हीरापुर चौराहा (धनबाद) : आप माने अथवा नहीं, आपकी मर्जी। लेकिन हकीकत यह है कि भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में 'ईमानदारी' की 'छवि' रखने वाले राजनेताओं को यह अलंकरण इसलिए मिला है, अथवा मिलता है, क्योंकि वे बेईमानों का जी भर कर संरक्षण और पोषण किए होते हैं, अथवा कर रहे होते हैं । यह मैं नहीं कह रहा हूँ, बल्कि, जय प्रकाश नारायण की अनुयायी और सम्पूर्ण क्रांति में कन्धा-से-कन्धा मिलाकर चलने वाले नेताओं का कहना है, जो आज राजनीति की मुख्यधारा से किनारे हैं।
इतना ही नहीं, उनका यह भी कहना है कि तत्कालीन जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर, जो बाद में प्रधानमंत्री भी बने, भले खुलकर बोलने वाले नेता थे, बहुत जोरदार भाषण भी देते थे, आवाम को आकर्षित करने की क्षमता भी रखते थे; लेकिन यह भी उतना ही सच है कि उनकी "राजनीति एथिकल (नैतिक)" नहीं थी और इसका जीवंत दृष्टान्त धनबाद के तत्कालीन कोयला सरगना सूर्यदेव सिंह को 1977 के विधानसभा चुनाव में टिकट देना था।
विगत छह दशकों से अविभाजित और विभाजित बिहार की राजनीति को अपनी आँखों के सामने चोला बदलते का प्रत्यक्षदर्शी रहे इन नेताओं ने जब आज की राजनीतिक व्यवस्था पर दृष्टि देते हैं तो कहते हैं कि "आज बिहार वैश्विक स्तर के साइकोऐनलिस्ट्स की आवश्यकता है जो प्रदेश की राजनीति में शीर्षस्थ पदों पर आसीन, अथवा नेतृत्व देने वाले नेताओं पर शोध करे और राष्ट्र को बताये कि 'आखिर ऐसी कौन सी बात है जिसके कारण कल 'ज', 'स', 'भ', 'भा' शब्दों को सुनते ही बौखलाने वाला व्यक्ति, आज उन्हीं शब्दों का माला पहनकर आठो-पहर जप-ध्यान करते हैं, उन अक्षरों से बने शब्दों वाली पार्टी के नेताओं को पैर पकड़ने में संकोच भी नहीं करते ।"
यह अलग बात है कि आज के स्वार्थ-परत काल में ऐसे साइकोऐनलिस्ट्स शोष के तरफ आकर्षित नहीं हो रहे हैं, लेकिन समय से बड़ा कोई शोधकर्ता नहीं हुआ है, कल इस विषय पर भी शोध होगा, उसी तरह जिस तरह आज पचास वर्ष बाद इस कहानी में उन बातों को शब्दबद्ध किया जा रहा है।
सिंह मैंशन की दो बहुएं
चलिए सं 1977 चलते हैं। बिहार में 30 अप्रैल से 24 जून 1977 तक राष्ट्रपति शासन के अधीन था। अविभाजित बिहार के 324 सदस्यीय सातवें विधानसभा के गठन के लिए चुनावी मैदान में तत्कालीन जनता पार्टी के 311 सदस्य मैदान में अपनी-अपनी टोपी फेंके थे। कांग्रेस के 286 सदस्य चुनावी मैदान में थी। चुनाव के बाद जब जनता पार्टी को 214 सीटों पर आधिपत्य हुआ और कर्पूरी ठाकुर की अगुवाई में सरकार का गठन हुआ। उस कालखंड में जगन्नाथ कौशल प्रदेश के लाट साहब थे।
पांचवें विधानसभा (फरवरी 1970 से जनवरी 1972) के कालखंड में बिहार में तीन व्यक्ति मुख्यमंत्री बने - दारोगा प्रसाद राय, कर्पूरी ठाकुर और भोला पासवान शास्त्री। इस कालखंड में कर्पूरी ठाकुर लगभग 162 दिन मुख्यमंत्री कार्यालय में रहे। खैर। राष्ट्रपति शासन के बाद सं 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी कर्पूरी ठाकुर (एक साल 301 दिन) के लिए फिर और उनके बाद रामसुंदर दास (302) दिन के लिए मुख्यमंत्री बने।
