जनपथ (वेस्टर्न कोर्ट), नई दिल्ली: रायसीना रोड, जहाँ संसद वाली छोड़ पर स्थित बांग्ला संख्या - 1 में प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया स्थित है, की ओर से आने वाली सड़क, ली-मेरिडियन होटल के रास्ते जब जनपथ में प्रवेश करती है, कुछ दूर बाद वेस्टर्न कोर्ट के बाहर खड़ा हूँ। विगत 34-वर्षों से इन सड़कों पर पैदल चलकर पत्रकारिता के क्षेत्र में नाम का गोदना गोदाने के अनवरत प्रयास कर रहा हूँ।
अभी मुंबई से प्रकाशित 'ओपन' पत्रिका के पुरस्कार विजेता डिप्टी फोटो एडिटर आशीष शर्मा की नई कॉफी टेबल किताब "रीइमेजिनिंग जम्मू एंड कश्मीर: ए पिक्टोरियल जर्नी" पर आधारित फोटो प्रदर्शनी को देखकर निकला हूँ। आशीष के जीवन का अधिकांश हिस्सा भले महाराष्ट्र में बिता हो, लेकिन पैदाइश कश्मीर में हुआ था और जीवन की शुरुआत भी कश्मीर में ही किये थे। स्वाभाविक है अन्य कश्मीरियों की तरह, आशीष कश्मीर को जितना समझते हैं, गैर कश्मीरी नहीं समझेंगे।

इन बातों को सोच ही रहा था तभी के.पी.एस. गिल साहब का चेहरा और वर्षों पहले प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में एक पुस्तक विमोचन के दौरान उनकी बातें याद आ गई। वैसे आम तौर पर दिल्ली शहर में बहुत सारे लेखक, आलोचक, विश्लेषक हैं जो कभी दिल्ली सल्तनत से बाहर नहीं निकले, अगर निकले भी तो उस शहर के वातानुकूलित कक्ष में स्थानीय पत्रकारों से मिलकर (अपवाद छोड़कर) विलक्षण अंग्रेजी में कहानियां लिखकर दिल्ली के अख़बारों में (जो एसाइनमेंट देता है) में प्रकाशन हेतु प्रेषित कर देते हैं। अपवाद छोड़कर, जिस शहर के बारे में कहानी लिखते हैं, उस शहर के भूगोल, गणित, नागरिक शास्त्र, ज्यामिति से लेशमात्र भी परिचित नहीं होते, लेकिन विश्लेषण करने में तनिक भी कोताही नहीं करते।

उस दिन भी कुछ वैसा ही हुआ था। दिल्ली के एक प्रकाशक द्वारा प्रकाशित एक पुस्तक का विमोचन हो रहा था। उस कार्यक्रम में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के.पी.एस. गिल साहब भी थे। प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया के अंदर बाएं हाथ मैदान में पत्रकार बंधू बांधव खचाखत बैठे थे। कैमरे का क्लिक-क्लिक हो रहा था। जब गिल साहब की बोलने की बारी आयी, अन्य बातों के अतिरिक्त गिल साहब बिहार की कानून व्यवस्था पर भी टिप्पणी करने लगे। खूब बोले। दिल्ली सल्तनत में केजरीवाल की सरकार नहीं आयी थी और मुख्यमंत्री कार्यालय में श्रीमती शीला दीक्षित जी (अब दिवंगत) विराजमान थी।

जब गिल साहब बिहार के कानून व्यवस्था पर नकारात्मक टिप्पणी करते चले जा रहे थे, मुझसे रहा नहीं गया। मैं उनसे पूछा कि 'गिल साहब आप बिहार कितने बार गए हैं? क्योंकि विगत चालीस वर्षों में, जब से मैं अख़बार की दुनिया में आया हूँ, कभी बिहार से प्रकाशित अख़बारों में आपकी भ्रमण-सम्मेलन से सम्बंधित कहानियां नहीं पढ़ा हूँ। हां, पंजाब, दिल्ली या अन्य शहरों के डेट लाइन' से कहानियां जरूर देखा हूँ।'
मेरी बात सुनते ही सभी पत्रकार बंधू-बांधव मेरी ओर देखने लगे। फिर गिल साहब कहते हैं: 'मैं एक बार राजधानी एक्सप्रेस ट्रेन से कलकत्ता (हावड़ा) से नई दिल्ली आ रहा था। जब पटना में ट्रेन रुकी तो खिड़की से बाहर देखा। प्लेटफॉर्म पर जो अनुशासन होनी चाहिए, नहीं थी। स्वाभाविक है प्रदेश का भी वही हाल होगा।' उनकी बातों को सुनकर मुझे हंसी आ गई।सोचने लगा कि 'ट्रेन की खिड़की से बाहर चाँद मिनट देखकर गिल साहब पुरे प्रदेश की कानून व्यवस्था को आंक लिए।काश भारत में ऐसे ही 'दिव्य दृष्टि' वाले अधिकारी होते।'

