चार दशक पहले लखनऊ की एक तवायफ कही थी: "हम कैसे समाज की रचना कर रहे हैं, कैसी शिक्षा, कैसा तालीम दे रहे हैं जो 'तवायफ' और 'रंडी' में फर्क नहीं समझता"