नई दिल्ली: भारत में तक़रीबन 27 करोड़ लोग (मतदाता सहित) गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। इन्ही गरीबी रेखाओं के नीचे देश के लाखों पत्रकार भी रहते हैं जो शब्दों के सहारे अपना और अपने परिवार का जीवन यापन कर रहे हैं। आज भी देश से प्रकाशित लाखों पत्र-पत्रिकाओं में 'सामान्य पत्रकारों को', 'इंच' और 'बित्ता' से पंक्तियों को और रुद्राक्ष की मालाओं पर शब्दों को गिनकर पैसा दिया जाता है, वह भी न्यूनतन तीन-चार महीनों के बाद। यह सिद्धांत उन पत्रकारों के साथ लागू नहीं है जो 'शब्दों के साथ खिलवाड़ कर पत्रकारिता के कन्धों के सहारे आगे बढ़ते हैं।
वैसे समाज के प्रतिष्ठित, संभ्रात लोगबाग पत्रकारों को ज्ञान की घुटी पिलाने में तनिक भी संकोच नहीं करते। सामाजिक सरोकार का पाठ पढ़ाने, समाज के प्रति उनके दायित्व को याद दिलाने में कोताही नहीं करते। वैसे सरकार भी यह मानती है कि गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की जिंदगी उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती है। संभव है आगामी लोकसभा और विधान सभाओं के चुनावों में केंद्र से लेकर राज्यों तक की सत्तारूढ़ पार्टियां 'गरीबी रेखा' को कश्मीर से कन्याकुमारी तक मिटाने का वादा भी करें। कुछ भी हो सकता हैं।
खैर। अब तनिक तथ्य पर आएं। भारत सरकार के वित्त मंत्रालय का एक दस्तावेज देखकर सन 1958 में बनी सत्येन बोस द्वारा निर्मित ‘चलती का नाम गाड़ी’ फिल्म याद आ गई। इस फिल्म में गीतकार थे मजरूह सुल्तानपुरी, संगीतकार थे सचिन देव बर्मन। इस गीत का बोल था “मैं सितारों का तराना…मैं बहारों का फ़साना…रूप का तुम हो खज़ाना…तुम हो मेरी जाँ ये माना…लेकिन पहले दे दो मेरा…पांच रुपैया बारा आना…पाँच रुपैया…बारा आना-आआ…मारेगा भैया…ना ना ना ना-आआ।”
इस गीत का जिक्र इसलिए किया हूँ कि अगर उस दस्तावेज को माने तो भारत के संसद के किसी भी पूर्व माननीय सम्मानित सदस्यों के बारे में पेंशन से संबंधित जानकारियां की वे पेंशनभोगी हैं या नहीं, उनका परिवार पेंशनभोगी है अथवा नहीं – दो रुपये प्रति पृष्ठ के हिसाब से उपलब्ध की जा सकती है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण जानकारी यह है कि जब आप दो रूपये प्रति पृष्ठ के हिसाब से जमा कर देंगे तो आपको जो जानकारी मिलेगी, उसे देखकर, पढ़कर आपके होश उड़ जायेंगे, आपको गश आ जायेगा, आपका सुगर डीप कर जायेगा, आपको चक्कर आ जायेगा और आप चारो-खाने चित्त गिर जायेंगे।
क्योंकि विगत दो दशकों में, यानी सं 2000-01 वित्तीय वर्ष से 2020-21 वित्तीय वर्ष तक भारत सरकार के खजाने से कुल 8,771,486,000/- रुपये की निकासी हुई है - सिर्फ और सिर्फ एक मद पर खर्च के लिए । यह रकम आने वाले दिनों में दो-गुना, तीन-गुना, चार-गुना और अधिक भी हो सकती है। यह रकम वर्तमान में लोकसभा / राज्यसभा के क्रमशः 1981 एवं 741 भूतपूर्व सदस्यों के पेंशन पर व्यय हुआ है और आगे भी होता रहेगा।
