पटना/नई दिल्ली: जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति का बिगुल बजने के आस-पास ही पटना के गाँधी मैदान के दक्षिणी छोड़ पर, जहाँ दाहिने तरफ एग्जिविशन रोड गांधी मैदान के बाहरी घेरा से मिलकर अपना अस्तित्व समाप्त करता था और बाएं तरफ पटना विश्वविद्यालय के कुलपति के आवास के आठ हथुआ हॉउस का ऐतिहासिक भवन हुआ करता था, सुलभ का पहला सार्वजनिक शौचालय अपने अस्तित्व में आया। साल 1974 से आज तक (2025) तक, विगत 51 वर्षों में सुलभ शौचालय (प्रारंभिक नाम) से सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन में तब्दील होना महज इत्तिफाक नहीं, बल्कि समाजशास्त्री और महात्मा गाँधी के अनुयायी डॉ. बिन्देश्वर पाठक का अदम्य प्रयास है, जो एक क्रांति के रूप में बदला।
इन वर्षों में सामाजिक सरोकार के क्षेत्र में डॉ. पाठक की जो भूमिका रही, उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही नहीं, बल्कि वर्तमान राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू, पूर्व-राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अलावे वर्तमान केंद्रीय मंत्रिमंडल से लेकर बिहार के सचिवालय और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक सभी अवगत है। सबों का विचार उनके प्रति 'सकारात्मक' ही है। सभी डॉ. पाठक के कार्यों को 'अद्वितीय' ही कहते हैं। फिर ऐसी कौन सी बात है, जो डॉ. बिंदेश्वर पाठक को भारत रत्न के अलंकरण से दूर रखे है।
सुलभ शौचालय के स्थापना के कोई 18 वर्ष बाद डॉ. पाठक को भारत सरकार द्वारा 1991 में पद्म भूषण नागरिक सम्मान से अलंकृत किया गया। फिर 33 वर्ष बाद, विगत वर्ष 2024 के 22 अप्रैल को उन्हें मरणोपरांत पद्म विभूषण नागरिक सम्मान से अलंकृत किया गया। बिहार ही नहीं, सामाजिक सरोकार से जुड़े सभी लोगों में मन में प्रधानमंत्री के प्रति विश्वास था कि वे डॉ. पाठक को 'भारतरत्न' सम्मान इ अलंकृत करेंगे। लेकिन 'राजनीति में कर्पूरी ठाकुर, पीवी नरसिम्हा राव, लालकृष्ण आडवाणी, चरण सिंह और एमएस स्वामीनाथन का नाम अंकित हो गया।" खैर। डॉ. पाठक की पत्नी श्रीमती अमोला पाठक राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के हाथ जब अपने पति के लिए पद्म विभूषण का अलंकरण हस्तगत की, उनके मन में राष्ट्र के सामाजिक बदलाव के क्षेत्र में अपने पति का एक-एक योगदान याद आ रहा होगा।
श्रीमती अमोला पाठक अपने पति के सम्मानार्थ राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू से पद्म विभूषण अलंकरण प्राप्त करती
आगामी 19-21 नवम्बर को संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित विश्व शौचालय दिवस का 25 वां संस्करण दिल्ली में सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन के तत्वावधान में मनाया जा रहा है। यह दिल्ली में संपन्न होगा। यह ऐतिहासिक निर्णय सुलभ के अध्यक्ष कुमार दिलीप और वर्ल्ड टॉयलेट ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक जैक सिम के बीच हुई बैठक के बाद लिया गया। ज्ञातव्य है कि यह ऐतिहासिक समिट 2030 के सतत विकास लक्ष्यों (SDG) की समयसीमा से ठीक 5 वर्ष पूर्व आयोजित हो रही है।
इस सम्मेलन का एक मुख्य केंद्र बिंदु होगा भारत का स्वच्छ भारत अभियान, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चलाया गया और जिसके अंतर्गत 11 करोड़ से अधिक शौचालयों का निर्माण हुआ — यह सामुदायिक भागीदारी से संचालित एक वैश्विक मॉडल बन चुका है। समिट का उद्देश्य यह भी होगा कि ग्लोबल साउथ के देश किस प्रकार स्थानीय, विश्वसनीय और समुदाय-आधारित समाधानों के माध्यम से मानव कल्याण से जुड़ी चुनौतियों, विशेषकर स्वच्छता जैसे विषयों से प्रभावी ढंग से निपट सकते हैं।