आपातकाल के बाद हुए चुनाव में मैं अख़बारों में लिखने वाला पत्रकार नहीं बना था। लेकिन पटना से प्रकाशित दी इंडियन नेशन अखबार के संपादकीय विभाग में आना-जाना शुरू हो गया था अपने गंतव्य पर पहुँचने हेतु। पटना विश्वविद्यालय के बिहार नेशनल कॉलेज का अर्थशास्त्र (सम्मान) का छात्र था। इसलिए दोनों हाथों में लड्डू था। विश्वविद्यालय परिसर में तत्कालीन छात्रों की, जो राजनीति में प्रवेश ले लिए थे, की गतिविधियों का चश्मदीद गवाह बनता था; साथ ही, संध्याकाळ में दफ्तर में पत्रकारिता सीखने का, लिखने का अनुभव भी होता था।
उन दिनों के अख़बारों में, चाहे पटना से प्रकाशित हो अथवा कलकत्ता से, सच लिखने वालों की लेखनी से यह स्पष्ट था कि जिस राजनीतिक, सामाजिक, मौलिक उद्देश्य से जयप्रकाश नारायण ने बिहार छात्र आंदोलन का समर्थन कर अगुवाई किये थे, सत्ता में प्रवेश का दरवाजा खुलते ही 'बेशर्म' हो गए और जातिवाद, भाई-भतीजावाद का झंडा लेकर आगे बढ़ने लगे। उस आंदोलन में जो बदलाव के लिए झंडा उठाये थे, वे पीछे जाते गए।
जय प्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति में अहम् भूमिका निभाने वाले पटना सिटी के उमेश प्रसाद सिंह, जो आज अस्सी के दशक के मध्य में हैं, अखबारवाला001 को कहते हैं कि "सत्येंद्र नारायण सिंह बिहार में जनता पार्टी संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष थे। जब यह बात उठाई गई कि आखिर सूर्यदेव सिंह को किस आधार पर झरिया विधानसभा सीट से टिकट दी गयी, सिंह का चेहरा तिलमिला सा गया था। वे शायद खुश नहीं थे उस निर्णय से। इसलिए झुंझलाकर कहे कि जब पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ही अनुशंसा करे तो कौन क्या कर सकता है।
उमेश प्रसाद सिंह
उमेश प्रसाद सिंह आगे कहते हैं कि "सूर्यदेव सिंह को पार्टी का टिकट इस कदर देना जनता पार्टी के भविष्य को, जय प्रकाश नारायण और सम्पूर्ण क्रांति की गरिमा को नेस्तनाबूद कर दिया। पिछले पांच दशकों और अधिक समय से हम सभी चश्मदीद गवाह रहे हैं कि 'ईमानदारी का तगमा लटकाने वाले लोग बेईमानों को संरक्षण देने के कारण ही बनते हैं। आज न जेपी हैं, न चंद्रशेखर हैं और ना ही सूर्यदेव सिंह; लेकिन उन दिनों जो घटना हुई, चाहे जिस उद्देश्य से हुई हो; प्रदेश की राजनीतिक इतिहास में धब्बा है। अगर ईमानदारी की इतनी ही बात थी तो मोरारजी देसाई के स्थान पर उन्हें ही प्रधानमंत्री क्यों नहीं बना दिया गया। यह भी शोध का विषय है।"
उन दिनों पटना के अख़बारों में, दिल्ली और कलकत्ता से प्रकाशित अख़बारों, पत्रिकाओं में यह खबर प्रमुखता से प्रकाशित होने लगी कि किस कदर जनता पार्टी के शीर्षस्थ नेता, यहाँ तक कि चंद्रशेखर ने भी धनबाद के सूर्यदेव सिंह, जो अपराध की दुनिया में, कोयला क्षेत्र के सरगना बन गए थे, जनतापार्टी का टिकट देकर विधानसभा में प्रवेश का मार्ग प्रसश्त किये थे। अपराधियों का राजनीतिकरण की यह एक कड़ी थी।
उन दिनों यह आरोप लगाया गया था कि विधानसभा के चुनाव के लिए जिस प्रकार से टिकट वितरण का काम किया गया है जिससे आंदोलन से जुड़े युवक स्तब्ध थे। उम्मीदवारों की सूचि प्रकाशन के बाद जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं में जो अनुशासनहीनता, निराशा और आपसी कलह दिखी, उसके लिए केंद्रीय नेतृत्व तथा प्रांतीय चुनाव समिति को पूरे तौर से जिम्मेदार ठहराया गया था। यह बात आज पचास वर्ष बाद भले 'असामयिक' लगे पढ़ने वालों को, लेकिन 29 मई - 4 जून 1977 के दिनमान जैसे प्रतिष्ठित पत्रिका के पृष्ठ संख्या 19 पर एक बॉक्स में कहानी प्रकाशित हुई थी।
