रांची / धनबाद / हज़ारीबाग /पटना /नई दिल्ली : अगर शोध किया जाय तो दिल्ली के लोकसभा, राज्यसभा, केंद्रीय कमिटियां, प्रदेश के विधानसभा, विधान परिषद् या अन्य निर्वाचित और सरकारी कार्यालयों में नियुक्त आला अधिकारी शायद गया, सासाराम, समस्तीपुर, दरभंगा, खगड़िया, बेगूसराय आदि जिलों में भ्रमण-सम्मेलन करने जाते हैं, जितना कल के दक्षिण बिहार और आज का झारखण्ड इलाके में भ्रमण-सम्मेलन करते हैं चाहे कोयला का 'काला' इलाका हो या 'जस्ता' का चमचमाता-चकचकाता क्षेत्र। क्योंकि उन इलाकों में 'सुखाड़' है और इस इलाके में 'माल-ही-माल है। इधर नोचते हैं, खसोटते हैं और फिर ज्ञान भी देते हैं यहाँ के आदिवासियों को, यहाँ के निवासियों को - गजब की राजनीति है। यहाँ भ्रमण-सम्मेलन करने वाला अनपढ़, अज्ञानी भी स्वयं को ज्ञानी-महात्मा समझता हैजिला स्तर का एक पत्रकार श्याम किशोर चौबे जिस तरह से संथाल परगना - छोटानागपुर पठारी क्षेत्र के आदिवासियों, संथालों, अनुसूचित जातियों / जनजातियों के बारे में, देश के स्वाधीनता आंदोलन में इस क्षेत्र के लोगों के योगदान के बारे में, यहाँ के क्रांतिकारियों को मातृभूमि के लिए अपने-अपने प्राणों का उत्सर्ग करने की बातों को शब्दबद्ध किये हैं, शायद आने वाले दिनों में यह भी एक शोध का विषय होगा।
वजह यह है कि किसी बड़े-बड़े आर्थिक रूप से मजबूत प्रदेश की राजधानी में वातानुकूलित कक्ष में बैठकर, शराब, मुर्गी, मुसल्लम, मटन, बिरयानी को तोड़ते-मरोड़ते-पीते-खाते लिखने वालों की किल्लत उन शहरों में नहीं होता है। आज भी नहीं है। तभी तो इन शहरों में अधिकांश पत्रकार अख़बारों के कतरनों को पढ़कर, इंटरनेट पर पालथी मारकर बड़े-बड़े आलोचक और समीक्षक बन जाते हैं। टीवी वाले पैसे देकर बुलाते हैं स्क्रीन पर चिचियाने के लिए। हकीकत यह है कि उन महानुभावों और मोहतरमाओं को जमीनी सतह से दूर-दूर तक, कोसों, मीलों कोई सम्बन्ध नहीं होता है।
यह बात यहाँ इसलिए उद्धृत कर रहा हूँ कि कई वर्ष पहले पंजाब के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, जिन्हे भारत के लोग सर-माथे पर बैठाये थे उनके जीवन काल में, अपने जीवन के अंतिम सांस तक कभी अविभाजित बिहार (या विभाजन के बाद भी बिहार या झारखंड) की भूमि पर पैर नहीं रखे थे। लेकिन एक बार राजधानी एक्सप्रेस से कलकत्ता (अब कोलकाता) से नई दिल्ली यात्रा कर रहे थे। रास्ते में उन्हें पटना जंक्शन रेलवे स्टेशन मिला था। यहाँ गाड़ी भी रुकी थी। खिड़की से उन्होंने जो स्टेशन का हाल देखा, उसके आधार पर उन्होंने यह सार्वजनिक कर दिया की बिहार में कानून व्यवस्था नहीं है, अब क्या कहेगे आप।
भारत में पत्रकारों की भी स्थिति इससे बेहतर नहीं है। वजह यह है कि बड़े-बड़े शहरों में पदस्थापित, ऊँची-ऊँची कुर्सियों पर बैठे, मोटी -मोटी रकम वाली तनखाह उठाने वाले पत्रकार बंधू, पत्र-पत्रिका और टीवी के मालिक महोदय ऐसे छोटे-छोटे पत्रकारों से सीधे मुंह बात भी नहीं करते। मैं भी उन्ही छोटे-छोटे मुफस्सिल वाले पत्रकारों की श्रेणी में हूँ, इसलिए बेहतर जानता हूँ। जब पटना, दिल्ली के अख़बारों में काम करने वाले पत्रकार गण जो धनबाद में पदस्थापित थे उन दिनों, मुझे भी 'ट्रेटर' शब्द से अलंकृत किये। जानते हैं क्यों ? मैं उनका राग नहीं आलापा।
तीन दशक पहले धनबाद के पत्रकारों के साथ वहां के प्रशासन के साथ ठन गयी। देश का पूरा प्रेस एक तरफ, लेकिन उन दिनों आपका यह अखबारवाला जो कहानी लिखा, दी टेलीग्राफ में प्रकाशित हुआ, वही सच था जो स्थानीय पत्रकारों को कठघरे में खड़ा किया था। भाजपा के वरिष्ठ नेता और अधिवक्ता ताराकांत झा कमिटी बनी लेकिन निर्णय वही हुआ जो दी टेलीग्राफ अख़बार में प्रकाशित हुआ था। खैर। कल भी इस क्षेत्र के लोग, बाहर के लोग, अंदर के लोग यहाँ की मिट्टी को, यहाँ की संस्कृति को निस्तोनाबूत किये अपने -अपने हितों के लिए, आज भी कर रहे हैं और आगे भी करेंगे। लेकिन अखबारवाला की नजर में श्याम किशोर चौबे कल भी सम्मानित थे, आज भी हैं और आगे भी रहेंगे - क्योंकि नून-रोटी खाने वाला हैं।
