धनबाद / हज़ारीबाग / नई दिल्ली :तत्कालीन दक्षिण बिहार और आज के झारखंड के ऐतिहासिक हज़ारीबाग जिला की मिट्टी जहाँ धनबाद की सीमा रेखा को चूमती है, जमूरीआ नदी की धारा बहती है। कुछ और आगे, जिस दिशा में भगवान सूर्यदेव आसमान पर छाते हैं, पार्श्वनाथ के पास कतरी नदी की धारा कोयलांचल को धोते निकलती है। कोनार नदी और बरकार नदी भी कोयलांचल की सीमा पर बहती है।
किसी भी दस्तावेज में यह बात उद्धृत नहीं है कि इस क्षेत्र में कब से ये नदियां अपनी धाराओं से इस क्षेत्र को, यहाँ के लोगों को अपनी सेवाएँ देती आ रही है। लेकिन दस्तावेजों में यह बात अवश्य उद्धृत हैं कि देश के जंगे आज़ादी में तत्कालीन बिहार का यह दक्षिणीं हिस्सा महत्वपूर्ण भूमिका अदा किया है। दस्तावेजों में यह भी अंकित है कि आज़ादी मिलने के एक दशक बाद से आज़ाद भारत के 'दबंग', 'राजनीतिक संरक्षण प्राप्त अपराधी किस तरह कोयलांचल में खून की होली खेलते यहाँ की जमीन को लहू-लहुआन करते, यहाँ की प्राकृतिक खनिजों का उपयोग कर समाज के तथाकथित ठेकेदार बने। लेकिन समय सभी को देख रहा था
उन तथाकथित समाज के ठेकेदारों में आज कई तो ईश्वर के प्यारे हो गए। कई ईश्वर के दरबार में पहुंचा दिए गए। कई समय के चपेट में आकर अपने दुष्कर्मों की सजा भोगते सांस गिन रहे हैं। जो जीवन में कभी चीनी जैसे मीठी बोली नहीं बोले, आज चीनी के रोग से ग्रस्त है। जो कभी गर्म खून होने का दावा करते लोगों को लहू-लहूआन किये स्वयं शक्तिशाली होने के लिए, आज उनके शरीर में लहू प्रवाह इतना तेज है कि धमनी-शिराओं में अंतर करना मुश्किल हो गया है। त्राहिमाम सा जीवन जी रहे हैं। क्योंकि समय से बड़ा कोई नहीं है।
जो शेष बचे हैं वे अपने जीवन की अंतिम सांसे गिन तो रहे हैं, लेकिन अभी भी माया से मुक्त नहीं हुए हैं। लोभ, प्रलोभ से शिकार आज भी हैं। पैर थरथरा रहे हैं लघु और दीर्घ शंकाओं से मुक्त होते समय, हाथ काँप रहे हैं जल ग्रहण के समय - लेकिन काश !!! इस क्षण भी प्रेम, मोहब्बत के बीज अंकुरित होने देते ताकि अगली पीढ़ी एक शांत और सभ्य समाज का हिस्सा बन पाता।
बाबूजी संस्कृत में एक श्लोक कहते थे:
धैर्यं यस्य पिता क्षमा च जननी शान्तिश्चिरं गेहिनी,
सत्यं मित्रमिदं दया च भगिनी भ्राता मनःसंयमः।
शय्या भूमितलं दिशोऽपि वसनं ज्ञानामृतं भोजनम्
ह्येते यस्य कुटुम्बिनो वद सखे कस्माद् भयं योगिनः।
यानी, धैर्य जिसका पिता है, क्षमा जिसकी माता है, लम्बे काल तक साथ देने वाली शान्ति जिसकी स्त्री है, सत्य जिसका मित्र है, दया जिसकी बहिन है, मन का संयम जिसका भाई है, भूमि ही जिसकी शय्या है, दिशाएं ही जिसके वस्त्र हैं और ज्ञान रूपी अमृत का पान करना ही जिसका भोजन है, हे मित्र ! जिस योगी के ऐसे कुटुम्बीजन हैं, उसे संसार में किससे भय होगा ? अर्थात् किसी से भी भय नहीं होगा। लेकिन कोयलांचल के मामले में यह श्लोक कहाँ तक उचित होगा, यह पाठक ही कहेंगे।
