गाजियाबाद : कल की ही तो बात है। राजस्थान और झारखंड राज्य के उच्च न्यायालयों की पूर्व मुख्य न्यायाधीश और भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक दक्ष न्यायाधीश के रूप में अपना हस्ताक्षर करने वाली पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्रीमती ज्ञान सुधा मिश्र इंदिरापुरम स्थित संत थॉमस स्कूल के 25 वें स्थापना वर्षगाँठ पर "मूल्य शिक्षा' की अहमियत को बता रही थी। वहां उपस्थित हज़ारों लोग, महिला-पुरुष, अभिभावक उनकी बातों को अन्तःमन से सुन रहे थे। सम्पूर्ण वातावरण में गहरी ख़ामोशी थी।
पूर्व न्यायमूर्ति श्रीमती मिश्र उस समय विद्यालय में दाखिला ली थी जब शिक्षा के क्षेत्र में, खासकर विधि शिक्षा के मामले में, वह भी बिहार में, महिलाओं का दाखिला नहीं के बराबर था। परन्तु पटना के माउंट कार्मेल स्कूल की छात्रा अपने शिक्षक-शिक्षिकाओं द्वारा प्रदत्त 'मूल्य शिक्षा' का अनुसरण कर देश के न्यायिक व्यवस्था में अपना हस्ताक्षर करने में कामयाब रही।
गहरी ख़ामोशी के बीच पूर्व न्यायाधीश कहती हैं: 'प्रत्येक जीव जानता है कि जीवन अनमोल है। अगर जीवन अनमोल है तो इस अनमोल जीवन को नियंत्रित करने वाले मूल्य कितने अनमोल होंगे, इसी बात को आज हमें आज की पीढ़ी के बच्चों को, छात्र-छात्रों को बताना है; ताकि वे कल न केवन अपना एक नियंत्रित और अनुशासित जीवन का निर्माण कर सकें, बल्कि अनुशासित समाज और राष्ट्र का भी निर्माण करने में मदद कर सकें।'
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्रीमती ज्ञान सुधा मिश्र गाजियाबाद के इंदिरापुरम क्षेत्र में स्थापित संत थॉमस स्कूल के 25वां स्थापना दिवस पर जब देश के शैक्षणिक संस्थाओं को आह्वान करते हुए यह कहीं कि 'आज पूरे देश के शैक्षणिक संस्थाओं को मूल्य शिक्षा पर अधिक जोर देना चाहिए, ताकि समाज में एक ऐसी 'अदृश्य संहिता' का निर्माण हो सके जिससे एक सभ्य समाज के साथ-साथ, एक न्यायपूर्ण समाज का भी निर्माण हो सके।
कार्यक्रम में उपस्थित हज़ारों लोगों को सम्वोधित करती पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्रीमती मिश्र कहती है कि 'शिक्षा एक मनुष्य को गढ़ता है और मूल्य उसके पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक संबंधों और व्यवहारों को आकृति देता हैं। हमारी शिक्षा और हमारा मूल्य समाज के प्रति, राष्ट्र के प्रति जितना अधिक सकारात्मक होगा; हमारा व्यवहार और कार्य भी उतना ही अधिक मजबूत और सकारात्मक होगा।
उन्होंने कहा कि आज के इस बदलते परिवेश में हम सभी मूल्य शिक्षा को अधिकाधिक महत्व देते हैं। शिक्षा पद्धति में बदलाव होने पर भी शैक्षिक विशेषज्ञ मूल्य शिक्षा को अहमियत देते हैं। और जब हम उसे महत्व देंगे, हमारा ही नहीं, समाज का भी, आचरण, चरित्र और आत्मसम्मान अधिकाधिक मजबूत होगा, जिसकी आज बेहद जरूरत है।
संत थॉमस स्कूल के 25वें साल के मौके पर एक कार्यक्रम में बोलते हुए, सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्रीमती मिश्र ने दोहराया कि 'देश की शिक्षा पद्धति में इसे मूल्य-सहित बनाने की बहुत बड़ी क्षमता है', और कहा कि 'हम देश के दूरदराज के गांवों से लेकर राष्ट्रीय राजधानी के रायसीना हिल तक की लड़कियों को पढ़ाए बिना हम अपने उद्देश्य को नहीं प्राप्त कर सकते हैं।