इस इलाके में कुकुरमुत्तों की तरह नेता जन्म लेते हैं। तथाकथित रूप से समाज सेवक पनपते हैं। जन्म लेना, पनपना भी स्वाभाविक है क्योंकि खनिज सम्पदा से भरपूर इस इलाके को धनाढ्य होने के बाद भी शिक्षा के क्षेत्र में जितना विकसित होना चाहिए था, नहीं हुआ। इस क्षेत्र में यहाँ के बड़े-बड़े उद्योगों द्वारा समर्थित बेहतरीन शैक्षिक संस्थानें हैं, लेकिन यहाँ पढ़ने वाले, यहाँ से उत्तीर्ण होने वाले यहाँ नहीं, कहीं और चले जाते हैं। उनका जाना भी स्वाभाविक है - अपने जीवन निर्माण के लिए। यहाँ रह जाते हैं तो 'अशिक्षित' नेता और 'अशिक्षित' मतदाता। विश्वास नहीं तो हो एक नजर घुमा कर देख लीजिए।
चौबे साहेब कहते हैं: इस राज्य की विरासत काफी प्राचीन है। प्राचीन काल में यह क्षेत्र घनघोर वनों से भरा हुआ था और कई भागों में विभक्त था। ऋग्वैदिक काल में यह क्षेत्र मगध में समाहित था। ऋग्वेद में इस इलाके को कीकट क्षेत्र की संज्ञा प्राप्त हुई। उत्तर वैदिक काल में ‘व्रात्य प्रदेश’ के रूप में मगध की चर्चा मिलती है। ‘ब्राह्मण ग्रंथ’ काल में बंग, पुण्ड्र और पुलिंद जैसे नामों से संबोधित किया गया। कीथ एवं मैकडोनाल्ड के अनुसार, आधुनिक बिहार एवं बंगाल ही पुण्ड्र प्रदेश था। ‘महाभारत’ के दिग्विजय पर्व में ‘पुंडरिक प्रदेश’ की चर्चा मिलती है।
कहते हैं छोटानागपुर के नागवंशी राजा अपने पूर्वजों की कथा ‘पुंडरिक नाग’ से प्रारंभ करते हैं, जो जनमेजय के नाग यज्ञ से भाग निकला था। संभवतः इसी पुंडरिक के नाम पर आधुनिक झारखंड उस जमाने के वृहद् पौण्ड्र या पौण्ड्रिक प्रदेश के अंतर्गत संयुक्त रहा हो। महाभारत में इस क्षेत्र को ‘अर्क/कर्क खंड’ के नाम से संकेतित किया गया है। कर्ण द्वारा जीते गए क्षेत्रों में बंग, मगध एवं मिथिला के साथ अर्क/कर्क खंड का उल्लेख है। बहुत संभव है कि छोटानागपुर से गुजरने वाली कर्क रेखा के नाम पर इस क्षेत्र को अर्क/कर्क खंड कहा जाता हो।
बुद्ध पूर्व काल में मगध के जंगल आच्छादित और दक्षिणी प्रदेश स्वतंत्र थे, जो ‘सीमांतक देश’ कहलाते थे। इसी काल में सुह्य प्रदेश के अंतर्गत बाँकुड़ा, मेदिनीपुर और मानभूम के कुछ हिस्से तथा हजारीबाग के पूर्वी भाग आते थे। आज का संथाल परगना तत्कालीन अंग प्रदेश का भाग था।"
मौर्य काल में यह क्षेत्र मगध का भाग था। अशोक के अभिलेखों में सीमांतक जनजातियों का उल्लेख है। क्लासिकल रोमन यूनानी लेखक प्लिनी (Pliny the Elder) ने लिखा है कि पाटलिब्रोथिस (पाटलिपुत्र) से सुदूर दक्षिण में मोनेडस और सुआरी कहे जाने वाले लोग रहते थे। ‘मोनेडस’ एवं ‘सुआरी’ आधुनिक मुंडा एवं शबर के यूनानी उच्चारण थे। मिस्र के प्रख्यात ज्योतिर्विद टॉलेमी ने मोनेडस एवं सुआरी के बदले ‘मुंडाला’ एवं ‘सुभराई’ शब्द का प्रयोग किया था। चीनी यात्री फाहियान (399-414 ई.) ने इस इलाके का उल्लेख ‘कुक्कुट-लाड’ नाम से किया था।
मध्यकाल में मुसलिम इतिहासकारों ने छोटानागपुर का उल्लेख ‘झारखंड’ के रूप में किया। संभवतः जंगल एवं झाड़ की अधिकता के कारण यह नाम उनके द्वारा दिया गया। बंगाल चिकित्सा सेवा में 1794 से 1815 तक कार्यरत रहे अंग्रेज डॉक्टर फ्रांसिस बुकानन ने लिखा—‘काशी से लेकर वीरभूम तक का सारा पहाड़ी प्रदेश झारखंड था। दक्षिण में वैतरणी इसकी सीमा थी’। ‘अकबरनामा’ के विवरण के अनुसार छोटानागपुर खास एवं उड़ीसा के ट्रिब्यूटरी स्टेट झारखंड कहलाते थे। अबुल फजल लिखित ‘आईन-ए-अकबरी’ में दरशाए गए मुगल साम्राज्य के मानचित्र में झारखंड का विस्तार वर्तमान मध्य प्रदेश और बिहार के क्षेत्रों में फैला था।
राजनीतिक रूप से छोटानागपुर का जिक्र 13वीं सदी से मिलता हउत्तरी उड़ीसा के गंग वंश के राजा नरसिंह देव-2 ने खुद को ‘झारखंड का राजा’ घोषित किया था। नरसिंह देव-2 के ताम्रपत्र में झारखंड का उल्लेख है। मुगलकाल में छोटानागपुर को ‘खुखरा’ या ‘कोकरह’ कहा गया।ब्रिटिश काल मेंकोकरह ही धीरे-धीरे चुटिया नागपुर, चुटा नागपुर और अंततः छोटानागपुर के नाम से विख्यात हुआ। 1802 तक केवल राँची जिले वाले क्षेत्र को छोटानागपुर या नागपुर कहा जाता था। 1812 के बाद यह नाम संपूर्ण छोटानागपुर क्षेत्र को दिया गया। डाल्टन, बॉल और बेल, एस. सी. राय, ब्रेडले-बर्ट, राँची जिले का सर्वेक्षण प्रतिवेदन, इम्पीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया और राँची जिला गजेटियर (1917) जैसे लेखक और दस्तावेज बताते हैं कि पहले असुर और तब मुंडा छोटानागपुर में स्थापित थे।