दिनमान की उस कहानी में लिखा था: "नामांकन की अंतिम तिथि 18 मई के पहले तक उम्मीदवारों की सूची बना नहीं पाने के कारण प्रत्याशियों के बीच अश्वस्थ प्रतियोगिता शुरू को गयी। चयन के कार्य को विकेन्द्रित करने में नेतृत्व न सिर्फ असफल रहा, बल्कि उसने जय प्रकाश नारायण द्वारा सुझाये गए मूल्यों और कसौटियों को तिलांजलि दे दी। परिणामस्वरूप जातीयता और भाई भतीजावाद, बिना अपवाद के नियम बन गया है। मतदाताओं के मुंह पर यह एक चपत है क्योंकि पिछले लोक सभा चुनाव में मतदाताओं ने जातीयता और भाई भतीजावाद से ऊपर उठकर मतदान किया था तथा उम्मीद की थी हमारे राजनेता भी इसी स्वस्थ धारा को आगे बढ़ाएंगे।"
आश्चर्य की बात तो यह थी कि जिन आधारों पर जनता पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष चंद्रशेखर अपने अभिन्न मित्र सूर्यदेव सिंह का नाम झरिया विधानसभा के लिए अभ्यर्थी के रूप में अनुशंसित किया था, उसने चंद्रशेखर ने लिखा था कि आपातकाल के दौरान आंदोलनकारियों को सूर्यदेव सिंह बहुत 'मदद' किये हैं। 'मदद' शब्द को भले पार्टी अध्यक्ष ने स्पष्ट नहीं किया कि वह मदद किस तरह की थी; लेकिन तत्कालीन युवा नेताओं ने 'मदद' को अपने-अपने तरह से परिभाषित किया।
"गलत चयन" के सबूतों के बारे में दिनमान ने लिखा था कि "इस तरह के बहुत सारे उदाहरण हैं और बताने में कोई संकोच नहीं है। अम्बिका शरण सिंह, जिन्हे बरहरा भोजपुर चुनाव क्षेत्र से जनता पार्टी का उम्मीदवार बनाया गया है, न सिर्फ अय्यर आयोग के दागी हैं, बल्कि लोक सभा चुनाव में उन्होंने जनता पार्टी के उम्मीदवार का खुलमखुल्ला विरोध किया था। श्री इमामुल हई खान बिहार राजनीति के एक जाने माने स्वस्थ लोलुप और दलबदलू हैं। सूर्यदेव सिंह, जिन्हे झरिया (धनबाद) चुनाव क्षेत्र से जनता पार्टी का उम्मीदवार घोषित किया गया है, एक कुख्यात समाज विरोधी तत्व हैं, उनके कारनामों को लेकर बिहार विधान सभा में तथा अख़बारों में काफी चर्चा हुई है।

दूसरी ओर बहुत सारे ईमानदार, कर्मठ और लोक नायक जय प्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के प्रति प्रतिवद्ध कार्यकर्ताओं को जनता पार्टी के टिकट से वंचित कर दिया गया है। सूची विलम्ब से निकलने के कारण बहुत सारे नामांकन दाखिल नहीं हो सके। इनमें पिरो के गांधी राम इकबाल सहित करीब 35 व्यक्ति जनता पार्टी की सूची में शामिल हैं।
इतना ही नहीं, कहानी में आगे भी लिखा गया कि "उम्मीदवारों के चयन में स्थानीय कार्यकर्ताओं का ख्याल नहीं रखा गया । ऊपर से उम्मीदवारों को थोपने की प्रवृत्ति रही है और यह बहुत ही घातक है। प्रदेश चयन समिति में छात्र प्रतिनिधि के रहते हुए इतने सारे गलत निर्णय लिए गए हैं। चयन समिति में छात्रों के सिर्फ दो प्रतिनिधि लिए गए हैं और जनता पार्टी के दस, उसी समय ऐसा आभास हुआ था की अब वह बात नहीं चलेगी और परंपरागत ढंग से समिति उम्मीदवारों का चयन करने में सफल हो जाएगी। फिर भी प्रतिनिधियों को संघर्ष संचालन समिति ने हिदायत दी थी कि जहाँ जेपी की शरणों की अवहेलना हो, वहां बैठक का बहिष्कार करें। किन्तु खेद है कि जेपी के मूल्यों की हत्या होने के बाद भी प्रतिनिधि बैठक में बने रहे और सार्वजनिक ढंग से भीतर की बात को बताने की कोशिश नहीं की । इसके लिए चयन समिति के अन्य सदस्यों की तरह ये प्रतिनिधि भी जिम्मेदार हैं।"
