झरिया/धनबाद/नई दिल्ली: घबड़ाएं नहीं। वातानुकूलित कक्षों में बैठकर चाय-समोसा-पनीर टिक्का-कॉफी और अन्य शाकाहारी व्यंजनों पर झरिया कोयला क्षेत्र में मुद्दत से लगी माइंस फायर पर चर्चा, विचार-विमर्श करें। दिल्ली-कलकत्ता-मुंबई हवाई यात्रा कर, बड़े-बड़े पांच-सितारा होटलों में स्वयं और सरकारी व्ययों पर सपरिवार झरिया माइंस फायर के बारे राजनेताओं के साथ, मंत्रियों-संतरियों के साथ, विदेशी मेहमानों के साथ विस्की-रम-बियर के साथ पेट की धधकती ज्वाला को, और पैसे कमाने की भूख को शांत करें। विश्वास नहीं हो तो खर्च की गयी राशियों की रसीद जांच करवा लें।
फिर सप्ताह-दस दिन बाद भ्रमण-सम्मेलन समाप्त हो जाय, कलकत्ता, दिल्ली, मुंबई के पांच सितारा होटलों में देशज-विदेशज अखबारवालों, पत्रिका वालों, टीवी वालों, इंटरनेट पर लिखने वालों के बुलाकर, निजी क्षेत्र के नामी-गरामी 'पब्लिक रिलेशंस' कंपनियों को सट्टा - बट्टा देकर प्रेस कांफ्रेस करें। सैकड़ों प्रतिनिधियों के हाथों लुभावने उपहार देखर ऐलान कर दें - "झरिया कोयला क्षेत्र के कोयला खदानों में लगी आग को हम शीघ्र बुझाने जा रहे हैं। इस कार्य के लिए देश-विदेश के वैज्ञानिक आ रहे हैं। बड़े-बड़े आयातित उपकरणों, संयंत्रों के सहारे हमारी सरकार इस समस्या को जड़ से समाप्त करने जा रही है।"
अगले दिन अख़बारों के पन्नों पर विशाल तस्वीरों के साथ कहानियों का प्रकाशन, टीवी पर 'ब्रेकिंग न्यूज' देखें। अख़बारों का कतरन काट कर, टीवी का फुटेज के साथ अपने प्रोफ़ाइल में जोड़ लें। संध्याकाळ अपने शीर्ष अधिकारियों के पास मुस्कुराते फूलों का गुलदस्ता लेकर पहुंचे और कहे - 'सर!! कवरेज बहुत अच्छा रहा। देश-विदेश तक आपकी बात पहुंच गई, मंत्री जी की बात पहुंच गई।' उन कतरनों के साथ अधिकारी मंत्री तक मुस्कुराते पहुंचेंगे और वही बात वे भी दोहराएंगे । यह परंपरा मुद्दत से आ रही है और मुद्दत तक चलेगी।
जब तक इन कार्यों से मुक्त होंगे, भारत का चुनाव आयोग आम चुनाव का ऐलान कर देगा और पूरा देश लोक सभा के चुनावों की ओर अग्रसर हो जायेगा । चुनाव के फेज, तारीखों की घोषण हो जाएगी। चुनाव की घोषणा के साथ ही देश की सम्पूर्ण मतदाताओं की समस्याओं पर विराम लग जायेगा, जैसे समस्याएं अब रही ही नहीं। देश में 'आचार संहिता' लागू हो जायेगा। राजनेताओं, मंत्रियों, संतरियों, अधिकारियों, पदाधिकारियों को आचार संहिता मानना आवश्यक।
उधर झरिया में लाखों लाख मतदाता कोयला खदानों में लगी आग, धधकती आग की ज्वालाओं की ओर सपरिवार अग्रसर, यानी मौत के दरवाजे की ओर अग्रसर हो जायेंगे। क्योंकि विगत साठ और अधिक वर्षों में झरिया कोयला खदानों में लगी आग - जो भूमिगत से सतह पर आ गयी है अब, के बुझने - बुझाने के बारे में जो भी कुछ कह रहे हैं - सभी झूठ बोल रहे हैं। आज की ज्वाला जो उन दिनों थी, आज और अधिक भयावह हो गयी है। किसी भी दिन पूरा क्षेत्र जमीन के अंदर धधकती खदानों में समा सकती है। लेकिन कागज पर इन खदानों की आग बुझाने के निमित्त सरकारी कोषों से निर्गत होने वाली राशियों पर किसी भी प्रकार की संहिता नहीं लगती।
वजह यह है कि 'झरिया कोयला खदानों की आग भारत के कोयला क्षेत्र में काम करने वाले हज़ारों-हज़ार अधिकारियों के लिए, पधाधिकारियों के लिए, निदेशकों के लिए, तथाकथित कल्याणकर्ताओं के लिए, माफियाओं के लिए, समाज सेवियों के लिए, व्यापारियों के लिए, अख़बार के मालिकों के लिए, नेताओं के लिए, मंत्रियों के लिए, संतरियों के लिए 'ऊपरी आय' का बहुत बड़ा श्रोत हैं। कमाई का बहुत बड़ा जरिया है। किसी को 'तरह' के रूप में तो किसी को 'विज्ञापन' के रूप में - अब कौन चाहेगा ऊपरी कमाई का श्रोत बंद हो।?
