केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने एक वीडियो संदेश जारी कर लोगों से आगे बढ़कर एक पेड़ मां के नाम 2.0 पहल में भाग लेने का आग्रह किया। उन्होंने नागरिकों से 5 जून 2025 को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 'मिशन लाइफ' के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने का आह्वान किया। एक पेड़ मां के नाम 2.0 पहल का लक्ष्य 5 जून से 30 सितंबर, 2025 की अवधि में 10 करोड़ पेड़ लगाना है। काश !! मंत्री जी भारत में परित्यक्त माताओं के तरफ भी नजर उठाते।
भारत में गर्भाधान से लेकर मृत्यु तक महिलाओं के संरक्षण के लिए दर्जनों कानून हैं, लेकिन कभी आपने सोचा कि भारत में एक विधवा की रक्षा और सुरक्षा के लिए कोई कानून नहीं है। किसी भी अवस्था में पति की मृत्यु होने के बाद वह अपना जीवन कैसे जियेगी, सरकार की नज़रों में कोई अहमियत नहीं रखता है।
यह अनुमान लगाया गया है कि भारत में लगभग 13 मिलियन घरों का नेतृत्व अकेली माताएँ करती हैं, जो सभी घरों का लगभग 4.5% है। 2011 जनगणना के अनुसार भारत में करीब 43 मिलियन विधवा है। और विधवाओं के कल्याणार्थ सरकार के तरफ से कोई ठोस कदम उठाने के लिए राष्ट्रीय स्तर अभियान का नेतृत्व करते।
2022 का विधेयक संख्या 25 विधवा (संरक्षण एवं कल्याण) विधेयक, 2022 (बेनी बेहनन, सांसद द्वारा) जिसमें संकटग्रस्त, अशक्त, उपेक्षित और परित्यक्त विधवाओं के लिए सरकार द्वारा कल्याण बोर्ड के माध्यम से वित्तीय सहायता, पेंशन, चिकित्सा देखभाल, आवास और अन्य सुविधाएं प्रदान करके आवश्यकता आधारित पुनर्वास और कल्याण के साथ सुरक्षात्मक उपाय किए जाने और उससे संबंधित या उसके आनुषंगिक मामलों का प्रावधान किया गया है, सरकार को पेश किया गया था।
लेकिन, भारतीय संसद में विधवाओं की सुरक्षा के लिए विशेष विधेयक पेश किए गए हैं, लेकिन पारित नहीं हुए हैं। हालाँकि विधवाओं की सुरक्षा के लिए कई प्रयास किए गए हैं, जिनमें "विधवा (संरक्षण और भरण-पोषण) विधेयक, 2015" और "विधवाओं और एकल महिलाओं के अधिकारों का संरक्षण और विधवापन प्रथा उन्मूलन" विधेयक 2022 में पेश किया गया है, लेकिन इनमें से कोई भी कानून नहीं बन पाया है। वह तो सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक दिवंगत डॉ. बिंदेश्वर पाठक धन्यवाद के पात्र थे जो अपने जीवन काल में सैकड़ों नहीं, हज़ारों विधवाओं को उनका वजूद दिए, जीने का मकसद दिए।

शिक्षा मंत्री प्रधान ने अपने संदेश में कहा कि यह पहल पेड़ों की संख्याओं से कहीं बढ़कर प्रकृति के प्रति प्रेम और जिम्मेदारी की प्रतीक है। उन्होंने, खासकर छात्रों सहित सभी को अपनी मां के नाम पर एक पेड़ लगाने के लिए प्रोत्साहित किया ताकि वे अपनी मां और प्रकृति दोनों के प्रति श्रद्धा व्यक्त कर सकें। उन्होंने कहा कि सरकार की यह पहल प्रत्येक नागरिक को पेड़ लगाने के लिए प्रेरित करने के लिए है।

उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि 2024 में इसकी शुरुआत के बाद से यह पहल एक जन आंदोलन बन गयी है। उन्होंने याद दिलाया कि किस प्रकार पिछले साल 5 जून को प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी मां की याद में एक पेड़ लगाया था। प्रधान ने बताया कि देश भर में अब तक 5.5 करोड़ से ज़्यादा पेड़ लगाए जा चुके हैं। उन्होंने सीड बॉल, बायो फेंसिंग आदि जैसी अभिनव पहल करने वाले छत्तीसगढ़, त्रिपुरा और राजस्थान के बच्चों और माताओं के प्रयासों की भी सराहना की।