आंकड़ों के अनुसार 2000 -2001 में 46833000/- रुपए, 2001-2002 में 32102000/- रुपए, 2003-2004 में 73492000/- रुपए, 2004-2005 में 104993000/- रुपए, 2005-2006 में 108762000/- रुपए, 2006-2007 में 227902000/- रुपए, 2007-2008 में 252595000/- रुपए, 2008-2009 में 316242000/- रुपए 2009-2010 में 391447000/- रुपए, 2010-2011 में 624146000/- रुपए, 2011-2012 में 253790000/- रुपए, 2012-2013 में 552597000/- रुपए, 2013-2014 में 596684000/- रुपए, 2014-2015 में 623984000/- रुपए, 2015-2016 में 650798000/- रुपए, 2016-2017 में 535629000/- रुपए, 2017-2018 में 554382000/- रुपए, 2018-2019 में 580216000/- रुपये, 2019-2020 में 705100000/- रुपए और 2020-2021 में 992209000/- रुपये। वैसी स्थिति में देश में विकास कहाँ होगा, कैसे होगा आप जाने।
अब अपने प्रदेश चलते हैं, जहाँ सम्मानित नितीश बाबू नवमीं बार मुख्यमंत्री कार्यालय में स्थापित हुए। बिहार के 991 ‘पूर्व विधायकों और उनकी आश्रित पत्नियों के खाते में “क्रेडिट” भी स्थानीय सरकार के कोषागार से पैसे पेंशन के रूप में जमा होता है । इस क्रिया-प्रक्रिया का कोई अंत नहीं है, क्योंकि विधायकों की संख्या क्रमशः बढ़ेंगे। स्वाभाविक है राशि भी बढ़ेगी ही। वैसी स्थिति में प्रदेश के 38 जिलों में, 101 अनुमंडलों में, 534 पंचायत समितियों और 8387 पंचायतों में रहने वाले लोग यह कैसे विश्वास करेंगे कि उनके घरों में भी विकास के दीपक जलेंगे? संभव है ये सभी विधायक महोदय मन-ही-मन सोचते भी होंगे, अपने से पूछते भी होंगे की “कैसी सरकार है? कैसी व्यवस्था है? कैसे लोग बाग है? कैसी नियम-कानून है? कभी कोई आवाज भी नहीं उठाता कि सरकारी कोष से इतनी बड़ी रकम क्यों खर्च होती है?
प्लासी युद्ध 23 जून, 1757 के बाद 22/23 अक्टूबर 1764 को बक्सर के आसपास ईस्ट इंडिया कंपनी के हैक्टर मुनरो और मुगल तथा नवाबों की सेनाओं के बीच युद्ध हुआ था । लड़ाई में अंग्रेजों की जीत हुई और इसके परिणाम में बंगाल, बिहार, उड़ीसा का दीवानी और राजस्व अधिकार अंग्रेज कंपनी के हाथ चला गया। चाहे इतिहास को कितना भी ममोड़ा जाय, ‘बैटल ऑफ़ बक्सर’, इतिहास में अमिट है। विगत दिनों बक्सर के ही शिव प्रकाश राय सैद्धांतिक तौर पर प्रदेश की राजनीतिक व्यवस्था और जनता द्वारा कर के रूप में सरकारी कोष में जमा राशि का सार्वजनिक जानकारी के अभाव में कैसे नोच-खसोट होता है, एक युद्ध के रूप में बिगुल बजाया है – सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत सूचना प्रदान करने के क्रम में।