अगर ऐसा नहीं होता तो कोयला क्षेत्र के राष्ट्रीयकरण के बाद से आज तक भारतीय संविधान के अध्याय 5 द्वारा स्थापित भारत सरकार तथा सभी प्रादेशिक सरकारों के सभी तरह के अंकेक्षण करने वाला भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक के पुस्तकालय के साथ साथ भारत के संसद में कई हज़ार पन्नों में कोयला क्षेत्र के घपलों के बारे में नहीं लिखा गया होता, उजागर नहीं हुआ होता, प्रकाशित नहीं हुआ होता। लेकिन क्या हुआ? रिपोर्ट पर रिपोर्ट, रिपोर्ट पर रिपोर्ट, पैसा पर पैसा, पैसा पर पैसा - और अन्तः आग वहीं की वहीं।
मुद्दत से सैकड़ों, हज़ारों प्रतिवेदनों से लेकर अनुशंसाओं पर मिट्टी की परतें जमती रही है, और आगे भी कई दशकों तक बैठती रहेगी - जब तक माइंस फायर से प्रभावित सम्पूर्ण इलाका, और इसमें रहने वाले लोग 'निःसहाय', 'असहाय' कर्मचारी, लोग (जो मतदाता भी हैं) अग्नि के रास्ते काल ग्रसित नहीं हो जायँ।
और ऐसा होता है तो इस क्षेत्र में कफ़न के लुटेरों की भी किल्लत नहीं है। मृतकों के परिवार अथवा परिजनों, जो खुदा न खास्ते जीवित रह गए, को अगर व्यवस्था की और से, सरकार की और से 'मुआवजा' दिया गया, तो उन्हें मानसिक रूप से नग्न होकर, अधिकारियों के सैकड़ों सवालों का जवाव देना होगा - अगर दे पाए तो कुछ मिल भी जाय, अगर नहीं दे पाए तो कागज पर मुआवजा प्रदान किया गया लिखने में कितना समय लगेगा। बहुत बड़ा सवाल है। शोध का विषय है - लेकिन ईमानदारी से।
और धनबाद-झरिया क्षेत्र में कौन ईमानदार है, कौन बेईमान है, कौन चोर हैं, कौन साध है, कौन माफिया है - ढूँढना उतना ही मुश्किल है जितना चासनाला से जीवित मजदूरों को निकालना। बहरहाल, कोल इण्डिया, भारत कोकिंग कोल लिमिटेड, कोयला मंत्रालय के लोगबाग, अधिकारी, पदाधिकारी, मंत्री जो भी दावा कर लें, आग के कारण पूरा इलाका डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड जैसी जहरीली गैसों से डूबा है और निसहाय लोग उसमें साँसे लेकर अपनी अंतिम सांसों की ओर बढ़ रहे हैं। उधर मंत्रालय के लोग 'सर्वाधिक कोयला उत्पादन का आंकड़ा परोसकर वाहवाही लूट रहे हैं। स्थिति का विरोध करें तो किससे और सुनेगा कौन? सभी के हाथ तो एक-दूसरे से जुड़े ही हैं। अकेला तो सिर्फ निःसहाय लोग और मतदाता है।
झरिया की स्थिति भारत के सबसे बड़े कोयला उत्पादकों में एक होने के वावजूद बहुत चिंताजनक है। आक्साइड , सल्फर डाइऑक्साइड और अन्य जहरीली गैसों का हवा में उपस्थिति के कारण मुख्य रूप से त्वचा और फेफड़ों के रोगों से पीड़ित हैं। अधिकांश निवासी क्रोनिक ब्रोंकाइटिस, अस्थमा, त्वचा रोग और न्यूमोकोलिओसिस (कोयले की धूल के कारण) से पीड़ित हैं। जब गैस भूमि में फंस जाती है, तो यह अंततः पानी को प्रदूषित कर देती है, जिसके परिणामस्वरूप सल्फर विषाक्तता होती है जो डायरिया और गैस्ट्राइटिस जैसी बीमारियों का कारण बनती है।