न्यायमूर्ति मिश्र ने सेंट थॉमस स्कूल की कार्यप्रणाली की विशेष सराहना करते हुए कहा कि विद्यालय का प्रदर्शन विश्व स्तर के स्कूलों की तुलना में भी उत्कृष्ट है। यहां शिक्षा उच्च गुणवत्ता, अनुशासन, मानवीय मूल्यों और व्यवहारिकता के संतुलित आधार पर दी जाती है। उन्होंने कहा कि जहाँ कई विद्यालय शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में संघर्ष कर रहे हैं, वहीं सेंट थॉमस स्कूल सभी आवश्यक मापदंडों को अपनाते हुए उत्कृष्ट और प्रेरणादायक कार्य कर रहा है।”
उन्होंने दुख जताया कि देश में 12.97 मिलियन से ज़्यादा बच्चे, खासकर महिलाएं, स्कूल नहीं जाते हैं। जबकि भारत में महिला शिक्षा का इतिहास प्राचीन वैदिक काल से जुड़ा हुआ है। उल्लेखनीय है कि लगभग 3000 से अधिक वर्ष पूर्व वैदिक काल के दौरान महिलाओं को समाज में एक प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त था और उन्हें पुरुषों के समान समाज का एक महत्त्वपूर्ण अंग समझा जाता था। शास्त्रों में भी, लड़कों के साथ लड़कियों को उचित देखभाल के साथ पोषित और प्रशिक्षित करने की बात कही गयी है। इसलिए आज जरुरत इस बात की है कि स्कूल ड्रॉप-आउट की संख्या को न्यूनतम करना होगा, चाहे महिला की हो या पुरुषों की।
पूर्व न्यायमूर्ति सेंट थॉमस स्कूल, इंदिरापुरम के वेलेडिक्टरी कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थीं। गाजियाबाद डेवलपमेंट अथॉरिटी के सीनियर ऑफिसर श्री अभिनव गोपाल और ऑर्थोडॉक्स चर्च के दिल्ली डायोसीज़ के मेट्रोपॉलिटन, हिज़ ग्रेस डॉ. योहानन मार डेमेट्रियोस भी इस मौके पर मौजूद थे।
ज्ञातव्य हो कि इंदिरापुरम और दिल्ली-NCR इलाके में सीखने और पूरे विकास की एक मिसाल, सेंट थॉमस स्कूल 2000 में दिल्ली डायोसीज़ की सेंट थॉमस ऑर्थोडॉक्स चर्च सोसाइटी के तहत शुरू हुआ था, और यह साहिबाबाद के सेंट थॉमस स्कूल की दूसरी ब्रांच के तौर पर शुरू हुआ, जो नर्सरी से क्लास V तक की क्लास देता था, और फिर एक पूरी तरह से सीनियर सेकेंडरी इंस्टीट्यूशन बन गया। इस स्कूल की नींव 1999 में रखी गई थी जब चर्च सोसाइटी ने इंदिरापुरम में 2.75 एकड़ जमीन खरीदी थी।
इस अवसर पर अनेकानेक रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुए। कल्चरल फिएस्टा कॉन्सर्टिना द सिल्वर स्क्रॉल में लगभग 600 छात्र-छात्रों ने हिस्सा लिया।
स्कूल का उद्घाटन उस समय के लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने किया था। स्कूल ने 2000 में कम छात्र-छात्राओं के साथ काम करना शुरू किया था, और 2005 में 72 क्लासरूम वाली चार मंज़िला बिल्डिंग बनने के साथ इसका विकास तीव्र गति से हुआ। 2006 में CBSE से मान्यता और सीनियर सेकेंडरी का दर्जा मिलने के बाद, स्कूल जल्द ही इस इलाके में एक जाना-माना शैक्षिक संस्थान बन गया। अब यह लगभग 3,000 छात्र-छात्राओं को पढ़ाता है और इसे 280 शैक्षिक और गैर-शैक्षिक कर्मचारी मदद करते हैं।