लेकिन जनपथ सड़क पर वेस्टर्न कोर्ट के सामने खड़े होकर जब आशीष शर्मा की तस्वीरों को, उनकी किताब को, उनकी सोच को, कैमरे से कश्मीर को दिखाने की बात को एक सरसरी निगाहों से आंक रहा था, तो सोचा 'एक व्यक्ति, अपनी जमीन को जितना अधिक बेहतर जान सकता है, अपनी जमीन और जमीर के साथ जितना बेहतर तारतम्य बना सकता है (बशर्ते आत्मा से जीवित हो), दूसरा व्यक्ति नहीं कर सकता है। आशीष का यह फोटो प्रदर्शनी (इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र) आत्म संतुष्टि देता है।
शर्मा का जन्म और पालन-पोषण कश्मीर में हुआ, हालांकि उनकी जड़ें महाराष्ट्र से हैं। उनके पूर्वज महाराजा के शासन के दौरान जागीरदारों (जमींदारों) के रूप में कश्मीर आए थे। तब से, परिवार श्रीनगर में रह रहा है। शर्मा कहते हैं कि 'मेरे पिता का जन्म बिजबेहरा में हुआ था, और मेरा जन्म 1989 में लाल चौक के पास हुआ था।'

उनका कहना है कि 'उग्रवाद का सीधा सामना करने के बाद, सबसे काले, सबसे हिंसक वर्षों के दौरान जीवन को कैद करने के लिए मैंने कैमरा उठाया। जब मैं सिर्फ आठ साल का था, आतंकवादियों को अपने घर में घुसते और अपने पिता पर बंदूक तानते देखा हूँ मैं। जैसे-जैसे बड़े हो रहे थे, प्रदेश में उग्रवाद भी अपने चरम पर बढ़ रहा था। मैंने कश्मीर को खून बहते, रोते और विलाप करते देखा है। मैंने इस स्वर्ग के अंधेरे पक्ष को देखा है, जहाँ संघर्ष बेहद खूबसूरत पृष्ठभूमि के खिलाफ स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। परिणाम यह हुआ कि किसी भी अन्य चीज़ से ज्यादा, मुझे परिवर्तन को कैद करने का लालच बढ़ा और कैमरा हाथ में आ गया।"
आशीष कहते हैं कि 'हमारा विचार जम्मू को दिखाने का था क्योंकि हम अक्सर भूल जाते हैं कि यह जम्मू और कश्मीर है, सिर्फ़ कश्मीर नहीं, और जम्मू की अपनी पहचान भी है।" प्रदर्शनी हॉल में प्रवेश करते ही एक छोटी सी पट्टिका नज़र आती है। इस पर लिखा है: "अगर फिरदौस बर रू-ए ज़मीन अस्त, हमीं अस्त-ओ हमीं अस्त-ओ हमीं अस्त।" मूल रूप से फ़ारसी में, इसका अंग्रेज़ी और शारदा लिपि में भी अनुवाद किया गया है: "अगर धरती पर कहीं स्वर्ग है, तो वह यहीं है, यहीं है, यहीं है।"

आशीष कहते हैं: "लेकिन समय एक मरहम लगा देता है। बदल जाता है, यह दयालु हो जाता है। यह सिद्धांत कश्मीर के लिए भी लालू हुआ, समय बदला। पाँच साल पहले, आशा की एक किरण दिखाई दी, जिसने उस निराशा को बदल दिया जिसने इस क्षेत्र को जकड़ लिया था। दशकों में पहली बार, जम्मू और कश्मीर संघर्ष और अनिश्चितता से उभरना शुरू हुआ। मैंने यह भी देखा था जीवन कैसे जाती है, और मैंने यह भी देखा कि कैसे जीवन वापस लौटती है। पुरे प्रदेश में फिर से अमन स्थापित होने लगा। मेरा काम इस क्षेत्र के गतिशील वर्तमान और उम्मीद से भरे भविष्य के बारे में है, जिसे मैंने तस्वीरों के ज़रिए एक सार्थक सोच को दिखने की कोशिश किया हूँ।"
एक फ़ोटो पत्रकार और इस भूमि से गहरे जुड़ाव वाले एक कश्मीरी के तौर पर, मैं न केवल एक पर्यवेक्षक का लेंस लेकर आता हूँ, बल्कि एक निवासी का दिल भी। इस जगह के बारे में मेरे अनुभव, सहानुभूति और गहन ज्ञान मुझे मिथकों को तोड़ने और जम्मू और कश्मीर और इसके लोगों के बारे में सच्चाई को उजागर करने में मदद करते हैं। मैं आपको हर तस्वीर के पीछे की कहानियों को देखने के लिए आमंत्रित करता हूँ।

