विजयचौक (नई दिल्ली) से: सुमन हेम्मादी यानी सुमन कल्याणपुर को कौन नहीं जानता खासकर जो पुराने गीतों के शौक़ीन हैं। आज से कोई 59 वर्ष पहले एक फिल्म आई थी -जब-जब फूल खिले। इस फिल्म में अनेकों गीतों में एक गीत था - ना ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे - करना था इंकार मगर इक़रार तुम्हीं से कर बैठे।" इस अनमोल गीत के गीतकार थे आनंद बक्षी। फिल्म में संगीत दिया था कल्याणजी - आनंद जी और गायक थे सुमन कल्याणपुर और मोहम्मद रफ़ी। मुझे विश्वास है कि भारत के लोगों के होठों पर यह गीत, गीत के बोल आज भी जीवित होंगे।
संभव है आपके मन में एक द्वन्द चल रहा होगा कि आखिर यह अखबारवाला 59-साल बाद इस गीत का फूल क्यों खिला रहा है। वजह यह है कि आज के समय में प्यार की परिभाषा भी बदल गयी है। जबाबदेही का अर्थ बदल दिया है लोगों में, परिवार में, समाज में। संभव हैं अब तक आप क्रोधित भी हो गए होंगे। लेकिन मन को विश्राम दीजिये और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विचार कीजिये की आखिर आज जो भी 59-वर्ष के हैं उन्हें अपने बचपन में, यहाँ तक कि महाविद्यालय और विश्वविद्यालय की पढाई के समय बाबूजी, माँ, दादाजी, दादीजी भले बहुत प्यार करते होंगे, लेकिन पढ़ने/पढ़ाने के मामले में कोई रियायत नहीं देते होंगे। हमारी-आपकी सभी की यही कहानी थी - घर में उनका जूता, चप्पल, झाड़ू, डंडा, थप्पड़, पैर, बेलन, चिमटा हमेशा सज्ज रहता था रसीदने के लिए जब हम पढ़ने के मामले में गलतियां करते थ े।
इन विगत वर्षों में ऐसा क्या हुआ कि हमारे बच्चों को हम नहीं, दूसरे लोग सीखा-पढ़ा रहे हैं। क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए, कैसे पढ़ना चाहिए, किस तरह का आचरण रखना चाहिए, विद्यालय में शिक्षकों के साथ कैसा वर्ताव करना चाहिए, घर में माँ-बाबूजी या अन्य बड़े-बुजुर्गों के साथ कैसे बात करनी चाहिए - अब घर के लोग यानि माता-पिता नहीं बल्कि समाज और मोहल्ले के लोग बता रहे हैं। बच्चों की नजरों में माता-पिता या घर के लोग 'ऑउट-लॉज' हो गए हैं, उन्हें लगता है कि माता-पिता उनके मौलिक अधिकारों पर कुठाराघात कर रहे हैं। उनसे उनके जीने का हक़ छीन रहे हैं - सिर्फ इसलिए कि कि वे उन्हें पढ़ने के लिए कह रहे हैं, समय का पावंद होने को कह रहे हैं, अनुशासित होने को कह रहे हैं।
इतना ही नहीं, इन तमाम बातों को बताने, सिखाने के लिए अब अलग पढाई होने लगी है। हमारे ज़माने में 'काउंसिलर' शब्द भी जन्म नहीं लिया था। आज गली - मोहल्ले के कोने पर, नुक्कड़ों पर काउंसिलर बैठे हैं। घरों में ही नहीं, समाज और शैक्षणिक संस्थाओं में भी अनुशासन में भयंकर गिरावट आ गयी है । यह समझ से परे हैं कि हम विकास की ओर बढ़ रहे हैं या विनाश की ओर?
