लखनऊ : जब महिलाओं के खिलाफ अपराध की बढ़ती घटनाओं की बातें 'वर्चुअल' माध्यम से हो, फिर आप महिलाओं के विरुद्ध बढ़ते अपराध के भविष्य के बारे में क्या सोचेंगे ? बहुत अहम् सवाल है। विगत दिनों ऐसा ही कुछ हुआ था उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में, वह भी सचिवालय से कोई दो किलोमीटर दूर।
देश भर में पेशेवर वातावरण और सार्वजनिक क्षेत्र दोनों में महिलाओं के खिलाफ अपराध की बढ़ती घटनाओं को संज्ञान में लेकर पिछले वर्ष 9 सितम्बर, 2024 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया था। इस वर्ष तारीख पहले खिसककर 26 जुलाई, 2025 हो गया और लखनऊ विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के डॉ. राम मनोहर लोहिया पीठ के सहयोग से एक और संगोष्ठी का आयोजन हुआ। यह पहल देश भर में पेशेवर वातावरण और सार्वजनिक क्षेत्र दोनों में महिलाओं के खिलाफ अपराध की बढ़ती घटनाओं को संज्ञान में लेकर की गई।
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी. रामसुब्रमण्यन ने 'वर्चुअल माध्यम' से मुख्य भाषण देते हुए, भारत में देवियों के प्रति सांस्कृतिक श्रद्धा और महिलाओं के खिलाफ हिंसा की भयावह वास्तविकता के बीच के अंतर पर प्रकाश डाला और बताया कि हर घंटे ऐसे अपराधों से संबंधित लगभग 51 एफआईआर दर्ज की जाती हैं। उन्होंने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न निवारण अधिनियम, 2013 को लागू करने के पीछे के लंबे संघर्ष को याद किया और इस बात पर बल दिया कि शिक्षा और करियर में उल्लेखनीय प्रगति के बावजूद, न्यायमूर्ति रामसुब्रमण्यन ने महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए जागरूकता बढ़ाने, मजबूत प्रवर्तन तंत्र और व्यवस्थागत बदलावों का आग्रह किया।
पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा के खिलाफ, ऐपवा ने लखनऊ में एक महत्वपूर्ण विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया था। परिवर्तन चौक पर आयोजित इस विरोध प्रदर्शन में प्रतिभागियों ने अपनी शिकायतें व्यक्त की और न्याय की मांग की। विधानसभा की ओर मार्च को केडी सिंह बाबू स्टेडियम के पास भारी पुलिस बल की मौजूदगी के कारण रोक दिया गया। तमाम बाधाओं के बावजूद, प्रदर्शनकारियों ने नारेबाजी और संघर्ष के बीच मुख्यमंत्री के नाम एक ज्ञापन पुलिस आयुक्त को सौंपा, जिसमें महिला-विरोधी और दलित-विरोधी नीतियों की निंदा की।
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि सरकार "बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ" का नारा तो लगाती है, लेकिन बलात्कारियों और अपराधियों को संरक्षण भी देती है। उत्तर प्रदेश के हाथरस और उन्नाव जैसे भयावह मामलों का हवाला भी दिया जहाँ पुलिस ने अपराधियों का पक्ष लिया। साथ ही, रायबरेली के चुरुवा गाँव में हुई एक हालिया घटना की ओर भी ध्यान आकर्षित किया, जहाँ उत्तराखंड की एक विवाहित महिला के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्या और उसके बाद पुलिस द्वारा उसके शव को जबरन जला दिया गया। यह घटना 11-7-2024 को हुयी थी। 5/5/2024 को रायबरेली के अमावा गाँव में एक नाबालिग लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्या कर दी गयी। 10/07/2024 को आलमनगर, चंदौली में एक नाबालिग लड़की के साथ हुए सामूहिक बलात्कार की गई। 10/04/2024 को पटेहरा कला, मिर्जापुर में कुलपति कोल के सामूहिक बलात्कार और हत्या मामले हुए। इसी तरह, 19 मई 2024 को रैरा गाँव, मिर्जापुर में श्याम कोल की हत्या की गयी। 16 जुलाई 2024 को गोरखपुर में दो ऑर्केस्ट्रा नर्तकियों के साथ हुए सामूहिक बलात्कार किया गया। 29/06/2024 को मऊ में छेड़छाड़ का विरोध करने पर दो महिलाओं की वाहन से कुचलकर हत्या कर दी गई।