1820 में वाल्टर हेमिल्टन द्वारा लिखित एवं लंदन से प्रकाशित ‘ज्योग्राफिकल स्टैटिस्टिकल एंड हिस्टोरिकल डिस्क्रिप्शन ऑफ हिंदुस्तान’ में छोटानागपुर क्षेत्र को ‘चुटा’ (छोटा) नाम से अभिहित किया गया है। लगता है कि मराठों के भोंसले परिवार द्वारा अधिकृत नागपुर से छोटानागपुर क्षेत्र को अलग दिखाने के लिए चुटा (छोटा) शब्द हैमिल्टन ने चुना। हेमिल्टन ने छोटानागपुर के बारे में लिखा—‘...और भी आगे दक्षिण में तीसरा और ऊँचा क्षेत्र है, जो 18,000 वर्गमील में फैला है, काफी मूल्यवान् है।
यह ऊँचा क्षेत्र आजकल का पलामो, रामगढ़ और चुटानागपुर में सम्मिलित है, जिसके पश्चिम में इलाहाबाद का सूबा, गोंडवाना एवं दक्षिण में उड़ीसा और पूरब में बंगाल है।’ यह जानकारी 1815 में पहली बार प्रकाशित ‘ईस्ट इंडिया गजेटियर’ में भी मिलती है। ब्रिटिश शासन के आरंभिक काल में सरकारी प्रतिवेदनों एवं दूसरे प्रकाशनों में वर्तमान छोटानागपुर को सामान्यतः नागपुर कहा गया है। ईस्ट इंडिया कंपनी ने जब 12 अगस्त, 1771 को तत्कालीन शासक द्रीपनाथ शाहदेव के साथ भू-लगान संबंधी समझौता किया, तब इस क्षेत्र को कुकराह कहा।
12 अगस्त, 1774 को छोटानागपुर में प्रवेश करने वाले प्रथम ब्रिटिश ऑफिसर कैप्टन कैमक ने फोर्ट विलियम के गवर्नर को 18 सितंबर, 1799 को लिखे एक पत्र में इस क्षेत्र को नागपोर संबोधित किया। 1912 से पूर्व झारखंड, बंगाल का एक भाग था। 1 अप्रैल, 1912 को जब बिहार, बंगाल से अलग हुआ, तो झारखंड बिहार का हिस्सा बन गया। अप्रैल 1936
में जब बिहार को विभाजित कर उड़ीसा का गठन किया गया, तो झारखंड क्षेत्र के गांगपुर, बोनाई आदि जिले उड़ीसा को दे दिए गए। जशपुर, उदयपुर और सरगुजा क्षेत्र मध्य प्रांत को भेंट कर दिए गए, जो बाद में मध्य प्रदेश का भाग बने और जब मध्य प्रदेश को विभाजित कर छत्तीसगढ़ का गठन 1 नवंबर, 2000 को किया गया तो ये इलाके इस नवोदित राज्य का भाग बन गए
आजादी के बाद भारत गणराज्य का जब पुनर्गठन किया गया तो सरायकेला और खरसावाँ रियासतें 1948 में बिहार में सम्मिलित कर दी गईं। झारखंड गठन के बाद यह क्षेत्र इसका भाग बन गया। 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग की अनुशंसा पर झारखंड के मानभूम का एक बड़ा हिस्सा बंगाल को दे दिया गया और इसका एक छोटा भाग धनबाद के नाम से रह
गया। इस प्रकार इतिहास के विभिन्न कालखंडों में झारखंड क्षेत्र कई राज्यों का अंग रहा और समय-समय पर इसका अंग-भंग होता रहा।
परिणामस्वरूप प्रादेशिक और राजनीतिक इकाई के रूप में झारखंड जहाँ एक ओर अलग-अलग सत्ता के अधीन रहा, वहीं दूसरी ओर इसके अंग-भंग से इसकी सांस्कृतिक और प्रजातीय विविधता के तत्त्व दूसरे राज्य का भाग बनते चले गए, जिन्हें ‘झारखंड आंदोलन’ के दौरान झारखंड में शामिल करने की माँग उठती रही। जनजातीय समाज, संस्कृतिऔर शासन-व्यवस्था यह आदिवासी राज्य नहीं है, लेकिन आदिवासी बहुल क्षेत्र तो है ही। असुर, पहाड़िया आदि के बाद इस क्षेत्र में मुंडा, उराँव, हो, संथाल इत्यादि जनजातियों का
आगमन हुआ।
प्रसिद्ध इतिहासकार शरतचंद्र राय के अनुसार मुंडाओं का झारखंड में प्रवेश ई.पूर्व 600 में हुआ था। इस इलाके में 1,206 से उराँव और 1,790 से संथालों का आगमन प्रारंभ हुआ। आज की तारीख में यहाँ 32 जनजातियाँ रहती हैं, जिनमें आठ आदिम जनजातियाँ हैं। ये आदिम जनजातियाँ हैं—असुर, बिरहोर, बिरिजिया, माल पहाड़िया, परहिया, सौर पहाड़िया और सबर। आदिम जनजातियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति अधिक खराब है। उनकी आबादी वैसे ही अत्यल्प है। 2011 की जनगणना में राज्य में जनजातीय आबादी 86,85,042 पाई गई थी, इसमें भी आदिम जनजातियों की संख्या मात्र 3.38 प्रतिशत ही है। आबादी के हिसाब से बड़ा प्रतिशत रखने वाले संथाल, उराँव और मुंडा राजनीतिक, आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत सक्षम हैं।
जनजातियों की बसाहट क्षेत्रवार है। गुमला, लोहरदगा, लातेहार जैसे इलाकों में उराँव की बसाहट है, तो खूँटी, सरायकेला, खरसावाँ आदि में मुंडा, पश्चिम सिंहभूम में हो और संथाल परगना, रामगढ़ और पूर्वी सिंहभूम में संथालों की। जातीय स्वाभिमान कह लीजिए या जातीय कट्टरता ऐसी कि जिस इलाके में जिस जनजातीय आबादी की बहुलता है, उस इलाके में उसी जाति का जनप्रतिनिधि चुनाव जीत सकता है। आदिवासी गाँवों की संरचना में खेती-बाड़ी और अन्य कार्यों में सहायक जातियों की बसाहट होती है और सभी मिल-जुलकर रहते हैं तथा सभी सबके काम निपटाते हैं। इनके पर्व-त्योहारों में धनी-गरीब का कोई भेद नहीं होता।
