अब्दुल कलाम रोड (नई दिल्ली) : साल 1955 से शुरू हुए सरदार पटेल स्मृति व्याख्यान माला में अब तक देश के कई दर्जन राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षिक, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक, इतिहासकार, प्रशासनिक क्षेत्रों के धनुर्धर अपनी-अपनी बातें आकाशवाणी के माध्यम से भारत के लोगों तक पहुंचाए हैं। आने वाले 31 अक्टूबर को भी प्रादेशिक और राष्ट्रीय स्तर पर अनेकानेक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है। लेकिन हकीकत तो यह है कि लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल के नाम पर राजनीतिक पार्टियों द्वारा, सरकारों के दौरा जितनी भी राजनीति की जाय, स्वतंत्र भारत के प्रथम उप-प्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार पटेल को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हक़दार थे, और आज भी हैं।
भारत के पहले सूचना और प्रसारण मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के सम्मान में, आकाशवाणी वार्षिक सरदार पटेल स्मृति व्याख्यान का आयोजन करता है। इससे पहले भी कई प्रतिष्ठित नेता, वैज्ञानिक और इतिहासकार भी इस व्याख्यान कार्यक्रम में शामिल हो चुके हैं। यह व्याख्यान श्रृंखला 1955 में शुरू हुई थी और पहला व्याख्यान सी. राजगोपालाचारी ने दिया था।
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, मोरारजी देसाई, डॉ. जाकिर हुसैन, डॉ. कर्ण सिंह, वसंत साठे, डॉ. के. कस्तूरी रंगन, प्रो. एम.जी.के. मेनन, डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन, न्यायमूर्ति लीला सेठ, जे. एन. दीक्षित, अरुण जेटली, अजीत डोभाल, डॉ. एस जयशंकर, डॉ. एस सोमनाथ, डॉ. के एस कृष्णा, जेबीएस हलदाने, डॉ. वर्रिएर एल्वान, केपीएस मेनन, पी एन हसकर, डॉ. जाकिर हुसैन, जैकब चंडी, मोरारजी देसाई, पी बी गजेंद्र गडकर, वीवी चंद्रचूड़, डॉ. कारन सिंह, डॉ. एस एल क़ासिम, एन ए पालकीवाला, वसंत साठे, आबिद हुसैन, एन गोपालस्वामी अय्यर, प्रोफ़ेसर जयंत नार्लीकर, जगमोहन, स्वामी रंगनाथानंदा, श्रीमन नारायण, बाल्मीकि प्रसाद सिंह, मोहम्मद हामिद अंसारी, शिवशंकर मेनन, डॉ. चन्दन मित्रा, जितेंद्र सिंह, श्रीमती ईरानी, जनरल बिपिन रावत इत्यादि पहले भी व्याख्यान दे चुके हैं। इस व्याख्यान की रिकॉर्डिंग 31 अक्तूबर को सरदार पटेल की जयंती के अवसर पर आकाशवाणी के पूरे नेटवर्क पर प्रसारित की जाएगी।
जब आप इण्डिया गेट के रास्ते अपने दाहिने हाथ नवनिर्मित/स्थापित सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा को नमस्कार करते, शाहजहां रोड के रास्ते पृथ्वीराज रोड – ए पी जे अब्दुल कलाम रोड के नुक्कड़ पर पहुँचते हैं, वहां मुद्दत से ईंट-से-ईंट अलग होते दीवारों के अंदर वाला भवन आज भी भारत के उस महान नायक को याद करते बिलखता है, जो कभी इस भवन के वासिंदे थे। उस भवन को देखकर आत्मा बिलख जाता है। मन सोचने को विवश हो जाता है कि राष्ट्र की राजधानी दिल्ली में लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल को वह सम्मान नहीं मिल पाया आज तक, जिसके वे हकदार थे। इस कार्य के लिए अगर कांग्रेस सरकार की ओर ऊँगली उठाते हैं तो गैर-कांग्रेसी सरकार और कोई प्रधानमंत्री भी इस दिशा में सकारात्मक पहल नहीं किये ‘अंतिम निर्णय’ तक ।