लेकिन जब सुमन कल्याणपुर का यह गीत सुनते हैं तो ऐसा लगता है की उन दिनों जब वे इस गीत को गायी होंगी, परिवेश में मोहब्बत चतुर्दिक रहा होगा। चाहे माँ-बाबूजी का प्यार हो, दादा-दादी का फटकार हो। लेकिन आज 59-साल बाद हमें अपने बच्चों के लिए समय नहीं है। उनके साथ बैठकर उनकी बातों को सुनने का समय नहीं है। बच्चे तो हो रहे हैं लेकिन शहरों में बच्चे माँ की जगह 'आया' पाल रही है। बच्चे भी माँ को देखकर उसके सीने में चिपकने की इक्षा नहीं कर रहे हैं। अलबत्ता 'आया' के साथ चिपक रहे हैं। हम लाचार हो गए हैं। बहुत बातें हैं, छोटी-छोटी बातें हैं जो आज माता-पिता को अपने बच्चों से दूर कर रहा है, कर दिया है।
लेकिन ऐसी क्या बात है जो देश के बच्चों को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर आकर्षित कर रहा है। आप भले प्रधान मंत्री की इस पहल को 'राजनीतिक शब्द से अलंकृत करें, लेकिन जब आप आराम से सोचेंगे तो आप यक़ीनन इस नतीजे पर पहुंचेंगे कि जो कार्य देश के माता-पिताओं को, चाहे वे रिक्शा चलाते हों या किसी कॉर्पोरेट घराने में ऊँची कुर्सी पर बैठे हों, करनी चाहिए, वह कार्य देश का प्रधानमंत्री कर रहे हैं। अन्यथा पढ़ने-पढ़ाने की विधि, मनोवैज्ञानिक परिवेश, मनोवैज्ञानिक क्रियाकलापों के आधार पर प्रधानमंत्री 'परीक्षा पर चर्चा' नहीं करते। आप यह कह सकते हैं कि देश के प्रधानमंत्री के पास इतना समय है कि वह इस तरह की बातों पर घंटो चर्चा कर रहे हैं? मेरी माने तो 'नहीं', लेकिन आखिर राष्ट्र निर्माण की बात है और बच्चे राष्ट्र के निर्माता हैं ।
अगर ऐसा नहीं होता तो मोदी की "परीक्षा पे चर्चा" का अब तक 7वां संस्करण नहीं हुआ होता। देशव्यापी इस कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी छात्रों, शिक्षकों व अभिभावकों से परीक्षा व शिक्षा क्षेत्र से जुड़ी तमाम चुनौतियों पर बातचीत नहीं करते। समय समय पर वे माता-पिता से आग्रह नहीं करते कि वे अपने बच्चों पर दबाव न डालें। साथ ही, छात्रों को भी यह नहीं कहते कि अपनी क्षमताओं को कम नहीं आकें। प्रधानमंत्री यह नहीं कहते हैं कि परिवार के सदस्यों की बहुत सारी उम्मीदें होना बहुत स्वाभाविक है और इसमें कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन अगर सामाजिक स्थिति के कारण परिवार के सदस्यों को ये उम्मीदें हैं तो यह चिंता का विषय है।