वैसे, नए सर्वे के आधार पर यह दावा किया जा रहा है कि झरिया में आग पर काबू पाया जा रहा है। एक अधिकारी ने कहा कि शुरुआत में 595 साइटों को आग एवं भूधसान प्रभावित माना गया था , वहीं नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर के नए सर्वे के अनुसार यह संख्या 300 से कम हो गई है।और आग नियंत्रण के लिए कई उपाय अपनाए जा रहे हैं ।
मसलन ट्रेंच कटिंग, सतह को बालू/रेट से भरना, आग वाले क्षेत्र में रेत/बालू की फ्लशिंग करना, इंटर्न गैस इन्फ्यूजन, रेत / बालू एवं टोनाइट के मिक्सचर की फ्लशिंग करना, पानी के आवरण व तालाब के जरिए ठंडा करना, डिगिंग आउट करना। यह सभी बातें आधिकारिक तौर पर कही जा रही है, लिखी जा रही है। लें जो पुराने अधिकारी हैं, आज भी जीवित हैं, वे इस बात को भली-भांति जानते हैं कि रेत/बालू और अन्य उपायें, जिसका प्रशासन दावा करती हैं, प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में कोयला क्षेत्र में माफियाओं को भी जन्म दिया है, पाला-पोसा है।
कोयला मंत्रालय कहता है कि झरिया कोयला क्षेत्र की कोयला खदान 1916 से हैं जब आग लगने की पहली घटना सामने आई थी। उन दिनों ओवरबर्डन मलबे के भीतर कई बार आग देखी गयी थी। राष्ट्रीयकरण से पहले, ये खदान निजी स्वामित्व में थी। वैसे आज भी प्रशासन इस बात को कहते नहीं थकती कि निजी स्वामित्व के दिनों में कोयला खदानों में खनन अधिकाधिक लाभ कमाने के दृष्टिकोण से की जाती थी, जिसमें खनन के तरीके सुरक्षा, संरक्षण और पर्यावरण के लिए कम से कम चिंता थी और सभी अवैज्ञानिक थे। इसके परिणाम स्वरूप गंभीर भूमि निम्नीकरण, धंसाव, कोयला खदान में आग और अन्य सामाजिक-पर्यावरणीय समस्याएं पैदा होती चली गयी। लेकिन आज भी सोच में बहुत अधिक का परिवर्तन नहीं है। आज भी 'लाभ' के उद्देश्य से ही खनन होता है। अगर ऐसा नहीं होता तो सरकार / संस्थान कोयला खनन और लाभ को लेकर ढिंढोरा नहीं पीटती।
मंत्रालय कहता है कि राष्ट्रीयकरण के बाद, झरिया कोयला अग्नि संकट का अध्ययन करने के लिए 1978 में पोलिश टीम और भारतीय विशेषज्ञों को नियुक्त किया गया था। जांच के अनुसार, भारत कोकिंग कोल लिमिटेड की 41 कोलियरियों में 77 आग की घटनाओं की पहचान की गई थी । सन 1996 में, भारत सरकार ने जेसीएफ में आग और धंसाव की समस्याओं की समीक्षा के लिए कोयला मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता में एक उच्च-शक्ति समिति का गठन भी किया गया था।
इस आग से निपटने और आसपास के निवासियों के पुनर्वास के लिए 1999 में दो मास्टर प्लान तैयार किए गए, जिन्हें बाद में 2004 में संशोधित किया गया, जो बीसीसीएल और कोयला मंत्रालय के बढ़े हुए आग से निपटने के प्रयासों पर आधारित था। इस सम्बन्ध में भारत के सर्वोच्च न्यायालय में भी याचिका दायर किया गया था। ताकि असुरक्षित इलाके से लोगों का पुनर्वास किया जा सके। उसी पहल के तहत कोई दो दशक पहले एक एक्शन प्लान बना।
