐसा प्रतीत हो गया कि यह काम आसान है, पकड़ाने का कोई डर नहीं है। बेईमानों का पेट बढ़ने लगा। चूँकि जो भी लोग इसमें मिले थे, सभी सरकार और प्रशासन का हिस्सा थे, अतः वे उन सभी बातों, यहाँ तक की चिट्ठी किस प्रकार लिखी जाती है, तारीख किधर होता है, विषय कैसे लिखे जाते हैं, किन-किन शब्दों का प्रयोग होता है, सभी जानते थे और उसी क्रम में चिठ्ठियों होती थी।
1987 -1988 में जो निकासी 89 करोड़ थी, १९९५-1996 में वह राशि बढ़कर 272 करोड़ हो गयी। यह कैसे हुआ, इसकी जांच या पूछताछ एकाउंटेंट जेनेरल को करनी चाहिए थी, दुर्भाग्य कहूं या मिली भगत, कभी सवाल नहीं उठाया गया और चोरी की परंपरा लगातार नौ वर्ष तक चली।"

"आम तौर पर ऑडिटर जनरल सरकारी लेखाजोखा रखने वाला विभाग होता है, अतः वह सरकारी कोषागार से निकासी और खर्च के बारे में पूरी जानकारी रखता है, जांच पड़ताल करता है। लेकिन उन वर्षों में कभी भी ऑडिटर जेनेरल के द्वारा ;या उसके रिपोर्ट में इस बात पर चूं तक नहीं किया गया की पशुपालन विभाग की जांच होनी चाहिए। बल्कि हरेक साल भारत भारत के राष्ट्रपति की ओर से नियंत्रक-लेखापरीक्षक के तरफ से चार-पांच रिपोर्ट प्रस्तुत करता गया।
यह रिपोर्ट दो तरह के होते हैं - एक: वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट और दूसरा: वार्षिक विनियोजन रिपोर्ट। चाहिए तो यह था की इस रिपोर्ट में यह बताना कि सरकारी बजट में कितने पैसे का आवंटन हुआ था और कोषागार से कितने पैसों की निकासी - लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ। अलबत्ता, जब वार्षिक बजट से अधिक खर्च दिखाया जाता था तो प्रतिवर्ष सरकार द्वारा 'अनुपूरक बजट' के माध्यम से उस खर्च को नियमित कर लिया जाता था। वजह था ऊपर से नीचे तक सबों की मिलीभगत।"
दुबे जी कहते है की तीन लोगों को विशेष कर मालूम होना चाहिए था कि अवैध निकासी या अधिक खर्च कहां हो रहे हैं। सबसे पहला डीडीओ, जो बिल बना कर भेज रहा था। दूसरा कोषागार, जो उस बिल को पास कर रहा था। और तीसरा महालेखाकार, जो आने वाले बिलों को कंपाइल, जांच और मिलान करता था। उस दौरान महालेखाकार कार्यालय अपनी एनुअल रिपोर्ट डेढ़ दो साल विलंब से भेज रहा था। हमेशा दो-तीन साल विलंब से रिपोर्ट आती थी।
दुबे जी आगे कहते हैं कि "साल 1995-96 में बिहार सरकार की माली हालत इतनी खराब थी कि सरकारी कर्मचारियों को उनकी तनख्वाह भी नहीं मिल रही थी। जो पेंशनधारी थे उनके पेंशन बंद होने के कगार पर थे, विश्वविद्यालय को मिलने वाली राशि की किल्लत हो गयी थी। सरकार के पास पैसे थे ही नहीं जिससे वह खर्चों को संभाल सके। अगर पेंशन या तनखाह का भुगतान नहीं हुआ तो सभी हड़ताल पर चले जायेंगे। सरकार गिर सकती थी। यह जुलाई का महीना था। मेरी नियुक्ति वित्त विभाग के प्रमुख सचिव के तौर पर हुई थी। मैंने जुलाई 1995 में पद संभाला। इन स्थितियों को देखकर सभी माथा पकड़कर बैठ गए थे। चूंकि हमारी स्थिति कर्मचारियों को वेतन देने की भी नहीं थी, मेरे मन में सवाल आया कि आखिर पैसे जा कहां रहे हैं? इतना ही नहीं, भारतीय रिजर्व बैंक का करीब 400 से 500 करोड़ रूपये का ओवरड्राफ्ट भी हो गया था।
मैं तत्काल श्री विजय राघवन और श्री शंकर प्रसाद जो उस समय अतिरिक्त वित्त सचिव थे, को बुलाया और उनसे स्थिति पर चर्चा करते पूछा की आखिर इन हालातों में तनखाह कैसे देते हैं या अन्य खर्च कैसे करते हैं? दोनों अधिकारी कहते हैं कि भारत सरकार जो पैसा देती है उसे पहले मांग लेते हैं, या फिर राज्य सरकार के प्रतिष्ठानों से उधार लेते हैं।