बहरलाह, कोयलांचल में, खासकर धनबाद में, जैसे-जैसे कोयला की खुदाई गहरी होती गई, कोयले का रंग और काला होता गया, कोयला पर माफियाओं का बर्चस्व समाप्त होता गया। समय बीतने के साथ-साथ आज भले दशकों पहले कोयलांचल में माफियागिरी करने वाले दबंगो की वर्त्तमान पीढ़ियां भय का वातावरण बनाये रखने का जी-जान कोशिश करे, हकीकत यह है कि अब समय बदल गया है।
यह अलग बात है कि देश में कांग्रेस पार्टी का अंक सौ के आधे अंक पर आ गया है, लेकिन जिस कदर पार्टी आज भी अपनी सैद्धांतिक लड़ाई लड़ने में कोई कसार नहीं छोड़ रहा है, धनबाद की मिटटी भी कुछ वैसी ही लड़ाई लड़ रही है। उसे विस्वास है कि एक दिन वह विजय होगी। उसे विस्वास है कि एक दिन लोग स्वयं उसके पास लौटेंगे - समय चाहे जितनी लगे। सभी अपनी-अपनी भूमिका अदा कर रहे है।
ज्ञानी-महात्माओं, विशेषज्ञों, राजनितिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि धनबाद के कोयला माफियाओं की स्थिति देश के कांग्रेस पपर्टी जैसे ही हो गयी है। आज़ादी के समय अथवा आज़ाद भारत के प्रारंभिक दिनों के बाद से उत्तरोत्तर जिस तरह कांग्रेस का आधिपत्य देश के मतदाताओं के प्रति कमजोर होती चली गयी है - क्योंकि मतदाताओं की सोच बदलने लगी, छोटे-छोटे बालक वयस्क होते गए, मतदाता बनते गए - उसी तरह कोयला क्षेत्र में माफियाओं का, चाहे कोयला के माफिया हों, बालू के माफिया हों, श्रमिकों के माफिया हों, राजनीति में माफिया हों, उनकी पकड़ फिसलती जा रही है।
बंदूक़ से यहाँ के लोगबाग उन दिनों भी डरते थे और आज भी डरते हैं। लेकिन कल वे 'मष्तिष्क' से कमजोर थे, अज्ञानी थे, अशिक्षित थे, इसलिए दमित भी थे और भयभीत भी। लेकिन आज समय बदल गया है। और यही कारण है कि आज उन कोयला माफिआओं की अगली पीढ़ी 'मन से कमजोर' हो गया है। इसका जीवंत दृष्टान्त कांग्रेस पार्टी की अंक तालिका है। और जब ऐसे लोग मन से कमजोर हो जाते हैं तो समाज में मूक-बधिर भी बोलता है। मूक-बधिर का बोलना सामाजिक क्रांति का, बदलाव का प्रतिक मन जाता है। इसलिए यह नहीं सोचें कि 'फूल' खिल रहा है, सोचें यह कि मजदूरों का 'हाथ' मजबूत हो रहा है - धीरे-धीरे।
सं 1951 -52 में जब देश में पहला लोक सभा चुनाव हुआ था, कांग्रेस पार्टी का एकाधिकार था और वह 489 सदस्यों वाली लोकसभा में 364 स्थान कांग्रेस पार्टी को मिला था। सन 1957 के चुनाव में लोकसभा के 494 सीटों में 371 का अंक प्राप्त की थी कांग्रेस पार्टी जबकि 1962 के चुनाव में दस स्थान गंवाकर 361 पर सिमट गयी। यह अंक 1967 के चुनाव में 520 की संख्या वाली लोकसभा में 283, 1971 में 518 सदस्यों वाली लोकसभा में 352 और 1977 में 542 स्थानों वाली संसद में 353 स्थान प्राप्त की। सन 1980 के आम चुनाव में जहाँ लोक सभा में सीटों की संख्या 529 थी, कांग्रेस पार्टी को 353 अंक प्राप्त हुयी।