करीब पौने दो घंटे तक पीएम 'सर' अपने मेगा क्लास में बच्चों को परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन से लेकर बेहतर नागरिक बनने के गुर नहीं देते। पीएम ने बच्चों के साथ-साथ उनके माता-पिता और शिक्षकों से भी बात नहीं करते। प्रधानमंत्री ने बेहद सरल और मजेदार अंदाज में बच्चों के हर एक सवाल का जवाब नहीं देते। कैसे बोर्ड परीक्षा की तैयारी की जाए, समय प्रबंधन कैसे हो, मोबाइल के दुष्प्रभाव से कैसे बचा जाए? इन सभी सवालों का जवाब प्रधानमंत्री नहीं देते। यह सभी कार्य तो सैद्धांतिक रूप से माता-पिता, घर-परिवार के बड़े-बुजुर्गों को करनी चाहिए, लेकिन यह कार्य आज देश का प्रधानमंत्री कर रहा है
सैकड़ें 90 फीसदी माता-पिता अपने बच्चों के साथ इस बात की चर्चा नहीं करते कि आखिर उनकी प्रतियोगिता किससे है? वे क्यों इतना भयभीत हैं? लेकिन नरेंद्र मोदी बच्चों से कहते हैं: "आपके दोस्त से आपको किस चीज की स्पर्धा है? मान लीजिए 100 नंबर का पेपर है। आपका दोस्त अगर 90 नंबर ले आया तो क्या आपके लिए 10 नंबर बचे? आपके लिए भी 100 नंबर हैं। आपको उससे स्पर्धा नहीं करनी है आपको खुद से स्पर्धा करनी है... उससे द्वेष करने की जरूरत नहीं है। असल में वो आपके लिए प्रेरणा बन सकता है। अगर यही मानसिकता रही तो आप अपने से तेज तरार व्यक्ति को दोस्त ही नहीं बनाएंगे।
परीक्षा के दौरान बच्चों की जिस प्रकार के तनाव से जूझना पड़ता है उस तनाव को सबसे अधिक एक माता-पिता और अभिभावक समझ सकते हैं। लेकिन अगर प्रधानमंत्री यह कहते हैं कि 'माता-पिता/अभिभावकों को उन्हें 'उत्साह के साथ बच्चे को परीक्षा केंद्रों ले जाना चाहिए, जाने देना चाहिए' यह एक सकारात्मक सोच है। आम तौर पर परीक्षा के दिनों में भी हम परीक्षा केंद्रों पर देर से पहुँचते हैं, जो मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सही नहीं है। प्रधानमंत्री कहे भी 'परीक्षा केंद्रों में हमेशा आप जल्दी जाने की कोशिश करें। परीक्षा केन्द्रों में गहरा सांस लीजिए और खुद में खोने की कोशिश करें। अब आपके हाथ में प्रश्नपत्र आएगा तो आपको तनाव महसूस नहीं होगा। आप प्रश्नपत्र को पढ़ लीजिए और उन्हें हल करने का समय तय कर लीजिए और इसके लिए सबसे अधिक जरूरी है सवालों को लिखकर अभ्यास करना।
प्रधानमंत्री के अनुसार 'हमें आदत डालनी चाहिए कि हम निर्णायक बने। कंफ्यूजन में नहीं रहना चाहिए। अगर कोई कंफ्यूजन है तो हमें उस पर बात करनी चाहिए और उसका समाधान करके आगे बढ़ना चाहिए। कंफ्यूजन किसी भी स्तर का हो, वो बुरा ही होता है। अनिर्णय तो और भी बुरा है।' लेकिन क्या इस बात को भी कहने के लिए भी प्रधानमंत्री आएगा? आम तौर पर विद्यालयों में माता-पिता यह कहते तनिक भी हिचकते नहीं कि 'उनके बच्चे उनकी बात नहीं मानते,' यह कहना माता-पिता के लिए कहाँ तक न्यायसंगत है। यह उनकी कमियों को नहीं दर्शाता?