मंत्रालय का मानना है कि यह व्यापक मास्टर प्लान दो पहलुओं को कवर करता है। सबसे पहले, अग्नि प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करने, जिसमें अग्नि क्षेत्रों की पहचान, आग से निपटने के लिए प्रौद्योगिकियों का चयन, अस्थायी निधि आवश्यकता के कार्यान्वयन और मूल्यांकन को प्राथमिकता देना और दूसरा, आग और धंसाव के कारण प्रभावित लोगों की पहचान के साथ साथ उनके पुनर्वास, प्रभावित स्थल, पुनर्वास स्थल और अस्थायी निधि आवश्यकता का आकलन शामिल है।
अंततः, आग, धंसाव और पुनर्वास से निपटने के लिए झरिया मास्टर प्लान (जेएमपी) को 12 अगस्त 2009 को भारत सरकार द्वारा 10 वर्ष की कार्यान्वयन अवधि और दो वर्ष की पूर्व-कार्यान्वयन अवधि के साथ 7112.11 करोड़ रुपए के अनुमानित निवेश के साथ अनुमोदित किया गया था। मास्टरप्लान ने 25.70 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर करते हुए 595 स्थलों की पहचान की जिन्हें पुर्नस्थापित किया जाना आवश्यक था।
वैसे कोयला मंत्रालय आग की घटनाओं और पुनर्वास प्रयासों की बारीकी से निगरानी करने का दावा करता है। झरिया मास्टर प्लान की प्रगति की निगरानी के लिए कोयला मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता में हाई-पावर सेंट्रल कमेटी (एचपीसीसी) की बैठकें आयोजित की गईं। दो वर्ष पूर्व, यानी 2021 में किए गए सर्वेक्षणों के अनुसार आग से प्रभावित क्षेत्र 17.32 वर्ग किमी को कवर करने वाले 77 साइटों (पूर्व-राष्ट्रीयकरण) से घटकर 67 साइट (झरिया मास्टर प्लान, 2009 के अनुसार) से घटकर 1.8 वर्ग किमी को कवर करने वाले 27 साइट हो गया है।
आपको जानकार यह आश्चर्य होगा कि अब तक लगभग 21 उच्च स्तरीय कमेटी की बैठकें हो चुकी हैं। बीसीसीएल ने आग से निपटने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास करने का दावा भी करता है। यह भी कहता है कि 27 अग्नि परियोजनाओं को लागू किया, जिसमें सर्वोत्तम उपलब्ध तकनीक का उपयोग किया गया है । इन प्रयासों में सतह को सील करना, खुदाई करना, ट्रेंचिंग, अक्रिय गैस डालना और रिमोट रेत-बेंटोनाइट मिश्रण फ्लशिंग जैसी तकनीक शामिल थीं।
जेएमपी को उद्धृत करते मंत्रालय कहता है कि कौशल विकास, रोजगार के अवसरों और समावेशी स्थानांतरण पर उचित ध्यान देने के साथ, आवास पुनर्वास में एक प्रमुख घटक के रूप में उभरा है। मंत्रालय का मानना है कि जनसंख्या की तीन श्रेणियों को पुनर्वास की आवश्यकता है: कानूनी स्वामित्व धारक, गैर-कानूनी स्वामित्व धारक, और बीसीसीएल कर्मचारियों के परिवार। प्रारंभ में, बीसीसीएल को 25,000 घर बनाने थे, लेकिन सेवानिवृत्ति और अन्य कारणों से, आवश्यक घरों की संख्या घटकर 15,713 रह गई। बीसीसीएल ने अब तक 11,798 घरों का निर्माण किया है, और शेष निर्माणाधीन हैं। 15,713 घरों में से 8,000 घर जेआरडीए द्वारा कानूनी स्वामित्व धारक परिवारों को आवंटित किए जाएंगे।