दिनांक 27-07-2021 को भारत सरकार के वित्त मंत्रालय (व्यय विभाग) के केंद्रीय पेंशन लेखा कार्यालय के पत्रांक CPAO/RTI/2020-21/LS-RS/P-137/762 OTH2108088, OTH 2118951 के तहत शिव प्रकाश राय को लिखा है: “उपरोक्त विषय के संदर्भ में आपका आरटीआई आवेदन पत्र दिनांक 28-05-2021 सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत राज्य सभा सचिवालय से पात्र संख्या RS/2(155)/2021-RTI दिनांक 01-07-2021 एवं लोक सभा सचिवालय से पत्र संख्या 1(675)/IC/21 दिनांक 08-07-2021 के द्वारा इस कार्यालय को प्राप्त हुआ है, के बिंदु संख्या 1 एवं 2 के सन्दर्भ से सम्बंधित अनुभागों एवं इस कार्यालय में उपलब्ध जानकारी के आधार पर सूचित किया जाता है कि वर्तमान में लोकसभा और राज्यसभा के क्रमशः 1981 एवं 741 भूतपूर्व सदस्य पेंशन प्राप्त कर रहे हैं।
साथ ही यह भी अवगत कराया जाता है कि लोकसभा / राज्यसभा के पूर्व सदस्यों के के आश्रितों का अलग से कोई वर्ग नहीं है, उपर्युक्त पेंशनभोगी / पारिवारिक पेंशन भोगी सभी मिश्रित हैं। उपरोक्त सदस्यों की सूची प्राप्त करने के लिए आपको 2/- रुपये प्रति पेज के हिसाब से भुगतान करना होगा तत्पश्चात आपको सुच डाक द्वारा प्रेषित कर दी जाएगी। इन सूचियों के पेजों की संख्या 59 है, अतः आप 118/- रुपये का भुगतान पोस्टल ऑर्डर / बैंक ड्राफ्ट /डिमांड ड्राफ्ट / बैंकर्स चेक द्वारा वेतन एवं लेखा अधिकारी, केंद्रीय पेंशन लेखा कार्यालय, नई दिल्ली के पक्ष में कर संसद सदस्यों की सूची प्राप्त कर सकते हैं। भूतपूर्व सांसदों का वर्ष 2000-2001 से 2020-2021 में दिए गए पेंशन पर कुल खर्च का ब्यौरा संलंग हैं।”
अब बिहार आएं। बिहार के भूतपूर्व विधायकों को देय पेंशन का सवाल है, बिहार विधान सभा के प्रभारी सचिव के अनुसार 2015-16 वित्तीय वर्ष में 996 विधायकों के पेंशन / पारिवारिक पेंशन पर कुल 424300000/- रुपये खर्च किये गए। अगले वित्तीय वर्ष, यानी 2016-17 में भूतपूर्व विधायकों की संख्या 981 हो गई और उन पर कुल 414795000/- रुपये खर्च किये गए। सन 2017-2018 वित्तीय वर्ष में पेंशन और पारिवारिक पेंशन भोताओं की संख्या में इजाफा हो कर 1062 हो गया और पेंशन तथा पारिवारिक पेंशन के मद में कुल 449874000/- रुपये खर्च किये गए। इसी तरह 2018-2019 वित्तीय वर्ष में संख्या 1037 हो गई तथा इस मद में कुल 441477000/- रुपये व्यय हुए। जबकि 2020-२०२१ वित्तीय वर्ष में वैसे भोक्तओं की संख्या में पूर्व वित्तीय वर्ष की तुलना में कमी तो आई (संख्या 1008 हो गई), लेकिन पेंशन / पारिवारिक पेंशन के माध में व्यय राशि बढ़कर 607300000 हो गयी।
बिहार विधानसभा सचिवालय से दी गई जानकारी के अनुसार राज्य में ऐसे 12 राजनेता हैं जिन्हें एक से डेढ़ लाख तक की रकम पेंशन के रूप में मिलती है। जबकि, 70 राजनीतिज्ञ ऐसे हैं जो 75 हजार से एक लाख रुपये तक की पेंशन पाते हैं और 254 पूर्व एमएलए-एमएलसी को 50 से 75 हजार तक की रकम मिलती है। रमई राम ऐसे राजनेता हैं जिन्हें पेंशन के तौर पर सर्वाधिक 1,46,000 रुपये प्रतिमाह मिलते हैं। चारा घोटाले के आरोपी रहे जगदीश शर्मा दूसरे नंबर पर आते हैं। उन्हें सवा लाख रुपये की पेंशन मिलती है । इसी तरह अलकतरा घोटाले के आरोपी रहे मो. इलियास हुसैन को 1,01,000 रुपये दिए जाते हैं। आप सभी सम्मानित महानुभाव कुछ कहें ..... है कुछ कहने के लिए आपके पास?
