लखनऊ/नई दिल्ली: भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार 'पुलिस' और 'कानून तथा व्यवस्था' राज्य के विषय हैं, तदनुसार, राज्य सरकारों की यह प्रमुख जिम्मेदारी है कि वे अपने पुलिस बल की कार्यप्रणाली में सुधार कर, मजबूत कर सार्वजनिक व्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा के लिए उभरती चुनौतियों का सामना करने के लिए पर्याप्त रूप से सुसज्जित रहे। अगर इसे आधार माना जाय तो भारत के 75वें गणतंत्र माह के पहले पखबाड़े के अंतिम दो दिन पूर्व मकर संक्रांति के दिन उत्तरायण जाते सूर्य साक्षी हैं कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 2025 महाकुंभ के अवसर पर अमर हो गए।
इस महाकुंभ के लिए देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में भारत और विश्व के लोग चाहे जिन-जिन शब्दों का विन्यास करें, विशेषणों के साथ विश्लेषण करें, उनकी तारीफ़ की तारीख़ लिखें, हकीकत यह है कि घर्म के प्रति आस्था और विश्वास का समागम और उस समागम को सफल बनाने हेतु गंगा-यमुना-सरस्वती नदियों वाले प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनकी सरकार, प्रदेश के आम नागरिक सहित, सरकार में लगे लोग, अधिकारी, पदाधिकारी, सुरक्षाकर्मी, चपरासी, सफाई कर्मचारी, स्वास्थ्य सेवा - सभी क्षेत्र के लोग, सभी तबके के लोग अपने प्रदेश के नेतृत्व को उम्मीद से अधिक मजबूत करने में अहम् भूमिका अदा किये, अदा कर रहे हैं, ताकि प्रदेश पर कोई आंच न आए । 2025 का यह महाकुंभ योगी आदित्यनाथ को धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, प्रशासनिक इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिख दिया इस कहानी को शब्द बद्ध करते समय तक, चाहे दिल्ली के सिंहासन पर बैठे लोग अपने आकाओं को खुश रखने के लिए कुछ भी कह लें।
लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि इस समागम को सफल बनाने के लिए गंगा-यमुना-सरस्वती की बहती धाराओं में - भले अंतराष्ट्रीय मुद्रा की तुलना में भारतीय मुद्राओं का मोल घुटने तक पहुँच गया हो (1 $ = 82.46 रुपये) - पानी की धाराओं की तरह पैसे को बहाया गया है जिसे आने वाले दिनों में भारत का नियंत्रक महा अभिलेखागार के अधिकारी जांच करेंगे। विधानसभा के पटल पर, संसद के पटल पर रखेंगे, कुछ नेता पक्ष में ताली ठोकेंगे, कुछ विपक्ष में उलटे-हाथ से टेबुल थपथपायेंगे और फिर अख़बारों के पन्नों पर, पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होंगे, टीवी के स्क्रीनों पर आंकड़े दिखाए जायेंगे - और फिर सभी पुनः मुश्को भवः हो जायेंगे - लेकिन ब्रह्माण्ड पर सूर्यदेव योगी आदित्यनाथ को 100 में 100 अंक देकर उत्तरायण में प्रवेश करेंगे। यही सत्य है।
