अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (नई दिल्ली) : सत्तर साल पहले तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर दिल्ली में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के स्थापना के लिए संसद में विधेयक प्रस्तुत की थी। उस समय शायद सोची नहीं होंगी कि आने वाले दिनों में देश के नेता, मंत्री, बड़े-बड़े व्यवसायी जब बीमार पड़ेंगे, वे इस संस्थान में (अपवाद छोड़कर) इलाज नहीं कराकर लंदन, मॉरीशस, दुबई, अमेरिका के अस्पतालों में इलाज करायेंगे और इसका मौद्रिक भार भारत के करदाताओं पर पड़ेगा। शायद वह यह भी नहीं सोची होंगी कि जैसे-जैसे आज़ादी का वर्ष पुराना होता जाएगा, व्यवस्था में बैठे लोग, चिकित्सक, अधिकारी, राजनेतागण सरकारी अस्पतालों को मजबूत करने के बजाय, निजी क्षेत्र में अस्पतालों में अपना मालिकाना हिस्सा रखेंगे।
आज निजी क्षेत्र में जितनी भी संस्थाएं हैं, चाहे शिक्षा के क्षेत्र में हो, संचार के क्षेत्र में हों, चिकित्सा का क्षेत्र में हों, खाद्यान्न के क्षेत्र में हो, सबों ने प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से सरकारी संस्थाओं के कंधों का इस्तेमाल कर आगे बढ़े हैं, बढ़ रहे हैं। इसमें संसद में बैठे राजनेता भी उतने ही जिम्मेदार हैं, जितने देश के संसाधनों को स्वहित में इस्तेमाल कर देश को खोखला और स्वयं को धनाढ्य बनाने वाले लोग शोषक । अगर ऐसा नहीं होता तो आज अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान का राजनीतिकरण नहीं होता, बाजारीकरण नहीं होता और यहाँ से विशेषज्ञ चिकित्सकों का एक बड़ा भाग छोड़कर नहीं जाता।
वैसे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) से शीर्षस्थ संकायों से इस्तीफा देकर निजी क्षेत्रों का दामन पकड़ने वाले चिकित्सकों की परंपरा नई नहीं है, दशकों पुरानी है, लेकिन विगत कुछ वर्षों से इस परंपरा में तेजी आ गयी है। साल 2009 में डॉ. रोहिणी हांडा, प्रोफेसर (मेडिसिन), डॉ. अशोक कुमार, प्रोफेसर (मेडिसिन), डॉ. आर.के. शर्मा, अतिरिक्त प्रोफेसर (फोरेंसिक मेडिसिन), डॉ. एस.सी. तिवारी, प्रोफेसर (नेफ्रोलॉजी), डॉ. सुमित सिंह, एसोसिएट प्रोफेसर (न्यूरोलॉजी), डॉ. के.के. हांडा, एसोसिएट प्रोफेसर (ई.एन.टी.), डॉ. राजीव गुप्ता, एसोसिएट प्रोफेसर (मेडिसिन), सिर और गर्दन के सर्जन डॉ. एस.वी.एस. देव जैसे लोगों ने इस्तीफा देकर अन्यत्र चले गए।
हाल के वर्षों में पद्मश्री से सम्मानित डॉ. रणदीप गुलेरिया ने अपना निदेशक का कार्यकाल खत्म होने के कुछ समय बाद ही दिल्ली एम्स को नमस्कार कर गुड़गांव में स्थित मेदांता अस्पताल में पल्मोनरी विभाग के अध्यक्ष के तौर पर चले गए। न्यूरोलॉजी विभाग की प्रमुख रही डॉक्टर प्रो. एमवी पद्मा श्रीवास्तव ने भी 2023 में एम्स छोड़कर गुरुग्राम स्थित पारस अस्पताल में विभाग प्रमुख के तौर पर ज्वाइन किया। कहते हैं डॉक्टर पद्मा श्रीवास्तव डॉक्टर गुलरिया के बाद एम्स का निदेशक बनने की प्रबल दावेदारों में शामिल थी। लेकिन उन्हें निदेशक नहीं बनाया गया। आर्थोपेडिक विभाग के प्रमुख रहे प्रोफेसर राजेश मल्होत्रा भी एम्स निदेशक पद के प्रबल दावेदार थे, लेकिन उन्हें भी नहीं बनाया गया और वे एम्स छोड़कर अपोलो हॉस्पिटल में अपनी पारी की शुरुआत किये। ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रमुख रहे प्रोफेसर अतुल शर्मा ने भी कुछ कारणों से एम्स से सेवानिवृत्ति ले ली। सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रमुख रहे डॉक्टर एसबीएस देव ने भी वर्ष 2023 में ही दिल्ली एम्स को छोड़ दिया और अपोलो चले गए। नेशनल सेंटर ऑफ एजिंग के वरिष्ठ प्रो. प्रसून चटर्जी ने भी एम्स छोड़कर से आर्टेमिस अस्पताल चले गए। ऐसा लगता है कि चिकित्सा के बाज़ार में 'रोकने वालों' (सरकार/व्यवस्था) की किल्लत हो रही है, जबकि बुलाने वालों की तादात बढ़ रही है।

विगत दिनों जब राज्यसभा में रामजी लाल सुमन ने सवाल उठाया कि क्या अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली से डॉक्टर अपनी नौकरी छोड़कर निजी क्षेत्र में जा रहे हैं? और जब उन्होंने पिछले तीन वर्षों के दौरान एम्स छोड़ने वाले डॉक्टरों की विस्तृत संख्या भी मांगी और पूछा कि क्या डॉक्टरों के नौकरी छोड़ने के कारणों का पता लगाने के लिए कोई अध्ययन किया गया है? इस पर प्रतिक्रिया देते हुए जब केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री जो बताया वह निश्चित तौर पर चौंकाने वाला है। मंत्री ने बताया, "पिछले तीन वर्षों (2022-2024) के दौरान, विभिन्न अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) से 429 संकाय सदस्यों ने इस्तीफा दिया है, जिनमें एम्स, नई दिल्ली से 52 संकाय सदस्य शामिल हैं। वैसे संकाय सदस्यों के इस्तीफे के कारण व्यक्तिगत और व्यावसायिक दोनों हैं।
मंत्री द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में एम्स नई दिल्ली से सबसे अधिक संकाय सदस्यों ने इस्तीफा दिया है। कुल मिलाकर 52 संकाय सदस्यों ने एम्स दिल्ली छोड़ा, उसके बाद एम्स ऋषिकेश का स्थान है, जहाँ से कुल 38 संकाय सदस्यों ने इस्तीफा दिया है। आंकड़ों से पता चला है कि एम्स रायपुर और एम्स बिलासपुर से क्रमशः 35 और 32 संकाय सदस्यों ने इस्तीफा दिया है। इसके अलावा, 22 संकाय सदस्यों ने एम्स कल्याणी से, 16 ने एम्स नागपुर से, 17 ने एम्स रायबरेली से, 19 ने एम्स बीबीनगर से, 12 ने एम्स गोरखपुर से, 15 ने एम्स भुवनेश्वर से, 30 ने एम्स मंगलगिरी से, 22 ने एम्स भटिंडा से, 11 ने एम्स राजकोट से, 27 ने एम्स भोपाल से, 20 ने एम्स देवगढ़ से, 25 ने एम्स जोधपुर से और 19 ने एम्स पटना से इस्तीफा दिया है।
इससे पूर्व 2010 में तत्कालीन सांसद दी.राजा ने भी सदन में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग से सवाल पूछा था कि 'क्या यह सच है कि हाल ही में कई वरिष्ठ डॉक्टरों ने दिल्ली के निजी अस्पतालों में काम करने के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान छोड़ दिया है; यदि हां, तो पिछले एक वर्ष के दौरान एम्स छोड़ने वाले डॉक्टरों का ब्यौरा क्या है; और इसके क्या कारण हैं और एम्स से वरिष्ठ डॉक्टरों के पलायन को रोकने के लिए क्या उपचारात्मक उपाय किए जा रहे हैं? इस प्रश्न के उत्तर में तत्कालीन स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री गुलाम नबी आज़ाद ने कहा था कि 'पिछले एक वर्ष के दौरान, 629 संकाय की कुल स्वीकृत शक्ति के मुकाबले सात संकाय सदस्यों, जो 1.11% के बराबर है, ने या तो एम्स की सेवा से “व्यक्तिगत आधार पर” इस्तीफा दे दिया है या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली है।