सन 1984 में श्रीमती इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद राजीव गाँधी को राष्ट्र का सम्पूर्ण समर्थन मिला और 541 वाली लोक सभा में 414 स्थान कांग्रेस पार्टी को प्राप्त हुआ। इसे तरह, 1989 के आम चुनाव में 529 संख्या वाली लोक सभा में कांग्रेस को 197, 1991 चुनाव में 534 संख्या वाली लोकसभा में 244.सं 1996 में 543 की संख्या में 140, सं 1998 में 141, 1999 के चुनाव में 114, सं 2004 के चुनाव में 145, सं 2009 चुनाव में 2006 और उसके बाद 2014 में 44 तथा 2019 में 52 स्थानों पर सिमट गयी।
कांग्रेस पार्टी की अंक तालिका को यहाँ इस लिए उद्धृत कर रहा हूँ क्योंकि पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गाँधी तक या कुछ मामले में डॉ. मनमोहन सिंह तक (लाख आलोचना के वावजूद) कांग्रेस पार्टी का वजूद भारत के मतदाताओं में था। तत्कालीन नयी पीढ़ियों के मतदाता भी उन्हें अस्वीकार कर रहे थे। धनबाद के मतदाताओं की सोच बदलने लगी।आज से दस वर्ष पहले देश में जो बच्चे आठ साल के थे, आगामी चुनाव में भारत के नए मतदाता होंगे।
यही बात धनबाद और कोयलांचल में भी है। यहाँ के लोग चाहे किसी भी क्षेत्र में हों, छात्र हों, शिक्षक हो, कर्मचारी हों, व्यापारी हों, पुलिस हों, अधिकारी हों - कोयला माफिआओं से दशकों त्राहिमाम रहे हैं, पीड़ित रहे हैं। साठ-सत्तर-अस्सी-नब्बे का दशक जीता-जागता दृष्टान्त है। खुनी होली आज भी लोगों को याद है, जो जीवित हैं। जो मृत्यु को प्राप्त किये उनके परिवार और परिजनों को पूछने वाला कोई नहीं है। समय के साथ-साथ जब तत्कालीन कोयला माफिया और दबंग बुजुर्ग होते गए, मृत्यु को प्राप्त करते गए, उनकी अगली पीढ़ी इस कार्य में लिप्त होती गई ।
परन्तु समय बदल रहा था, सोच भी बदल रहा था और लोग तो बदल रहे ही है। कल तक धनबाद या कोयलांचल 'स्मार्ट सिटीज' की गिनती में नहीं था। आज है। कल समाज के लोग यहाँ के दबंगों की त्राहिमाम को सहे थे, लेकिन आज नहीं। स्वाभाविक है अब उन कोयला माफियाओं की दबंगता की समाप्ति का समय आ गया है या फिर नए लोग, नए चेहरे नया सोच लेकर समाज के उथ्थान के लिए आगे आएगा।
धनबाद के इतिहास को उद्धृत करते अरविन्द रॉय कहते हैं कि बीपी सिंह का माफिया राज इतना बड़ा था की एक बार जब प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी अपने रैली के दौरान सभा में देर से आई थीं, इस बात को लेकर बीपी सिन्हा बहुत नाराज हुए थे। कहते हैं इंदिरा गाँधी को भरी सभा में जनता से क्षमा माँगनी पड़ी थी | सिन्हा साहब की प्रभुता के किस्से में एक अध्याय यह भी जुड़ा है की उन्होंने अपने माली बिंदेश्वरी दुबे’ को मजदूर संघ का नेता तक बना डाला था। वे कट्टर कांग्रेसी थे और उनका कद इतना बड़ा था की उन दिनों इंदिरा गांधी से उनकी वार्तालाप हॉटलाइन पर हुआ करती थी। यह कोयलांचल एशिया में सबसे बड़ा रोजगार देने वाला उद्योग था, जहाँ मजदूर लाखों की तादाद में काम करते थे। वहाँ सैकड़ों की तादाद में नेता थे और हजारों की तादाद में दलाल। नौकरशाही की भी एक बड़ी फौज़ थी। इन सबसे तालमेल रखने वाले थे गॉडडफादर।