विश्व के सबसे बड़े धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन महाकुम्भ 2025 न केवल आस्था, विश्वास और श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि एकता, समता और सांस्कृतिक विविधता के अद्भुत उदाहरण के रूप में भी है जहाँ सम्पूर्ण सुरक्षा कवच में, बिना किसी भेदभाव, डर भय, जात पात, रंग रूप, आकार-प्रकार, ऊंच-नीच के संगम के तट पर श्रद्धालु मकर संक्रांति के दिन गंगा, यमुना और सरस्वती के पवित्र जल में डुबकी लगाए। अमेरिका, फ्रांस, इज़राइल, ईरान, पुर्तगाल समेत कई अन्य देशों के नागरिक भारतीय संस्कृति और आस्था से अभिभूत होकर अपने परिवारों के साथ संगम में स्नान करने पहुंचे।
महाकुम्भ के इस ऐतिहासिक अवसर पर सुरक्षा व्यवस्था, स्वच्छता और व्यवस्थापन पर विशेष ध्यान दिया गया है। पूरे मेला क्षेत्र में सुरक्षा को लेकर अभूतपूर्व इंतजाम दिखा। मेला क्षेत्र में 50,000 से अधिक सुरक्षा कर्मियों की तैनाती है जिनमें पुलिस, पैरा मिलिट्री फोर्स, और स्थानीय सुरक्षा कर्मी शामिल हैं। महाकुम्भ मेला प्रशासन ने श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी जरूरी उपाय किए हैं। इसके अलावा, घाटों पर गंगा सेवा दूतों की तैनाती की गई हैं, जो नदी की स्वच्छता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
सर्दियों के अंत और गर्म दिनों की शुरुआत के संकेतक जैसे ही मकर संक्रांति की सुबह हुई, प्रयागराज में त्रिवेणी संगम तट पर दिव्य वैभव का दृश्य उत्पन्न हो गया। महाकुंभ 2025 का पहला अमृत स्नान (पवित्र डुबकी) मकर संक्रांति के शुभ अवसर पर आरंभ हुआ जिसमें लाखों श्रद्धालुओं और संतों ने कड़कती ठंड के बावजूद गंगा, यमुना और सरस्वती के पवित्र संगम में पवित्र डुबकी लगाई। पहले अमृत स्नान में तीन करोड़ पचास लाख से अधिक भक्तों ने पवित्र संगम में डुबकी लगाई, जिससे महाकुंभ के पहले दो दिनों में ही श्रद्धालुओं की कुल संख्या 5 करोड़ से अधिक पहुंच गई। शुद्धि और आशीर्वाद के प्रतीक आस्था का यह पुनीत कार्य भारतीय संस्कृति और परंपरा का सार दर्शाता है।
श्रद्धालुओं ने पवित्र स्नान करते हुए पवित्रता और समृद्धि की कामना की। कई लोगों ने भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया, पुण्य और मोक्ष के लिए उनसे आशीर्वाद मांगा, क्योंकि मकर संक्रांति सूर्य देव को समर्पित है। वैज्ञानिक रूप से यह त्योहार उत्तरी गोलार्ध में सूर्य के संक्रमण को चिह्नित करता है, जो लंबे दिन और छोटी रातों का संकेतक है। पवित्र डुबकी लगाने के बाद, भक्तों ने अनुष्ठान किए और घाटों पर प्रार्थना की। इसमें उन्होंने तिल, खिचड़ी और अन्य पवित्र वस्तुएं देव को समर्पित कीं। श्रद्धालुओं ने गंगा आरती में भी भाग लिया। परंपरा के अनुसार उन्होंने दान-पुण्य भी किया। श्रद्धालुओं ने तिल और खिचड़ी दान कर इस पवित्र पर्व की पावनता बढ़ा दी।
महाकुंभ कोई साधारण पर्व नहीं है। यह एक महाघटना है जो त्रिवेणी संगम के घाटों को आस्था और दिव्यता में बदल देती है। रात की गहराई के बाद ब्रह्म मुहूर्त में जब सूर्य की पहली किरण ने संगम को स्पर्श किया तो भक्तों का जैसे वहां रेला लग गया। प्रत्येक मनुष्य संगम में पवित्र डुबकी लगाकर आत्मशुद्धि और आशीर्वाद मांग रहा था। श्रद्धालुओं की सामूहिक भक्ति से जनवरी की कंपकपाती ठंड बिल्कुल नगण्य लग रही थी।