इतना ही नहीं, 23 अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थानों में कुल मिलाकर 2783 संकाय और 22861 गैर-संकाय पद रिक्त हैं। इनमें से, देश भर के एम्स में कुल 6376 स्वीकृत संकाय पद हैं। हालांकि, इनमें से 2561 पद रिक्त हैं, जो 40.16% रिक्त पदों को दर्शाता है। सरकार ने देश में एम्स जैसे 23 संस्थान स्थापित किए हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में संकाय सदस्यों के पलायन ने उन्हें बुरी तरह प्रभावित किया है।इतना ही नहीं, आंकड़ों से अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) सहित आरक्षित श्रेणियों में भारी रिक्तियों का भी पता चलता है। अकेले एम्स दिल्ली में, वरिष्ठ रेजिडेंट सहित कुल संकाय और रेजिडेंट डॉक्टरों के 730 पद रिक्त हैं, जिनमें से क्रमशः 250, 115 और 350 पद एससी, एसटी और ओबीसी श्रेणियों के लिए हैं।
दिल्ली एम्स में प्रतिदिन 15,000 से अधिक मरीज आते हैं, जिनमें अकेले आपातकालीन विभाग में लगभग 500 मरीज शामिल हैं। अस्पताल के लोगों का मानना है कि ज्यादातर निकासी के पीछे का कारण संस्थानों में कैरियर के विकास से असंतोष और कॉर्पोरेट अस्पताल में काम करने का अनुभव प्राप्त करने की इच्छा है। एक वरिष्ठ चिकित्सक ने तो यहाँ तक कहते हैं कि मौजूदा पदों पर नियुक्ति होने तक नए एम्स और मेडिकल कॉलेज शुरू करने पर रोक लगा दी जाए। मुख्य रूप से नए संस्थानों के लिए समाधान यह हो सकता है कि देश में उपलब्ध शिक्षण संकाय की संख्या पूरी होने तक नए एम्स और मेडिकल कॉलेज शुरू न किए जाएँ, प्रतिस्पर्धी पारिश्रमिक और करियर विकास की पेशकश की जाए और लंबी छुट्टी लेने वाले नामांकित कर्मचारियों के विदेश में नियुक्ति पर प्रतिबंध लगाया जाए। देश में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को इलाज और मेडिकल शिक्षा का सर्वोच्च संस्थान माना जाता है। सब जगह से हिम्मत हारने वाले मरीजों के लिए एम्स आखिरी ठौर होता है, इसलिए देश के कई राज्यों में एम्स का विस्तार किया गया है।
एक रिपोर्ट के अनुसार, डॉ एम श्रीनिवास ने निदेशक बनने के बाद फैकल्टी स्तर के डॉक्टरों को उनके मुख्य काम के अलावा प्रशासनिक कामकाज भी देना शुरू कर दिया, जिससे डॉक्टरों के ऊपर काम का बोझ अत्यधिक बढ़ गया है। डॉक्टर की सबसे बड़ी संतुष्टि अपने मरीज को ठीक करने में होती है यही उसका पहला काम होता है. जब वह यह काम नहीं कर पाएगा तो उसका फिर संस्थान में टिकना मुश्किल है। जब डॉक्टर के ऊपर प्रशासनिक कामकाज का बहुत ज्यादा भार होगा तो ऐसे में फैकल्टी स्तर का डॉक्टर अपने स्टूडेंट को पढ़ाने में कैसे मेहनत कर पाएगा? कैसे वह मरीजों पर ध्यान दे पाएगा? यह भी कहा जा रहा है कि एम्स निदेशक ने अपने कुछ चहेते डॉक्टरों को तीन-तीन विभाग के प्रमुख की जिम्मेदारी देकर के दूसरे अन्य योग्य डॉक्टर जो विभागाध्यक्ष बनने के काबिल थे उनको उसका मौका नहीं दिया। इसके चलते भी कई डॉक्टरों का दिल्ली एम्स से मोहभंग हो रहा है।