समय गवाह है कि कोयलांचल और धनबाद में नेता और अफसर, अक्सर इनके तलवे चाटते थे। मजदूर एवं उन मजदूरों के छोटे-बड़े नेता इनकी जागीर थे। कभी-कभार कोई चालाक अफसर इन दोनों गुटों को लड़वा भी दिया करता था पर प्रायः अफसर इनके बाहर नहीं जा सकते थे। ट्रांसफर, पोस्टिंग, प्रमोशन सब के पैरवीकार यही करते, करवाते थे। कोई भी नया अफसर आता, खासकर श्रम विभाग का, उसे बी.पी. सिन्हा के यहाँ हाजरी देनी ही होती थी। उनके यहाँ आयोजित रात्रि भोज में जाकर, आगे की राजनीति, स्ट्रेटेजी या यूनियन की कार्यनीति, सभी तो इनके यहाँ तय होती थी।
आज 'इंटक' की क्या दशा और दिशा है यह तो कर्मचारी और संगठन के लोग अधिक जानते हैं, लेकिन उन दिनों धनबाद में कोयले की सबसे बड़ी यूनियन ‘इन्टक’ से सम्बद्ध ‘कोलियरी मजदूर संघ’ थी, जिसके सिरमौर बी.पी. सिन्हा ही थे। बाद में इसका नाम बदल कर राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर सभा कर दिया गया। बी.पी. सिन्हा के यहाँ आयोजित पार्टियों में कोलियरी मालिक भी शामिल रहते थे, इसलिए मालिकों से सम्बन्धों के संदर्भ में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सभी हिदायतें, इन्हीं पार्टियों में दी जाती थीं। यह भी तय की जाती थी कि किस हद तक मज़दूरों के मुद्दों की पक्षधरता करनी है।
गजब का शहर था धनबाद उन दिनों - और गजब का शहर है धनबाद आज भी। गरीबी और अमीरी के मापदण्ड तोड़ती, माफिया और पहलवानों के भय को भोगती, भ्रष्टाचार के बटखरे पर सबसे भारी उतरने वाली, राजनीति की बड़ी-बड़ी हस्तियों का आकर्षण केंद्र, आकांक्षाओं की धुरी, पैंतरेबाजी के लिए प्रसिद्ध अखाड़ा,सरकारों को बदलने, उलटने-पलटने, मंत्रियों के विभाग और मुख्यमंत्रियों के बनने-बनाने, हटने-हटाने की मंत्रणाओं का गढ़। इनके कार्यान्वयन हेतु धन जुटाने का अजस्र स्रोत भी यही धनबाद। ओह !!!
इस शहर में आका भी जबरदस्त थे। सबसे बड़े थे बी.पी. सिन्हा, मज़दूर नेता, भूमिहार ब्राह्मण परिवार में जन्मे बिरेन्द्र प्रताप सिन्हा जी। आई.एन.टी.यू.सी.,कांग्रेस पार्टी (सत्ता पार्टी) से सम्बद्ध ‘कोलियरी मजदूर संघ’ यूनियन के अध्यक्ष थे। उनके विरोधियों का भी एक भारी-भरकम मजमा था। जब 17 अक्टूबर 1971 को कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाता है तब राष्ट्रीयकरण होते ही बीपी सिन्हा का कोल नगरी पर पकड़ और अधिक मजबूत हो जाता है, पूरे कोल माइनिंग में उनकी तूती बोलती थी। उनका कोयले की खदानों पर एकछत्र राज्य था। वह कांग्रेस के प्रचारक थे और कोल माइनिंग में भारतीय राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर संघ की तूती बोलती थी।