यह भी लिखा गया था कि "हम जानते हैं की इससे जनता पार्टी के कुछ उम्मीदवारों का नुकशान हो सकता है। लेकिन भारत की जनता और संघर्ष के प्रति हमारा जो कर्तब्य है उसी को हम निभा रहे हैं। अगर नेतृत्व के गलत कार्यों की आलोचना नहीं होती है तो पार्टी में सड़ांध बढ़ती जाएगी। इस प्रकार की गलतियों का विरोध हो रहा है, यह जानकर जनता और मतदाताओं को भरोसा होगा। नेतृत्व वर्ग भी आगे से गलतियों को दोहराने का साहस नहीं करेगा। इससे जनता पार्टी का जितना नुकसान होगा इससे अधिक फायदा ही होगा।"
स्थानीय लोगों का कहना है कैसे कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इण्डिया के एसके रॉय, जो 1967 के चुनाव में कांग्रेस के एसआर प्रसाद (10024 मत) के हाथों झरिया में चुनाव हारे (7150 मत) थे, बाद में 1969 के चुनाव में एसके रॉय ने 14239 मत) पाकर एसआर प्रसाद को (9257 मत) हराया था। सन 1972 के चुनाव में रॉय (15310 मत) ने बीजेएस के रामदेव सिंह (8301 मत) को हराया था।
लेकिन 1977 जब बिहार विधानसभा का चुनाव हुआ राजनीतिक समीकरण बिलकुल बदल गया। सन 1977 के विधानसभा चुनाव में जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर के कृपापात्र बने सूर्यदेव सिंह। सिंह को झरिया विधानसभा से आधिकारिक टिकट प्राप्त हुआ। उस चुनाव में झरिया में 119577 मतदाता थे शिवकुमार रॉय, सूर्यदेव सिंह, मोईउद्दीन खान, रामदेव सिंह, राजकुमार रॉय के अलावे 17 व्यक्ति चुनावी मैदान में उतरे थे अपनी किस्मत आजमाने के लिए। कोई 55883 मतदाता मतदान केंद्र तक पहुंचे। सबसे न्यूनतम मत राम रेखा रॉय (153) को मिला, जबकि सबसे अधिक मत सूर्यदेव सिंह (18539) को मिले। सूर्यदेव सिंह और शिव कुमार रॉय के बीच 5650 मतों का अंतर था।
सन 1977 के विधानसभा चुनाव में झरिया पर कब्ज़ा करने के बाद सूर्यदेव सिंह 1980 में कांग्रेस के राम नारायण शर्मा को, 1985 में कांग्रेस के रमेश प्रसाद सिंह को और 1990 में कांग्रेस के ही मन्नान मल्लिक को परास्त किये।
वहीं यदि कोयलांचल की राजनीति में राजनेताओं और कोयला माफियाओं का समीकरण देखा जाय तो यह वही कालखंड था जब धनबाद में कोयला माफिया और राजनेतागण एक दूसरे के हितैषी होने लगे। देश में जिस समय आपातकाल की घोषणा (25 जून 1975) हुयी थी, धनबाद के उपायुक्त भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी कुंवर बहादुर सक्सेना (अगस्त 5, 1974 से जुलाई 24, 1975) थे। आपातकाल के दौरान ही सक्सेना को हटाकर भाप्रसे के अधिकारी लक्ष्मण शुक्ल उपायुक्त बने और इनके कार्यकार ( जुलाई 25, 1975 से अगस्त 21 1977) में ही आपातकाल समाप्त (मार्च 21, 1977) भी हुआ।