मसलन, 1977-1979 मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री थे, फिर 1979-1980 चरण सिंह आये। चौधरी चरण सिंह के बाद 1989-1990 विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री कार्यालय में विराजमान हुए। फिर 1990-1991 में आये चंद्रशेखर। फिर कुछ दिन के लिए आये अटल बिहारी वाजपेयी, साल 1996 था। सन 1996-1997 में एच डी देवेगौड़ा, 1997-1998 इंद्र कुमार गुजराल और फिर आये 1998-2004 तक अटल बिहारी वाजपेयी। लेकिन सन 2014 से आज तक भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय में नरेंद्र मोदी जी विराजमान हैं ।
सरदार पटेल का दिल्ली आगमन सन 1946 में हुआ था जब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में ‘अंतरिम सरकार’ बनी थी। पटेल चाहते तो सरकारी आवास में रह सकते थे, परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया और नई दिल्ली क्षेत्र में कुछ कमरों वाले एक निजी भवन में रहना पसंद किये। यह समय था आज़ादी के पहले का।
जब देश आज़ाद हुआ सरदार वल्लभ भाई पटेल स्वतंत्र भारत के उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री बने, वे उसी बंगला में रहना पसंद किये। इतिहास गवाह भी है कि जंगे आज़ादी के बाद, भारत-पाकिस्तान के बंटबारे के परिणाम स्वरुप देश में जहाँ-जहाँ भी सांप्रदायिक दंगे हुए, जान-माल हुई, सरदार पटेल इसी भवन से स्वतंत्र भारत के लोगों को अमन-चैन के लिए प्रार्थना किये और लोगों ने उनकी बातों को ह्रदय से स्वीकार किया। भारत के इतिहास में, चाहे स्वतंत्रता से पहले की बात हो या आज़ादी के बाद की, सरदार पटेल की भूमिका को भी वह स्थान नहीं मिल पाया जिसके वे हकदार थे।

बहरहाल, औरंगजेब रोड (अब ए पी जे अब्दुल कलाम रोड) वाले इस मकान के स्वामी थे सरदार पटेल के अभिन्न मित्र श्री बनवारी लाल। श्री बनवारी लाल जी उन्हें अपने कोठी में रहने का निमंत्रण दिया। सरदार पटेल अपने मित्र की बात को टाल नहीं सके और मणिबेहन पटेल के साथ रहने लगे। सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 21 अप्रैल, 1947 को भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के पहले बैच से बात की थी । उनके साथ ‘स्वराज्य’ के महत्व पर चर्चा की थी और कहा था कि वे भारत के आम लोगों को अपना समझें, अपने ह्रदय में स्थान दें।
सरदार पटेल का मानना था कि भारत, देश के सिविल सेवकों पर भरोसा और विश्वास कर सकती हैं। उसे विश्वास करनी ही होगी तभी सिविल सेवक अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकते हैं। इतना ही नहीं उन्होंने यह भी विश्वास जताया कि प्रशासन की अधिकतम निष्पक्षता और अस्थिरता बनाए रखने में इन सिविल सेवकों की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण है। सरदार पटेल का मानना था कि एक सिविल सेवक राजनीति में भाग नहीं ले सकता है , न ही उसे भाग लेना चाहिए और न ही उसे खुद को सांप्रदायिक झगड़ों में शामिल करना चाहिए। सिविल सेवकों के महत्व को बताते वे यह भी कहे थे कि जिन अनुबंधों पर वे हस्ताक्षर करते हैं उस अनुबंध के अनुसार वे अपनी पूरी सेवा के दौरान उसकी गरिमा, सत्यनिष्ठा और अस्थिरता को बनाए रखने के लिए इसे एक गौरवपूर्ण विशेषाधिकार के रूप में स्वीकार करेंगे समग्र रूप से भारत की भलाई में योगदान देने का सर्वोत्तम प्रयास करेंगे। बहुत उम्मीद किये थे सरदार पटेल भारत के सिविल सेवकों से।
