कलकत्ता/पटना/मुजफ्फरपुर/लखनऊ/नई दिल्ली: 23 मार्च, 1995 को दिल्ली से प्रकाशित दी इण्डियन एक्सप्रेस के प्रथम पृष्ठ पर करीब आठ कॉलम में एक कहानी प्रकाशित होती है। वह कहानी सांख्यिकी के आधार पर थी। उस कहानी में यह लिखा गया था कि दिल्ली पुलिस जी बी रोड यानी श्रद्धानंद मार्ग स्थित कोठों से सप्ताह वसूलती है। उस समय दिल्ली पुलिस के आयुक्त श्री निखिल कुमार थे। जिस दिन वह कहानी प्रकाशित हुई, उसी रात कोई 12 बजे मंदिर मार्ग, कनॉट प्लेस, पंचकुहिया रोड क्षेत्रों में "सीवर-लाइन ब्लास्ट" हुआ। दर्जनों लोग हताहत हुए। इण्डियन एक्सप्रेस के तीन संवाददाता - मैं, श्री अजय सूरी और श्री संजीव सिन्हा - मौके वारदात पर थे। मन्दिर मार्ग के पुलिस कर्मी अपने उच्च अधिकारियों को हमलोगों की ओर इशारा किये। फिर क्या था, मुझे और संजीव की पिटाई-कुटाई हो गई।
देर रात श्री निखिल कुमार, तत्कालीन सेन्ट्रल डिस्ट्रिक्ट के उपयुक्त श्री आदित्य आर्या दफ्तर पधारे। उधर तत्कालीन केंद्रीय गृह राज्यमंत्री पी एम सईद (अब दिवंगत) देर रात अपने घर कार्य कर रहे थे। हमलोगों की फोन की घंटी टनटनाइ। पूरी बात सुने और कहानी खुलकर लिखने को कहा। उसी रात कोई 2 बजे मंदिर मार्ग थाना के तीन कर्मी लाइन हाज़िर हो गए।
आजश्रद्धानंद मार्ग के इलाके में गया था। आज भी उस इलाके में महिलाओं की घरों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं है । आज भी उन्हें अच्छे स्वास्थ्य, शिक्षा, संस्कृति, भोजन-व्यवस्था, वस्त्र के लिए ललकना पर रहा है। यहाँ कोई दो हज़ार से अधिक मतदाता हैं जो दिल्ली विधान सभा और लोक सभा चुनाव में अभ्यर्थियों को वोट देते हैं। चुनाव के समय अभ्यर्थी दूर से यहाँ हाथ हिलाते दीखते हैं। परन्तु चुनाव के बाद अगली चुनाव में दर्शन देते। इन महिलाओं की क्षमता नहीं है कि वे अपनी आवाज बुलंद कर सकें।
दिल्ली की सरकारी कार्यालयों में, फाइलों में इनके जीवकोत्थान के लिए काला, लाल, हरे स्याहियों से पन्ना-दर-पन्ना टिपण्णी लिखे होते है; परन्तु फाइलों की गति "दिव्यांगों" की गति से भी 99 फीसदी धीमी होती है। क्योंकि अगर गति तीव्र होती तो शायद मरणासन्न जीवन जीने वाली यह महिला मतदाताओं का जीवन कुछ अलग होता।
कहते हैं नाम का हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। कई लोग अपने नाम का ‘अर्थ’ भी नहीं समझते। फिर उसे ‘सार्थक’ या ‘निरर्थक’ सिद्ध करने में उनकी भूमिका का ‘गौण’ होना भी स्वाभाविक है। समाज का औसतन पचास से अधिक फीसदी महिला-पुरुष अपने नाम की सार्थकता जीवन पर्यन्त सिद्ध और सार्थक नहीं कर पाते। अगर ऐसा होता तो शायद भारतवर्ष की स्थिति आज ऐसी नहीं होती। लेकिन जब समाज के लोग अपने हित में किसी और का नाम खुले बाजार में बेच देते हैं, फिर उसे अपना नाम अपभ्रंश कर समाज में जीना होता है। दुर्भाग्य यह है कि उस अपभ्रंशित नाम, शाब्दिक से व्यावहारिक अर्थ तक, अपनी सार्थकता सिद्ध करता है फिर उसे समझने के लिए हमारे समाज में शायद शून्य दशमलव एक फ़ीसदी लोग भी नहीं होते हैं।