शुक्ला के जाने के बाद कोई डेढ़ वर्ष के लिए देवदास छोटराय उपायुक्त बने। लेकिन शहर को रक्तरंजित करने के लिए बन रहे चक्रव्यूह से भिज्ञ नहीं थे। धनबाद के साथ-साथ कोयलांचल में एक तरफ जहाँ कोयला खदानों, खासकर भूमिगत खदानों से अग्नि की ज्वाला सतह पर आना शुरू हो गया था; कोयलांचल पर आधिपत्य को तोड़ने के लिए बाहुबली का एक साम्राज्य तैयार हो रहा था। छोटराय के कार्यकाल में धनबाद की मिट्टी पर खून का जो खेल हुआ वह न केवल धनबाद के इतिहास में काला धब्बा लगाया, बल्कि कोयलांचल की भूमि में खूनी होली के शुरुआत का भी शंखनाद किया।
कोल माइनिंग पर वर्चस्व के लिए मजदूर संघ का मजबूत होना बहुत ही आवश्यक था, बीपी सिन्हा इस बात को बखूबी जानते थे। जब 17 अक्टूबर 1971 को कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण हुआ। राष्ट्रीयकरण होते ही बीपी सिन्हा का कोल नगरी पर पकड़ और अधिक मजबूत हो गया। पूरे कोल माइनिंग में उनकी तूती बोलने लगती है, उनका अब कोयले की खदानों पर एकछत्र राज्य चलने लगता है।
कहा जाता है कि मजदूरों को काबू में रखने के लिए उन्होंने पांच लठैतों की एक टीम बनाया। इसमें बलिया के रहने वाले सूर्यदेव सिंह और स्थानीय वासेपुर के शफी खान आदि शामिल थे। उसी समय से उनकी दुश्मनी वासेपुर के शफी खान गैंग्स से शुरू हुई। बीपी सिन्हा कांग्रेस के प्रचारक थे और कोल माइनिंग में भारतीय राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर संघ की तूती बोलती थी। किद्वान्ति है कि उनका माफिया राज इतना बड़ा था की एक बार जब प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी अपने रैली के दौरान सभा में देर से आई थीं, इस बात को लेकर बीपी सिन्हा बहुत नाराज हुए थे, जिसको लेकर इंदिरा गाँधी को भरी सभा में जनता से क्षमा माँगनी पड़ी थी।
उस दिन मार्च महीने का 28 तारीख था और साल 1978 था। धनबाद के गांधी नगर स्थित आवास-सह-कार्यालय में सिन्हा साहेब रेकर्ड प्लेयर पर अपने पोते गौतम के साथ गाना सुन रहे थे। घर में उस वक्त आसपास के चार-पांच लोग अपनी फरियाद लेकर पहुंचे। अचानक दो-तीन लोग बरामदे में पहुंचे और एक ने पूछा साहेब हैं? जवाब 'हां' में मिलने पर वे लोग लौट गये।
इस बीच अचानक बिजली गुल हो गयी और कुछ सेकेंड में बिजली आ भी गयी। सिन्हा साहेब को पूछने वाले लोग इतने में ही 10-11 व्यक्तियों को साथ ले कर बरामदे में शोर करते हुए प्रवेश किये। शोर सुन कर साहेब पूछते हैं कौन आया है? क्या हो रहा है? जवाब मिलता है 'डाकू' आये हैं। इतने में सिन्हा साहेब जैसे ही कमरे से बाहर निकलते हैं मोटा सा एक आदमी लाइट मशीन गन से गोलियों की बौछार करने लगा । करीब सौ गोलियां चली । सिन्हा साहेब के शरीर को तब तक कई गोलियां बेध चुकी होती थी। सिन्हा साहेब खून से लथपथ होकर जमीन पर गिर पड़े थे। शरीर पार्थिव हो गया था। उस वक्त उनकी उम्र करीब 70 साल रही होगी।