इतना ही नहीं, फैकल्टी स्तर के एक डॉक्टर को सिक्योरिटी का इंचार्ज बनाया दिया गया। दूसरे फैकल्टी स्तर के डॉक्टर को ट्रैफिक कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया। एक कार्डियोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉक्टर को इमरजेंसी मेडिसिन का हेड बनाया गया। अब सवाल उठना भी लाजमी है कि फैकल्टी स्तर के डॉक्टर को एम्स का सिक्योरिटी इंचार्ज बनाना, ट्रैफिक कमेटी का अध्यक्ष बनाना या एक काबिल कार्डियोलॉजिस्ट को एमरजैंसी मेडिसिन के हेड की जिम्मेदारी देना सीधे-सीधे तौर पर उनके खुद के विभाग का काम प्रभावित होना स्वाभाविक है। इससे भी कई चिकित्सक एम्स छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं।

केंद्र सरकार ने एक पॉलिसी बनाई थी कि सभी अस्पतालों में रोटेटरी हेडशिप लागू करके सभी डॉक्टरों को विभागाध्यक्ष बनने का मौका दिया जाएगा। लेकिन, यह व्यवस्था दिल्ली एम्स और पीजीआई चंडीगढ़ में अभी तक लागू नहीं की गई। इससे बहुत सारे डॉक्टरों को विभागाध्यक्ष बनने का मौका नहीं मिल रहा है, जो लोग विभागाध्यक्ष के पद पर हैं रिटायरमेंट होने तक वही लोग उस पद पर जमे हुए हैं, जिससे दूसरे डॉक्टरों को अपने करियर में आगे बढ़ने का मौका नहीं मिल पा रहा है। उधर देश में मेडिकल कॉलेजों की संख्या तेजी से बढ़ने के कारण निजी क्षेत्र के मेडिकल कॉलेज की संख्या अधिक है, जिससे फैकल्टी की मांग काफी बढ़ रही है। जबकि देश में बेहतर फैकल्टी की कमी है। इसका सीधा असर सरकारी अस्पतालों पर पद रहा है जहाँ से लोग अधिकाधिक पैसे पर बेहतरीन फैकल्टी को निकाल रहे हैं।
इससे भी एक खतरनाक स्थिति यह है कि देश के प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों में बढ़ते मरीजों के आवागमन के अलावा डॉक्टरों के ऊपर एक राजनीतिक दबाव भी है। हर नेता एम्स में अपना और अपने रिश्तेदारों का इलाज कराना चाहता है। साथ ही वह चाहता है कि डॉक्टर उनको अधिक समय दें और उनका ज्यादा ध्यान रखें। ऐसे में डॉक्टर अपने दूसरे मरीजों को कम समय दे पाते। कई मर्तबा आईसीयू और वेंटीलेटर बेड के लिए भी पॉलिटिकल प्रेशर आता है। इसका परिणाम यह होता है कि आये दिन सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों के साथ अशोभनीय घटनाएं होती रहती है। परिणाम स्वरूप डॉक्टर असुरक्षित भी महसूस करने लगे हैं।
ज्ञातव्य हो कि 9 मई 1956 को राज्यसभा में एम्स विधेयक 1956 पर चार दिनों तक चली लंबी बहस समाप्त हो गई थी। राजकुमारी अमृत कौर ने बहस के उत्तर में कहा था - "मैं चाहती हूँ कि यह संस्थान एक अद्वितीय संस्थान बने और हमारे लोगों - युवा पुरुष और महिला डॉक्टरों - को स्नातकोत्तर शिक्षा के ऐसे अवसर प्रदान करे जो उन्हें अब तक अपने देश में नहीं मिल पाए हैं। मैं चाहती हूँ कि यह एक अद्भुत संस्थान हो, जिस पर भारत को गर्व हो, और मैं चाहती हूँ कि भारत इस पर गर्व करे।" राज्यसभा के उपसभापति ने "विधेयक पारित किया जाए" का प्रश्न उठाया। प्रस्ताव स्वीकृत हुआ और इस प्रकार पचास वर्ष पूर्व एम्स का जन्म हुआ।
एम्स अधिनियम 1956 में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की स्थापना का प्रावधान था। इसे संसद द्वारा अधिनियम संख्या 25, 1956 के रूप में अधिनियमित किया गया था और इसमें केवल 29 धाराएँ हैं। लोकसभा की कार्य मंत्रणा समिति ने इस विधेयक पर चर्चा और पारित होने के लिए केवल 60 मिनट का समय आवंटित किया था। इस विधेयक ने संसद सदस्यों में ज़बरदस्त उत्साह जगाया और 18 से 21 फ़रवरी 1956 तक लोकसभा में तीन दिन और 3 मई से 9 मई 1956 तक राज्यसभा में चार दिन इस पर बहस हुई। इस बहस का संसदीय रिकॉर्ड 800 से ज़्यादा पृष्ठों का है।
