नई दिल्ली : भारत के उपराष्ट्रपति श्री जगदीप धनखड़ ने आज कहा, “राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए हमें स्वदेशी शक्ति की आवश्यकता है। युद्ध से सबसे अच्छा बचाव तब होता है जब हम शक्ति की स्थिति में हों। शांति तब सुनिश्चित होती है जब आप युद्ध के लिए हमेशा तैयार रहें… शक्ति केवल तकनीकी क्षमता या पारंपरिक हथियारों से नहीं आती, बल्कि यह जनता से भी आती है।”
राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति निवास में राज्यसभा इंटर्नशिप कार्यक्रम – चरण 7 के उद्घाटन सत्र में बोलते हुए कहा, नागरिकों को उनके कर्तव्यों के पालन की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने कहा, “संतुलन बनाए रखना ज़रूरी है। हम केवल अपने मौलिक अधिकारों की बात करते हैं, उन्हें 24x7 माँगते हैं, और मौलिक कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह उदासीन रहते हैं!… अगर हम केवल अपने अधिकारों पर ध्यान दें और कर्तव्यों की अनदेखी करें, तो हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में एक नागरिक के रूप में अपने दायित्व को पूरा नहीं करते। संविधान में शुरू में यह कर्तव्य नहीं थे।
उन्होंने कहा कि हमारे संविधान निर्माताओं ने अपेक्षा की थी कि हम इन कर्तव्यों के प्रति स्वाभाविक रूप से समर्पित रहेंगे। लेकिन बाद में जब इसकी आवश्यकता महसूस हुई, तो इन्हें 42वें और 86वें संविधान संशोधन के माध्यम से शामिल किया गया। यदि मैं मौलिक कर्तव्यों का सार बताऊँ, तो यह है कि राष्ट्रीय कल्याण को प्राथमिकता देना, लोक व्यवहार, अनुशासन, सार्वजनिक संवाद, पर्यावरण और जीवन में भलाई की सभी बातों में अपना योगदान देना।”

राज्यसभा के सभापति ने कहा, “लोग सोचते हैं कि हम योगदान कैसे करें? स्वदेशी का विचार आर्थिक राष्ट्रवाद से जुड़ा हुआ है। आर्थिक राष्ट्रवाद का मतलब है कि हम स्वदेशी वस्तुओं का उपभोग करें। ‘वोकल फॉर लोकल’ को अपनाएं। यह हमारे कारीगरों को प्रेरित करेगा कि वे हमारी आवश्यकताओं को पूरा करें। लेकिन अगर हम उन वस्तुओं का आयात करते हैं जिन्हें देश में बनाया जा सकता है, तो तीन समस्याएं उत्पन्न होती हैं — एक, विदेशी मुद्रा भंडार में अनावश्यक छेद; दूसरा, अपने देश के लोगों से रोजगार छीनना; और तीसरा, उद्यमशीलता को कुंद करना। हर व्यक्ति योगदान दे सकता है — वह क्या पहनता है, क्या खाता है, कौन से जूते पहनता है। लेकिन हम विदेशी चीजों के प्रति आकृष्ट होते हैं और यह भूल जाते हैं कि इससे हमारी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को चोट पहुँचती है। इसलिए मैं कहता हूँ कि आर्थिक राष्ट्रवाद जनता का कार्य है।”
उन्होंने कहा, “हाल की घटना, ऑपरेशन सिंदूर, ने हमारी सोच को पूरी तरह बदल दिया है। अब हम पहले से कहीं अधिक राष्ट्रवादी हो गए हैं। इसका उदाहरण यह है कि सभी राजनीतिक दलों ने मिलकर विदेशों में भारत का शांति और आतंकवाद के प्रति शून्य सहिष्णुता का संदेश दिया है। हालिया घटनाओं से हमें यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि हमारे पास अब एक ही रास्ता है — एकजुट रहना और मजबूत बनना। संस्थानों की तरह, राजनीतिक दलों की भी राष्ट्रीय उद्देश्य के प्रति नैतिक जिम्मेदारी होती है। क्योंकि अंततः सभी संस्थाओं का केंद्र बिंदु है — राष्ट्रीय विकास, राष्ट्रीय कल्याण, सार्वजनिक कल्याण, पारदर्शिता, जवाबदेही और ईमानदारी।
राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक प्रगति जैसे विषयों पर सभी दलों को राष्ट्रहित को अपने राजनीतिक हितों से ऊपर रखना चाहिए। मैं सभी राजनीतिक वर्गों से अपील करता हूँ कि वे गहन चिंतन करें और इस निष्कर्ष पर पहुँचें कि इन विषयों पर सहमति होनी चाहिए। कभी-कभी राजनीति राष्ट्रवाद और सुरक्षा जैसे विषयों पर बहुत गर्म हो जाती है — इसे हमें पार करना होगा।”
श्री धनखड़ ने संसद के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा, “भारतीय संसद एक साधारण विधायी निकाय नहीं है। यह आज 140 करोड़ लोगों की इच्छा का प्रतिबिंब है। यह एकमात्र वैधानिक संवैधानिक मंच है जो जनता की वास्तविक इच्छा को प्रकट करता है। इसलिए संसद की विशेष भूमिका है — एक, यह कानून बनाने की अंतिम संस्था है; और दूसरा, यह कार्यपालिका को उत्तरदायी ठहराती है। शासन कुछ मूल सिद्धांतों से संचालित होता है — पारदर्शिता, जवाबदेही और अब आधुनिक समय में संस्थाओं का श्रेष्ठ प्रदर्शन भी इसमें शामिल हो गया है। संसद बहस, संवाद, चर्चा और विमर्श का सर्वोच्च मंच है।”
सहयोग और सहमति के महत्व पर बल देते हुए उन्होंने कहा, “हमारा संविधान एक पवित्र दस्तावेज है। इसे हमारे संविधान निर्माताओं ने लगभग तीन वर्षों के गहन विचार-विमर्श के बाद तैयार किया। उन्होंने विभाजनकारी मुद्दों, ज्वलंत मुद्दों और अत्यंत संवेदनशील विषयों को सहयोग, समन्वय और सहमति के साथ सुलझाया। जीवन में यह सीखना जरूरी है कि हमें दूसरे के दृष्टिकोण का सम्मान करना चाहिए। यदि आप सोचते हैं कि केवल आप ही सही हैं और सामने वाला गलत है, तो आप एक महत्वपूर्ण विचार से खुद को वंचित कर रहे हैं। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि अक्सर दूसरे का दृष्टिकोण ही सही होता है।”
उन्होंने यह भी जोड़ा, “संविधान एक ऐसी दस्तावेज़ है जो हमारे सभ्यतागत विकास को भी दर्शाता है। जब आप संविधान की मूल प्रति को देखेंगे, तो उसमें 22 चित्र मिलेंगे, जो हमारे गौरवशाली अतीत को दर्शाते हैं — गुरुकुल, सिंधु घाटी सभ्यता, राम, सीता और लक्ष्मण की अयोध्या वापसी (जो मौलिक अधिकारों वाले भाग 3 में है)। राज्य के नीति निदेशक तत्वों वाले हिस्से में भगवान कृष्ण का अर्जुन को गीता उपदेश देना दर्शाया गया है। संविधान जहां हमें मौलिक अधिकार देता है, वहीं वह हमें नागरिक कर्तव्यों के निर्वहन की भी आज्ञा देता है। अधिकार तब और अधिक सार्थक हो जाते हैं जब वे लागू किए जा सकते हों।
भारत दुनिया के कुछ गिने-चुने देशों में है जहाँ आप अपने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर सीधे सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं। लेकिन नागरिकों और संस्थाओं को अपने अधिकारों और शक्तियों का प्रयोग संविधान की मर्यादाओं के भीतर रहकर करना चाहिए। जैसे हम अपने पड़ोसी से प्रेम करते हैं, वैसे ही हमें उसकी सीमाओं में दखल नहीं देना चाहिए — न शारीरिक रूप से, न अन्य रूपों में। इसी तरह, संविधान की सीमाओं का सम्मान हर परिस्थिति में आवश्यक है। यदि इसमें कोई विघ्न आता है, तो आप खतरे को भांप सकते हैं।”

श्री धनखड़ ने संसद के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा, “भारतीय संसद एक साधारण विधायी निकाय नहीं है। यह आज 140 करोड़ लोगों की इच्छा का प्रतिबिंब है। यह एकमात्र वैधानिक संवैधानिक मंच है जो जनता की वास्तविक इच्छा को प्रकट करता है। इसलिए संसद की विशेष भूमिका है — एक, यह कानून बनाने की अंतिम संस्था है; और दूसरा, यह कार्यपालिका को उत्तरदायी ठहराती है। शासन कुछ मूल सिद्धांतों से संचालित होता है — पारदर्शिता, जवाबदेही और अब आधुनिक समय में संस्थाओं का श्रेष्ठ प्रदर्शन भी इसमें शामिल हो गया है। संसद बहस, संवाद, चर्चा और विमर्श का सर्वोच्च मंच है।”