उधर, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की संयुक्त सचिव श्रीमती सैदिंगपुई छकछुआक ने संगोष्ठी के आयोजन की आवश्यकता पर प्रकाश डाला और अपने व्यक्तिगत अनुभव बताते हुए कहा कि कैसे व्यापक कानूनी ढांचे के होते हुए भी, लिंग आधारित हिंसा की दैनिक रिपोर्टें जारी रहती हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, भारत मानव अधिकार उल्लंघन के ऐसे मुद्दों का शीघ्र समाधान करने के लिए सक्रिय कदम उठाता है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि आने वाली पीढ़ियां महिला अधिकारों के संबंध में अधिक मुखर और क्रियाशील होंगी। श्रीमती छकछुआक ने शिक्षकों से सभी की गरिमा बनाए रखने के लिए लैंगिक मुद्दों के प्रति अधिक संवेदनशील होने का आह्वान किया और कहा कि सभी अपराध खुले तौर पर हिंसक नहीं होते। उन्होंने नीति, प्रवर्तन और जन जागरूकता पर बल देने का आग्रह किया।
लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एसके चौधरी ने बल देकर कहा कि स्वतंत्रता और समानता के अधिकार भारतीय संविधान में निहित हैं। हालांकि, उन्होंने उल्लेखित किया कि केवल जागरूकता ही काफी नहीं है—लोगों में अपराधों की रिपोर्ट करने का आत्मविश्वास भी होना चाहिए। उन्होंने समाज में संरचनात्मक समायोजन का आह्वान किया और मानवाधिकारों की संस्कृति को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया जो दैनिक व्यवहार में परिलक्षित हो। दिल्ली विश्वविद्यालय, जनजातीय अध्ययन केंद्र के निदेशक और मानव विज्ञान विभाग के प्रमुख प्रोफेसर एस.एम. पटनायक ने सार्वजनिक स्थानों पर उत्पीड़न पर एक सामाजिक-मानवशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि कैसे पितृसत्ता और गुमनामी लैंगिक हिंसा को मजबूत करते हैं। कार्ल सागन को उद्धृत करते हुए—“साक्ष्य का अभाव, अनुपस्थिति का प्रमाण नहीं है”, उन्होंने यह मानने के प्रति आगाह किया कि आंकड़ों की कमी यह संकेत देती है कि समस्या कम हो गई है।
लखनऊ विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. पीके गुप्ता ने महिलाओं के खिलाफ घरेलू अपराधों की व्यापकता की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर व्यवहार संबंधी पैटर्न को संबोधित करने की आवश्यकता पर बल दिया और इस बात पर जोर दिया कि व्यापक सामाजिक प्रभाव के लिए बदलाव की शुरुआत घर से ही होनी चाहिए।
उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के अध्यक्ष डॉ. एस.एन. सबत ने महिलाओं की गरिमा को बनाए रखने वाले मौजूदा कानूनी तंत्रों पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा, विशेषकर शहरी क्षेत्रों में, को मजबूत करने के लिए उभरती तकनीकों और निगरानी प्रणालियों में निवेश की आवश्यकता पर बल दिया। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रो. नीलिका मेहरोत्रा ने महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने में सार्वजनिक परिवहन प्रणालियों की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में बताया। उन्होंने संदर्भ-संवेदनशील समाधानों की आवश्यकता पर बल दिया और कानून प्रवर्तन और न्यायपालिका में अधिक संवेदनशीलता का आह्वान किया, और ‘‘सब पर एक जैसा प्रभाव’’ वाले दृष्टिकोण के विरुद्ध तर्क दिया।