न्यायमूर्ति मिश्र ने 1972 में बिहार स्टेट बार काउंसिल में एडवोकेट के तौर पर एनरोल किया, उस समय भारत में महिलाओं के लिए लीगल प्रोफेशन काफी आम नहीं था। मार्च 1994 में, उन्हें पटना हाई कोर्ट का जज अपॉइंट किया गया। बाद में उन्हें राजस्थान हाई कोर्ट और फिर झारखंड हाई कोर्ट में चीफ जस्टिस के तौर पर ट्रांसफर कर दिया गया। बाद में, 30 अप्रैल 2010 को उन्हें सुप्रीम कोर्ट में प्रमोट किया गया। दिल्ली उपहार आग त्रासदी सहित सुप्रीम कोर्ट में कई अहम और खास फैसले दिए, जिसमें बच्चों और महिलाओं समेत 59 लोग जलकर मर गए थे और 110 से ज़्यादा गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उन्होंने मैनेजमेंट को भारी नुकसान के लिए ज़िम्मेदार ठहराया और उन्हें ट्रॉमा सेंटर बनाने जैसे सामाजिक कामों के लिए भारी मुआवजा देने का निर्देश दिया।
न्यायमूर्ति मिश्र को उनके शानदार फैसले के लिए भी जाना जाता था - सेंट मैरी स्कूल, नई दिल्ली बनाम इलेक्शन कमीशन ऑफ़ इंडिया के मामले में - जिसमें जस्टिस मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने फैसला सुनाया कि चुनाव के दौरान किसी भी वर्किंग डे पर स्कूल की बिल्डिंग और स्कूल बसों का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा क्योंकि इससे रूटीन पढ़ाई में रुकावट आती है और स्कूल के एडमिनिस्ट्रेटिव काम में भी रुकावट आती है।
स्कूल के मिशन के बारे में बताते हुए, स्कूल मैनेजर रेव. फादर बिनीश बाबू ने कहा कि यह इंस्टीट्यूशन वैल्यू-बेस्ड एजुकेशन देने और ज़िम्मेदार, दयालु नागरिक बनाने के लिए कमिटेड है। यह ध्यान देने वाली बात है कि कई पुराने स्टूडेंट्स ने सिविल सर्विसेज़, इंजीनियरिंग, मेडिसिन, डिफ़ेंस सर्विसेज़, एंटरप्रेन्योरशिप, जर्नलिज़्म और फ़िल्म और टेलीविज़न इंडस्ट्री जैसे अलग-अलग फ़ील्ड्स में बहुत अच्छा काम किया है।
फादर बिनीश बाबू ने कहा कि स्कूल में हाल ही में बड़े इंफ़्रास्ट्रक्चरल सुधार हुए हैं, जिसमें रोबोटिक्स और AI लर्निंग सिस्टम, स्मार्ट क्लासरूम, अपग्रेडेड प्लेग्राउंड और एक मॉडर्नाइज़्ड लाइब्रेरी शामिल हैं। एक बायोमेट्रिक अटेंडेंस सिस्टम भी लगाया गया है। इन सुधारों का मकसद एकेडमिक स्टैंडर्ड को मज़बूत करना और हर स्टूडेंट का होलिस्टिक डेवलपमेंट पक्का करना है।
उन्होंने कहा कि हालांकि शहरी इलाकों और ग्रामीण इलाकों में दी जाने वाली एजुकेशन का टाइप बहुत अलग है, लेकिन पूरे भारत में एजुकेशन के ओवरऑल डेवलपमेंट के लिए ग्रामीण और शहरी इलाकों में एजुकेशन का एक स्टैंडर्डाइज़्ड रूप शुरू करने का यह सही समय है। और, सेंट थॉमस स्कूल, इंदिरापुरम, टीचर्स और एडमिनिस्ट्रेशन की मदद से, इस दिशा में अपना बेस्ट काम कर रहा है।
उनके अनुसार, भारत पूरी दुनिया के एजुकेशन सिस्टम में एक अहम जगह रखता है। भारत में लगभग 1.5 मिलियन स्कूल हैं जिनमें 260 मिलियन स्टूडेंट पढ़ते हैं। इसके अलावा, देश में 751 यूनिवर्सिटी के तहत लगभग 35,539 कॉलेज हैं। इसलिए यह आसानी से कहा जा सकता है कि एजुकेशन का सबसे बड़ा और सबसे एडवांस्ड फ्रेमवर्क भारत में मौजूद है। हालांकि, भारतीय एजुकेशन फ्रेमवर्क में सुधार की बहुत गुंजाइश है। यह कहा जा सकता है कि आने वाले सालों में भारतीय एजुकेशन सिस्टम में काफी सुधार हो सकता है।