एक प्रयास जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलेगा समाज के लिए
विश्व शौचालय संगठन की शुरुआत 2001 में 15 सदस्यों के साथ हुई थी। आज इसकी संख्या 53 देशों से बढ़कर 151+ हो गई है। संगठन के सभी सदस्य शौचालय की समस्या को खत्म करने और दुनिया भर में स्वच्छता के समाधान के लिए काम करते हैं। यह संगठन सिंगापुर में 19 नवंबर 2001 को जैक सिम द्वारा स्थापित किया गया था। यह संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों, अकादमियों, शौचालय संघों, शौचालय हितधारकों और सरकार के लिए एक सेवा मंच और एक वैश्विक नेटवर्क के रूप में कार्य करता है। एक अनुमान के मुताबिक अब तक लगभग 2.4 अरब से अधिक लोगों की पहुँच स्वच्छता की सुविधा तक ना होने के कारण खुले में शौच करते हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है।
ट्विटर पर अपने संदेश में, माननीय राष्ट्रपति ने लिखा, "डॉ. पाठक ने लाखों लोगों को स्वच्छ और सुरक्षित स्वच्छता प्रथाओं को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करके व्यवहार परिवर्तन की वकालत की। सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन के संस्थापक, डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने देशव्यापी सामाजिक स्वच्छता और सुधार आंदोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने व्यवहार परिवर्तन की वकालत करने के लिए अपने शौचालय मॉडल का उपयोग किया और सार्वजनिक शौचालयों के लिए भुगतान करें और उपयोग करें की अवधारणा प्रस्तुत की। उन्होंने भारत को खुले में शौच मुक्त बनाने के दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया और स्वच्छता एवं संबंधित कार्यक्रमों के बारे में जागरूकता बढ़ाई।"
उन्होंने हाथ से मैला ढोने वालों का भी उत्थान किया और विधवाओं के अधिकारों को बढ़ावा दिया, मानवाधिकारों और सम्मान की वकालत की। स्वर्गीय डॉ. बिंदेश्वर पाठक की पत्नी श्रीमती अमोला पाठक द्वारा ग्रहण किया गया यह पुरस्कार उनकी विरासत को श्रद्धांजलि है। माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिंदेश्वर पाठक के निधन के बाद उनके मानवीय कार्यों के प्रति उनके अद्वितीय समर्पण की प्रशंसा की। उस दिन डॉ. बिंदेश्वर पाठक के पुत्र कुमार दिलीप और पौत्र आर्यमन पाठक भी राष्ट्रपति भवन में आयोजित पुरस्कार समारोह में उपस्थित थे, गवाह बने। डॉ. पाठक के लिए पद्म विभूषण पुरस्कार न केवल एक सम्मान है, बल्कि आशा की किरण और प्रत्येक नागरिक के लिए निस्वार्थ सेवा के मूल्यों को अपनाने और राष्ट्र की प्रगति में योगदान देने का आह्वान है।
साल 1974: डॉ बिंदेश्वर पाठक और उनका प्रयास