बिहार विधानसभा सचिवालय द्वारा उपलब्ध जानकारी के अनुसार दिवंगत 446 विधायकों- विधान पार्षदों के पारिवारिक पेंशन पर पिछले वित्तीय वर्ष में 23 करोड़ 85 लाख रुपये खर्च किए गए। बतौर पेंशन इनमें सर्वाधिक 1,09,500 रुपये पूर्व कांग्रेस नेता महावीर चौधरी की विधवा वीणा देवी के खाते में भेजे जाते हैं । ऐसे करीब डेढ़ दर्जन राजनेता हैं जिनकी विधवाओं को 70 हजार से लेकर एक लाख रुपये पारिवारिक पेंशन के रूप में मिलते हैं। क्षेत्रवार देखें तो सबसे ज्यादा पटना जिले में 30 दिवंगत विधायकों की पत्नियां पारिवारिक पेंशन पा रहीं है । इसके बाद मुजफ्फरपुर में 23 को और पूर्णिया, पूर्वी चंपारण तथा दरभंगा में 20-20 विधायकों की विधवाओं के खाते में पेंशन की राशि भेजी जा रहीं है ।औसतन 35,000 रुपये प्रतिमाह की दर से 991 पूर्व-विधायक, उनकी विधवा को बिहार सरकार ‘पेंशन’ देती आ रही है। यानी एक महीने में 3,46,85,000 रुपये उन विधायकों / विधवाओं को देती है। यानी एक साल में 41, 62,20,000 रुपये भुगतान करती है। संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि ही होती जाएगी क्योंकि 243 सदस्यों वाली विधान सभा में और 75 विधान परिषद् के सदस्यों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद अगर वे पुनः निर्वाचित हुए, चयनित हुए तो सरकारी खजाने पर ‘वेतन-स्वरुप’ वजन आएगा; अन्यथा, इसी पेंशन वाली संख्याओं में वृद्धि होती जाएगी, जब तक दोनों जने जीवित हैं, प्रदेश की सरकारी कोषागार को पेंशन का वजन उठाना बाध्यकारी है।
अब यह कहना हिमालय की ऊंचाई पर चढ़ने के बराबर है कि सालाना 41, 62,20,000 रूपये का भुगतान विगत कितने वर्षों से होती आ रही है और आगामी कितने शताब्दी तक होता रहेगा – अनुत्पादक। वैसी स्थिति में बिहार की मतदाता अपने गाँव में, पंचायत में, प्रखंड में, जिला में सरकारी स्तर पर बेहतर शिक्षा, भर-पेट भोजन, उचित दवाई, भर-तन कपड़ा के बारे में सोचे – व्यर्थ है। इसे कहते हैं “जान-सेवा” और ”सरकारी-लूट।”
देश भर में कर्मचारी से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज तक को केवल एक पेंशन मिलती है । किंतु, सांसद व विधायक इसके अपवाद हैं। वे एक या उससे अधिक पेंशन पाने के हकदार हैं। ऐसे में अगर कोई राजनेता एक बार विधायक बनता है और उसके बाद फिर सांसद बन जाता है तो उसे विधायक की पेंशन के साथ-साथ लोकसभा सांसद का वेतन और भत्ता मिलता है। इसके बाद अगर वह किसी सदन का सदस्य नहीं रह जाता है तो उसे विधायक के पेंशन के साथ-साथ सांसद का पेंशन भी मिलता है। बिहार में एक एमएलए या एमएलसी को 35,000 की राशि न्यूनतम पेंशन के तौर पर मिलती है। लेकिन यह एक साल विधायक रहने पर ही मिलती है। इसके बाद वह जितने साल विधायक रहते हैं, उतने वर्ष तक हर साल उनके पेंशन में तीन-तीन हजार रुपये तक की बढ़ोतरी होती है।