आम तौर पर भारत सरकार आयकर वसूलती है। आयकर के अलावे कुछ अन्य अप्रत्यक्ष कर भी होते हैं जो केंद्र सरकार ही वसूलती है। वैसी स्थिति में बिहार का नागरिक अगर बिहार के लोगों से पैसे वसूलती है तो वह पैसा वापस बिहार सरकार को भी मिलनी चाहिए। इसी क्रम में वितता आयोग ने यह निर्णय लिया था कि प्रत्यक्ष और परोक्ष कर के रूप में जो पैसे केंद्र वसूलती है उसका एक अमुक हिस्सा राज्य सरकार को मिले। यह तो तत्काल समस्या और उसके निवारण की बात थी।
दुबे जी कहते हैं कि "संदेह यहीं से प्रारम्भ हुआ। आखिर जो पैसा इकठ्ठा हो रहा है, जा कहाँ रहा हैं? इसके बाद सितंबर-अक्टूबर में पता चला कि पशुपालन विभाग तय बजट से पांच गुना ज्यादा खर्च कर रहा है। गड़बड़ी की आशंका और मजबूत हो गई। इसके बाद एक बैठक बुलाकर यह निर्णय किया गया कि इस बात की पड़ताल हो की बजट में कितने पैसे का प्रावधान है विभाग को और खर्च कितना किया जा रहा है। यह जांच-पड़ताल बिहार सरकार के सभी 38 विभागों के लिए था।
आश्चर्य की बात तब हुई जब 37 विभागों का क्रियाकलाप बिलकुल दुरुस्त मिला। 24 अक्टूबर, 1995 को पशुपालन विभाग का बारी आया। जब पशुपालन विभाग के सचिव बेक जूलियस से पूछा कि 1987-1988 से 1994-1995 तक पशुपालन विभाग में बजट से अधिक की निकासी कैसे हो रही है? आप इसकी जांच-पड़ताल करें। अगर आप खर्चा नहीं बताएँगे तो पैसा रोक दिया जायेगा , कोषागार को तत्काल कह दिया जायेगा की पशुपालन विशग को एक पैसे की निकासी नहीं करने दें।

दुबे जी आगे कहते हैं: बेक जूलियस कहने लगे कि विभाग बंद हो जायेगा', मैंने कहा: 'बंद हो जाने दो।" मैं उसे 15 दिन का समय दिया और कहा कि आप इसकी जांच करेंगे और बताएं पैसा कहाँ जा जा रहा है और आगामी 6 नवम्बर को आकर पूरी जानकारी दें।
इस पर जूलियस कहने लगे 'हम क्यों इन्क्वायरी करें। पैसा सही मुद्दों पर खर्च हो ही रहा है।' जूलियस के शब्द और उनके शारीरिक भाषा को देखकर संदेह पक्का हो रहा था। फिर मैंने उसे कहा कि 'मुझे बर्गलाओ नहीं। मैं डीएम और कलेक्टर रह चुका हूँ । 6 नवम्बर तो अगर पूरी जानकारी नहीं दी गयी तो विभाग को पैसा बंद। यह सुनकर वह मुंह फुलाकर चला गया। क्योंकि बिहार सरकार के 38 विभागों में सिर्फ पशुपालन विभाग ही ऐसा था जहाँ यह गोरख धंधा हो रहा था।
मेरी बातों को और निर्णय को लेकर वह कैबिनेट कमेटीों ऑन इकोनॉमिक एफेर्स एंड कोआर्डिनेशन को कर दिया। जहाँ तुलसी सिंह और भोला राम तूफानी दोनों बैठे थे। यहाँ कहा गया की दुबे जी बदमाश अधिकारी हैं, उसने तत्काल प्रभाव से हटाया जाय। परिणाम यह हुआ कि मामला तूल पकड़ रहा था। 16-18 दिसंबर को एक बैठक हुई जिसमें चंद्रदेव प्रसाद सिंह, शंकर प्रसाद टेकरीवाल, जगदानंद सिंह तो थे ही, जूलियस भी थे और हमें भी बुलाया गया। सबों ने एक ही स्वर में कहने लगे की आज तक जितने भी अधिकारी आये किसी ने यह सवाल नहीं पूछा कि पैसा कहाँ जा रहा है? किसी ने रोकने की धकमकी नहीं दी। आपको विभाग का प्रमुख बनाया, आप को क्या पड़ी है कि यह सवाल पूछ रहे हैं।
उनकी बातों को सुनकर मैं गुस्से में आ गया और कहा 'मैं तो बनना भी नहीं चाह रहा था। मेरे पदस्थापना तो भारत सरकार में हो गयी थी। जगदानंद सिंह, जिनके साथ जल संसाधन मंत्रालय में काम किया था, रोके और यह भेज दिए। लेकिन एक बात तय है कि अब जब तक जांच-पड़ताल नहीं होगा, पैसा कहाँ जा रहा है, बजट राशि कैसी बढ़ रही है, अतिरिक्त राशि का समायोजन कैसे हो रहा है - कोषागार से पशुपालन विभाग को एक पैसे की निकासी नहीं करने देंगे। यह पक्का है।