अब सवाल यह है कि अगर बिड़ला हाउस जहां गांधी अपने जीवन के अंतिम 144 दिन रहे, 26 अलीपुर रोड जहां डॉ. बी. आंबेडकर 1956 में अपनी मृत्यु तक रहे, को उनका स्मारक बनाया जा सकता है, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, जगजीवन राम, लाल बहादुर शास्त्री आदि राष्ट्रीय नेताओं का समर्पित स्मारक हो सकता है तो फिर लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल को सिर्फ पटेल चौक, पटेल चेस्ट और सरदार वल्लभ भाई पटेल मार्ग तक ही क्यों सीमित कर दिया गया।
आज लोग यह नहीं कह सकते हैं कि सरकार कांग्रेस की है। यह भी नहीं कह सकते कि दिल्ली में केजरीवाल की अनुमति के बिना यह कार्य नहीं हो सकता – क्योंकि पूरी नई दिल्ली तो भारत सरकार की ही है और भारत सरकार में श्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह उपस्थित हैं। गुजरात में बने ‘स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी’ सरदार पटेल के बेहतरीन स्मारक है, सम्मान है; परन्तु वह स्मारक या सम्मान राष्ट्र की राजधानी में नहीं है।

कहते हैं 1- एपीजे अब्दुल कलाम रोड (पहले औरंगजेब रोड) चुकी निजी संपत्ति है और वर्तमान परिपेक्ष में उस भवन और स्थान की कीमत आम नागरिक नहीं लगा सकता। लेकिन अगर स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के निर्माण के समय राष्ट्र के लोगों से “लौह” की मदद की गुहार की जा सकती थी, तो आज दिल्ली में उस स्थान पर सरदार वल्लभभाई पटेल के नाम से स्मारक बनाने हेतु भी राष्ट्र से मौद्रिक सहायता के लिए प्रार्थना की जा सकती है।
मुझे उम्मीद है कि सरदार वल्लभ भाई पटेल को दिल्ली सल्तनत में सम्मान के साथ स्थान देने हेतु राष्ट्र के लोग दिल खोल देंगे क्योंकि आजादी से पहले और आजादी के बाद आज तक सरदार वल्लभ भाई पटेल की ऊंचाई को कोई मापने वाला जन्म नहीं लिया है। उनकी गहराई को कोई माप नहीं सकता। वे भारत के लोगों के ह्रदय में पीढ़ी-दर-पीढ़ी रहते आ रहे हैं। खैर।
नाम की राजनीति तो आम बात है। दिल्ली सरकार द्वारा पटेल की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में राष्ट्रव्यापी अभियान सरदार एट 150 चलाया जा रहा है। सरदार@150’ नाम की एक व्यापक पहल के तहत इस अभियान का उद्देश्य विद्यार्थियों को देश के प्रथम उप-प्रधानमंत्री के आदर्शों से जोड़कर राष्ट्रीय एकता और जनभागीदारी का संदेश फैलाना है। इस पहल के तहत, यमुना नदी का पानी कश्मीर से कन्याकुमारी तक देशभर की 25 नदियों में पहुंचाया जाएगा, जो सांस्कृतिक और भावनात्मक एकता का प्रतीक होगा। इन नदियों का जल बाद में 31 अक्टूबर को पटेल चौक स्थित पटेल की प्रतिमा पर ‘जलाभिषेक’ समारोह के लिए दिल्ली लाया जाएगा।
बहरहाल, सरदार पटेल की 150वीं जयंती के अवसर पर दिल्ली विधानसभा में 30 अक्टूबर को सरदार वल्लभभाई पटेल और भारत के एकीकरण में उनके अमूल्य योगदान विषय पर विशेष संगोष्ठी आयोजित होगी। दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता के अनुसार संगोष्ठी में बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान मुख्य अतिथि होंगे। गुजरात के बारडोली स्थित स्वराज आश्रम की प्रशासक निरंजनाबेन कालारथी विशेष अतिथि रहेंगी। इस अवसर पर विधानसभा परिसर में एक विशेष प्रदर्शनी का भी आयोजन होगा, जिसमें सरदार पटेल के जीवन से जुड़ी दुर्लभ अभिलेखीय तस्वीरें, स्मारक सिक्के, डाक टिकट, पुस्तकें और ऐतिहासिक दस्तावेज प्रदर्शित किए जाएंगे।