डॉ. पाठक महात्मा गांधी से प्रेरित थे। उनके कार्य और लोकाचार ने संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों और सिद्धांतों में आंतरिक रूप से योगदान दिया। पिछले पांच दशकों में, उन्होंने सूखे शौचालयों की सफाई करने वाले, हाथ से मैला ढोने वालों के मानवाधिकारों के लिए अथक प्रयास किया है। उन्हें पुनर्वास करना और कौशल विकास के माध्यम से वैकल्पिक रोजगार प्रदान करना उनका उद्देश्य रहा। डॉ. पाठक को भारत और दुनिया भर में पाँच दशकों से भी ज़्यादा समय तक चले राष्ट्रव्यापी स्वच्छता आंदोलन के लिए अपना जीवन समर्पित करने के लिए व्यापक रूप से जाना जाता है। उनके योगदान ने लाखों वंचित गरीबों के जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव लाया। यही कारण है कि डॉ पाठक की तुलना इब्राहिम लिंकन से भी लोगों ने किया। लोगों का मानना है कि जिस तरह लिंकन अमेरिका में काले-गोरों में भेदभाव को मिटाने के लिए याद किये जाते हैं, डॉ पाठक भारत में समाज के दबे-कुचले, समाज से उपेक्षित सर पर मैला ढोने वाले महिला-पुरुषों को समाज की मुख्यधाराओं में जोड़ने के लिए और भारत के विभिन्न प्रांतों से बनारस और वृन्दावन में विधवा माताओं को सम्मानित जीवन देने के लिए याद किये जायेंगे।
कहते हैं कि अगर “मेरी आवाज ही पहचान है” – ये पांच शब्द सुनते ही माननीया लता मंगेशकर जी याद आतीं हैं, आएँगी, “मिसाईल” सुनते ही महान वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति दिवंगत ए पी जे अब्दुल कलाम साहेब याद आएंगे, क्रिकेट के मैदान में जब भी कोई खिलाड़ी “स्ट्रेट ड्राईभ” मारता है या मरेगा, उस ड्राईभ की तुलना महान क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर से की जाती है और की जाएगी। उसी तरह आज ही नहीं, कल भी और आने वाले समय में भी, जब भारत में स्वच्छता और भंगी-मुक्ति आन्दोलन, यानि “सामाजिक बदलाव” और “मानवीय विकास” के अग्रणी का नाम लिया जायेगा, तो “सुलभ” और उनके संस्थापक “डॉ बिन्देश्वर पाठक” का नाम लिया जायेगा।
डॉ पाठक का मानना था कि स्वच्छता के बिना व्यक्ति सम्मान और बेहतर स्वास्थ्य हासिल नहीं कर सकता और सुलभ का आरम्भ इसी दृष्टि से हुआ। समय के साथ-साथ यह एक आंदोलन में बदल गया और दुनिया में स्वच्छता का काम करने वाले गैर-सरकारी संस्थानों में अपना नाम दर्ज किया। इसमें 60,000 स्वैच्छिक कार्यकर्ता हैं। यह आंदोलन दो प्रमुख उद्देश्यों पर केंद्रित है – एक: स्वच्छता के लागत-प्रभावी उपायों के जरिए पर्यावरण और जल प्रदूषण को रोकना तथा मानव-मल की सफाई में लगे अस्पृश्य कहे जाने वाले लोगों की मुक्ति और पुनर्वास। पिछले पांच दशकों के अथक प्रयास से न केवल भारत की राजधानी या विभिन्न राज्यों के शहरी क्षेत्रों में, बल्कि देश के दूर-दरस्त गांवों के लोगों में जागरूकता उत्पन्न हुआ है और लोग “सुलभ” शब्द को स्वीकार किये हैं। यह अलग बात है की सरकार की ढुलमुल नीति के कारण आज भी भारत के 12,30,00,000 घरों में शौचालय नहीं हैं और 80,00,00,000 की आबादी खुले में शौच करती है। इस दिशा में सुलभ अभी तक हमने 12,00,000 घरेलू और 9000 सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण किया है, साथ ही, 10,000 से अधिक स्कैवेंजर्स को मुक्त करवाया है।
1970 : डॉ. बिंदेश्वर पाठक का प्रयास और लोगों का आकर्षण
डॉ पाठक का जन्म 1943 में बिहार के वैशाली जिले के एक गांव में एक रूढि़वादी ब्राह्णण परिवार में हुआ था। अपनी जीवनी में उन्होंने लिखा है कि “जब मैं 6 वर्ष का था तो मैंने एक कथित अस्पृश्य महिला को छू दिया और रूढि़वादी अस्पृश्यता को मानने वाली मेरी दादी ने शुद्ध करने की बात कहकर जबरन मुझे गाय का गोबर और गौ मूत्र पिलाया , जिसका कड़वा स्वाद आज भी मेरे मुंह में है।” डॉ पाठक के अनुसार वे जिस घर में पले-बढे उसमे वैसे नौ कमरे तो थे, परन्तु एक भी शौचालय नहीं था। जब वे सोते थे तो सुबह-सवेरे अर्धनिद्रा में कुछ आवाजें सुनते थे, कोई बाल्टी उठा रहा होता था, कोई पानी भर रहा होता था और महिलाएं सूर्योदय से पहले शौच के लिए बाहर जा रही होती थीं। कोई महिला बीमार पड़ जाती तो उसे एक मिट्टी के बर्तन में ही शौच करना पड़ता था। कई महिलाओं के सिर में दर्द रहता क्योंकि उन्हें दिनभर अपने शौच को रोककर रखना पड़ता था।