यह बात मैं नहीं कह रहा हूँ। यह बात आज से कोई पैंतीस वर्ष पहलेलखनऊ के हज़रतगंज और चारबाग, पटनासिटी के मालसलामी, मुजफ्फरपुर के चतुर्भुज स्थान, दिल्ली के जी बी रोड (अब श्रद्धानन्द मार्ग), कलकत्ता के सोनागाछी क्षेत्रों में उन दिनों उम्र से बूढी तंग गलियों में जीवन की सांस गिनने वाली समाज से उपेक्षित बेटियों की मौसी, बाज़ारों में बेचीं गई बेटियों की मौसी, कूड़े-कचरों के ढ़ेरों से उठाई-पोसी गई बेटियों की मौसी, पैसे के लालच में अपनी बेटियों-पत्नियों को बेचने वाले भारतीय मर्दों की पत्नियों की मौसी कही थी – वह भी फ़क्र के साथ, सर उठावह तो यह भी कही थी कि “अगर हमारी बेटियां अपना जिस्म बेचना बंद कर दे तो आपके समाज की बहु-बेटियां चौराहों पर नग्न हो जाएँगी। समाज के संभ्रांतों की इज्जत बड़े-बड़े शहरों की सड़कों पर बेपर्द हो जाएगी। तमीज और तहजीव तो हमारी बेटियों में है जो ‘आदाब’ और ‘खुदहाफिज़’ कहकर आपका सम्मान भी करती है और आपकी पुरुषार्थ को, आपकी इज्जत को अपने दोनों पैरों के बीच कुछ देर रख लेती है। आप उसमें ही खुश हो जाते हैं। आपको जीवन के उत्कर्ष वाली शांति प्राप्त होती है। उस ‘शांति’ की बात आप अपने-अपने घरों की ‘शांति’ से नहीं करते। लेकिन उसे, मुझे ‘वेश्या’, ‘रंडी’, ‘बदचलन’ भी आप ही कहते हैं।”
मौसी फिर कहती है: “मेरी बेटियों को देखकर समाज की औरतें अपने-अपने बच्चों को खींचकर दरवाजे के अंदर इस कदर खींचती हैं जैसे हमारी बेटियां ”एयर-बोर्न डिजीज’ लेकर चल रही हों। हमारी बेटियां कभी ‘चूं’ भी नहीं करती। लेकिन आपके घरों की ‘शांति’ को देखकर ‘मुस्कुराती’ जरूर हमैं तो महज उस श्रद्धेय मौसी की बातों को आज दोहरा रहा हूँ।
पैंतीस वर्ष पहले कलकत्ता से प्रकाशित ‘आनंद बाजार पत्रिका’ का ‘संडे’ पत्रिका एक कवर स्टोरी कर रही थी। हम सभी छोटे से बड़े संवाददाता भारत के विभिन्न ‘लालरंगी क्षेत्रों’ में स्थित संकीर्ण गलियों की कहानी, उन गलियों में रहने वाली मौसियों, उनकी बेटियों की रुदन को शब्दबध्द कर कलकत्ता भेज रहे थे। उद्देश्य था ‘समाज के संभ्रांतों की सोच बदले – क्योंकि अपने-अपने नजरों में नंगे सभी हैं और उसी नंग आखों से दूसरों की नंग्नता को आंकते हैं।
जो ‘समाज के अंदर’ है, उन्हें ‘संभ्रांतों’ के रूप में अलंकृत करते हैं; जो समाज की तंग-गलियों में सांस ले रही हैं, जो समाज के संभ्रांतों की पुरुषार्थ को शांत कर रही हैं, उसे ‘वेश्या’, ‘रंडी’ ‘बदचलन’ शब्दों से अलंकृत किया जाता है। हाँ, सामाजिक, बौद्धिक और चारित्रिक बाजार में वे भले ‘चरित्रहीन’ हों; लेकिन भारत के राजनीतिक बाजार में उनका और समाज के संभ्रातों का मोल ‘बराबर’ होता है – एक वोट – जो स्थानीय राजनेताओं के राजनीतिक चरित्र का निर्माण करता है। इससे बड़ी ‘बिडम्बना’ और क्या हो सकती है।