इसे ऐसे समझा जा सकता है कि अगर कोई व्यक्ति पांच साल तक एमएलए रहता है तो उसे एक साल के लिए 35,000 तथा अगले चार साल के लिए अतिरिक्त 12,000 रुपये अर्थात कुल 47,000 रुपये मिलेंगे। इसके अतिरिक्त वह संसद के किसी सदन के सदस्य रहे होते हैं तो उन्हें उस सदन के सदस्य के तौर पर अलग पेंशन मिलता है।
ठीक इसी तरह मौजूदा नियम के अनुसार एक सांसद यदि दूसरे बार निर्वाचित होता है तो उसकी पेंशन राशि में दो हजार रुपये प्रतिमाह की और बढ़ोतरी कर दी जाती है और यही क्रम आगे भी चलता जाता है। पहले यह नियम था कि वही पूर्व सांसद पेंशन के योग्य माना जाएगा जिसने बतौर सांसद चार साल का कार्यकाल पूरा कर लिया हो। 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार ने इसमें संशोधन करके यह प्रावधान कर दिया कि यदि कोई एक दिन के लिए भी सांसद बनेगा तो वह पेंशन का हकदार होगा और तब से यही व्यवस्था चल रही है ।
यह कौन सा नियम है कि ये लोग जहां-जहां रहेंगे, वहां-वहां से पेंशन लेंगे। एक आदमी को एक जगह से पेंशन मिलना चाहिए। ऐसा नहीं कि विधायक रहे तो उसका पेंशन, विधान परिषद का सदस्य रहे तो उसका पेंशन राज्यसभा सदस्य रहे तो उसका पेंशन, लोकसभा सदस्य रहे तो उसका पेंशन और नहीं तो जहां नौकरी में रहे उससे भी पेंशन लें. एक-एक आदमी पांच-पांच जगहों से पेंशन ले रहा है।’ इतना ही नहीं, दिवंगत विधायकों तथा उनके दिवंगत आश्रितों के खाते में भी पेंशन की रकम भेजी गई है। पूर्व केंद्रीय मंत्री व वरिष्ठ भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद की माता व स्व. ठाकुर प्रसाद की धर्मपत्नी विमला देवी, राज्य के पथ निर्माण मंत्री नितिन नवीन की माता व भाजपा के पूर्व विधायक स्व. नवीन किशोर सिन्हा की पत्नी मीरा सिन्हा तथा राजद नेता विजय सिंह यादव के बैंक अकाउंट में पेंशन की रकम भेजी गई। जबकि इन तीनों का निधन हो चुका है।
सूचना देने के लिए एक जुलाई, 2021 का संदर्भ लिया गया है। हालांकि, रविशंकर प्रसाद ने ट्वीट कर इस सूचना को गलत बताते हुए कहा कि 25 दिसंबर, 2020 को माताजी के निधन के बाद 31 दिसंबर, 2020 को ही उनका पेंशन अकाउंट बंद करा दिया गया है। अकाउंट में पैसा आना संभव ही नहीं है। वहीं मंत्री नितीन नवीन ने कहा कि इसी साल मार्च महीने में मां के निधन के बाद 13 मई को बैंक को मेल कर सूचना दे दी गई थी. उनके निधन के बाद इस बीच खाते में राशि भेजी गई थी जिसे बैंक ने वापस ले लिया है।