यह कहानी महज उनके घर या गाँव की नहीं बल्कि यही कहानी भारत के 7,00,000 गांवों और सैकड़ों शहरों की थी। उनकी शिक्षा चार स्कूलों में हुई और दुर्भाग्य से किसी में भी शौचालय नहीं था। पटना विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में स्नातक करने के बाद उन्हें 1968-69 में बिहार गांधी जन्म शताब्दी समारोह समिति के भंगी मुक्ति विभाग में काम करने का मौका मिला। समिति ने उन्हें सुरक्षित और सस्ती शौचालय तकनीक विकसित करने और दलितों के सम्मान के लिए काम करने को कहा ताकि उन्हें मुख्यधारा में शामिल किया जाय। ब्राह्मण परिवार के जन्म लिए एक व्यक्ति के लिए यह सबसे “नीच कार्य” समझा जाता था, परन्तु डॉ पाठक इसे सहर्ष स्वीकार किया – यह स्वीकार्यता न केवल उनके व्यक्तित्व में बदलाव लाया परन्तु उनके जीवन को एक नयी दिशा भी दिया।
1970 : डॉ. बिंदेश्वर पाठक का प्रयास और लोगों का आकर्षण
डॉ पाठक के जीवन में नया मोड़ तब आया, जब वे बेतिया की दलित बस्ती में तीन महीने के लिए उनके बीच रहने गए। उस समय देश में जाति-प्रथा उत्कर्ष पर थी। उनके साथ रहते हुए डॉ पाठक ने जो देखा-सीखा-पीड़ा का अनुभव किया, वह सभी बातें इन्हे अपने जीवन को स्कैवेंजरों के लिए समर्पित करने की ओर उन्मुख कर दिया – पश्चिमी देशों में इस्तेमाल हो रही महंगी कलश और सीवर व्यवस्था के विकल्प के रूप में प्रभावी और सस्ती शौचालय व्यवस्था का विकास कैसे किया जाए, ताकि स्कैवेंजिंग प्रथा रोकी जा सके और उन्हें किसी दूसरे कार्य में पुनर्वासित किया जा सके।
पटना का पहला सुलभ शौचालय : साल 1974
सर्वप्रथम इन्होने 1968 में एक टू-पिट पोर-कलश, डिस्पोजल कंपोस्ट शौचालय का आविष्कार किया, जो सरलतापूर्वक स्थानीय वस्तुओं से, कम लागत पर बनाया जा सकता था। यह आगे चलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानव-अपशिष्ट के निपटान के लिए बेहतरीन वैश्विक तकनीकों में से एक माना गया। इसकी सार्थकता दिखाने के लिए इन्हे लंबा संघर्ष करना पड़ा जो 1973 में आया। शौचालय का प्रयोग सफल हुआ और उसने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इससे प्रोत्साहित होकर डॉ पाठक ने 1974 में शहरी क्षेत्रों में ‘भुगतान और उपयोग’ के आधार पर सामुदायिक शौचालयों की अवधारणा विकसित किया। इसे सबसे पहले बिहार और फिर पूरे भारत में लोकप्रियता मिली। धीरे-धीरे डॉ पाठक ने इस व्यावहारिक नीति का विकास किया कि एक गैर-सरकारी संगठन सरकार, स्थानीय निकायों, नागरिकों और लाभार्थियों के मध्य किस प्रकार एक उत्प्रेरक के तौर पर काम कर सकता है। इस रास्ते को अपनाकर सुलभ ने सरकारी, गैर-सरकारी संगठन की साझेदारी का सफल उदाहरण दिया।