गाँव के सार्वजनिक स्थान अखरा में कोई विभेद नहीं होता। वहाँ सभी बराबर होते हैं, सामूहिक निर्णय लेते हैं और नृत्य-गीत, खान-पान में सामूहिक हिस्सा-भागीदारी निभाते हैं। ये प्राकृतिक तौर पर खुशहाल रहने वाले लोग हैं, जिनके चेहरे पर उदासी शायद ही झलकती है। हमेशा हँसते-मुसकराते रहने वाले लोग हैं ये। नृत्य, गीत, संगीत, उत्सव, आनंद इनके डीएनए में समाया हुआ है। ये किसी से भय खाने वाले भी नहीं होते। पेड़-पौधे, नदी, पहाड़ आदि इनके आराध्य हैं। यह एक बहुजातीय और बहुभाषिक राज्य है।
वर्तमान में इस राज्य में देश के प्रायः सभी राज्यों के निवासी किसी-न-किसी अंश में मिलते हैं। उनकी अपनी-अपनी भाषा है। राज्य सरकार ने जनजातीय और स्थानीय भाषाओं के बतौर नौ भाषाओं को द्वितीय राजभाषा के रूप में मान्यता दी है। हिंदी, अंग्रेजी का कहना ही क्या? निश्चय ही, अन्य राज्यों से बहुतेरे लोग रोजी-रोजगार की तलाश में वैसे ही आए हैं, जैसे आदिम जमाने में जनजातियों सहित अन्य जातियाँ इस भू-भाग में आ बसीं।
चौबे साहब कहते हैं: "खुद मेरे ऊपर की 13वीं पीढ़ी के मुरार चौबे वल्द मकरंद चौबे उत्तर प्रदेश के बस्ती जिलांतर्गत महुली गाँव से पलामू में आ बसे थे।" कहा जाता है कि मकरंद
चौबे शेरशाह के मेंटर थे। इस कारण हुमायूँ उनसे चिढ़ा रहता था। हुमायूँ से त्रस्त होकर ही उन्होंने इधर का रुख किया था। मध्यकालीन भारत में निश्चय ही यह क्षेत्र छोटी-छोटी रियासतों में बँटा हुआ था। पलामू में जनजातीय चेरो राजवंश राज कर रहा था, तो राँची आदि इलाकों में मदरा मुंडा का शासन चलता था। राजा मदरा मुंडा ने अपना बेटा रहते हुए
नागवंशी फणि मुकुट राय को उनकी योग्यता के कारण गद्दी सौंप दी थी।
इसी प्रकार वर्तमान गढ़वा जिले के रंका, नगरउंटारी, हजारीबाग, खरसावाँ, सरायकेला, पोड़ाहाट, झरिया, संथाल परगना के खड़गपुर, शंकरा, सुल्तानाबाद, हंडवा आदि क्षेत्रों में छोटे-छोटे राजे-रजवाड़े हुआ करते थे। इन सभी का आपस में कोई विशेसामंजस्य नहीं रहता था। सभी अपने में मस्त रहते थे। अलबत्ता कभी-कभार एक दूसरे पर ही ताकत आजमा लिया करते थे। 1647 से 1707 के बीच छोटानागपुर के नागवंशी शासक रघुनाथ शाही के जमाने में पलामू के चेरो राजा मेदिनी राय ने डोइसा गढ़ पर आक्रमण कर बहुत-कुछ हड़प लिया था।
इतिहास के पन्नों से गुजरने पर ऐसा प्रतीत होता है कि मुगलों के शासन तक यह भू-भाग बहुत प्रसिद्ध नहीं हो सका था। अलबत्ता यह मुगल सेना के आवागमन का रास्ता जरूर था। राजमहल में मान सिंह का किला अभी तक जूद है। मान सिंह द्वारा बनवाई गई जामा मसजिद भी है। उससे काफी "कलिंग युद्ध किया था, तब भी निश्चय ही पाटलिपुत्र से उनको इसी रास्ते से गुजरना पड़ा होगा। मुगल हों या उनके पहले के हिंदू और अन्य राजे-रजवाड़े, सबने इसका कॉरिडोर के तौर पर इस्तेमाल जरूर किया, लेकिन न तो वे यहाँ रहने आए, न
ही इसके विकास और बसाहट से उनका कोई लेना-देना था। यहाँ के राजाओं यारियासतदारों से टैक्स लेना ही उनका एकमात्र कार्य रहा।
अलबत्ता अंग्रेजों ने इस क्षेत्र पर ध्यान जरूर दिया। एक तो तब तक इधर ईसाई मिशनरियों का धावा हो चुका था, दूसरे, अंग्रेजों की गिद्ध दृष्टि इस क्षेत्र के खनिजों पर थी। डिस्ट्रिक्ट गजेटियर ऑफ हजारीबाग और डिस्ट्रिक्ट गजेटियर ऑफ राँची के अनुसार, जर्मन लुथरेन चर्चद्वारा भेजे गए चार पास्टरों ने 4 नवंबर, 1845 को राँची में प्रवेश किया। पाँच
वर्षों तक ‘सेवा कार्य’ करने के बाद 1850 में मिशनरियों ने उराँव जनजाति के कुछ लोगों का पहले धर्म परिवर्तन कराया। 1853 में गोस्सनर मिशन राँची से रेवरेंड हेनरी वैस्टोन हजारीबाग गए और वहाँ बगोदर मार्ग पर सिंघानी में मिशन स्टेशन की स्थापना की। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय मिशनरी हजारीबाग छोड़कर भाग गए, लेकिन 1862 में वे लौट भी आए। 1880 में यह मिशन गिरिडीह तक विस्तारित हुआ।