क्या आज तक कोई इस कदर चर्चा कर बताये कि 'परीक्षा एक ऐसा आंदोलन है जो छात्रों, अभिभावकों, शिक्षकों और समाज को एक साथ लाने के लिए प्रेरित करता है ताकि एक ऐसे वातावरण का निर्माण हो जहां प्रत्येक बच्चे की अद्वितीय व्यक्तित्व का जश्न मना सके, प्रोत्साहित हो सके और खुद को पूरी तरह से व्यक्त करने की अनुमति मिल सके। जो कार्य माता-पिता और अभिभावक को करनी चाहिए, प्रधानमंत्री कर रहे हैं और वे प्रेरक बन गए हैं । आज तो 'एग्जाम वॉरियर्स' के नाम से किताब भी आ गया। आप कहेंगे कि यह एक व्यवसाय है। लेकिन यह कार्य आप भी कर सकते थे। आपकी कमियों को किताबों में लाया गया है। जो कार्य लोगों को करनी चाहिए, वह कार्य प्रधानमंत्री कर रहा है।
इस पुस्तक के माध्यम से, प्रधान मंत्री ने शिक्षा के लिए एक ताज़ा दृष्टिकोण की रूपरेखा तैयार की। छात्रों के ज्ञान और समग्र विकास को प्राथमिक महत्व दिया जाता है। प्रधानमंत्री ने सभी से परीक्षाओं को अनुचित तनाव और दबाव से युक्त जीवन-मृत्यु की स्थिति बनाने के बजाय सही परिप्रेक्ष्य में रखने का आग्रह किया। सीखना एक आनंददायक, संतुष्टिदायक और अंतहीन यात्रा होनी चाहिए - यही प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की पुस्तक का संदेश है। यह मॉड्यूल सिर्फ युवाओं के लिए नहीं बल्कि माता-पिता और शिक्षकों के लिए भी है। हर कोई उन मंत्रों और अवधारणाओं को आत्मसात कर सकता है जो प्रधान मंत्री ने एग्जाम वॉरियर्स में लिखे हैं क्योंकि प्रत्येक मंत्र को चित्रात्मक रूप से दर्शाया गया है। मॉड्यूल में विचारोत्तेजक लेकिन आनंददायक गतिविधियाँ भी हैं जो व्यावहारिक माध्यमों से अवधारणाओं को आत्मसात करने में मदद करती हैं।
'द थर्स्टी क्रो' की कहानी सभी माता-पिता/अभिभावक जानते हैं मुद्दत से। लेकिन नरेंद्र मोदी इस कहानी को कुछ अलग तरीके से भारत के बच्चों को बताया। वे यह भी बताया परीक्षा और पाठ्यक्रम के दबाव को कैसे झेलें। हमें खुद को सामर्थ्यवान बनाना चाहिए। दबाव को हमें अपने मन की स्थिति से जीतना जरूरी है। किसी भी प्रकार की बात हो, हमें परिवार में भी चर्चा करनी चाहिए।' परीक्षा पे चर्चा कार्यक्रम के दौरान पीएम मोदी से सवाल हुआ कि छात्रों को प्रेरित करने में शिक्षकों की क्या भूमिका होनी चाहिए और छात्रों को किस तरह से तनाव मुक्त रखना चाहिए?
किसी भी शिक्षक और छात्र के बीच परीक्षा को लेकर सिर्फ नाता नहीं होना चाहिए, अगर ऐसा है तो उसे ठीक करने की जरूरत है। विद्यार्थी और शिक्षक का नाता पहले दिन से ही निरंतर बढ़ते रहना चाहिए। अगर ऐसा होता है तो परीक्षा के दिनों में तनाव की नौबत ही नहीं आएगी। मोबाइल ही नहीं, बल्कि किसी भी चीज का अति...किसी का भला नहीं करता।हर चीज के लिए एक मानदंड होना चाहिए। उसका एक आधार होता है। किसी भी चीज का कितना उपयोग करना चाहिए, इसका विवेक होना बहुत जरूरी है। टेक्नोलॉजी से
हमें दूर नहीं भागना चाहिए, बल्कि उसका सकारात्मक उपयोग करना चाहिए.