लाखों लोगों की इस भीड़ के बीच, संतों के अखाड़ों के स्नान विशेष रूप से दर्शनीय थे। पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी के नागा साधुओं ने भव्यता से शाही अमृत स्नान किया। भाले, त्रिशूल और तलवारों से सुशोभित वे एक जुलूस में भीड़ के बीच से निकले जो किसी राजसी आगमन से कम नहीं थी।
घोड़ों और रथों पर सवार होकर उनके तपस्वी रूपों ने एक आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार कर दिया जिसने उपस्थित जनसमुदाय को सम्मोहित कर लिया। इसके बाद भजन मंडलियों की स्वरलहरियों ने समा बांध दिया और उनके भजन के बीच भक्तों ने "हर हर महादेव" और "जय श्री राम" के उद्घोष किए। तब हवा में एक दिव्य लय के साथ अलौकिक कंपन थी।
संगम तट पर इन अद्भूत दृश्यों में परिवारों ने भी आस्था की एक और परत जोड़ दी। कहीं पिता ने अपने बच्चों को पवित्र संगम की पहली झलक दिखलाने के लिए अपने कंधों पर बिठा रखा था तो कहीं बेटे अपने बुजुर्ग माता-पिता को भीड़-भाड़ वाले घाटों पर रास्ता दिखा रहे थे ताकि सुनिश्चित कर सकें कि वे भी पवित्र जल में स्नान-अर्चना कर सकें। यह भारतीय संस्कृति के चिरस्थायी मूल्यों का एक जीवंत रूप था जिसमें श्रद्धा, कर्तव्य और एकता समाहित थी।
महाकुंभ मेला हिंदू पौराणिक कथाओं में गहराई से अंतर्निहित है और यह दुनिया में आस्था के सबसे महत्वपूर्ण आयोजनों में से एक का प्रतिनिधित्व करता है। यह पवित्र आयोजन भारत में चार स्थानों - हरिद्वार, उज्जैन, नासिक और प्रयागराज में होता है और इनमें से प्रत्येक नगर पवित्र नदी के किनारे स्थित है। इनमें गंगा से लेकर शिप्रा, गोदावरी और प्रयागराज में गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती का संगम है। प्रत्येक कुंभ मेले का समय सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति की ज्योतिषीय स्थिति से निर्धारित होता है, जो आध्यात्मिक स्वच्छता और आत्म-ज्ञान के लिए शुभ अवधि का संकेत माना जाता है। भारतीय पौराणिक कथाओं और संस्कृति की समृद्ध मिट्टी में निहित, महाकुंभ मेला आंतरिक शांति, स्वयं से साक्षात्कार और आध्यात्मिक एकता के लिए मानवता की कालातीत खोज का गहरा प्रतिनिधित्व है।
कुंभ मेला ऐसा आयोजन है जिसमें आंतरिक रूप से खगोल विज्ञान, ज्योतिष, आध्यात्मिकता, अनुष्ठानिक परंपराओं और सामाजिक-सांस्कृतिक रीति-रिवाजों और प्रथाओं के विज्ञान को समाहित है। यह इसे ज्ञान में बेहद समृद्ध बनाता है। यह कार्यक्रम बड़ी संख्या में हिंदू आस्थावान तीर्थयात्रियों द्वारा मनाया जाता है। इसमें साधु और नागा साधु जैसे तपस्वी शामिल होते हैं, जो गहन आध्यात्मिक अनुशासन का अभ्यास करते हैं। कहते हैं कुंभ मेला दुनिया का सबसे बड़ा शांतिपूर्ण समागम है, जिसमें लाखों तीर्थयात्री पवित्र नदियों में स्नान के लिए आते हैं। यह स्नान आध्यात्मिक शुद्धि और नवीनीकरण का प्रतीक है। अर्ध कुंभ मेला हर छह साल में हरिद्वार और प्रयागराज में होता है, जबकि महाकुंभ मेला, एक दुर्लभ और भव्य आयोजन है, जो हर 144 साल में होता है।