स्कूल के चेयरमैन फादर बीजू डैनियल ने कहा कि भारत दुनिया के सबसे बुरे एजुकेशनल संकटों में से एक का सामना कर रहा है, 12.97 मिलियन से ज्यादा बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं। अशिक्षा का स्तर 30% तक है और इन बहुत कम नंबरों को सुधारने का आधार कम लगता है, सेंट थॉमस स्कूल इंदिरापुरम ड्रॉप-आउट रेट को कंट्रोल करने और स्टूडेंट के इनोवेटिव दिमाग के साथ-साथ देश के युवाओं के दिमाग को बेहतर बनाने के लिए अपनी पूरी कोशिश कर रहा है।
UNESCO के आंकड़ों का हवाला देते हुए, 2021 से स्कूल न जाने वाले बच्चों और युवाओं की संख्या 6 मिलियन बढ़ी है और अब यह कुल 250 मिलियन हो गई है, और स्कूल में पढ़ने वाले बहुत से बच्चे पढ़ाई के खराब हालात की वजह से ठीक से सीख नहीं पा रहे हैं।
फादर डैनियल ने कहा कि स्कूल अपने मूल्यों के हिसाब से कई कम्युनिटी आउटरीच प्रोग्राम चलाता है। इनमें होप स्कूल शामिल है, जो ज़रूरतमंद बच्चों को पढ़ाई में मदद देता है; शेयर इफ यू केयर, जो स्टूडेंट्स को अपनी पॉकेट मनी का कुछ हिस्सा ज़रूरतमंद बच्चों की मदद के लिए देने के लिए बढ़ावा देता है; फीड द हंग्री, जो स्कूल गेट पर आने वाले लोगों को खाना देता है; और गुड सैमेरिटन वीक, एक सालाना कैंपेन है जो अनाथालयों, सर्विस सेंटरों और ज़रूरतमंद परिवारों के लिए ज़रूरी चीज़ें इकट्ठा करके बांटता है।
इस अवसर पर केंद्रीय माध्यमिक बोर्ड परीक्षा में अब्बल आये छात्र-छात्राओं को, राष्ट्रीय कैडेट कॉर्प्स के कैडेट्स को, राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले छात्र-छात्राओं को विद्यालय के तरफ से सम्मानित भी किया गया। इस अवसर पर संत थॉमस सोसाइटी के कई पूर्व चेयरमैन रेव. फादर पी के थॉमस, रेव. फादर शाजी मैथ्यूज, रेव. फादर साजी अब्राहम, रेव. फादर फिलिप एम सैम्युअल के अलावे पूर्व प्राचार्य श्रीमती मनीषा जोशी और विद्यालय के सैकड़ों शिक्षक और शिक्षकेत्तर कर्मचारी उपस्थित थे।
विद्यालय के प्रबंधक रेव. फादर बिनीश बाबू के अनुसार हाल ही में कई उन्नत सुविधाएँ जोड़ी गईं जिसमें रोबोटिक्स एवं AI आधारित लर्निंग, स्मार्ट क्लासरूम, आधुनिक खेल परिसर, अत्याधुनिक लाइब्रेरी, बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली आदि शामिल हैं जिसका उद्देश्य प्रत्येक छात्र के समग्र विकास एवं शैक्षणिक उत्कृष्टता को सुदृढ़ करना है। इसके अलावे समाज के पिछड़े और जरूरतमं बच्चों की शिक्षा के लिए सेंट थॉमस स्कूल 'Hope School', छात्रों द्वारा सहायत और दान के लिए 'Share If You Care', जरूरतमंदों के लिए भोजन वितरण 'Feed the Hungry', अनाथालयों और सेवा केंद्रों के लिए 'Good Samaritan Week' के तहत सामग्री संग्रह भी करता है जो विद्यालय की मूल्य-आधारित शिक्षा और सामाजिक उत्तरदायित्व का उत्तम उदाहरण हैं।
ज्ञातव्य हो कि विगत दिनों संत थॉमस स्कूल परिसर के पीछे झुग्गी में रहने वाले एक परिवार की बच्ची के जीवन निर्माण में विद्यालय की भूमिका महत्वपूर्ण रही। 'शालिया' संत थॉमस स्कूल की Hope School की छात्रा थी। झोपड़ी में रहने वाली शालिया की माँ स्थानीय सोसाइटी में चौका-बर्तन-झाड़ू-पोछा का कार्य करती थी (अब दिवंगत) और उसके पिता रिक्शा चलाते है। Hope School में शिक्षा प्राप्त कर केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में 90+ फीसदी अंक प्राप्त की और फिर दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। आज वह ''लेडी इन यूनिफॉर्म' में है।