यूँ, हजारीबाग में गोस्सनर चर्च की विधिवत् स्थापना 1919 में हुई। इसके पहले 1869 में ही चर्चों का विभाजन हो गया। उसी समय कुछ मिशनरियों ने चाईबासा में डेरा डाल दिया। इस प्रकार धीरे-धीरे मिशनरियों का पूरे झारखंड क्षेत्र में संजाल खड़ा हो गया। शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र को इन्होंने अपना हथियार बनाया। गरीब और अशिक्षित जनजातीय समुदाय का इनके प्रति आकर्षण बढ़ने लगा, क्योंकि ये हर तरह से मदद करते थे और अंग्रेज बहादुर इनको विशेष सुविधाएँ देते थे। ईस्ट इंडिया कंपनी को जब बंगाल की दीवानी मिली तो उसने 1793 में जमीन की स्थायबंदोबस्ती का विधान लागू कर जमींदारों को अनेकानेक अधिकार दे दिए। ग्राम स्वशासन के अभ्यस्त लोगों पर जब अंग्रेजों का शासन चलने लगा तो विरोध की लहरें फूटने लगीं। वे ‘दिकू’ यानी बाहरी लोगों से अकसर पंगा लेने लगे थे।
झारखंड सरकार के डॉ. रामदयाल मुंडा ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा दो साल पहले प्रकाशित ट्राइबल एटलस में मानभूम में 1766 के चुआड़ और उसके बाद संथाल परगना के पहाड़िया आंदोलन से लेकर 1914 के टाना भगत आंदोलन तक 17 आंदोलनों का उल्लेख है। इनमें 1831-32 का हो-मुंडा-उराँव आंदोलन, जिसे ‘कोल विद्रोह’ भी कहते हैं, 1855-56 का ‘संथाल हूल’ और 1895 का ‘बिरसा मुंडा आंदोलन’ अधिक प्रसिद्ध है। अलबत्ता 1914 का टाना भगत आंदोलन इसलिए अधिक मायने रखता है, क्योंकि यह महात्मा गांधी के सत्याग्रह किस्म का आंदोलन था। तब तक महात्मा झारखंड क्षेत्र में आए भी नहीं थे और कोई ऐसा संचार माध्यम नहीं था, जिससे यह लगे कि टाना भगतों को कहीं से कोप्रेणा प्राप्त हुई।
जुलाई 1917 में जब महात्मा राँची आए, तब उनसे टाना भगतों का साक्षात्कार हुआ और जैसा कि इतिहासकार बताते हैं, गांधी उनसे उतने ही प्रभावित हुए, जितने वे गांधी से प्रभावित हुए। उसके बाद तो पूरा टाना भगत समुदाय ही गांधीमय हो गया और आज भी है। जनेऊधारी यह स्वपाकी निरामिषजनजातीय समाज खद्दर वस्त्र और गांधी टोपी धारण करता है और तिरंगा, घंटी, शंख लिये घूमता है। यह समाज नशा सेवन से भी दूर रहता है। संथाल क्षेत्र में यही चरित्र सफा होड़ का है। निश्चय ही ये सारे आंदोलन साहूकारों, जमींदारों और अंग्रेजी शासन व्यवस्था द्वारा किए जा रहे शोषण के विरुद्ध उठ खड़े हुए थे, जो झारखंड की प्रवृत्ति के संकेत तो देते ही हैं। टाना भगत और बिरसा आंदोलन धार्मिक-सामाजिक सुधार के लिए शुरू हुआ था, लेकिन देखते-देखते इन्होंने व्यवस्था-विरोध का स्वरूप धारण कर लिया
झारखण्ड के निर्माण में अहम् भूमिका निभाने वाले 78-वर्षीय सूरज मंडल कहते हैं: "झारखंड अपने अस्तित्व में कैसे आया यह आज की पीढ़ी नहीं सोच सकता है। जबकि उसे ही अधिक सोचने की आवश्यकता है। हमें ही नहीं, इस क्षेत्र में रहने वाले करोड़ों लोगों को फक्र हैं होनी चाहिए कि वे इस प्राकृतिक गोद में जन्म लिए। झारखंड में आज भी जितनी प्राकृतिक सम्पदा है, विश्व के लोग कल्पना नहीं कर सकते। हमने आदिवासियों के लिए, संथालों के लिए, अनुसूचित जातियों, जनजातियों के लिए, यहाँ के लोगों की संस्कृति, सभ्यता को बचने के लिए मुद्दत से लड़े। अंत में हमें सफलता भी मिली। हमें अपनी पहचान मिली। अलग झारखण्ड राज्य बना। उन लोगों के हाथों राज्य के विकास का दायित्व सौंपा गया जो क्रांतिकारी थे । लेकिन उन क्रांतिकारियों के मन में अपने प्रदेश के लिए, उसके विकास के लिए जो वेदना-संवेदना होनी चाहिए थी, वह नहीं रही। मेरा मानना है कि उन्हें जो जबाबदेही मिली थी, उसका भरपूर दुरुपयोग किया उन्होंने - स्वहित में।
कोई भी कल्पना कर सकता है कि चाहे उग्र विद्रोह रहे हों अथवा सत्याग्रही आंदोलन, यदि पूरे राज्य में एक साथ उठ खड़े होते तो इनको कुचलना कतई आसान नहीं होता। उन दिनों अलग-अलग रियासतों में यह भू-भाग बँटा हुआ था, अन्यथा ये आंदोलन एक साथ भी अंजाम पा सकते थे। इन आंदोलनों के कई नेतृत्वकर्ता इतने पराक्रमी थे कि उनमें अनुयायी
या साथी आंदोलनकारी दैवी शक्ति का आभास करते थे। संथाल परगना के दोनों भाई सिदो-कान्हू इसी श्रेणी में आते हैं, जबकि बिरसा मुंडा को तो आज भी भगवान कहा जाता है। इन आंदोलनों में शामिल अनेक लोगों को अंग्रेजी सैनिकों ने या तो बेदर्दी से मार डाला या बंदी बना लिया। कई गाँव फूँक डाले।