लेकिन भारत में ‘वेश्यावृति’ आज भी क़ानूनी तौर पर अपराध हैकल मुद्दत बाद गंगूबाई फिल्म देखा। जब तक वह ‘गंगा’ थी, समाज के लोग उसकी ‘पवित्रता’ को ठग कर शरीर खरीद-बिक्री के बाजार में बेच दिया। गंगा अपभ्रंशित होकर ‘गंगू’ हो गई। लेकिन ‘गूंगी’ नहीं हुई। कोई कहता है यह फिल्म मशहूर लेखक हुसैन जैदी की किताब ‘माफिया क्वीन्स ऑफ मुंबई’ पर आधारित है। कोई कहता है गंगूबाई 60 के दशक में मुंबई माफिया का बड़ा नाम थीं। उसके पति ने महज पांच सौ रुपए के लिए बेच दिया था और इसके बाद से ही वे वेश्यावृत्ति में लिप्त हो गई थी।
लेकिन संजय लीला भंसाली ने भारतीय वेश्यावृति समाज की पीढ़ी-दर-पीढ़ी से लेकर वर्त्तमान काल तक की स्थिति को गंगूबाई के माध्यम से जिस कदर पेश किया है, काबिले तारीफ है। यह इस बात को भी उजागर करता है कि आज भी समाज में वेश्याओं को अपनी आवाज खुद बननी होगी क्योंकि समाज में मानसिकता का महज दो फांक नहीं, सहस्र फांक है और सभी अपना-अपना राग अलाप रहे हैं। इस फिल्म में गंगूबाई का किरदार आलिया भट्ट ने जिस कदर निभाई हैं, वह उनके समाज के बाहर के समाज को “गूंगा” बना दी हैं।
एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के इतिहास में कई ऐसी महिलाएं रहीं जिनका रुतबा और शान विश्व प्रख्यात रहा। ये महिलाएं केवल सिनेमा, राजनीति और खेल जगत तक ही सीमित नहीं रहीं बल्कि समाज सेवा जैसे कई ऐसे क्षेत्रों से जुड़कर उन्होंने विश्व भर में अपना नाम बनाया। लेकिन उन महिलाओं के जीवन के विषय में लोग कम ही जानते हैं। कहा जाता है कि गंगा हरजीवनदास यानी गंगूबाई गुजरात की एक पढ़ी-लिखी और संपन्न परिवार से ताल्लुक रखती थीं। उनका जन्म गुजरात के काठियावाड़ में 1939 में हुआ था। जब गंगूबाई छोटी थीं तब वो बॉलीवुड की अभिनेत्री बनने का ख्वाब रखती थीं और अपना सपना पूरा करने मुंबई आना चाहती थीं।
16 साल की आयु में जब गंगू पढ़ाई करने कॉलेज पहुंची तो उनके जीवन में एक बड़ी घटना ने दस्तक दी। गंगू को 16 वर्ष की आयु में ही प्यार हो गया था और उस शख्स का नाम था रमणीक लाल। रमणीक गंगू के पिता के लिए बतौर एक अकाउंटेंट का कार्य करते थे। जब गंगू का प्यार परवान चढ़ा तो उन्होंने रमणीक से शादी करने का मन बनाया और उसके साथ भागकर मुंबई आ गईं। लेकिन ये प्यार उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल साबित हुआ क्योंकि रमणीक ने गंगू को केवल 500 रुपये के लिए कोठे पर बेच दिया।
बहरहाल, ‘मायइण्डिया‘ के एक लेख के अनुसार सन 1956 में, अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम द्वारा यौनकर्मियों की स्थिति के बारे में एक अत्यधिक महत्वपूर्ण कानून पारित किया गया था। जिसे एसआईटीए के नाम से भी जाना जाता है। यह कानून बताता है कि वेश्याओं को उनके निजी व्यापार को चलाने की पूरी अनुमति है, लेकिन वे इस व्यवसाय को सार्वजनिक रूप से या खुलेआम बिल्कुल भी नहीं चला सकती हैं।