बड़ा चन्दा करना हो तो पटना के सभी लीडर-जन बी.पी. सिन्हा के घर आ जाते थे,वहीं कोलियरियों के मालिक व ठेकेदार, जिनमें ज्यादा यूनियन के लीडर ही होते थे, जमा हो जाते,और तय राशि पटना से आए नेताओं को दे दी जाती थी। सबसे पहले जयप्रकाश नारायण ने धनबाद में ‘हिन्द मज़दूर सभा’ (एच.एम.एस.) से सम्बद्ध यूनियन का गठन किया था। बाद में उन्होंने इस यूनियन की दो शाखाएं बर्ड कम्पनी की दो कोलियरियों, सिरका तथा अरगड्डा,जो हजारीबाग जिला में पड़ती हैं, में भी खोल दी थीं।
उन दिनों इमामुल हई खान भी उनके साथ थे। बाद में बी.पी. सिन्हा ने उनसे अलग होकर इन्टक से सम्बद्ध कोलियरी मजदूर संघ नामक यूनियन बना ली। कुछ कोलियरियों पर इमामुल हई खान का भी दबदबा बना रहा। हई खान की यूनियन एच.एम.एस. से सम्बद्ध थी। इसी धनबाद में एक बंगाली लेबर लीडर को काले पानी की सजा हुई थी। वे एक ईमानदार नेता थे, जो मालिकों के आगे बिके नहीं थे। मारपीट में मालिक के अतिरिक्त मारे तो ज्यादा मजदूर ही गये थे, पर वे मालिकों पर मजदूरों की हत्या करने का जुर्म साबित नहीं कर सके थे। उलटे लेबर लीडर को ही सजा भोगनी पड़ी थी।
इन्टक में ही दो खेमे थे, जिनमें प्रायः हिंसक संघर्ष भी हो जाया करते थे। हत्या तो आम बात थी। इन्टक चूंकि कांग्रेस से सम्बद्ध थी, इसलिए सत्ता में उसका दखल था। पटना किसके हाथ में रहे, लड़ाई यही थी। मालिक किसका आदेश मानें, झगड़ा यहाँ था। जहाँ तक मज़दूरों के हक का सवाल था, वह इंटक के लिए खास मायने नहीं रखता था। मालिक ही मज़दूरों का चन्दा और यूनियन की सदस्यता काट कर दफ्तर में भिजवा देते थे। दरअसल यूनियन के प्रायः सभी नेता व कई सरकारी अफसर भी, सच कहा जाए तो बी.पी. सिन्हा के प्रति ही वफादार थे और उन्हीं की कृपा से ठेकेदारियां भी करते थे।
बड़ी-बड़ी अंग्रेजी कम्पनियों के अतिरिक्त वोरा, चंचनी और अग्रवाल बड़े खदान मालिकों में थे। कुछ ठाकुर,कुछ भूमिहार, जो पहले ठेकेदारों के यहाँ पहलवानी करने आए थे, छोटी-मोटी ठेकेदारियां लेकर बाद में मालिकों को भरकर खुद ही मालिक बन बैठे थे। वे मजदुर नेता भी थे। शंकर दयाल सिंह, सतदेव सिंह, सूरजदेव सिंह आदि पहले पहलवान के रूप में ही बी.पी. सिन्हा की शरण में धनबाद आए थे। फिर ठेके लिए और बाद में खदानें हड़प कर मालिक बन गए। अन्त में तो अपनी स्वतन्त्रा सत्ता कायम करने के बाद, सभी के सभी मुख्यतः जातीय आधार पर या जिला-जवार के नाम पर बी. पी. सिन्हा के खिलाफ हो गये या इन्होंने अपने स्वतंत्र गुट व खेमे बना लिये। इन सबके तार पटना से जुड़े थे।
धीरे-धीरे इन्होंने राजनीति में भी हिस्सा लेना शुरू कर दिया और कांग्रेस पार्टी में अपनी जाति के नेताओं और मंत्रियों से जुड़कर अपनी पैठ बना ली। शंकरदयाल सिंह जैसे लोग, तो न केवल जिला बोर्ड के अध्यक्ष बन गये बल्कि बिहार सरकार में केबिनेट मंत्री भी बन गये थे। उनके भाई सतदेव सिंह कोलयरियों के मालिक थे और शंकर दयाल सिंह मालिक तो थे ही, मजदूर नेता और सरकार में मंत्री भी थे। धनबाद एवं उसके आस-पास के क्षेत्रों, बल्कि कहा जाए बंगाल तक बड़ी-बड़ी अंग्रेजी कंपनियों के अतिरिक्त राजस्थान के मारवाड़ी और गुजरात के चंचनी और व्होरा ग्रुप की भी कई-कई खदानें थीं। खदानों में स्थानीय लोगों की बजाय बाहरी लोग ज्यादा थे।