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान की शुरुआत की थी, जो पर्यावरण की जिम्मेदारी के साथ-साथ माताओं को आदर देने वाली एक अनूठी पहल है। इस अभियान की शुरुआत 5 जून 2024 को प्रधानमंत्री द्वारा नई दिल्ली के बुद्ध जयंती पार्क में पीपल का पेड़ लगाने के साथ की गयी थी। प्रधानमंत्री ने पर्यावरण को बेहतर बनाने के लिए सामूहिक प्रयासों के महत्व पर जोर दिया और पिछले दशक में वन क्षेत्र बढ़ाने में भारत की प्रगति के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि यह अभियान सतत विकास के लिए देश की आवश्यकता के अनुरूप की गई पहल है।
'एक पेड़ मां के नाम' पहल का सार प्रतीकात्मक रूप से अपनी मां के नाम पर एक पेड़ लगाना है। यह सरल कार्य दोहरे उद्देश्य को पूरा करता है: जीवन को पोषित करने और धरती के स्वास्थ्य में योगदान देने के लिए माताओं की भूमिका का सम्मान करना। पेड़ जीवन का आधार हैं और एक मां की तरह वे अगली पीढ़ी के लिए पोषण, सुरक्षा और भविष्य प्रदान करते हैं। इस पहल के माध्यम से, लोग अपनी माताओं के लिए आदर स्वरूप एक पेड़ लगाकर एक स्थायी स्मृति प्रतीक बनाने के साथ ही पर्यावरण संरक्षण की तत्काल आवश्यकता को भी पूरा कर सकते हैं। खैर।
दो वर्ष पहले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भारत ने विधवाओं के कल्याण तथा उनके मानवाधिकारों के संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए केंद्र तथा राज्य सरकारों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासनों के सरकारी अधिकारियों को परामर्श जारी किया है। आयोग ने परामर्श जारी करने की आवश्यकता महसूस की क्योंकि उसने देखा कि विधवा महिलाओं को अपने पति को खोने के भावनात्मक संकट के अलावा, अक्सर कई अन्य चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है, जिसमें सामाजिक बहिष्कार, आय का नुकसान और यहां तक कि निवास का नुकसान भी शामिल है। लेकिन उस परामर्श का क्या हश्र हुआ, यह तो मानवाधिकार ही जानता है।
आयोग ने उल्लेख किया कि 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार भारत में 5.6 करोड़ विधवाओं की कुल आबादी में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 78% है। विधवा महिलाओं को अक्सर अपने पति की मृत्यु के बाद खुद की देखभाल करने के लिए छोड़ दिया जाता है। अपने परिवारों से पर्याप्त समर्थन और वित्तीय स्वतंत्रता की कमी के कारण, उन्हें समुदाय से अलग-थलग कर दिया जाता है, यहां तक कि उन्हें अपना घर छोड़कर आश्रय गृहों/आश्रमों में शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है। निरक्षरता का प्रचलन और बढ़ती उम्र के कारण उनकी स्थिति और खराब हो जाती है।
इसलिए, विधवा महिलाओं के समग्र कल्याण पर विचार करते हुए, आयोग ने अपने परामर्श में केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन द्वारा कार्रवाई के लिए 10 प्रमुख क्षेत्रों और अन्य उपायों पर ध्यान केंद्रित किया है। इनमें उनके लिए उचित पहचान दस्तावेज सुनिश्चित करना, उनके लिए आश्रय गृहों का विकास और रखरखाव, संपत्ति तक समान पहुंच; उनके घरों से बेदखल होने से रोकना और शोषण से सुरक्षा, कौशल विकास का प्रावधान और स्थायी आजीविका तक पहुंच, आसान बैंकिंग और वित्तीय स्वतंत्रता तक पहुंच, स्वास्थ्य देखभाल की पहुंच, सामर्थ्य और उपलब्धता, मानसिक स्वास्थ्य, समुदाय आधारित नेटवर्क, निराश्रित विधवाओं के मुद्दों के बारे में डेटा की कमी, साहित्य का उपयोग और पहले दिए गए सुझावों सहित 17वीं लोकसभा में सांसद श्री जनार्दन सिंह सिग्रीवाल द्वारा पेश 'विधवा (संरक्षण और रखरखाव) विधेयक, 2015' के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत गठित समिति की 2017 की रिपोर्ट की समीक्षा करना ताकि विधवाओं के कल्याण के बारे में कानून लाया जा सके।