पूरे धनबाद ही नहीं, कोयलांचल से लेकर कलकत्ता तक, धनबाद से लेकर पटना के रास्ते दिल्ली तक कोहराम मच गया। सिन्हा साहेब की हत्या धनबाद कोयलांचल में कोयला माफिया और राजनीति के गठबंधन के इतिहास की पहली बड़ी घटना थी। बंदूक व बाहुबल की ताकत के समानांतर ताकत रखने वाले सिन्हा साहेब की हत्या में उनके करीबी कई लोगों का नाम आया। सिन्हा साहब का ‘अंत’, सूर्यदेव सिंह का ‘सूर्योदय’ था। सम्पूर्ण कोयलांचल सूर्यदेव सिंह की ऊँगली पर चलने लगी और भारत कोकिंग कोल मुख्यालय जाने के प्रवेश द्वार से कोई 100 कदम पर स्थित सिंह मैंशन इतिहास रचना प्रारम्भ कर दिया। व्हाइट हाउस का नामोनिशान समाप्त हो गया है। बीपी सिन्हा साहेब की हत्या में सूर्यदेव सिंह का नाम आया था, लेकिन कुछ समय बाद वे इस काण्ड से बरी हो गए।

वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्र कहते हैं कि "28 जून 1977 से 22 जून 1980 तक बिहार विधान सभा के अध्यक्ष थे जनता पार्टी के त्रिपुरारी प्रसाद सिंह। जिस शाम धनबाद में बीपी सिन्हा की हत्या हुई और उस कांड में सूर्यदेव सिंह का नाम आया; सूर्यदेव सिंह अगले दिन विधानसभा में हँसते हुए अपनी उपस्थिति दिए थे। न केवल विधानसभा अध्यक्ष बल्कि विधानसभा के सभी माननीय सदस्यगण टकटकी निगाहों से सूर्यदेव सिंह की ओर देख रहे थे।"
सत्तर के दशक का ये वह दौर था जब कोयले के निजी खदानों में मजदूरों का खूब शोषण हुआ करता था। खदान मालिकों के शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत किसी में भी नहीं होती थी। मजदूरो के साथ शोषण दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही थी। इस घटना ने इन्हें अंदर से इस कदर झकझोर दिया। इन्होंने शोषण के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया और ये आंदोलन धीरे धीरे तेज होता गया। सूर्वदेव सिंह मजदूरों के मसीहा गए, और पूरे कोयलांचल में अपनी एक अलग पहचान बना ली। 1970 के दशक में सूर्यदेव सिंह ने झरिया के कोयला मजदूरों की सेवा के लिए जनता मजदूर संघ का गठन किया। इसके माध्यम से वे मजदूरों की समस्याओं को लेकर हमेशा लड़ते रहे। उन्हें उनका हक दिलाया।
इसी दौर में सूर्यदेव सिंह की पहचान पूरे कोयलांचल में मसीहा के तौर होने लगी। मजदूरों की हक की लड़ाई लड़ने वाले सूर्यदेव सिंह को अब यहां के लोग अपना सरंक्षक मान चुके थे। बेबस और गरीब लोगों को न्याय के साथ आर्थिक मदद देना सूर्यदेव सिंह के जीवन का एकमात्र मकसद था। जरूरतमंदों कि पढ़ाई लिखाई, शादी विवाह से लेकर इलाज तक में वे भरपूर सहयोग करने से कभी भी पीछे नहीं हटते थे। कहते है कि इनके दरवाजे से कभी कोई निराश नहीं लौटता था। शरीर, दिमाग, और चरित्र से मजबूत सूर्यदेव सिंह का रुतबा ऐसा था, कि जब कभी भी धनबाद इलाके में हालात बिगड़ते थे पुलिस प्रशासन के हाथ से बाहर हो जाता था तो सबकी आखिरी उम्मीदें सिंह मेंशन पर ही होती थी। सूर्यदेव सिंह ने बिना जात पात भेदभाव के हर किसी की मदद किया करते थे।
आज पांच दशक बाद अखबारवाला001 जब उस कालखंड के युवा नेता शिवानंद तिवारी, जो उस समय 34-वर्ष के थे, पटना की सड़कों पर जयप्रकाश नारायण की आंदोलन को पहचान भी दिया था, से जब पूछा कि आपके कथन के आधार पर 1977 मई-जून के अंक में एक कहानी प्रकाशित हुई थी, जिसमें सूर्यदेव सिंह को झरिया से टिकट देने में तत्कालीन जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्र शेखर पर ऊँगली उठायी गयी थी, क्या आप इस बात को आज मानते हैं कि कोयलांचल में माफियाओं को संरक्षण देने में, या माफिया की उत्पत्ति में उनका सहयोग रहा था?