वक्ताओं ने व्यवस्थागत अन्याय, लैंगिक रूढ़िवादिता और संस्थागत जड़ता पर बात की जो संवैधानिक गारंटियों की प्राप्ति में बाधक हैं। कानूनी जागरूकता, सक्रिय सरकारी हस्तक्षेप और निर्णय लेने वाली संस्थाओं में महिलाओं के अधिक प्रतिनिधित्व की आवश्यकता पर जोर दिया गया। वैश्विक स्तर पर और भारत में मानव और महिला अधिकारों के विकास पर भी चर्चा की गई, साथ ही इस बात पर भी चर्चा की गई कि भारतीय संवैधानिक प्रावधान मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के साथ कैसे संरेखित होते हैं। कई वक्ताओं ने शी-बॉक्स, वन स्टॉप सेंटर और पिंक पुलिस बूथ जैसी उपलब्ध व्यवस्थाओं और पहलों पर भी प्रकाश डाला।

संगोष्ठी ने सिफारिश किया कि नीति-निर्माण, कार्यान्वयन और जागरूकता बढ़ाने के तीनों मोर्चों पर महिला सुरक्षा के मुद्दे को हल करने के लिए एक ठोस और लक्षित प्रयास की आवश्यकता है। महिलाओं की सुरक्षा के बारे में बातचीत में अनौपचारिक क्षेत्र को शामिल करने की आवश्यकता है और विशेष रूप से अनौपचारिक क्षेत्र में लक्षित जागरूकता अभियान की आवश्यकता है। व्यक्तिगत और पारिवारिक स्तर पर संवेदनशीलता की आवश्यकता है ताकि कार्यस्थल और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की सुरक्षा के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव आ सके। यह सिफारिश की गई कि राज्य महिलाओं के लिए समावेशी स्थानों का निर्माण सुनिश्चित करे, विशेष रूप से निर्णय लेने वाले निकायों में, ताकि संरचनात्मक परिवर्तन लाया जा सके। यह भी सिफारिश की गई कि शैक्षणिक संस्थान सक्रिय कदम उठाएं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि छात्रों को विभिन्न लिंग-संबंधी मुद्दों के प्रति संवेदनशील बनाया जाए, साथ ही उन्हें विपरीत लिंग से जुड़ी स्थितियों में कैसे व्यवहार करना चाहिए, इसके बारे में भी जागरूक बनाया जाए।
ज्ञातव्य हो कि कुछ समय पूर्व महिला एवं बाल संरक्षण संगठन के अधिकारियों के साथ एक उच्चस्तरीय बैठक में, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समक्ष राज्य में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों, विशेष रूप से भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376 और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पोक्सो) अधिनियम के अंतर्गत, 98.70 प्रतिशत की प्रभावशाली निपटान दर की प्रस्तुति की गई थी । वैसे मुख्यमंत्री ने गृह विभाग के अधिकारियों को लंबित जांच में तेजी लाने के निर्देश दिए थे, साथ ही, ज़ोर देकर कहा कि सकारात्मक छवि निवेश को आकर्षित करेगी और राज्य को एक ट्रिलियन अर्थव्यवस्था के अपने महत्वाकांक्षी लक्ष्य की ओर अग्रसर करेगी।
उन्होंने बताया कि महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को दो प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है - घर के अंदर होने वाले और बाहर होने वाले। उन्होंने कहा कि सरकार ने दोनों प्रकार के मुद्दों के समाधान के लिए ठोस कदम उठाए हैं। 2016 से वर्तमान तक के आंकड़ों की तुलना करते हुए, उन्होंने कहा था कि विभिन्न प्रकार के अपराधों में काफी कमी आई है। विशेष रूप से, 2016 और 2023-24 के बीच दहेज संबंधी अपराधों की घटनाओं में 17.5% की कमी आई है। इसी अवधि में बलात्कार के मामलों में 25.3% की कमी देखी गई है। उन्होंने नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों से निपटने में हुए सुधारों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि 2017 से 2024 तक विभिन्न मामलों में 24,402 दोषसिद्धि सुनिश्चित की गई है, जिनमें पोक्सो अधिनियम के तहत 9,875 मामले शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, 2022 से 2024 तक, कुल 16,718 अपराधियों को पोक्सो अपराधों में दोषी ठहराया गया, जिनमें से 21 अपराधियों को मृत्युदंड, 17,013 को आजीवन कारावास, 4,653 को 10 वर्ष से अधिक कारावास और 10,331 को 10 वर्ष से कम की सजा सुनाई गई।