इन्हीं तमाम बातों को मद्दे नजर कल राज्यसभा ने यूपीएससी, एसएससी आदि भर्ती परीक्षाओं और नीट, जेईई और सीयूईटी जैसी प्रवेश परीक्षाओं में पेपर लीक, कर्तव्य की उपेक्षा के साथ-साथ संगठित होकर गलत तरीके अपनाने पर अंकुश लगाने के लिए 'सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) विधेयक, 2024' पारित किया।
केन्द्रीय मंत्री डॉ. जितेन्द्र सिंह ने कहा, "सार्वजनिक परीक्षा विधेयक, जो संभवत भारत की संसद के इतिहास में अपनी तरह का पहला विधेयक है, भारत के युवाओं को समर्पित है। देश के युवाओं का इनसे संबंध है, जो देश की आबादी का 70 प्रतिशत है। लोकसभा इस विधेयक को पहले ही पारित कर चुकी है। अब इसे राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेजा जाएगा और अनुमति मिलने के बाद यह कानून बन जाएगा। सार्वजनिक परीक्षा विधेयक, जो संभवतः भारत की संसद के इतिहास में अपनी तरह का पहला विधेयक है, भारत के युवाओं को समर्पित है।
"अनुचित साधन निवारण विधेयक, 2024" में संघ लोक सेवा आयोग, कर्मचारी चयन आयोग, रेलवे, बैंकिंग भर्ती परीक्षाएं और राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी द्वारा आयोजित सभी कंप्यूटर-आधारित परीक्षाएं शामिल होंगी। लोकसभा विस्तृत चर्चा के बाद 6 फरवरी 2024 को इस विधेयक को पारित कर चुकी है। देश के युवाओं का इनसे संबंध है, जो देश की आबादी का 70 प्रतिशत हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के विकसित भारत के निर्माण में अगले दो दशकों में राष्ट्र निर्माण के लिए उनका योगदान अनिवार्य है। यह विधेयक भारतीय संसद के इतिहास में अपनी तरह का पहला विधेयक है। यह कानून युवाओं को प्रभावित करने वाली एक हालिया घटना को संबोधित करना चाहता है।
कांग्रेस के श्री दिग्विजय सिंह ने कहा कि विधेयक समवर्ती सूची के एक विषय से संबंधित है और इसे राज्यों तक विस्तारित करने का आह्वान किया। इस मुद्दे पर प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी परीक्षाओं में कदाचार रोकने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। डीएमके के श्री पी. विल्सन; आप के श्री संदीप कुमार पाठक; बीजेडी के श्री मुजीबुल्ला खान; सीपीआई (एम) के डॉ. वी. शिवदासन; कांग्रेस की डॉ. अमी याजनिक; भाजपा के डॉ. दिनेश शर्मा; सीपीआई के श्री संदोश कुमार पी., और एनसीपी की डॉ फौजिया खान ने भी बहस में भाग लिया।बहस का जवाब देते हुए, डॉ. जितेन्द्र सिंह ने कहा कि विधेयक अधिक पारदर्शिता और समयबद्ध चयन प्रक्रिया सुनिश्चित करेगा और समान अवसर प्रदान करेगा। सरकार राज्यों को इस विधेयक को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करेगी।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा, प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व के पिछले दस वर्षों में, भारत की अर्थव्यवस्था "फ्रैजाइल 5 से टॉप 5" तक पहुंच गई है। ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स में हम 2014 में 81वें स्थान पर थे, हमने 41 पायदान की छलांग लगाई है, आज हम दुनिया में 40वें नंबर पर हैं। वर्ष 2014 में लगभग 350 स्टार्टअप्स थी, आज हमारे पास है 1,30,000 से अधिक स्टार्टअप हैं। चार-पांच साल पहले अंतरिक्ष क्षेत्र में हमारे पास सिर्फ एक स्टार्टअप था, आज क्षेत्र खुलने के बाद हमारे पास 190 निजी अंतरिक्ष स्टार्टअप हैं।चालू वित्त वर्ष में अप्रैल से दिसंबर 2023 तक निजी अंतरिक्ष स्टार्टअप द्वारा 1,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया गया है। भारत आज दुनिया के शीर्ष 5 विनिर्माण देशों में शामिल है। पिछले दस वर्षों में कई युवा-केंद्रित प्रावधान और योजनाएं शुरू की हैं, जैसे पारदर्शिता सुनिश्चित करना और भर्तियों और उच्च अध्ययन में समान अवसर प्रदान करना।
बहरहाल, आप प्रधानमंत्री और उनकी योजनाओं की भले आलोचना करें, राजनीतिक शब्दों से अलंकृत करें, लेकिन हकीकत यह है कि भारत के लोग, बच्चे, ना-ना करके प्यार उन्हीं से कर बैठे - करना था इंकार, मगर इक़रार तुम्हीं से कर बैठे - ना ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे।