आगे सुनिए। स्वीकृत झरिया मास्टर प्लान के कार्यान्वयन में कई चुनौतियों का सामना करते हुए, कोयला मंत्रालय ने उनसे निपटने के लिए दृढ़ संकल्प और समर्पण प्रदर्शित किया है। जटिलताएँ भूमिगत आग का आकलन करने में तकनीकी सीमाओं से लेकर प्रभावित परिवारों के बीच इस धारणा तक थीं कि योजना का उद्देश्य आग और भूस्खलन के खतरों को संबोधित करने के बजाय कोयला खनन के लिए भूमि अधिग्रहण करना था। लेकिन सरकारी उत्तरदायित्व को अपने सर से स्थानीय लोगों के सरों पर डालते यह भी कहता है कि भूमि मालिकों द्वारा पुनर्वास पैकेज को स्वीकार न करना, जेआरडीए को भूमि अधिकार हस्तांतरण के लिए कानूनी ढांचे की अनुपस्थिति ने पुनर्वास की प्रक्रिया को जटिल बना दिया। यानी "हम तो तैयार हैं ही, वे ही उलझा देता हैं।"
लेकिन, फिर वही बात "अपने मियां मिठ्ठू", क्योंकि कोयलांचल में उन्हें छोड़कर, जिन्हे प्रबंधन से, आगे लगे रहने से फायदा हैं, के अलावे जो नित्य अपनी प्रत्येक सांस के साथ अंतिम सांस को गईं रहे हैं, मंत्रालय अथवा प्रबंधन की बातों को स्वीकार करने के लिए सज्जा नहीं हैं। मंत्रालय और कोयला प्रबंधन के आला अधिकारी कहते हैं कि "जीवन के साथ अनेकों चुनौतियों के बावजूद, कोयला मंत्रालय ने प्रत्येक बाधा को दूर करने के लिए अथक प्रयास किया और कर रहा है। कुछ महत्वपूर्ण प्रगति भी हासिल किया है।
मंत्रालय यह भी कहता है कि इसके अलावा, पुनर्वास और पुनर्वास आवश्यकताओं को संबोधित करने के लिए, व्यापक योजना बनाई गई, जिसमें रेल, सड़क और सतही बुनियादी ढांचे का परिवर्तन शामिल था। नए घरों के निर्माण में महत्वपूर्ण प्रगति के साथ, प्रभावित परिवारों को समर्थन देने के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार की गईं। इन प्रयासों के महत्व पर बल देते हुए अग्नि प्रबंधन और पुनर्वास के लिए पर्याप्त धनराशि आवंटित की गई।" लेकिन कागज पर कितनी उपलब्धि है और जमीनी सतह पर कितनी, यह तो कोयला मंत्रालय के लोग, प्रबंधन के लोग, बिचौलिए, माफिया, अधिकारी, पदाधिकारी, राजनेता सभी जानते हैं।
विगत मंत्रालय आगे कहते हैं कि अगस्त 2021 में झरिया मास्टर प्लान की समाप्ति के बाद भी, कोयला मंत्रालय बीसीसीएल और जेआरडीए द्वारा की गई गतिविधियों की प्रगति की समीक्षा द्विसाप्ताहिक और मासिक आधार पर जारी रखा है। इसके अतिरिक्त, मंत्रालय राज्य सरकार के परामर्श और समन्वय से आग बुझाने और पुनर्वास के लिए झरिया मास्टर प्लान की समाप्ति के दौरान शुरू की गई, चल रही परियोजनाओं को वित्त पोषित करना जारी रख रहा है। आग से निपटने, प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और कोयले की सतत निकासी सुनिश्चित करने में कोयला मंत्रालय के प्रयासों ने एक उज्ज्वल भविष्य की नींव रखी है।
परन्तु, विगत सात-आठ दशकों में कोयला क्षेत्र के इस इलाके में रहने वाले लोग, मतदाता, श्रमिक किस कदर अपने, अपने परिवार, परिजनों के साथ 'उज्जवल भविष्य का नींव रख रहे हैं, यह तो अधिकारी, पदाधिकारी, मंत्रालय के लोग अधिक जानते हैं, अग्निदेव की प्रज्वलित आंच और तप तो जानता ही है। क्यंकि मंत्रालय कहते नहीं थकता कि आग बुझाने, प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और आगे का रास्ता प्रस्तावित करने पर ध्यान देने के साथ झरिया मास्टर प्लान की समीक्षा करने के लिए 2022 में कोयला सचिव की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया था। इस समिति ने एक कार्य योजना तैयार की, जिसे बाद में सचिवों की समिति द्वारा अनुमोदित किया गया। सचिवों की समिति की बैठक के दौरान कई अहम फैसले लिए गए, जिनमें मुख्य रूप से कट-ऑफ डेट को लेकर फैसला लिया गया।