मुख्यमंत्री ने कहा था कि राज्य ने 2018 में केंद्र सरकार की 'यौन अपराधों के लिए जांच ट्रैकिंग प्रणाली' को सक्रिय किया है । इस प्रणाली ने कड़ी निगरानी को सक्षम किया है, जिससे लंबित मामलों में उल्लेखनीय कमी आई है। उत्तर प्रदेश अब लंबित मामलों की दर के मामले में देश में दूसरे स्थान पर और इन मामलों में दोषसिद्धि सुनिश्चित करने में तीसरे स्थान पर है। साथ ही, राज्य अभियोजन के मामले में देश में पहले स्थान पर है और महिलाओं और बाल अपराध के मामलों के समाधान में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया है, जिसमें 98% से अधिक मामले सुलझाए गए हैं । इसके अतिरिक्त, अब प्रत्येक जिले में एक महिला पुलिस है। इसके अलावा, राज्य भर के 1,585 पुलिस थानों में अलग से महिला हेल्प डेस्क स्थापित किए गए हैं।
बहरहाल, 'कोरा' पर जब सुश्री निष्ठा त्रिपाठी लिखती हैं कि '25 साल की उम्र से ही, एक मैनेजर इस बात पर नज़र रखता है कि उसकी टीम की महिला कब शादी कर रही है या कब बच्चे को जन्म दे रही है - सिर्फ इसलिए कि उसकी उत्पादकता कम होने की आशंका होती है। उसे पदोन्नति नहीं दी जाती, कोई ऑनसाइट अवसर नहीं दिया जाता या नेतृत्व की भूमिका नहीं दी जाती, सिर्फ़ इस डर से कि जैसे ही घरेलू जिम्मेदारियां उस पर आएँगी, वह नौकरी छोड़ देगी। ऐसा माना जाता है कि भारतीय महिलाएँ पेशेवर जीवन की तुलना में घरेलू जीवन को ज्यादा प्राथमिकता देती हैं।'
सुश्री त्रिपाठी के अनुसार, 'एक महिला के लिए पुरुषों की तरह नेटवर्क बनाना मुश्किल होता है। पुरुष सहकर्मी आसानी से बार में जा सकते हैं, शराब पी सकते हैं, अनौपचारिक बातचीत कर सकते हैं और दोस्ती बना सकते हैं। ऐसा करने पर एक महिला को आंका जाएगा। किसी तरह हमारे दिमाग में ये पूर्वाग्रह घर कर गए हैं - एक महिला के लिए क्या उचित है और क्या अनुचित। यह पुरुष संबंध मूल्यांकन, पदोन्नति और करियर के हर निर्णायक पल में एक बड़ी भूमिका निभाता है। सच तो यह है कि हम स्वभाव से सामाजिक होते हैं और एक प्रबंधक को अपने किसी पुरुष टीम सदस्य को, जिसे वह बेहतर जानता है, पदोन्नत करना आसान लगता है क्योंकि उनके बीच ज़्यादा नज़दीकी नेटवर्क/बंधन होता है। दुनिया संदर्भों और संबंधों पर निर्भर करती है और पुरुषों के लिए ये संबंध बनाना हज़ार गुना आसान है। एक महिला बॉस एक महिला कर्मचारी के लिए ऐसा कर सकती है, लेकिन चूँकि वरिष्ठ कार्यकारी स्तरों पर महिलाएँ बहुत कम हैं, इसलिए ऐसा होने की संभावना कम है।

महिलाएं हर समय अपराध बोध महसूस करती हैं। अगर वे अपने काम में अच्छी हैं और अपने करियर में अच्छा कर रही हैं, तो उन्हें घर पर न होने का अपराध बोध होता है। अगर वे अपनी बेटी के पियानो वादन में शामिल होने के लिए कोई महत्वपूर्ण मीटिंग छोड़ देती हैं, तो उन्हें उस मीटिंग के लिए अपराध बोध होता है। यह अपराधबोध उन्हें लगातार खाए जाता है। वे पुरुषों की तुलना में भेदभाव को अधिक आसानी से स्वीकार कर लेती हैं। सच तो यह है कि किसी भी महत्वपूर्ण बात के लिए महिलाओं को कहीं अधिक गंभीरता से आंका जाता है। क्या उन्हें पदोन्नति मिल रही है? क्या वह शायद अपने बॉस से मीठी-मीठी बातें कर रही हैं। क्या वह अपनी टीम का नेतृत्व ठीक से नहीं कर रही हैं? वह पेशेवर होना नहीं जानतीं। क्या वह किसी पुरुष कर्मचारी से उसका काम करने के लिए कह रही हैं? वह तो बस एक कुतिया है। किसी कॉन्फ्रेंस रूम में जाइए और अगर वहां एक भी महिला है, तो पुरुष तुरंत मान लेंगे कि वह कोई सेक्रेटरी है।