जानकारी के अनुसार राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह के चचेरे भाई सच्चिदानंद सिंह (रामगढ़), मेदिनी राय (बेगूसराय), विश्वनाथ राय (रामगढ़) का मामला भी कुछ इसी तरह का है। इसकी जांच सख्ती से होनी चाहिए। तभी स्थिति साफ हो सकेगी। ” वहीं इस संबंध में न्यूज एजेंसी एएनआई से बातचीत में विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा ने कहा कि हालांकि पेंशन की राशि दूसरे विभाग से जारी की जाती है। किंतु इसमें गलती किस स्तर से हुई, उसकी जांच कराई जाएगी. वैसे इसकी एक प्रक्रिया है जिसके तहत पेंशनभोगी को साल में एक बार लाइफ सर्टिफिकेट देना पड़ता है। 2017 में लोक प्रहरी नाम की एक संस्था ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर पूर्व सांसदों को मिलने वाले पेंशन व अन्य भत्तों को बंद करने की मांग की थी।
वैसे क़ानूनवेत्ता कहते हैं कि सांसद के पद से हटने के बाद भी जनता के पैसे से पेंशन लेना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) और अनुच्छेद 106 का उल्लंघन है। संसद को यह अधिकार नहीं है कि गरीब कर दाताओं के ऊपर सांसदों और उनके परिवार को पेंशन राशि देने का बोझ डाले। हालांकि अदालत ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि हमारा मानना है कि विधायी नीतियां बनाने या बदलने का सवाल संसद के विवेक के ऊपर निर्भर है।
एक और पक्ष देखें। पिछले लोक सभा चुनाब के बाद जो 165 सदस्य 16 वे लोकसभा में चयनित होकर आये थे, उनकी आयों में लगभग 137 फीसदी की वृद्धि हुयी थी पिछले लोक सभा में चयनित होने के बाद, यानि 2009 और 2014 के बीच। इसमें सबसे अधिक तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी के नेता-अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा का था। सिन्हा का 2009 में कुल संपत्ति जो 15 करोड़ थी, 2014 में 131.74 करोड़ हो गयी। शत्रुघ्न सिन्हा के अलावे शरद पवार की पुत्री सुप्रिया सुले की है। सुश्री सुले की आय 2009 में 51.53 करोड़ थी, जो 2014 में 113.90 करोड़ हो गयी। आने वाले समय में आय में कितनी फीसदी बढ़ेगी यह कहा नहीं जा सकता। वैसे देश का आर्थिक विकास दर भले ही कभी 7.40 फीसदी बढे या नहीं, लेकिन 165 करोड़पति सांसदों की आमदनी औसतन 7.40 करोड़, यानि 137 फीसदी की बृद्धि हुयी। डिम्पल यादव की आय में 210 फीसदी की वृद्धि हुयी थी जबकि मुलायम सिंह यादव की आय में वृद्धि का प्रतिशत 613 फीसदी था।
यह ज्ञान-विज्ञान की बातें इसलिए यहाँ उद्धृत किया हूँ कि कोरोना से देश मुक्त हुआ लेकिन कोरोना काल के दौरान रेल यात्रा में स्थगित किराये में रियायत को अब तक चालू नहीं किया गया है। सीनियर सिटीजन, मृत सैनिक की विधवा, मान्यता प्राप्त पत्रकार, मरीज, दिव्यांग, चिकित्सक सहित कोई 53 श्रेणी के लोगों को रेल किराये में रियायत की सुविधा दशकों से मिलती रही है। जब कोरोना हुआ तो यह सुविधा सबसे पहले 'मृत' हुआ। सरकार और रेल मंत्रालय को ऐसा लगा कि यह सुविधा अथवा रियायत रोकने से देश का सर्वांगीण विकास हो जायेगा। फिर क्या था एक अधिसूचना के तहत 20 मार्च 2020 से इस सुविधा को बंद कर दिया गया। जानकारी के अनुसार, अभी वर्तमान में सिर्फ दो कैटगरी, जिसमें दिव्यांग (चार श्रेणी) और अस्पताल में इलाजरत कैंसर, हार्ट, किडनी रोग आदि गंभीर रोग से पीड़ित मरीजों को सफर में छूट मिल रही है।