शिवानंद तिवारी कहते हैं कि "यह बात उन दिनों जग-जाहिर हो गया था। कभी कभार, पत्रिकाओं में इस बात की चर्चा हुई थी। टिकट का वितरण जिस आधार पर हुआ था, हम सभी विरोध किये थे। लेकिन यह नहीं कह सकते कि कोयलांचल में माफियाओं को प्रश्रय देने, संरक्षण देने, उसके बढ़ने-बढ़ाने में उनका कोई हाथ था। कोयलांचल में कई कारण थे, चाहे वह सूदखोरी हो, शराब हो, अवैध कोयला खनन से प्राप्त होने वाली आय हो, जो सरगनाओं को जन्म देता गया। इन बातों की उपस्थिति उस दिन भी थी, आज पचास वर्ष बाद भी है ।"

दो बार विधायक और एक बार राज्यसभा के सांसद रहे शिवानंद तिवारी कहते हैं कि "कोयलांचल में सिजुआ में वे स्वयं श्रमिकों को संगठित करने के लिए कई वर्ष कार्य किये थे। उन दिनों उस क्षेत्र में सूर्यदेव सिंह का बोलबाला बढ़ रहा था, लेकिन वहीं श्रमिकों के हितों के रक्षार्थ एके राय, बिनोद बिहारी महतो, शिबू सोरेन और अन्य संगठित थे, जो सूर्यदेव सूर्यदेव सिंह का सैद्धांतिक और व्यावहारिक रूप से विरोधी थे।"
शिवानंद तिवारी आगे कहते हैं कि "जब जयप्रकाश नारायण क्रांति का आह्वान किये थे, उनकी विचारधारा से प्रभावित होकर तत्कालीन सिंदरी के विधायक एके रॉय, जो बाद में धनबाद से लोकसभा के सांसद भी बने, जेपी के समर्थन में विधान सभा से इस्तीफा देने का एलान किये थे। राय जेपी से मिलना चाहते थे। इस बात की जानकारी के बाद जेपी मुझे स्वयं भेजा था उन्हें लाने के लिए।" ज्ञातव्य हो कि जब सिंदरी में बाहरी-भीतरी को लेकर बवाल हुआ तो उस कालखंड में सूर्यदेव सिंह (वे स्वयं बाहरी थे) की भूमिका अक्षुण थी। इसी तरह झरिया में जब हिंद- मुस्लिम एकता पर आंच आई तो वे सभी धर्म के लोगों को एकजुट कर एकता की मिसाल पेश किये थे। वे जीवन के अंतिम सांस तक झरिया को अपना घर समझकर सांस लिए।
कहते हैं कि झरिया का इतिहास बहुत ही पुराना है और झरिया के राजाओं का इतिहास भी बहुत पुराना है। धनबाद शहर से कोई आठ किलोमीटर दूर स्थित एक समय में राजा महाराजाओं के अधीन था। आज भी झरिया राज के अवशेष दीखते हैं, जो जर्जर हैं। आज भी उसके कुछ वंश यहाँ रहते हैं। यह कहा जाता है कि झरिया राज ब्रिटिश भारत में एक ज़मींदारी स्टेट था, जो बंगाल प्रांत के बिहार प्रांत में स्थित था। 18वीं तथा 19वीं सदी में अंग्रेजों ने इस क्षेत्र पर कब्जा कर अपने कब्जे में कर लिया था और यह बंगाल को प्रेसीडेंसी का हिस्सा बन गया।