अब तक विभाग में हड़कंप मच गया था। जगदानंद सिंह मेरी किसी बात का विरोध नहीं कर रहे थे। आरोप-प्रत्यारोप चल ही रहा था, तभी जगदानंद सिंह उठे और और कहे: जांच-पड़ताल करने दें और 25-26 दिसंबर तक रिपोर्ट प्रस्तुत करें। फिर हुक्का-पानी बंद। उन दिनों मैं बिहार राज्य बिजली बोर्ड का अध्यक्ष भी था। संध्याकाळ से लेकर देर रात तक पशुपालन विभाग के इस गोलमाल को देख रहा था। उस समय तक नवम्बर की रिपोर्ट नहीं आयी थी। विजय राघवन ने बताया की रिपोर्ट जनवरी में आएगी। जबकि नवम्बर अंत तक 102 करोड़ रूपये की अतिरिक्त खर्च हो गए थे, जो 57 करोड़ अधिक था।
तारीख था 19 जनवरी, 1996 देर रात अपने कार्यालय से पहले वायरलेस संवाद सभी जिलाधिकारियों को प्रेषित किया कि तत्काल यह बताया जाए की पशु पालन विभाग अब तक कितने पैसे की निकासी किया है, खर्च किया है? साथ ही, निकासी पर प्रतिबंध लगा दिया जाय। फिर रात 11 बजे से 2 बजे तक सभी 38 जिलाधिकारियों को फैक्स भेजा गया जिसमें लिखा था 'पशुपालन विभाग के पिछले तीन सालों के खर्च का ब्यौरा पेश करें।' यह संवाद चारा घोटाला का बीज था जो अंकुरित होकर 950 करोड़ रूपये तक पहुंचा
दुबे जी कहते हैं कि '20 जनवरी को मैंने अपने एक एडिशनल सेक्रेटरी को रांची भेजा ताकि वह पता लगा सकें कि तीन सालों में ये पैसे कहां खर्च हुए। 21 जनवरी को उन्होंने जानकारी दी कि बजट से ज्यादा खर्च करने के साथ-साथ पैसे निकालने के लिए जो बिल और वाउचर जमा किए गए हैं वे सभी फर्जी हैं। सभी दस्तावेजों की छानबीन के बाद मैंने अगले दिन राज्य सरकार को एक फाइल भेजी जिसमें इस बात का पूरा विवरण था कि रांची में कैसे एक बड़ा घोटाला हुआ है। मैंने संदिग्धों के खिलाफ FIR दर्ज करने का सुझाव दिया था। 27 जनवरी 1996 को मैंने चाईबासा जिले के कलेक्टर को निर्देशित किया कि वह चाईबासा ट्रेजरी में छापा मारें। इस छापा में जो सामने आया उसने पूरे देश में खलबली मचा दी। इस छापे के बाद चारा आपूर्तिकर्ता और कई कर्मचारी भूमिगत हो गए।

फैक्स के साथ ही यह खबर लालू यादव और उनके साम्राज्य को हिला दिया। चतुर्दिक यह चर्चाएं होने लगी कि दुबे ने पकड़ लिया। कोषागार से पैसे की निकासी पर प्रतिबन्ध लगा दिया। अब सभी पकड़े जायेंगे। जेल जायेंगे। पता नहीं कैसे, रातो रात सभी गोलबंद होने लगे। 20 जनवरी को सुबह 8 बजे पब्लिक एकाउंट्स कमेटी के अध्यक्ष रूप भगत फोन किये और कहने लगे कि 'कैसे हिम्मत हुई यह पूछने की, जांच करने की।' मैंने कहा अगर पब्लिक एकाउंट्स कमेटी या एकाउंटेंट जनरल इसकी जांच किये होते तो शायद यह नौबत नहीं आती। जहाँ तक हिम्मत का सवाल है, हमारी हिम्मत क्यों नहीं है?
मैंने पूछा। आप कानून नहीं दिखाएँ। तू तू मैं मैं हुआ। इन सभी बातों से शक का दायरा और बढ़ा - कुछ तो गोलमाल है। उसी दिन एक चिठ्ठी भी आई कि कंटेम्प्ट में हमें जेल भेज देंगे। उस समय लालू मुख्यमंत्री के अलावे वित्त मंत्रालय को भी अपने पास रखे थे।
25 जनवरी 1996 को रांची, डोरंडा, जमशेदपुर, गुमला, दुमका, भागलपुर और चाईबासा के डीसी या जिलाधिकारी को फोन कर बताया कि सभी अपने-अपने कोषागार में जांच करें। इसी संदर्भ में 27 जनवरी 1996 को चाईबासा के तत्कालीन डीसी अमित खरे ने फोन कर कहा कि यहां चारों तरफ गोलमाल दिखता है। फिर तो पुरे प्रदेश में जांच ही जांच, टीम का भागादौड़ी, कागजों की पकड़, लोगों की गिरफ़्तारी, जनहित याचिका का दायर होना, मामला सीबीआई को जाना, लालू की अनंतकाल के लिए मुख़्यमंत्री कार्यालय से बाहर निकलना, नेता, अधिकारी की गिरफ़्तारी, कारावास इत्यादि इतिहास के पन्नों में दर्ज होते चले गए।
क्रमशः