जतरा टाना भगत ने 1914 में 20 समर्थकों संग भूत पूजा बंद करने, पशु बलि नहीं देने, मांस भक्षण बंद करने, शराब सेवन बंद करने, गुरुवार को हल न जोतने और दूसरों के लिए श्रम न करने की अपील के साथ सामाजिक आंदोलन प्रारंभ किया था। गुमला जिले के बिशुनपुर जैसी छोटी जगह से प्रारंभ यह आंदोलन राँची, गुमला, लोहरदगा, पलामू और हजारीबाग तक फैल गया। जतरा को गिरफ्तार कर डेढ़ वर्ष तक जेल में बर्बर यातना दी गई। उनको 1916 में रिहा किया गया था, लेकिन वे काफी कमजोर हो चुके थे।
उसी साल 28 वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई। उन दिनों इनके 2 लाख, 60 हजार से अधिक अनुयायी थे। उन्होंने उराँव की जगह अपना टाइटिल ‘टाना भगत’ लिखना शुरू कर दिया। उनका यह आंदोलन बाद में जमींदारों और महाजनों के अत्याचारों के विरुद्ध ढल गया। उन्होंने स्थानीय जमींदारों और अंग्रेजी शासन का विरोध करते हुए लगान न देने का निर्णय लिया।
गुस्साई हुकूमत ने उनकी जमीन नीलाम कर दी। उनका मानना था कि चूँकि पूर्वजों ने जंगल साफ कर जमीन तैयार की थी, इसलिए सारी भूमि उनकी है। स्वतंत्रता आंदोलन में वे महात्मा गांधी से प्रभावित हुए और सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया। उन्होंने खादी धारण कर लिया। उनके आंदोलन के लिए छोटानागपुर के तत्कालीन डीआईजी ने 3मार्च, 1921 की अपनी रिपोर्ट में लिखा, टाना भगत आंदोलन ने कठिनाई में डाल दिया है और पर्याप्त प्रमाण हैं कि इन्हें राष्ट्रीय असहयोग आंदोलन में जोड़ दिया गया है, जिससे आंदोलन में जान आ गई है। हैरानी है कि वे ही टाना भगत आज तक अपनी जमीन की वापसी की माँग करते हैं। टाना भगतों ने 19-20 मार्च, 1940 के रामगढ़ कांग्रेस सम्मेलन में महात्मा गांधी को 400 रुपयों की थैली भेंट की थी। 1942 के असहयोग आंदोलन में उन्होंने उग्र रूप धारण कर लिया था।स्वतंत्रता-प्राप्ति के साथ 1947 में टाना भगतों की नीलाम जमीन की वापसी का प्रावधान बना। 15 अगस्त, 1972 को स्वतंत्रता के 25 वर्ष पूरे होने पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने स्वतंत्रता सेनानी टाना भगतों को ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया था।
उनका कृषि भूमि वापसी अधिनियम असफल होने के कारण 1989 में संशोधित किया गया, लेकिन आजतक कई परिवार वंचित ही हैं। इसी प्रकार बिरसा मुंडा ने भी सामाजिक-धार्मिक आंदोलन ही प्रारंभ किया था, लेकिन कालक्रम में उसका स्वरूप बदलकर अंग्रेजी शासन व्यवस्था के विरुद्ध हो गया। 3 फरवरी, 1900 को बिरसा को जेल में डाल दिया गया था। जतरा जेल से निकलने के बाद मृत्यु को प्राप्त हुए, जबकि बिरसा मुंडा का तो राँची जेल में ही प्राणांत हुआ।
कहा जाता है कि बिरसा को धीमा जहर देकर मार डाला गया, लेकिन बताया यह गया कि हैजे से 9 जून, 1900 को उनका प्राणांत हुआ। उनके आंदोलन में सैकड़ों लोगों को अंग्रेजों की गोलियों का शिकार होना पड़ा था, जबकि 482 लोगों पर मुकदमा चलाते हुए 44 को आजीवन कारावास तथा तीन लोगों को मौत की सजा दी गई। निश्चय ही 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की धमक इस भू-भाग में भी हुई। तब तक यह क्षेत्र अपेक्षाकृत अधिक जागरूक हो चुका था। अंग्रेजों ने राँची के डोरंडा में रामगढ़ बटालियन का मुख्यालय बना रखा था। यहाँ आर्टिलरी और कैवेलरी दोनों थीं। इनमें करीब एक-तिहाई झारखंडी थे। हजारीबाग में 7वीं और 8वीं पैदल सेना थी। पूरे झारखंड में इस आंदोलन की तपिश देखी ग
डिस्ट्रिक्ट गजेटियर ऑफ राँची, 1880 में कैप्टन हेनरी ग्रेद्वारा प्रस्तुत बड़कागढ़ राज्य की रिपोर्ट, ‘1857 इन बिहार; छोटानागपुर एंड संथाल परगनाज’ जैसे विवरण बताते हैं कि खासकर राँची, लोहरदगा, हजारीबाग, चतरा, पलामू आदि इलाकों में अंग्रेजी सेना की संग्रामियों से जबरदस्त मुठभेड़ें हुईं। अंततः जैसा कि पूरे देश में हुआ, यहाँ भी यह विद्रोह कुचल डाला गया। छोटानागपुर के महाराजा के पूर्व दीवान पांडेय गणपत राय और जगन्नाथपुर के ठाकुर विश्वनाथ शाही को 21 अप्रैल, 1858 को राँची के जिला स्कूल के सामने कदम के एक पेड़ पर सार्वजनिक रूप से फाँसी दे दी गई। हुकूमत ने ठाकुर विश्वनाथ शाही के 97 गाँव और अन्य संपत्ति जब्त कर 1872 में महाराजा प्रताप उदय नाथ शाहदेव को वापस कर दिया, जिसे उन्होंने अपने छोटे भाई ऐनी नाथ शाही को खोरपोस में दे दिया। खोरपोस का मतलब शाही के जीवनकाल तक के लिए दी गई संपत्ति। पांडेय गणपत रायभौंरो की जमींदारी के 11 गाँव जब्त कर लिये गए। चोरेया के जमींदार भोला सिंह को एक कमरे में बंद कर भूखों मार डाला गया।