खासकर प्रबन्धन में या ठेकेदारियों में आरा, छपरा, बलिया, भोजपुर, दरभंगा और गया के लोग थे या फिर पंजाबी, गुजराती, मारवाड़ी और बंगाली। इनके सारे के सारे मजदूर या तो स्थानीय होते थे या फिर मध्य प्रदेश के रायगढ़, बिलासपुर, उड़ीसा के गंजाम जिला, बंगाल के पुरूलिया और उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से लाए जाते थे। प्रायः बिहार के पलामू, गया, भोजपुर, आरा, छपरा व मुंगेर से भी मजदूर लाए जाते थे, जो मजदूर-कम-लठघर (ठेकेदारों की तरफ से) दोनों होते थे अपने डील-डौल के कारण, खास कर गोरखपुर और पलामू के लेबर मालिक के लिए लठैती भी करते थे। छोटानागपुर के लोग यानी वर्तमान झारखण्ड के लोग प्रायः ठेकेदारियों में खटते थे।
सब ठेकेदार अपने-अपने पहलवान रखते थे, जिनका मकसद था यूनियनों को उभरने न देना, खासकर इन्टक विरोधी यूनियनों को। इन्टक सम्बद्ध यूनियनों में प्रायः ठेकेदार ही यूनियन के लीडर होते थे।बी. पी. सिन्हा इन्हीं जमातों के नेता थे और इनके मार्फत कोलियरी मलिकों और मजूदरों, दोनों पर अपना दबदबा बनाए रखते थे। लेकिन धीरे-धीरे सबने अपनी स्वतन्त्र सत्ता कायम करनी शुरू कर दी। के. बी. सहाय के बाद संविद की सरकारें बननी शुरू हो गईं और इनमें से कुछ नेता कांग्रेस और इन्टक छोड़कर जनता दल में भी चले गये।
कांग्रेसी सरकार में तो पांच साल में दो-दो तीन-तीन बार मुख्यमंत्री बदलने लगे थे, यानी राजनीति में अस्थिरता आ गई थी। कांग्रेस की केन्द्र सरकार ने खासकर मोहन कुमार मंगलम, जो कोयला मंत्री थे और इंदिरा गांधी, दो बातों से काफी विचलित थे। एक बात तो यह कि धनबाद, जो कोयला क्षेत्र का केन्द्र था, के पैसे का पटना की कांग्रेस सरकारों के मुख्यमंत्रियों या सरकारों को हटाने या बनाने में जबरदस्त दखल था। बाद में दूसरे दलों के लोग भी धनबाद के खजाने में हिस्सा बंटा कर सरकार को बनाने-गिराने लगे थे। कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के लिए इस ‘सरकार भंजक केन्द्र’ को तोड़ना जरूरी हो गया था।
दूसरा महत्वपूर्ण कारण यह था कि देश के विकास के लिए बिजली की सख्त जरूरत थी, रेलों के विस्तार की जरूरत थी, जिसके लिए उर्जा का एकमात्र स्रोत कोयले की खदानें थीं, जिनके विस्तार की बहुत आवश्यकता थी। इसकी पूर्ति के लिए धन की जरूरत थी। सरकार ने कोलियरी मालिकों से कोयला खदानों के विस्तार की पेशकश की थी। कोयला बोर्ड में सरकारी नुमाइंदों के अतिरिक्त कोलियरी मालिक भी शामिल होते थे और मजदूर नेता भी। कोलियरी मालिकों ने कोलियरियों के विस्तार के लिए पर्याप्त पूंजी लगाने में असमर्थता जाहिर की थी।