उधर, प्रधान ने जोर दिया कि यह पहल प्रकृति के प्रति प्रेम को हमारे दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बनाने वाले भविष्य के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है। श्री प्रधान ने यह भी बताया कि वैश्विक सतत विकास प्रयासों का मार्गदर्शन करने वाले संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार जलवायु परिवर्तन का समाधान न केवल नई तकनीकों में बल्कि बदलती जीवनशैली में भी निहित है। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि इस दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने के लिए, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने मिशन लाइफ की शुरुआत की थी। केंद्रीय मंत्री ने छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों को उनकी सक्रिय भागीदारी और जिम्मेदारी तथा संवेदनशीलता के साथ बदलाव लाने के लिए बधाई दी। उन्होंने यह भी बताया कि 29 लाख से अधिक छात्रों ने अपने लगाए गए पेड़ों के लिए 50 लाख से अधिक क्यूआर कोड तैयार किए हैं। इस प्रकार भारत के लिए एक विशाल, डिजिटल और सुलभ पर्यावरण डेटाबेस बनाने में योगदान मिला है।
आइये बनारस और वृंदावन चलते हैं।
दुनिया के दूसरे सबसे अधिक जनसंख्या वाले हमारे देश में लाखों बदकिस्मत और असहाय महिलाएं हैं जो अपने जीवनकाल में ही अपने पति को खो देती हैं और विधवा हो जाती हैं। इनमें से पचास प्रतिशत से अधिक विधवाएं वृद्ध, अशक्त, विभिन्न बीमारियों, शारीरिक विकृति या मानसिक असंतुलन से ग्रस्त होती हैं, खास तौर पर गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों से संबंधित होती हैं, जो अपने प्रियजनों द्वारा उपेक्षित और उपेक्षित रहती हैं और उनमें से अधिकांश के पास आजीविका और सिर पर छत के बिना स्वतंत्र और पर्याप्त साधन नहीं होते हैं। यह बहुत आम बात है कि जब किसी विधवा के पास आय या आजीविका का कोई स्थायी स्रोत नहीं होता है तो उसे उसके ससुराल या यहां तक कि उसके मायके से भी निकाल दिया जाता है।

गरीबी और अन्य मजबूरी वाले कारणों से उनकी समस्याएं कई गुना बढ़ जाती हैं जहां उनके पास जीवित रहने के लिए भीख मांगने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं होता है और ऐसी कई विधवाओं को सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर भीख मांगते देखा जा सकता है। कई महिलाएं जो अपनी युवावस्था में विधवा हो जाती हैं। ऐसी कई विधवाएं जीवित रहने के लिए घरेलू नौकरानी के रूप में काम करती हैं या अन्य काम करती हैं। कई विधवाएँ वृद्धाश्रमों में शरण लेती हैं, लेकिन कानूनी तौर पर उनकी संख्या बहुत कम है। जब उनके पास आश्रित बच्चे होते हैं, तो उनकी परेशानियाँ और बढ़ जाती हैं। उन्हें भी सुरक्षा की जरूरत होती है। इसलिए पूरे देश में ऐसी विधवाओं की देखभाल के लिए एक प्राधिकरण की स्थापना करना जरूरी है।