कुंभ मेला एक आध्यात्मिक से कहीं बढ़कर संस्कृतियों, परंपराओं और भाषाओं का एक जीवंत मिश्रण है, जो एक "लघु भारत" को प्रदर्शित करता है, जहाँ लाखों लोग बिना किसी औपचारिक निमंत्रण के एक साथ आते हैं। यह आयोजन विभिन्न पृष्ठभूमियों से तपस्वियों, साधुओं, कल्पवासियों और साधकों को एक साथ एक स्थान पर लाता है, जो भक्ति, तप और एकता का प्रतीक है। 2017 में यूनेस्को द्वारा अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता प्राप्त, कुंभ मेला बहुत अधिक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है। 2025 में प्रयागराज अनुष्ठानों, संस्कृति और खगोल विज्ञान के मेल इस भव्य आयोजन की 13 जनवरी से 26 फरवरी तक फिर से मेजबानी कर रहा है।
इस प्राथमिक अनुष्ठान के साथ-साथ, तीर्थयात्री नदी के किनारे पूजा में संलग्न होते हैं और श्रद्धेय साधुओं एवं संतों के नेतृत्व में आध्यात्मिक प्रवचनों में भाग लेते हैं। भक्तों को प्रयागराज महाकुंभ के दौरान किसी भी समय स्नान करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, लेकिन पौष पूर्णिमा से शुरू होने वाली कुछ तिथियां विशेष रूप से शुभ होती हैं। इन दिनों, संतों, उनके अनुयायियों और विभिन्न अखाड़ों (आध्यात्मिक क्रम में) के सदस्यों का शानदार जुलूस निकले, शाही स्नान भव्य अनुष्ठान में भाग लिए। यह परंपरा है कि आस्थावानों को उन संतों के संचित गुणों और आध्यात्मिक ऊर्जा से अतिरिक्त आशीर्वाद मिलता है।
कुंभ मेले की जड़ें हजारों साल पुरानी हैं, जिसका प्रारंभिक उल्लेख मौर्य और गुप्त काल (चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से छठी शताब्दी ईस्वी) के दौरान मिलता है। प्रारंभ में, हालांकि आधुनिक कुंभ मेले जितना बड़ा आयोजन नहीं होता था लेकिन इसमें पूरे भारतीय उपमहाद्वीप से तीर्थयात्री आते थे। समय बीतने पर हिंदू धर्म के उत्कर्ष के साथ-साथ मेले का महत्व बढ़ता गया, गुप्त काल के शासकों ने प्रतिष्ठित धार्मिक मंडली के रूप में इसकी स्थिति को और ऊंचा कर दिया। मध्य काल के दौरान, कुंभ मेले को विभिन्न शाही राजवंशों से संरक्षण प्राप्त हुआ, जिनमें दक्षिण में चोल और विजयनगर साम्राज्य और उत्तर में दिल्ली सल्तनत और मुगल शामिल थे। यहां तक कि अकबर जैसे मुगल सम्राटों ने भी धार्मिक सहिष्णुता की भावना को दर्शाते हुए समारोहों में भाग लिया था।
ऐतिहासिक वृत्तांतों से पता चलता है कि 1565 में, अकबर ने नागा साधुओं को मेले में शाही प्रवेश का नेतृत्व करने का सम्मान दिया, जो धार्मिक और सांस्कृतिक आधार पर एकता का प्रतीक था। औपनिवेशिक काल में, ब्रिटिश प्रशासकों ने इस उत्सव को देखा और इसके विशाल पैमाने और इसमें आने वाली विविध सभाओं से आश्चर्यचकित होकर इसका दस्तावेजीकरण किया। ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासक जेम्स प्रिंसेप जैसी शख्सियतों ने 19वीं सदी में कुंभ मेले का विवरण दिया, जिसमें इसकी अनुष्ठानिक प्रथाओं, विशाल समागम और सामाजिक-धार्मिक गतिशीलता का विवरण दिया गया। इन विवरणों ने कुंभ के विकास और समय के साथ इसके लचीलेपन में बहुमूल्य अंतर्दृष्टि प्रदान की।