जानकारी के मुताबिक रेलवे की ओर से छूट नहीं मिलने के कारण एक अप्रैल 2022 से इस साल 31 मार्च तक एक साल में लगभग 8 करोड़ बुजुर्ग यात्रियों ने पूरा किराया देकर रेलगाड़ियों में सफर किया है। जिनसे रेलवे को 2,242 करोड़ की आय हुई है। मंत्रालय के लोगों का मानना है कि जो पैसे दे सकते हैं, वे देकर यात्रा क्यों नहीं कर सकते। अगर विगत आंकड़ों को ही लिया जाय तो आठ करोड़ बुजुर्ग टिकट खरीदकर ही तो यात्रा किये। एक दृष्टान्त के दौर पर, सिर्फ धनबाद रेल मंडल में लगभग 11 लाख बुजुर्ग यत्रियों ने एक साल में बगैर किसी के रियायत के सरकार को कोसते हुए सफर किया।
अभी दिव्यांग और गंभीर मरीजों को स्लीपर, चेयर कार, 3-टीयर में 75 फीसदी और फर्स्ट एसी, सेकंड एसी में सफर के लिए के 50 फीसदी छूट मिल रही है। भाजपा सांसद राधामोहन सिंह की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने सीनियर सिटीजन को रेल में मिल रही बंद रियासत को शुरू करने की सिफारिश की थी लेकिन महीनो गुजर गये अब तक कोई निर्णय रेल मंत्रालय ने नहीं लिया है। वैसे दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर स्थित भारतीय जनता पटरी के मुख्यालय के वरिष्ठ लोगों का मानना है कि 'राधा मोहन सिंह क्या किसी भी सांसद के पास इतनी क्षमता नहीं है कि वे सम्मानित प्रधानमंत्री अथवा सम्मानित गृहमंत्री से रूबरू इस मसले पर बात कर सकें। रेलमंत्री भी कुछ नहीं कर सकते।" कांग्रेस के समय से ट्रेनों में सफर करने वाले बुजुर्ग यात्रियों को रियायत मिलती थी, जो बंद कर दी गई।
कहते हैं कि दिव्यांग को फर्स्ट और सेकंड एसी में 50 और बाकी क्लास में 75 फीसदी, नेत्रहीन को 25 फीसदी, मानसिक रोगी को एमएसटी पर 50 फीसदी, मूक-बधिर को एमएसटी पर 50 फीसदी, गंभीर मरीजों को फर्स्ट और सेकेंड एसी में 50 और बाकी में 75 फीसदी, थैलीसिमिया के मरीज को फर्स्ट और सेकेंड एसी में 50 और बाकी में 75 फीसदी, हैमोफीलिया में फर्स्ट व सेकेंड को छोड़कर बाकी में 75 फीसदी, एड्स मरीज को सभी क्लास में 50 फीसदी, वरिष्ठ नागरिक में ( पुरुष-60 और महिला 58 साल से अधिक) पुरुष को 40 और महिला को 50 फीसदी छूट मिलती थी. बाकी अन्य श्रेणियों में भी यात्रियों को 25 से 75 फीसदी छूट मिलती थी।