ओरमाँझी क्षेत्र के टिकैत उमराव सिंह तथा उनके दीवान शेख भिखारी को 8 जनवरी, 1858 को चुटूपालू घाटी में एक वृक्ष पर सार्वजनिक फाँसी दे दी गई। प्रिंसिपल असिस्टेंट के कार्यालय के जमादार कुर्बान अली को 14 वर्षों की सजा दी गई। रामगढ़ सेना के दो विद्रोही सूबेदारों जयमंगल सिंह और नादिर अली को 4 अक्तूबर, 1858 को चतरा में एक वृक्ष पर सार्वजनिक फाँसी दी गई। एक अन्य सूबेदार माधो सिंह को न पकड़ा जा सका, न ही उनकी कोई जानकारी मिल सकी। सितंबर 1857 के बाद राँची में दो सौ से अधिक सिपाहियों
कफाँसी दी गई। लोहरदगा में प्रिंसिपल असिस्टेंट पर 200 लोगों के साथ सशस्त्र हमला करने वाले तथा बर्वे थाना जला डालने वाले बहुरन सिंह को 5 जनवरी, 1858 को फाँसी दी गई। पलामू में आंदोलन का नेतृत्व कर रहे खरवार जागीरदार परिवार के दो भाइयों नीलांबर और पीतांबर को फाँसी दे दी गई। उनके नेतृत्व में विद्रोहियों ने लेस्लीगंज का खजाना लूटकर कचहरी, थाना, तहसील और कार्यालय फूँक दिया था।
इससे पहले मनिका के टिकैत और ठकुराई भिखारी सिंह को फाँसी दे दी गई थी। इनके अलावा भी कई लोगों को या तो फाँसी पर लटका दिया गया या घेरकर मार डाला गया। काफी मशक्कत के बाद अंग्रेज मार्च 1859 में पलामू को शांत कर सके थे। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से ठीक पहले साहूकारों और अंग्रेजों के शोषण के विरुद्ध संथाल परगना में हुए जबरदस्त संथाल हूल को जिस बेदर्दी से कुचलते हुए नेतृत्वकर्ता चार भाइयों—सिदो, कान्हू, चाँद, भैरव सहित हजारों संथालों को मार डाला गया था, उसके भय के कारण उस इलाके में ज्यादा तूफान न मच सका। डिस्ट्रिक्ट गजेटियर ऑफ धनबाद के अनुसार, वांछित सहायता न करने के कारण पंचेत के राजा निलोमोनी सिंह को गिरफ्तार कर कलकत्ता जेल में
बंद कर दिया गया। डिस्ट्रिक्ट गजेटियर ऑफ सिंहभूम के अनुसार, प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान चाईबासा की ट्रेजरी लूट ली गई तथा जेल तोड़कर कैदियों को आजाद कर दिया गया।
इस प्रकरण में पोड़ाहाट के राजा अर्जुन सिंह तथा उनके भाई पर बनारस में मुकदमा चलाया गया। वहीं इन दोनों की 1890 में मृत्यु हो गई। विद्रोहियों ने इस दौरान राँची, रामगढ़, हजारीबाग, पलामू आदि स्थानों पर सरकार को भारी नुकसान पहुँचाया। अलग राज्य : माँग और प्रचंड आंदोलन से निर्माण तक अपने अंदर समृद्ध इतिहास और संस्कृति को समेटे जिस भौगोलिक रूप में आज का झारखंड राज्य विद्यमान है, इसके निर्माण की कहानी थोड़ी अजीब और बहुत लंबी है। इस राज्य के निर्माण की माँग सबसे पहले 1938 में उठी थी। हुआ यह कि जनजातियों के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक सुधार के लक्ष्य से 1915 में ‘उन्नति समाज’ का गठन किया गया था। इस संगठन में फादर जुवेल लकड़ा और राय साहब बंदी राम उराँव शामिल
1937 के बिहार विधानसभा चुनाव में छोटानागपुर और संथाल परगना के 38 निर्वाचन क्षेत्रों से जनजातियों की तीन संस्थाओं उन्नति समाज, छोटानागपुर कैथोलिक सभा और छोटानागपुर किसान सभा ने भाग लिया था। इस चुनाव में छोटानागपुर कैथोलिक सभा के दो उम्मीदवार ही जीत सके थे। इस जबरदस्त पराजय के कारण तीनों संगठनों में 1938 में एकता हुई और एक नया संगठन बना, जिसका नाम था—‘आदिवासी महासभा।’ इसके द्वितीय अध्यक्ष जयपाल सिंह मुंडा बनाए गए, जिन्होंने दस साल पहले 1928 में भारतीय
हॉकी टीम का नेतृत्व करते हुए एम्सटर्डम ओलंपिक में गोल्ड जीता था। जयपाल सिंह उच्च शिक्षित व्यक्ति थे, जिन्होंने विश्व प्रसिद्ध ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पीजी डिग्री हासिल की थी। उनकी काबिलियत के कारण उन्हें भारतीय संविधान सभा का सदस्य बनाया गया था। आदिवासी महासभा के प्रथम अध्यक्ष थियोडोर सुरीन तथा मंत्री पॉल दयाल चुने गए थे।
उन दिनों इस संगठन में केवल ईसाई और जनजातीय सदस्य ही हुआ करते थे। संगठन ने अस्तित्व में आते ही जनजातीय एकता और क्रांति के उद्देश्य से पृथक् झारखंड राज्य के गठन की माँग बुलंद कर दी। इस पर बिहार के तत्कालीन गवर्नर सर एम.जी. हैलेट की टिप्पणी थी, ‘यह एबसर्ड माँग है।’ उन दिनों छोटानागपुर कमिश्नरी में राँची, हजारीबाग, पलामू, सिंहभूम और मानभूम पाँच जिले थे। बिहार असेंबली डिबेट्स, वॉल्यूम 3-1938 के अनुसार, जून 1938 में ‘आदिवासी महासभा’ के प्रस्ताव पर बिहार विधानसभा में अलग से बहस हुई थी। डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा के प्रश्न के उत्तर को टालते हुए सरकार ने कहा था कि 1765 से छोटानागपुर बिहार का हिस्सा है। यदि यह माँग मान भी ली जाए तो उस इलाके के लोगों, खासकर आदिवासियों का विकास कठिन होगा।