ऐसे भी सरकार के पास ये रिपोर्ट थी कि कोलियरी मालिक कोलियरियों का उत्खनन बहुत ही अवैज्ञानिक ढंग से कर रहे हैं। वे कम पूँजी लगाकर ज्यादा मुनाफा पाने के लिए ऊपर की परतों से कोयला निकाल कर, नीचे बची हुई परतों को ओवरवर्डेन से ढक देते थे और अंडरग्राउंड खदानों के कोयले में आग लगने अथवा पानी भर जाने से बचाने की बजाय उन्हें ढँक कर नया मुहाना खोल देते थे। खदानों की कटाई भी वर्टिकल होती थी और भूगर्भ खदानों को बालू भरे बिना छोड़ दिया जा रहा था। आग बुझाने के लिए भी बालू केवल कागजों में ढोया जाता था।
कांग्रेस पार्टी में बी.पी. सिन्हा के खिलाफ रंगलाल चैधरी सक्रिय थे, जो धनबाद कांग्रेस के अध्यक्ष भी थे। वे एकदम विशुद्ध शाकाहारी भूमिहार नेता थे। यूनियन के भीतर राम नारायण शर्मा ,जो लोकसभा सदस्य भी चुने जा चुके थे,बी.पी. सिन्हा के विरोधी गुट में थे। वे यूनियन के जनरल सेक्रेटरी थे। बी.पी. सिन्हा अध्यक्ष थे। राम नारायण शर्मा ईमानदारी के लिए मशहूर थे और वे बी.पी. सिन्हा के गलत समझौतों का विरोध भी करते थे। कान्ती भाई (गुजराती) और दास गुप्ता भी यूनियन में थे और बी.पी. विरोधी थे,पर वे मुखर नहीं हो पाते थे। उन्होंने बाद में कोयला की फेडरेशन बनाकर खुद को फेडरेशन का अध्यक्ष और दासगुप्ता को महामन्त्री बना दिया था। वे असन्तुष्ट , यानी बी.पी. लॉबी के विरोधियों तथा बिहार के बाहर के कोयला प्रतिनिधियों के समर्थन से जीत जाते थे।
फेडरेशन के स्तर पर वे ठेकेदारों को यूनियन में लाने के विरोधी थे,पर जहाँ सारा संगठन ही ठेकेदारों को हाथ में हो, तो वहाँ फेडरेशन के एक-दो नेताओं की कौन परवाह करता?ऐसे एक बार बी.पी. सिन्हा ने धनबाद से बर्ड कम्पनी के एक बड़े अफसर प्राण प्रसाद को धनबाद से सांसद का चुनाव लड़वाया था। उस चुनाव में लोगों को साइकिल भी बांटे थे। इस पर भी प्राण प्रसाद बुरी तरह पराजित हुए थे और उनकी जमानत जब्त हो गई थी। रामनारायण शर्मा ही सदैव कांग्रेस से जीतते थे,वे ही अन्ततः जीते। बी.पी. सिन्हा की जनता में नहीं चली।
ऐसे हालात में सरकार ने खदानों के सरकारीकरण का फैसला किया। चूंकि स्टील कारखानों के लिए कोयले की सख्त जरूरत थी ,जिसमें केवल कोकिंग कोल ही इस्तेमाल हो सकता था, इसलिए सरकार ने सन् 1970 में पहले केवल कोकिंग कोल वाली खदानों का ही सरकारीकरण किया, जिसमें धनबाद की सारी और बंगाल की अधिकांश खदानें चली गईं। इस प्रकार धनबाद में ‘भारत कोकिंग कोल लिमिटेड’ (बी.सी.सी.एल.) बनी।
इन्टक का नेतृत्व भौंचक रह गया, क्योंकि उनकी सारी कमाई तो कोलियरी मालिकों से होती थी। इन्टक के जितने भी ठेकेदार या मजदूर लीडर थे वे सब के सब रातों-रात कोलियरियों के स्टाफ बन गये। सबके भाई-भतीजे और लठैत-पहलवान, मुंशी या मजदूर बन गये। असली मज़दूर खदेड़े जाने लगे। अफसर, पुलिस और प्रशासन की मदद से, यहाँ तक कि कोर्ट के जजों की मदद से नये-नये लोग काम पाने लगे और पुराने लोग भगाये जाने लगे। नौकरी की इस भ्रष्ट मिलीभगत में लाखों रुपए के वारे-न्यारे होने लगे। स्थानीय और असली मजदूर हक्के-बक्के रह गए। उनकी आँखों के सामने लूटी जा रही थी उनकी नौकरियाँ और वे कुछ नहीं कर पा रहे थे। उनके अपने ही नेता उन्हें बेच रहे थे। बस, एक दिन सब्र का बाँध फूट गया,खासकर स्थानीय मजदूरों और किसानों का। मजदूर स्पष्ट रूप से दो खेमों में बंट गया,बाहरी और स्थानीय अर्थात् देशज ।