बीबीसी में एक लेख प्रकाशित किया गया था, जिसमें कहा गया है कि भारत में वेश्यावृत्ति अवैध है। हालांकि भारतीय कानून, वेश्यावृत्ति के रूप में पैसों के बदले वेश्याओं के साथ सेक्स सम्बन्ध बनाने की अनुमति नहीं देता है। कानून के अनुसार, यदि वे सार्वजनिक रूप से किसी भी यौन गतिविधियों में शामिल होती हैं, तो उनके ग्राहकों को गिरफ्तार भी किया जा सकता है। यदि एक व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत क्षमता के आधार पर पैसे देकर अगर किसी वेश्या से उसके बदले में सेक्स की अनुमति मांगता है, तो कोई भी वेश्या सार्वजनिक स्थान से लगभग 200 गज की दूरी के अंदर यह काम नहीं कर सकती है। देखा जाए, तो ये यौनकर्मी सामान्य श्रम कानूनों के दायरों में नहीं आती है। हालांकि, उनके पास वे सभी अधिकार हैं जो एक आम नागरिक के पास होते हैं, लेकिन आम लोग उनसे केवल आनंद ही लेना चाहते हैं, अगर वे इस दलदल से बचना चाहती हैं, तो उनका पुनर्वास भी करवाया जा सकता हैं।
हालांकि, एसआईटीए के रूप में इसका प्रयोग इस तरह नहीं किया जाता है। कभी-कभी आईपीसी के विभिन्न वर्गों को यौनकर्मियों के खिलाफ उनकी सार्वजनिक अश्लीलता, आपराधिक कृत्यों और आरोपों के विरुद्ध नियोजित किया जाता है। उनके ऊपर सार्वजनिक रूप से बाधाएं उत्पन्न करने के भी आरोप लगाए जा सकते हैं। अब समस्या यह है कि क्या इन अपराधों की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है क्योंकि कुछ सनकी अधिकारियों द्वारा यौनकर्मियों का शोषण करने के बाद उन्हें छोड़ दिया जाता है, वही यौनकर्मी बाद में उनके खिलाफ आरोप लगाती हैं। ‘एसआईटीए’ को हाल ही में ‘पीआईटीए’ या अनैतिक व्यापार (रोकथाम) के अधिनियम द्वारा बदल दिया गया है। इस कानून को बदलने के कई अथक प्रयास किये जा रहे हैं जिससे कि समाज में विस्तृत समूह में फैले हुए वेश्यावृत्ति और वेश्याओं के ग्राहकों पर लगे दोषों पर रोक लगाई जा सके। हालांकि, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने वेश्यावृत्ति में निरन्तर हो रहे विकास का विरोध किया है। लेकिन इन दिनों, कई बीमा कंपनियां यौनकर्मियों का बीमा करने के लिए आगे आ रही हैं।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 30 लाख यौनकर्मी रहते हैं। भारत में जिन महिलाओं को पैसे की अत्यधिक आवश्यकता है और उनके पास धन कमाने का कोई रास्ता नहीं है तो वे विवश होकर इस पेशे को अपना लेती हैं। हालांकि, बहुत से ऐसे लोग भी होते हैं जो इन महिलाओं को वेश्यावृत्ति के पेशे को अपनाने के लिए मजबूर करते हैं। ऑल इंडिया नेटवर्क ऑफ यौनकर्मी के अध्यक्ष, भारती डे का कहना है कि महिलाएं खुद के हालातों से समझौता करके, अन्त में वेश्या बन जाती हैं, मगर हमें उन वेश्याओं को दूसरों के समान अधिकार देने की आवश्यकता है। पिछले कुछ सालों में, वेश्यावृत्ति के उद्योग में भारी बढ़ोतरी हुई है और नए यौनकर्मी में से अधिकांश महिलाएं ग्रामीण क्षेत्रों की हैं, जिनमें बहुत ही कम महिलाएं ऐसी हैं जो कम या बिल्कुल भी शिक्षित नहीं है। उनमें से कुछ महिलाएं ऐसी हैं जो कम रुपयों में ही कोई छोटा और अच्छा काम करने का रास्ता चुनती हैं, जबकि कुछ महिलाएं अधिक रुपयों के लालच में यौनकर्मी का काम चुनती हैं।