बहरहाल, विगत 8 जुलाई, 2023 को रेल मंत्रालय ने रेल मंत्रालय ने अनुभूति और विस्टाडोम कोच सहित एसी सिटिंग सुविधा वाली सभी ट्रेनों की AC चेयर कार और एग्जीक्यूटिव क्लास में छूट योजना शुरू की। इसके तहत मूल किराये में अधिकतम 25% तक की छूट मिल सकती है। लेकिन अन्य शुल्क जैसे आरक्षण शुल्क, सुपर फास्ट अधिभार, जीएसटी इत्यादि, जो भी लागू हो, अलग से लगाए जाएंगे। ये छूट किसी या सभी वर्गों में प्रदान की जा सकती है। आदेश के मुताबिक, किराये में रियायत मुसाफिरों की संख्या या परिवहन के प्रतिस्पर्धी माध्यमों के किराये पर निर्भर करेगी। आदेश के अनुसार, रियायत व्यवस्था तत्काल प्रभाव से लागू की जाएगी, लेकिन पहले से सीट बुक करा चुके यात्रियों को किराया नहीं लौटाया जाएगा।
विगत लोकसभा के शीतकालीन सत्र में भी कुछ सदस्यों ने रेलगाड़ियों में यात्रा करने वाले वरिष्ठ नागरिकों के लिए किराये में रियायत और सुविधाएं बढ़ाने की मांग उठाई। लेकिन इसके पहले ही रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने लोकसभा में ये बता दिया है कि ट्रेन के सफर के दौरान हर पैसेंजर को ट्रेन टिकट पर औसतन 53 फीसदी की सब्सिडी दी जाती। सदन में शून्यकाल के दौरान जनता दल (यूनाइटेड) के सांसद कौशलेंद्र कुमार ने कहा कि कोरोना महामारी आने से पहले वरिष्ठ नागरिकों को रेल किराये में छूट मिलती थी, लेकिन इसे बंद कर दिया गया। उन्होंने कहा कि कोरोना तो कब खत्म हो गया, लेकिन वरिष्ठ नागरिकों को किराये में रियायत मिलना अभी तक शुरू नहीं हुयी।
ज्ञातव्य हो कि विगत 16 नवम्बर, 2023 को रेल मंत्रालय ट्रेन की गार्ड बोगी में चार बर्थ दिव्यांगों के लिए आरक्षित होंगी रेलवे ने गार्ड के डिब्बे में दिव्यांगजनों के लिए चार बर्थ का कोटा आरक्षित रखने के निर्देश दिए हैं। इसके तहत प्रीमियम ट्रेनों दुरंतो, राजधानी, शताब्दी एक्सप्रेस आदि में पावर जनरेटर कार को हटाकर लगाए जा रहे एलएसएलआर डिब्बों में यह व्यवस्था होगी। यह आदेश सभी जोनल रेलवे को यह आदेश जारी किए थे।
इस बीच झारखंड रेल संरक्षा संघर्ष समिति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भेजकर बंद की गई रियायत की सुविधा फिर से बहाल करने की सिफारिश की है। समिति के अध्यक्ष अरुण जोशी की ओर से कहा गया है कि कोरोना काल की शुरुआत के साथ ही मार्च 2020 से ट्रेनों में बुजुर्ग पुरुष और महिलाओं के साथ साथ किन्नर, खिलाड़ी और पत्रकारों समेत अन्य ज्यादातर रिययतों को बंद कर दिया गया था। इससे रेलवे को तकरीबन 1500 करोड़ रूपए की अतिरिक्त आमदनी हुई है। रेलवे के लिए यह राशि बहुत बड़ी रकम नहीं है, पर आम आदमी के लिए अगर पहले की तरह रियायत बहाल कर दी जाए तो इससे आम यात्रियों को बड़ी राहत मिल सकती है।
ट्रेन में सफर करने वाले सीनियर सिटीजन को रेलवे 50 फीसद छूट देती थी। इनमें पुरुषों के लिए 60 वर्ष और महिलाओं के लिए 58 वर्ष होने पर सभी श्रेणियों में किराए में छूट मिलती थी। पत्रकारों को सभी श्रेणियों में 50% छूट पर सफर का मौका मिलता था। मार्च 2020 से इन तमाम तरह की छूट पर रोक है।