यह कहा जाता है कि झरिया के जमींदार मूल रूप से मध्य भारत के रीवा (मध्य प्रदेश) के रहने वाले थे। सन् 1763 में झरिया के आसपास के क्षेत्र में अपना राज्य स्थापित किया था। सन् 1864 में जयनगर की संपत्ति झरिया स्टेट ने खरीदी थी। कटरा गांव में जमींदार का निवास स्थान है, जो परंपरा के अनुसार पहले झरिया राज का मुख्यालय हुआ करता था। सन् 1890 के दशक में इस क्षेत्र में कोयला खनन शुरू हुई तो झरिया राज के उल्लेखनीय जमींदार राजा दुर्गा प्रसाद सिंह ही का ही नाम पहले आता है। जिन्हें सन् 1850 के दशक में संपत्ति मिली थी, वह उस वक़्त नाबालिग थे, सन् 1916 में राजा दुर्गा प्रसाद सिंह की मृत्यु हो गई। जनवरी 1947 में राजा शिव प्रसाद की मृत्यु हो जाती है और उनके सबसे बड़े पुत्र, श्री काली प्रसाद सिंह झरिया के अंतिम राजा बनते हैं, जब तक कि 1952 में सरकार द्वारा जमींदारी समाप्त नहीं कर दी गई।

प्रमुख कोयला खनन क्षेत्र में पाँच बड़े सम्पदाओं में से एक था, झरिया राज, नवागढ़ राज, कटरासगढ़ राज, टुंडी राज और पांडरा राज, दामोदर और बराकर नदियों के बीच के क्षेत्र मानभूम जिले के अन्दर ही आते थे। सन् 1866 में ह्यूजेस, और सन 1890 में टी. एच. वार्ड. के द्वारा जिन्होंने करीब 850 मिलियन टन अच्छे गुणवत्ता वाला कोयला रिजर्व का अनुमान लगाया था। इससे पहले, सन् 1858 मेसर्स में बोरोदेल और कंपनी ने पूरे झरिया स्टेट के लिए पट्टे के लिए आवेदन किया था। उस वक़्त कोर्ट ऑफ वार्ड्स के तहत झरिया स्टेट में खदान के लिए लीज के लिए मंजूर नहीं किया जाता था। पहला पट्टा सन् 1890 से पहले नही दिया गया था। सन् 1895 में धनबाद, झरिया, कतरास, कुसुंडा और पाथरडीह आसनसोल से कलकत्ता तक रेलवे लाइनों से जुड़ी हुई थी। और इसने इस क्षेत्र के खनन उद्योग को बड़े पैमाने पर विस्तार करने में मदद की।
आज न चंद्रशेखर है, न सूर्यदेव सिंह, न जयप्रकाश नारायण और ना ही उस कालखंड के अधिकांश लोग, समाजसेवी जो उस दिन के चश्मदीद गवाह थे। पटना के विधान सभा से रांची के विधानसभा तक इन वर्षों में लोग बदलते गए, दरिद्र धनाढ्य होता गया, लाठी की प्रथा समाप्त हो गयी. आधुनिक शस्त्रों का बोलबाला हो गया, कोयलांचल में सत्ता की लड़ाई में सैकड़ों लोग कोयलांचल की भूमि को रक्तरंजित करते गए। लेकिन वह नहीं कर सके जो आपराधिक छवि के होते हुए भी सूर्यदेव सिंह ने इतिहास के पन्नों पर अपना जो नाम लिखा, उस नाम के ऊपर कोई दूसरा अपना नाम नहीं लिखा सके, चाहे उनके परिवार, उनके भाइयों के परिवार के लोग ही क्यों नहीं हो। लाख आलोचना के बाद भी, कल तक जहाँ सूर्यदेव सिंह अपने और अपने भाइयों के परिवारों को एक सूत्र में बांधकर अंतिम सांस तक जीवित रहे; आज जो स्थिति है 😢
क्रमशः …….