आगे घर निर्माण के बदले नकद मुआवजा दिया जाएगा और प्रभावित परिवारों को मालिकाना हक दिया जाएगा। इसके अतिरिक्त, उन घरों के लिए स्कूल, डिस्पेंसरी, सड़क, जल आपूर्ति और स्वच्छता सुविधाएं जैसी आवश्यक सुविधाएं विकसित की जाएंगी जो पहले से ही निर्मित हैं या वर्तमान में निर्माणाधीन हैं। उनका कहना है कि कठिन चुनौतियों का सामना करते हुए, कोयला मंत्रालय झरिया में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए दृढ़ और प्रतिबद्ध रहा। पुनर्वास एवं पुर्नवास का कार्य सुव्यवस्थित चरणों में संचालित किया जा रहा है। प्रारंभ में, भूस्वामियों को उनकी भूमि के लिए मुआवजा मिलेगा या उन्हें उपयुक्त आवास विकल्प आवंटित किए जाएंगे। इसके बाद कोयला निकालने के लिए भूमि अधिग्रहण किया जाएगा और जब पूरे क्षेत्र में कोयला निकालने की प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी हो जाएगी तो इसे वैज्ञानिक तरीके से बंद कर दिया जाएगा। इसके बाद, पूरे क्षेत्र को डी-कोलिंग की प्रक्रिया से गुजरना होगा।
इस मास्टर प्लान में आग से निपटने और बीसीसीएल कर्मियों के पुनर्वास की जिम्मेदारी बीसीसीएल को दी गई, जबकि भूतल पर सर्वे कराने और उस पर बने भवन व अन्य आधारभूत संरचना का डायवर्जन करने व गैर बीसीसीएल कर्मियों के पुनर्वास की जिम्मेवारी ज्रेडा यानी झरिया पुनर्वास एवं विकास प्राधिकरण को सौंपी गई. इस काम के लिए बीसीसीएल एवं ज्रेडा के लिए 7112.11 करोड़ रुपए की राशि का प्रावधान किया गया था. यह पैसा कोयल मंत्रालय की मुख्य कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड के द्वारा दिया जाता है.
मंत्रालय यह भी कहता है कि एक तरफ असुरक्षित क्षेत्रों से लोगों को हटाने की कोशिश हो रही है लेकिन दूसरी तरफ इन्हीं असुरक्षित क्षेत्रों में नए लोग बस भी रहे हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक साल 2009 से 2019 के बीच अवैध बसावट वाले परिवारों की संख्या तीन गुना बढ़ी है। उधर जिला प्रशासन की ओर से नया प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजा गया। उक्त प्रस्ताव में यह प्रावधान शामिल है कि अगर कोई व्यक्ति आवास नहीं लेना चाहता है तो उसे उसके एवज में नकद राशि दे दी जाए। परन्तु प्रस्ताव में यह बदलाव ऐसे हालात में किया गया है जब पूर्व में आवंटित मकानों को लेकर कई सवाल उठते रहे हैं।
बहरहाल, चल रहे पुनर्वास प्रयासों के बीच, कोयला निकासी का अनुमान प्राथमिकता बनी हुई है। जून 2023 तक 16 स्थानों पर अनुमानित 107 एमटी कोयले में से लगभग 14,000 करोड़ रुपए के मूल्य का ~43 मीट्रिक टन कोयला निकाला जा चुका है।
श्रृंखला जारी है