ठेकेदारी के जमाने से ही ए. के. राय की यूनियन धनबाद में अपने पाँव पसार चुकी थी और इन्टक की कोलियरी मजदूर संघ (बाद में राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर संघ) एवं ‘बिहार कोलियरी मजदूर सभा’ में प्रायः रोज हिंसक झड़पें होने लगी थीं। इन्टक के अधिकांश लीडर सूदखोर थे। ए. के. राय की यूनियन, जो सी. आई. टी. यू. से सम्बद्ध थी, ठेकेदारी और सूदखोरी के विरुद्ध लड़ाई के साथ-साथ लोकल की बहाली और विस्थपितों की लड़ाई भी लड़ रही थी।
ए. के. राय पहले पेशे से इंजीनियर थे लेकिन मजदूरों की दुर्दशा देख कर वे नौकरी छोड़ कर मजदूर संगठन से जुड़ गए। उन दिनों विनोद बिहारी महतो एक नामी वकील थे और शिबू सोरेन छोटानागपुर के उभरते आदिवासी नेता, जो अलग झारखण्ड की माँग कर रहे थे उन दिनों। तीनों एकजुट हुए और एक बड़ा संघर्ष चला। खासकर कोलियरियों के सरकारी होने के बाद। इस संघर्ष के नारे थे स्थानीय लोगों को नौकरी दो, विस्थापितों का पुनर्वास करो, नौकरी दो। ये लड़ाइयाँ बहुत लम्बी चलीं। हालांकि बाद में शिबू सोरेन ए.के. राय से अलग हो गये लेकिन विनोद बिहारी महतो आजीवन ए. के. राय के साथ रहे।
लेकिन समय से बड़ा पहलवान कौन हुआ है?धनबाद कोयलांचल का वह मशहूर मजदूर नेता जिनकी बात पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी मानती थी। पूरे कोयलांचल की धुरी जहां एक जगह जाकर सिमटता था। कोयलांचल में अभी काम मजदूर नेताओं ने जिनसे राजनीति का पाठ सीखा।धनबाद की मजदूर राजनीति में कभी तूती बोलती थी 29 मार्च 1978 को हत्या कर दी गई थी। 29 मार्च 1979 को इंदिरा गांधी ने आकर एक भव्य कांग्रेस भवन का शिलान्यास किया और उस भवन का नाम बीपी सिन्हा स्मृति भवन रखा गया था।
1978 में हत्या के बाद सिन्हा की राजनीति हासिल करने के लिए उनके परिवार के सदस्य प्रयासरत हैं। 1989 में सिन्हा के पुत्र राजनीति प्रसाद सिन्हा ने धनबाद के लोकसभा का चुनाव लाडे । लेकिन सफलता नहीं मिली। राजनीति प्रसाद सिन्हा की पत्नी डॉ. उर्मिला सिन्हा ने 2010 में धनबाद नगर निगम का चुनाव लड़ी। सफलता नहीं मिली। अब राजनीति प्रसाद सिन्हा के पुत्र वैभव सिन्हा ने कांग्रेस से जुड़कर धनबाद की राजनीति में वजूद की लड़ाई लड़ रहे हैं। कहते हैं समय एक चक्र है - क्या पता इन पांच दशकों में समय पुनः सिन्हा के घर के दरवाजे पर दस्तक दे दिया हो और वैभव का वैभव वापस करने आया हो।
धनबाद पर कहानी श्रृंखला जारी। अगर आप भी लिखना चाहते हैं तो लिखिए न.......