उनके आठ फीट x छः फीट के कमरे में तिलचट्टा और चिपकिल्ली का साम्राज्य था। कोने में प्लास्टिक के डब्बे में रखे लाल रंग का मसूर दाल पर कभी-कभी चिपकिल्ली चढ़कर नीचे उतर रहा था। छोटे-छोटे चूहों के लिए मानो समस्त क्षेत्र खुला मैदान हो और वे बाधा – दौड़ का अभ्यास लगातार कर रहे हों। दरवाजे के चौखट से घर में गिरे पानी एक सुराग से बाहर निकल रहा था। यह पानी कुछ देर पहले बर्तन साफ़ करने में गिरा था। भात के कुछ अंश अभी भी वहां गिरा था जो पानी की कमी के कारण बाहर नहीं निकल पाया था और वह तिलचट्टे के लिए भोजन था। एक दूसरे कोने में प्लास्टिक के एक बाल्टी में पानी रखा था। इस बाल्टी का क्षेत्रफल भी कमरे के क्षेत्रफल से अधिक नहीं था, जिसमे पांच लीटर पानी से अधिक जाना, यानि कमरे में बाढ़ आने के बराबर था।
सामने पचास के दसक में बने मोटे एल्युमिनियम के चादरों से बना एक बक्सा, जो अपने जवानी में चमकता रहा होगा, आज इस वृद्धा की तरह जीवन की अंतिम साँसे खींच रहा था। न जाने हवा और मिट्टी की कितनी परतें इसके चादरों को ढंककर काला कर दिया था। ऐसा लगता था जैसे उस घर में रखा एक-एक सामान उस वृद्ध महिला को देख रहा हो और इंतज़ार कर रहा हो की कब सभी गँगा की धाराओं में समर्पित होंगे अपनी संगनी के साथ। उस दिन से कोई ६० वर्ष पहले २० वर्ष की आयु में उनके घर के लोग उन्हें बनारस लाये थे। पति की मृत्यु के बाद गँगा स्नान कराने के उद्देश्य से। ललिता घाट स्थित गँगा के किनारे सभी एक साथ थे। पहले पुरुष लोग स्नान किये। फिर कुछ महिलाएँ एक साथ स्नान करने नीचे उतरीं।

हर-हर गंगे -हर – हर गंगे कर जब पानी से मुख को बाहर निकालीं भगवान् सूर्य को जल अर्पित करने, तब तक घर के सभी अपने “पराये” हो चुके थे। उधर सूर्यदेव आसमान पर ऊपर आये, इधर सभी सगे-संबंधी जो बहुत ही विश्वास के साथ कलकत्ता से साथ आये थे, अस्ताचल में चले गए। अब तो किसी का चेहरा तक याद नहीं है उन्हें। हाँ, इनके पति के पास उस समय कोई ३०० से अधिक बीघा जमीं थी। वे माता-पिता के एकलौते सन्तान थे। पांच बहुत बड़े-बड़े तालाब थे जिसमे मछलियाँ जीवन जीती थी। विवाह के कोई आठ महीने बाद ही समय ने अपना रुख मोड़ा था इनसे और ये विधवा हो गयीं।
उत्तर में वरुणा नदी और दक्षिण में अस्सी नदी के बीच बसा बनारस और बनारस की सैकड़ों गालियां न जाने कितनी विधवाओं के इतिहास को समेटे हुए हैं – निःशब्द। आज भी बनारस की गलियों में, विधवा आश्रमों में कई हज़ार विधवाएं अपने जीवन की अंतिम बसन्त को समाप्त होते देख रहीं हैं। गंगा की ओर जाती बनारस की पुरानी गलियों में जैसे दो घरों की दीवारें बांस-बल्लों के सहारे एक-दूसरे को संभाले हुए हैं, इस विस्वास के साथ की दोनों एक-साथ गिरेंगे; भारत के गाओं, शहरों से बनारस के घाटों पर, बनारस की तंग गलियों में अपने ही परिवारों, परिजनों, सन्तानो द्वारा फेकीं गयी, पटकी गयी विधवाओं को अब सिर्फ महादेव का सहारा है उनका शरणागत होने के लिए।
वृंदावन की तरह काशी भी विधवाओं के लिए मशहूर रहा है। हालांकि यहाँ विधवाओं की संख्या वृंदावन की तुलना में कम है। काशी के बारे में एक कहावत भी मशहूर है- रांड़, सांड़, सीढ़ी, सन्यासी / इनते बचैं तो सेवैं काशी… लेकिन यह भी सच है कि यहाँ की विधवाओं की हालत वृंदावन की विधवाओं जितनी खराब नहीं है और ना ही वृंदावन जितनी विधवाएँ यहाँ हैं भी। फिर भी सुलभ होप फाउण्डेशन वाराणसी की भी विधवाओं को मासिक सहायता देता है।विधवाओं की नगरी के रूप में वृन्दावन शहर में अब हालात बदल रहे हैं। कुछ वर्ष पहले तक जहाँ मथुरा-वृन्दावन में गलियों में, सड़कों पर, चौराहों पर, शहर के हर कोने और चौक पर वृद्ध विधवा स्त्रियां दिखाई देती थी अपने-अपने जीवन-मरण को देखती, महसूस करती, अब नहीं हैं। अब सभी विधवाएं आश्रमों में रहती हैं, टीवी देखती हैं, भजन गाती हैं। उनके लिए वहां जीवन की मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं।’