इतना ही नहीं, स्वच्छता के साथ ही सुलभ ने दलित बच्चों की शिक्षा के लिए पटना, दिल्ली और अन्य जगहों पर स्कूल खोले जिससे स्कैवेंजिंग और निरक्षरता के उन्मूलन में सहायता मिली। महिलाओं और बच्चों को आर्थिक अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से सुलभ ने व्यावसायिक प्रशिक्षण-केंद्रों की स्थापना भी की। सुलभ ने जाति-बंधन को तोडऩे के उद्देश्य से स्कैवेंजरों को मंदिरों में ले जाने, उच्च वर्गों और स्कैवेंजर्स का एक दूसरे के घर में आने-जाने, अंतरजातीय सम्मेलन और गोष्ठियां भी आयोजित की। इसका परिणाम यह हुआ की इससे जातिवादी मानसिकता में बदलाव आया, सामाजिक बंधन शिथिल हुए और जाति-प्रथा को तोड़ने की प्रक्रिया शुरू हुई। इसके बाद सुलभ ने बायोगैस, जैव-उर्वरक, द्रव और कचरा-प्रबंधन, गरीबी-उन्मूलन के काम में पदार्पण किया और सुलभ इंटरनेशनल सेंटर फॉर ऐक्शन सोशियोलॉजी, सुलभ इंटरनेशनल एकेडमी ऑफ एन्वायर्नमेंटल सैनिटेशन और दिल्ली में एक अनोखे म्यूजियम ऑफ टॉयलेट की स्थापना की गयी जो अपने आप में अजूबा है। यह म्यूजियम प्राचीन काल की शौचालयों की विकास की कहानी बताता है।
जब डॉ. पाठक ने 1970 में बिहार में सुलभ शौचालय संस्थान के नाम से एक स्वयंसेवी और लाभ निरपेक्ष संस्था की आधारशिला रखी, पटना विश्वविद्यालय के समाज शास्त्र विभाग के अध्यापक हेतुकर झा उनके पीछे खड़े थे। हेतुकर झा को अपने मित्र पर अटूट विश्वास था और उन्हें यह भी विश्वास था कि आने वाले समय में पाठक जी न केवल पटना, बिहार या भारत, अपितु विश्व के अन्य देशों में, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ‘समाजशात्र’ की परिभाषा को पुनः लिखेंगे। वे गाँधी की विचारधाराओं, जिससे वे अधिक प्रभावित थे, को अक्षरसः व्यवहार में अनुवाद करेंगे । उन दिनों पटना विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में प्रोफ़ेसर मुसी राजा साहब, प्रोफ़ेसर सरदार देवनंदन सिंह साहब, प्रोफ़ेसर सतीश कुमार साहब, प्रोफ़ेसर आनंद कुमार साहब, प्रोफ़ेसर (श्रीमती) फुलोरा सिंह, प्रोफ़ेसर ज़ियाउद्दीन अहमद जैस समाजशात्र के महान हस्ताक्षर थे। प्रोफ़ेसर हेतुकर झा की हमेशा इक्षा थी की समाज में उनके द्वारा, उनके सहयोग से कुछ ऐसी संस्थागत व्यवस्था हो जो आने वाली पीढ़ियों के लिए, खासकर उनकी शिक्षा-शोध में लाभकारी हो। परिणाम यह हुआ कि पटना में समाजशास्त्र और सामाजिक व्यवस्था पर उच्चस्तरीय शोध के लिए दोनों ने सुलभ इंस्टीटूट ऑफ़ सोसल स्टडीज की स्थापना की गई ।
तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और डॉ. बिंदेश्वर पाठक - गांधी सम्मान का अलंकरण
बहरहाल, तत्कालीन राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने वर्ष 2015, 2016, 2017 और 2018 के लिए गांधी शांति पुरस्कार प्रदान किये। गांधी शांति पुरस्कार वर्ष 2016 के लिए संयुक्त रूप से अक्षय पात्र फाउंडेशन व सुलभ इंटरनेशनल को प्रदान किया गया। उन्होंने कहा था कि हमारे देश में स्वच्छता को एक सुनियोजित सामाजिक अभियान के रूप में आगे बढ़ने में डाक्टर बिंदेश्वर पाठक द्वारा स्थापित सुलभ इंटरनेशनल का सराहनीय योगदान रहा है। जब स्वच्छता को इतना महत्व नहीं दिया जाता था, उस दौर में उन्होंने स्वच्छता के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर काम किया आज उनकी संस्था को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति और सम्मान प्राप्त है। उन्होंने यह भी कहा कि गांधीवादी विचार, संघर्ष के गांधीवादी तरीकों और मानवीय स्वतंत्रता को प्राप्त करने के लिए गांधीवादी आदर्शों ने हमारे युग के महान व्यक्तियों को प्रभावित किया है। अमेरिका के मार्टिन लूथर किंग जूनियर से लेकर दक्षिण अफ्रीका के नेल्सन मंडेला और पोलैंड के लेक वेलेसा जैसे राजनयिक गांधी जी के विचारों से अत्यधिक प्रभावित रहे हैं।