18 फ़रवरी 1956: जब स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर विधेयक प्रस्तुत करने के लिए लोकसभा में खड़ी हुईं, तो उनके पास अपने भाषण का कोई तैयार पाठ नहीं था। उन्होंने अपने साथ लाए गए नोट्स और अपने दिल से बात की। "यह मेरा एक प्रिय सपना रहा है कि स्नातकोत्तर अध्ययन और हमारे देश में चिकित्सा शिक्षा के उच्च मानकों को बनाए रखने के लिए, हमारे पास इस तरह का एक संस्थान हो जो हमारे युवा पुरुषों और महिलाओं को अपने देश में ही स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त करने में सक्षम बनाए। यह केवल कुछ ही लोगों को स्नातक अध्ययन प्रदान करेगा। मुख्य ज़ोर स्नातकोत्तर अध्ययन और विशेषज्ञता पर होगा।"

भारत में अपनी तरह का पहला और एशिया में अपनी तरह का पहला संस्थान होने के नाते, इस संस्थान की दो विशेषताएँ हैं: हर प्रकार की निजी प्रैक्टिस पर प्रतिबंध और डॉक्टरों को निजी प्रैक्टिस के नुकसान की भरपाई के लिए उचित वेतन देना। एम्स के डॉक्टर अपना पूरा समय न केवल अध्यापन, न केवल अस्पताल आने वाले मरीजों की सेवा में, बल्कि शोध में भी लगाएंगे। सभी कर्मचारियों और छात्रों को गुरु-शिष्य आदर्श की सर्वोत्तम परंपराओं के अनुसार संस्थान परिसर में ही ठहराया जाएगा ताकि वे एक-दूसरे के निकट संपर्क में रहें।
लोकसभा में सभी दलों के सांसदों ने एम्स विधेयक 1956 द्वारा चिकित्सा शिक्षा में प्रस्तावित क्रांतिकारी बदलावों का भारी समर्थन किया। बहस की शुरुआत करते हुए, काकीनाडा से सांसद डॉ. रामा राव ने कहा कि भारत में बहुत सीमित अवसरों को देखते हुए, संस्थान में स्नातक स्तर की अधिक सीटें होनी चाहिए। तिरुप्पुर से सांसद टी.एस.ए. चेट्टियार ने कहा कि संस्थान की संरचना में यह प्रावधान होना चाहिए कि अधिकांश सदस्य गैर-सरकारी हों। संसद में लेखा-जोखा प्रस्तुत करने के अलावा, संस्थान को अपनी गतिविधियों की वार्षिक रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में प्रस्तुत करनी चाहिए।
टी.एस.ए. चेट्टियार के इस प्रस्ताव को बाद में एक संशोधन द्वारा एम्स अधिनियम में शामिल किया गया। उन्होंने आगे कहा कि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के डॉक्टरों को संस्थान परिसर में व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान नहीं किया जा सकता है और संस्थान में एक अस्पताल होना चाहिए जहाँ व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया जा सके। यह बात दिल्ली के निकट बल्लभगढ़ स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में परिलक्षित होती है, जिसका संचालन संस्थान द्वारा किया जाता है जहाँ स्नातक डॉक्टरों को व्यावहारिक प्रशिक्षण के लिए भेजा जाता है।