प्रत्येक तस्वीर मेरी भूमि, उसके जीवन, उसकी कला, उसकी संस्कृति और उसके लोगों का चित्रण है - एक ऐसी भूमि जिसे अक्सर निहित स्वार्थों के प्रचार के कारण गलत समझा जाता है जो विभाजित जम्मू और कश्मीर पर पनपे हैं। ये तस्वीरें एक ऐतिहासिक परिवर्तन को दर्शाती हैं। जम्मू और कश्मीर आधुनिकता को अपना रहा है जबकि इसकी कालातीत कश्मीरियत - एक जीवन शैली - कायम है। कला, शिल्प, वस्त्र, साहित्य और व्यंजन एक समृद्ध भविष्य के साथ-साथ पनपते हैं। ये तस्वीरें प्राचीन और नए के बीच सामंजस्य को दर्शाती हैं, एक ऐसी भूमि दिखाती हैं जो स्वर्ग बनी हुई है, जहाँ परंपरा और प्रगति सहज रूप से मिलती है।

आशीष कहते हैं कि 'पिछले कुछ सालों में, कश्मीर नवीनीकरण के जीवंत रंगों में खिल उठा है। पहली बार, मैंने इसे शांति और प्रगति को गले लगाते हुए देखा। मैं उस कश्मीर को देखता हूँ जिसके बारे में मेरे पिता ने कभी बात की थी - एक ऐसी जगह जहाँ उन्होंने श्रीनगर के दिल में लाल चौक में एक संपन्न संगम फ़ोटो स्टूडियो चलाया, जहाँ पर्यटकों और स्थानीय लोगों का आना-जाना लगा रहता था और इस रमणीय जगह की यादों से भरे एल्बम बनाए जाते थे। सीपिया रंग की उन तस्वीरों में एक शानदार मूड झलकता था। सौम्य परिदृश्य, मनमोहक सुंदरता ने एक किशोर के रूप में मेरे अंदर कुछ हलचल पैदा की, जिससे फ़ोटोग्राफ़ी के लिए मेरा जुनून और क्षेत्र की लुभावनी घाटियों को दस्तावेज़ित करने की ज़रूरत पैदा हुई।

लैंडस्केप फ़ोटोग्राफ़ी के साथ, मुझे समझौता करने की ज़रूरत नहीं थी, मुझे इस बात की चिंता नहीं थी कि मेरी तस्वीरें आपत्तिजनक या दखल देंगी। मुझे बस उपलब्ध प्रकाश के बारे में चिंता करनी थी! अपनी फ़ोटोग्राफ़िक यात्रा में मैं जम्मू और कश्मीर के परिदृश्यों से होकर गुज़रता हूँ। मेरी तस्वीरें इस क्षेत्र की लुभावनी सुंदरता और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को कैद करती हैं, वे सिर्फ़ इस क्षेत्र की कालातीत सुंदरता, इसके आकर्षण, इसके लोगों की गर्मजोशी और आतिथ्य के बारे में घिसे-पिटे मुहावरों को ही नहीं दोहरातीं - हालाँकि आपने इसके बारे में जो कुछ भी सुना है वह सच है। मेरा काम इस क्षेत्र के गतिशील वर्तमान और उम्मीद से भरे भविष्य के बारे में भी है। बहुत लंबे समय से, कश्मीर के इर्द-गिर्द की कहानी संघर्ष पर हावी रही है। अपनी तस्वीरों के ज़रिए, मैं उस नज़रिए को बदलने की उम्मीद करता हूँ।
यह प्रदर्शनी आगामी 1 जुलाई तक दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में प्रदर्शित रहेंगी । इस प्रदर्शनी का उद्घाटन 16 जून को उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने किया था। ज़्यादातर तस्वीरें 2019 के बाद कश्मीर की हैं, जब अनुच्छेद 370 को निरस्त किया गया था।