प्रयागराज का समृद्ध इतिहास 600 ईसा पूर्व का है, जब वत्स साम्राज्य फला-फूला और कौशाम्बी इसकी राजधानी थी। गौतम बुद्ध ने कौशाम्बी की यात्रा की थी। बाद में, सम्राट अशोक ने मौर्य काल के दौरान इसे एक प्रांतीय केंद्र बनाया, जो उनके एक पत्थर से बने स्तंभों से जाना जाता था। शुंग, कुषाण और गुप्त जैसे शासकों ने भी इस क्षेत्र में कलाकृतियाँ और शिलालेख छोड़े हैं। 7वीं शताब्दी में, चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने प्रयागराज को "मूर्तिपूजकों का महान शहर" बताया था, जो इसकी मजबूत ब्राह्मणवादी परंपराओं को दर्शाता है। शेर शाह के शासनकाल में इसका महत्व बढ़ गया, जिसने इस क्षेत्र से होकर ग्रैंड ट्रंक रोड का निर्माण कराया। 16वीं शताब्दी में, अकबर ने इसका नाम बदलकर 'इलाहाबाद' कर दिया, जिससे यह एक किलेबंद शाही केंद्र और प्रमुख तीर्थ स्थल बन गया, इसी ने इसकी आधुनिक प्रासंगिकता के लिए मंच तैयार किया।
बहरहाल, महाकुम्भ 2025 में इस बार एक नई परंपरा भी देखने को मिली। मकर संक्रांति के अवसर पर महाकुम्भ मेला परिसर में पहली बार पूर्वोत्तर भारतीय संस्कृति का एक अभूतपूर्व रूप देखने को मिला। असम के प्रसिद्ध पर्व भोगाली बिहू का आयोजन महाकुम्भ मेला परिसर में किया गया। असम के संतों और श्रद्धालुओं ने इस पर्व को परंपरागत तरीके से मनाया, जिसमें बिहू नृत्य, नाम कीर्तन और चावल से बने व्यंजन वितरित किए गए। यह पर्व पूर्वोत्तर संस्कृति का प्रतीक है और महाकुम्भ में इसकी उपस्थिति ने इस आयोजन को और भी खास बना दिया। बिहू नृत्य के दौरान महिला श्रद्धालुओं ने असमिया संस्कृति का अद्भुत रंग महाकुम्भ मेला परिसर में बिखेर दिया।
भोगाली बिहू के अलावा महाकुम्भ मेला क्षेत्र में कई और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया गया। विभिन्न राज्यों के श्रद्धालुओं और कलाकारों ने अपने पारंपरिक नृत्य और संगीत प्रस्तुत किए, जिससे महाकुम्भ के दौरान भारत की सांस्कृतिक विविधता की झलक मिली। साथ ही, महाकुम्भ मेला प्रशासन ने इस अवसर पर विभिन्न सेवाओं का भी आयोजन किया, जैसे कि मुफ्त चिकित्सा सुविधा, फ्री पानी की व्यवस्था, और यातायात की सुविधाएं, ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।
महाकुम्भ 2025 का आयोजन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की सांस्कृतिक धरोहर को बढ़ावा देने में सफल रहा है। महाकुम्भ मेला प्रशासन ने इस आयोजन को दिव्य और भव्य रूप में प्रस्तुत किया है। महाकुम्भ की लोकप्रियता और सांस्कृतिक धरोहर को दुनिया भर में पहचान मिली है। महाकुम्भ में आने वाले विदेशी श्रद्धालु भारतीय संस्कृति से प्रभावित हुए और गंगा स्नान के साथ-साथ भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का अनुभव लिया। महाकुम्भ ने भारत की ब्रांडिंग को भी वैश्विक स्तर पर मजबूत किया है। यह कुम्भ आस्था, एकता और विविधता का प्रतीक है। यह आयोजन केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को भारतीय संस्कृति की महानता का एहसास करा रहा है।