वास्तव में, डे की अध्यक्षता वाला समूह, वेश्यावृत्ति में लिप्त महिलाओं को बाहर निकालना चाहता है। अप्रैल 2015 के दौरान, महिलाओं के खिलाफ अपराधिक मामलों पर एक बैठक बुलाई गई थी और उसमें ऐसा कहा गया था कि अगर भारत यौनकर्मियों की संख्या को कम करने में सफल रहा, तो देश में महिलाओं की स्थिति काफी बेहतर हो जाएगी। 2009 में, सुप्रीम कोर्ट ने यह सुझाव दिया था कि वेश्यावृत्ति के लिए कानून बनाया जाए। महिलाओं के लिए राष्ट्रीय आयोग, एक राष्ट्रीय-सरकारी संगठन ने इस मुद्दे को नजरअंदाज कर दिया। इसकी प्रमुख ललिता कुमारमंगलम ने कहा था कि अगर वेश्यावृत्ति को पूर्ण रूप से नियंत्रित करना है, तो हमारे देश के उच्च अधिकारियों को विशेष रूप से बच्चों की तस्करी पर रोक लगाने के लिए जल्द से जल्द कोई बेहतर कदम उठाने होगें।
यह उन बुरे हालातों में सुधार करने में मदद करेगा, जिसमें ग्राहक और यौनकर्मी के शरीर में एचआईवी-एड्स के प्रसार के साथ किसी अन्य बीमारी भी एक-दूसरे में पहुंचती हैं। 8 नवंबर को उन्होंने इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में विशेष पैनल के रूप में प्रस्तुत किया, जो कानून बदलना चाह रहे थे। ‘मयंक ऑस्टेन सूफी’ जीबी रोड पर स्थित वेश्यालय के बारे में लिखते रहे हैं और उनके अनुसार, सभी यौनकर्मी से बातचीत करने पर पता चला है कि वे सभी कानूनी दर्जा प्राप्त करने की इच्छा रखती है। वे लोग डॉक्टरों के पास बार-बार जाकर थक गई है और हमेशा पुलिस द्वारा परेशान किये जाने का डर भी उन्हें लगा रहता है। वे अपने मालिकों के घर भी एक डर की संभावना के साथ रहती हैं कि पता नहीं कब उनका मालिक उनको उस घर से निकाल दें, वे सब जीवित रहने के लिए वेश्यावृत्ति करने को मजबूर हैं।
जबकि इसके विपक्ष में विचार देने वालों का मानना है कि यह निश्चित रूप से सच है, हम केवल मजबूरी में की जाने वाली वेश्यावृत्ति को तुरंत बंद कर सकते है न कि ऐसी किसी भी गतिविधियों को जो स्वेच्छा से हो रही है। ‘अपने आप’ नाम का एक गैर-तस्करी समूह का कहना है कि तस्करों के दलालों द्वारा गांवों में युवा लड़कियों और बच्चियों के माता-पिता को कम कीमत देकर खरीदते हैं, वह उन लड़कियों को दुगनी कीमत पर बेचते है, इसलिए इन मासूम लड़कियों को मजबूरी में अपने साथ हो रहे बलात्कार को सहना पड़ता है। अक्सर, पुलिस और एनजीओ के संगठनों ने इन पर छापा भी मारा है और लड़कियों को बचाने में मदद भी की है, लेकिन इससे कोई खास फायदा नहीं हुआ क्योंकि जैसे ही लड़कियां उनके चंगुल से छूट कर आती है, उनके परिवार वाले फिर से उन्हीं दलालों के हाथ बेच देते है।