1939 में 20 से 22 जनवरी तक राँची में ‘आदिवासी महासभा’ का वार्षिक अधिवेशन हुआ, तो इसमें अलग झारखंड राज्य की रणनीतियाँ तय की गईं। उसी समय हिंदपीढ़ी मैदान में हुई बड़ी जनसभा में आदिवासी एकता की वकालत तो की ही गई, मुसलिमों और बंगालियों को सच्चा आदिवासी बताया गया। उसमें राजनीतिक प्रस्ताव पारित कर अलग झारखंड की माँग पर जोर डाला गया। जून आते-आते मुंडा, हो तथा संथालों को भी ‘आदिवासी महासभा’ में शामिल कर लिया गया। उसी समय से जयपाल सिंह को जनजातियों ने ‘मरंग गोमके’ यानी महान् नेता कहना प्रारंभ कर दिया। उस काल में इमाँग के समर्थन में जगह-जगह जनसभाओं का आयोजन होने लगा।
जुलाई 1939 में अलग राज्य की माँग के विरोध में ‘छोटानागपुर बचाओ लीग’ की स्थापना की गई। किसान सभा के संस्थापक ठेबले उराँव के नेतृत्व में ‘सनातन आदिवासी महासभा’ का गठन कर कहा गया कि ‘आदिवासी महासभा’ पर ईसाई आदिवासियों का वर्चस्व है, जो सरकारी सहायता के लिए अलग राज्य की माँग का नाटक कर रहे हैं। 3 सितंबर, 1939 को द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हो जाने के बाद अलग राज्य की माँग थोड़ी कमजोर पड़ गई। उस समय जयपाल सिंह ने अंग्रेजों से करीबी बना ली। उसी दौरान वे मुसलिम लीग के संपर्क में आए। कहा यही जाता है कि तब मुसलिम लीग ने ‘आदिवासी महासभा’ को खर्च के लिए बड़ी रकम दी थी।
कालांतर में जब पता चला कि मुसलिम लीग पूरे बंगाल को पाकिस्तान में मिलाने की पक्षधर है और इस बहाने वह झारखंड के खनिजों पर भी कब्जा करना चाहती है, तब जयपाल सिंह ने उससे अपना नाता तोड़ लिया। 1946 की प्रांतीय असेंबली का चुनाव प्रचार अभियान जोरों पर था। चुनाव प्रचार के दौरान फैली अशांति में 2 मार्च को तोरपा थाना के तपकरा में ‘आदिवासी महासभा’ के पाँच समर्थक मारे गए। प्रचार यह किया गया कि सैकड़ों लोग मौत के घाट उतार दिए गए। जयपाल सिंह चुनाव हार गए। इसके दो सालबाद खरसावाँ में एक बीभत्स गोलीकांड हुआ। आजादी के साथ ही करीब 600 देसी रियासतों के भारत संघ में विलयन की घोषणा की गई थी। इसी के तहत खरसावाँ और सरायकेला रियासतों को उड़ीसा (अब ओडिशा) में मिला दिया गया था। अधिसंख्य स्थानीय नागरिक और आदिवासी इसके विरोध में थे। यह विलयन 1 जनवरी, 1948 से प्रभावी था।
भारत सरकार के इस निर्णय के विरोध में विलयन के ही दिन यानी 1 जनवरी को खरसावाँ में जनसभा का आयोजन किया गया था। इसमें जबरदस्त जमावड़ा हुआ था। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के विपरीत जयपाल सिंह वहाँ पहुँचे नहीं तो कुछ नेताओं ने फैसला किया कि वे अपना माँगपत्र खरसावाँ के राजा को सौंपेंगे। उड़ीसा सरकार ने हालात का पूर्वानुमान
लगाकर पखवाड़ा भर पहले 18 दिसंबर, 1947 को ही कुमुक तैनात कर दी थी। राजमहल तक भीड़ पहुँचने से पहले ही पुलिस ने ताबड़तोड़ 500 राउंड फायरिंग की, जिसमें कम-से-कम सौ लोगों के मारे जाने और चार सौ लोगों के घायल होने की बात कही जाती है। उड़ीसा सरकार ने 32 लोगों के मरने की पुष्टि की, जबकि बिहार सरकार ने यह संख्या 48 बताई थी
इस नरसंहार की कोई जाँच नहीं हुई। अलबत्ता, गृह मंत्रालय अपने निर्णय पर पुनर्विचार के लिए मजबूर हुआ और 139 दिनों बाद 18 मई, 1948 को इन रियासतों को एक सबडिवीजन के रूप में सिंहभूम जिले के साथ जोड़ दिया गया। इस लोमहर्षक घटना में जयपाल सिंह पर इसलिए उँगली उठी, क्योंकि वे सभा में गए ही नहीं। इससे क्षुब्ध होकर उनके विश्वसनीय साथी जस्टिन रिचर्ड ने अपना अलग संगठन बना लिया। हालाँकि, बाद में जयपाल सिंह ने रिचर्ड को मना लिया और गैर-आदिवासी सदस्यों को भी एंट्री देते हुए ‘झारखंड पार्टी’ नामक नया राजनीतिक संगठन खड़ा करने की ठान ली। स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद 5 मार्च, 1949 को आदिवासी महासभा के स्थान पर झारखंड पार्टी का गठन किया गया।
झारखंड पर श्रृंखला जारी है