बॉम्बे सबअर्बन से सांसद श्रीमती जयश्री ने कहा कि एम्स का नर्सिंग कॉलेज देश के अन्य नर्सिंग कॉलेजों के लिए पथप्रदर्शक होना चाहिए। दरभंगा से सांसद श्री नारायण दास ने कहा कि सरकार को संस्थान को पर्याप्त वित्तीय सहायता प्रदान करनी चाहिए। सदन में लखनऊ का प्रतिनिधित्व करने वाले मोहनलाल सक्सेना ने कहा कि एम्स एक स्वायत्त निकाय होगा और संसद का इस पर अधिक नियंत्रण नहीं होगा। कई सदस्यों ने आयुर्वेद, होम्योपैथी और अन्य स्वदेशी चिकित्सा पद्धतियों को एम्स में शामिल करने की आवश्यकता भी उठाई, जो राज्यसभा में भी बहस का एक प्रमुख विषय रहा। विधेयक पर जब खंड दर खंड मतदान हो रहा था, तब कनारा से सांसद जोआचिम अल्वा ने चिंता व्यक्त की कि सरकार द्वारा नियुक्त किया जाने वाला निदेशक शायद कोई सेवानिवृत्त राजनेता हो सकता है - एक "खुशामदी" जिसने लगभग दो दशकों से कोई शिक्षण या संचालन कार्य या ऐसा कुछ भी नहीं किया हो।
लोकसभा में बहस के अपने उत्तर में, स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि शासी निकाय में अधिकांश गैर-सरकारी लोग होंगे। उन्होंने कहा कि अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान नाम सर्वसमावेशी और उपयुक्त है। उन्होंने सदस्यों को आश्वस्त किया कि एक स्थायी चयन समिति द्वारा प्रोफेसरों के चयन पर यूपीएससी ने सहमति व्यक्त की है। 3 मई 1956 को राज्यसभा में विधेयक पेश करते हुए, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर ने कहा, "संस्थान का भविष्य निदेशक, प्राध्यापकों, अन्य शिक्षण कर्मचारियों और छात्रों के हाथों में होगा। मेरा मानना है कि यह उनकी कर्तव्यनिष्ठा, अपने कार्य को बढ़ावा देने की उनकी इच्छा और परोपकार की भावना ही होगी जो उन्हें अपने व्यक्तिगत विचारों को गौण करने के लिए प्रेरित करेगी, जैसा कि मेरा मानना है कि चिकित्सा के महान पेशे को अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए करना चाहिए, और यही अंततः एक ऐसे वातावरण का निर्माण और रखरखाव करेगा जो इस तरह के संस्थान के लिए आवश्यक है। इसलिए, मुझे आशा है कि आज राज्यसभा में स्वीकृति के लिए विधेयक प्रस्तुत करते समय, जो कानूनी ढाँचा तैयार किया गया है, वह इस संस्थान में चिकित्सा शिक्षा के उन्नत तरीकों के क्रमिक कार्यान्वयन में सहायक होगा और इसके प्रभाव से पूरे देश में स्वास्थ्य के क्षेत्र में व्यावसायिक प्रशिक्षण के विभिन्न पाठ्यक्रमों के मानकों को ऊँचा उठाया जा सकेगा।"
उन्होंने सदस्यों को सूचित किया कि डॉ. बी.बी. दीक्षित को हाफकिन संस्थान में उनके शोध अनुभव और बॉम्बे के सर्जन-जनरल के रूप में प्रशासनिक अनुभव के आधार पर संस्थान का पहला निदेशक नियुक्त किया गया है। अपने परिचयात्मक भाषण के समापन पर, स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि "भारत सरकार अपनी नियम निर्माण शक्ति के माध्यम से न्यूनतम नियंत्रण के अधीन, संस्थान को अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए व्यापक स्वायत्तता प्राप्त होगी।"
यद्यपि राज्य सभा के सदस्य आधुनिक चिकित्सा में उच्च शिक्षा की सुविधा प्रदान करने हेतु अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की स्थापना के विधेयक के प्रबल समर्थक थे, फिर भी कई सदस्यों का मानना था कि इस विधेयक में स्पष्टता का अभाव है और नियमों में कार्यकारी प्राधिकार को अत्यधिक प्रत्यायोजन की परिकल्पना की गई है। सदस्यों ने कहा कि विधेयक के 30 खंडों में से 25 खंडों में "नियमों द्वारा निर्धारित" प्रावधान और 11 खंडों में "विनियमों द्वारा निर्धारित" प्रावधान शामिल है। जबकि प्रत्यायोजित विधान प्रत्येक अधिनियम के साथ आता है, एम्स विधेयक कार्यकारी प्राधिकार को असाधारण प्रत्यायोजन की मांग करता है। चिकित्सा परिषद को उपाधियाँ और डिप्लोमा प्रदान करने की शक्तियाँ और संघ लोक सेवा आयोग को चयन प्रक्रिया संचालित करने की शक्तियाँ संस्थान को सौंप दी गईं।
कई सदस्यों ने विधेयक में स्वदेशी चिकित्सा पद्धतियों के संदर्भों को पूरी तरह से नकार दिए जाने पर चिंता व्यक्त की और महसूस किया कि आयुर्वेद, होम्योपैथी और यूनानी चिकित्सा पद्धतियों पर भी ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। उड़ीसा से सांसद विश्वनाथ दास ने कहा कि महात्मा गाँधी से प्रेरणा प्राप्त स्वास्थ्य मंत्री आयुर्वेद को एक अछूत पद्धति बना रहे हैं। कुछ सदस्यों का यह भी मानना था कि एम्स में डेंटल कॉलेज और नर्सिंग कॉलेज की आवश्यकता नहीं है और उच्च स्तरीय शोध कार्यों पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।
उत्तर प्रदेश से सांसद पी.एन. सप्रू ने बहस की शुरुआत करते हुए कहा कि "हम इस सुझाव से सहमत नहीं हो सकते कि संस्थान के तकनीकी पहलू को आकार देने का काम संस्थान के निदेशक और प्रोफेसरों को सौंपा जाए जो एक चिकित्सा संकाय के रूप में कार्य करें। इस प्रकार के संविधान के तहत, संस्थान के शैक्षणिक संकाय के परस्पर प्रशंसा के एक बंद निगम में विकसित होने का खतरा है। संविधान में ही एक विशेषज्ञ चरित्र का प्रतिनिधित्व - एक बाहरी विशेषज्ञ चरित्र का प्रतिनिधित्व - प्रदान किया जाना चाहिए।"
बहस में भाग लेते हुए, मनोनीत सांसद डॉ. राधा कुमुद मुखर्जी ने विधेयक के खंड 5 पर स्पष्टीकरण माँगा, जिसमें कहा गया है कि "एम्स एक राष्ट्रीय महत्व का संस्थान होगा"। उनका मानना था कि राष्ट्रीय महत्व का दायरा इतना व्यापक होना चाहिए कि देश में प्रचलित सभी चिकित्सा पद्धतियों - उन चिकित्सा पद्धतियों को शामिल किया जा सके जो सदियों से चली आ रही हैं। उत्तर प्रदेश के सांसद एच.पी. सक्सेना ने भी खंड 5 पर इसी तरह के विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय महत्व के संस्थान को भारत के अन्य सभी मेडिकल कॉलेजों और अन्य संबद्ध संस्थानों के लिए चिकित्सा शिक्षा का उच्च मानक प्रदर्शित करना चाहिए। मध्य प्रदेश के सांसद डॉ. डब्ल्यू.एस. बार्लिंगे ने संस्थान के उद्देश्यों पर ज़ोर दिया कि चिकित्सा शिक्षा में शिक्षण के पैटर्न विकसित करना संस्थान के प्रमुख क्षेत्रों का एक महत्वपूर्ण घटक है। उन्होंने महसूस किया कि संस्थान को दिल्ली विश्वविद्यालय से जोड़ा जा सकता है जो डिप्लोमा और डिग्री प्रदान कर सकता है और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से अनुदान भी प्राप्त कर सकता है।
बहस के अपने उत्तर में, राजकुमारी अमृत कौर ने सदस्यों द्वारा व्यक्त की गई चिंताओं का उत्तर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि संस्थान को 1956 के अधिनियम के तहत चिकित्सा उपाधियाँ, डिप्लोमा और अन्य शैक्षणिक उपाधियाँ प्रदान करने का अधिकार होगा। उन्होंने कहा कि भारत में दंत चिकित्सा एक बहुत ही उपेक्षित विज्ञान रहा है और दंत चिकित्सकों को प्रथम श्रेणी की योग्यता प्राप्त करने के लिए विदेश जाना पड़ता है। इसलिए संस्थान से एक दंत चिकित्सा महाविद्यालय संबद्ध किया गया। इसी प्रकार, उन्होंने कहा कि नर्सिंग सबसे अधिक उपेक्षित है।
