कर्तव्य पथ के आसपास (नई दिल्ली) : जश्ने आजादी के 79वें वर्ष के 26 दिन पहले दिल्ली का तापमान 30 डिग्री सेल्सियस था। उस दिन राष्ट्रीय राजधानी में 5.6 मिमी बारिश हुई थी। सल्तनत के चप्पे-चप्पे में पानी का जमाव था। पूरी दिल्ली पनियाई थी। तभी एक ऐसी घटना हुई कि दिल्ली ही नहीं, भारत ही नहीं, पूरा विश्व गर्म हो गया। देश के राजनीतिक और संसदीय इतिहास में अब तक की घटनाओं में ऐसी घटना कभी नहीं हुई थी। संसद का वर्षाकालीन सत्र शुरू ही हुआ था। उप राष्ट्रपति जगदीप धनकड़, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, लोक सभा, राज्यसभा के सम्मानित सांसद नए संसद भवन में पहुंचे थे। प्रधानमंत्री संसद के प्रवेश द्वार पर हँसते-मुस्कुराते भारतीय, विदेशी संवाददातों को इस सत्र के महत्व के बारे में व्याख्यान किये थे। रायसीना हिल से विजय चौक के रास्ते संसद परिसर में लाल, पीला, सफ़ेद, हरा, बैगनी, कला, चेकदार, छींटदार रंग बिरंगे कपड़े पहने आगंतुकों का चेहरा खिलखिला रहा था। दीखने में सभी परिस्थियाँ सामान्य दिख रही थी। लेकिन कुछ पाल में देश में राजनीतिक सूनामी आने वाला है।
इधर आसमान से इंद्रदेव दिल्ली सल्तनत पर फ़िदा थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कहने से नहीं चुके कि मानसून नवीनता और नवसृजन का प्रतीक है। उन्हें जो खबर मिली हैं, उसके अनुसार देश में मौसम बहुत ही अच्छे ढंग से आगे बढ़ रहा है, उसी तरह जिस तरह उनके नेतृत्व में देश बढ़ रहा है। उनके अनुसार कृषि को लाभदायक मौसम की खबरें हैं और बारिश किसानों की अर्थव्यवस्था, देश की अर्थव्यवस्था, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और भारत के परिवारों के लिए एक सुखद सन्देश लेकर आयी है, उनकी सरकार की तरह।
उधर, भारत के उपराष्ट्रपति को यह ज्ञात था अथवा नहीं, यह तो वही जानते हैं, या फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र ही जानते हैं, लेकिन झमाझम बारिश में भी दोपहर के एक बजे से चार बजे के बीच ऐसा क्या हुया जो संसद के दीवारों को भी ज्ञात नहीं हो पाया और उप राष्ट्रपति धनकड़ को 'पूर्व-उपराष्ट्रपति' होना पड़ा।
वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्ता फेसबुक पर लिखते हैं की "पूर्व हो चुके अभूतपूर्व उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ जी के साथ कोई सहानुभूति नहीं है। हालांकि उन्हें हम नब्बे के दशक या उससे कुछ पहले भी जानते हैं। मिलना जुलना भी रहा है। लेकिन पश्चिम बंगाल में राज्यपाल के रूप में जिस तरह से उन्होंने एक दल के एजेंट की भूमिका निभाई। पुरस्कार स्वरूप उन्हें उप- राष्ट्रपति, राज्यसभा का सभापति बनाया गया। राज्यसभा के सभापति के रूप में भी उनकी भूमिका विवादित ही रही। वह 'लायल दैन किंग' की भूमिका में नजर आते थे। उन्होंने खुद को संघ का एकलव्य भी बताया लेकिन भूल गए कि वह संघ, जनसंघ या भाजपा के मूल उत्पाद नहीं हैं और आयातित लोगों के लिए वहां एक सीमा रेखा काम करती है जिससे बाहर निकलने की उन्हें इजाज़त नहीं होती। वैसे भी वहां 'यूज ऐंड थ्रो' का चलन है। यशवंत सिन्हा, मेनका-वरुण गांधी, सत्यपाल मलिक, चौधरी वीरेंद्र सिंह (हरियाणा) के साथ जो हुआ, उसकी कड़ी आप भी बने। और भी कई लोग कतार में हैं। लेकिन जिस अपमानजनक ढंग से धनखड़ जी को हटाया गया, पहले से लिखे त्यागपत्र पर हस्ताक्षर करवाये गये। उसे अगले दिन सदन में पेश करने तक की छूट नहीं दी गई। कुछ भी कहने बोलने से मना कर दिया गया, इस सबसे वह सहानुभूति के पात्र हैं। अभी वह चुप्पी साधे हैं लेकिन कब तक!"
वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्ता
खैर, अब प्रधानमंत्री का मौसम के प्रति विचार और मौसम विभाग की बातें पर चलते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके मंत्रिमंडल के लोग मोदी जी के कार्यकाल और उपलब्धियों का व्याख्यान करते नहीं थकते , प्रधानमंत्री भी यह कहने में नहीं चुके कि 'अब तक जो मुझे जानकारी दी गई है, उस हिसाब से पिछले 10 वर्ष में जो पानी का भंडार हुआ है इस बार वो करीब-करीब तीन गुना हुआ है, जिसका आने वाले दिनों में भी देश के अर्थतंत्र को बहुत लाभ होगा।' मौसम विभाग भी उन्हीं तारों और रागों को दोहराते हुए कहने में नहीं चुका कि 'भारत के लिए मानसून महज बरसात का एक मौसम भर नहीं है। यह अनूठी एवं शक्तिशाली जलवायु प्रणाली देश के लोगों की जीवन रेखा है। इस प्रणाली का प्रभाव इस देश के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने पर व्यापक, प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से पड़ता है। मानसून की बारिश कृषि क्षेत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है और उत्पादकता एवं खाद्यान्न की कीमतें अच्छे मानसून से जुड़ी होती हैं।' कौन नहीं मानेगा दोनों की बात।
मौसम विभाग वाले तो प्रधान मंत्री की बातों से भी एक कदम आगे निकल कर कहा कि देश के जल भंडार को फिर से भरने और पनबिजली उत्पादन की दृष्टि से, यह बारिश बेहद ही महत्वपूर्ण है। सदियों से, भारत का जनजीवन हवाओं के इस मौसमी उलटफेर के साथ जटिल रूप से जुड़ा हुआ है। कालिदास से लेकर रवींद्रनाथ टैगोर से होते हुए आधुनिक काल की भारतीय कविता, भारतीय शास्त्रीय संगीत, चित्रकारी, त्योहार, सामाजिक परंपराएं आदि मानसून की चक्रीय लय से प्रतिध्वनित होती हैं। अच्छे मानसून का आशय हमेशा आम लोगों की समृद्धि एवं कल्याण से रहा है और खराब मानसून का मतलब संकट रहा है। इसलिए इस परिघटना, इसे प्रभावित करने वाले कारकों, इसकी तीव्रता व वितरण आदि में दिखाई देने वाले बदलावों को समझना बेहद महत्वपूर्ण है और इसके लिए तैयारी करना भारत के लिए बेहद अहम है। वाह !!!
तस्वीर: इंटरनेट के सौजन्य से
अपने दूसरी पारी के प्रधानमंत्री काल में निर्मित नया संसद भवन के प्रवेश द्वारा पर खड़े होकर जब स्थानित पत्रकारों के साथ संवाद करने के बाद संसद पहुंचे तो प्रधानमंत्री अपने सम्वोधन में कहा कि 'मानसून सत्र राष्ट्र के लिए ये बहुत ही गौरवपूर्ण सत्र है। ये मानसून सत्र राष्ट्र के लिए एक अपने आप में विजयोत्सव का रूप है। उन्होंने यह भी कहा कि जब मैं कहता हूं कि ये सत्र राष्ट्र गौरव और विजयोत्सव का सत्र है, तो सबसे पहले तो मैं पहली बार इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर भारत का तिरंगा झंडा वहां लहराना ये हर देशवासी के लिए गौरव के पल हैं। देश में साइंस टेक्नोलॉजी के प्रति, इनोवेशन के प्रति, नया उमंग और उत्साह भरने वाली ये सफल यात्रा रही है। अब पूरा संसद, लोकसभा राज्यसभा दोनों सदन, देशवासी जिस गौरव का अनुभव कर रहे हैं, उसमें एक स्वर से जुड़ेंगे, एक स्वर से इसका यशगान होगा, जो भारत को अंतरिक्ष में नई ऊंचाइयों पर पहुंचने वाले जो भावी कार्यक्रम हैं, उनके लिए भी प्रेरक बनेगा, प्रोत्साहक बनेगा।' खैर।
उधर, मौसम विभाग के अनुसार, मानसून शब्द का जन्म अरबी शब्द मौसिम से हुआ है, जिसका अर्थ है “मौसम”। यह समुद्र और स्थल भाग के बीच के तापमान में अंतर और उसके परिणामस्वरूप पैदा होने वाले दबाव में अंतर के कारण होने वाले हवाओं के मौसमी उलटफेर को दर्शाता है। गर्मियों में स्थल भाग निकटवर्ती समुद्र की तुलना में अधिक तेजी से गर्म होता है। स्थल भाग की सतह पर फैली हवा गर्म होकर ऊपर की ओर उठती है, जिससे कम दबाव की स्थिति बनती है। यह समुद्र के ऊपर उच्च दबाव वाले क्षेत्रों से अपेक्षाकृत ठंडी, नमी से भरी हवा को मानसूनी हवाओं के रूप में स्थल भाग की ओर आकर्षित करती है और जब ये हवाएं स्थल भाग पर पहुंचकर पर्वत श्रृंखलाओं से टकराती हैं, तो व्यापक वर्षा होती है। सर्दियों में इसका ठीक उल्टा होता है, जब ठंडे स्थलों से हवाएं लौटते हुए मानसून के रूप में समुद्र की ओर बहती हैं। यह मानसून के संचरण की एक बहुत ही सरल व्याख्या है।
तस्वीर: इंटरनेट के सौजन्य से
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि ये मानसून सत्र एक विजयोत्सव है। पूरी दुनिया ने भारत की सैन्य शक्ति का, भारत के सैन्य के सामर्थ्य का रूप देखा है। ऑपरेशन सिंदूर में भारत की सेना ने जो लक्ष्य निर्धारित किया था, 100 परसेंट अचीव किया। आतंकियों के आकाओं के घर में जाकर के 22 मिनट के भीतर- भीतर ऑपरेशन सिंदूर के तहत उसको जमींदोज कर दिया गया। और मैंने बिहार के एक कार्यक्रम में इसकी घोषणा की थी, जो हमारी सैन्य शक्ति ने बहुत ही कम समय में सिद्ध करके दिखा दिया। और इसमें मेड इन इंडिया सैन्य शक्ति का ये नया स्वरूप इस पर भी दुनिया बहुत आकर्षित हुई है। इन दिनों विश्व के जिन-जिन लोगों से मिलना होता है तो, तो भारत के इस मेड इन इंडिया जो औजार तैयार हो रहे हैं, उसके प्रति दुनिया का आकर्षण बढ़ रहा है। मुझे विश्वास है कि जब सदन इस विजयोत्सव को एक स्वर में विजय के भाव से इस सत्र के दरमियान उन ओजस्वी-तेजस्वी भावनाओं को प्रकट करेगा, तो भारत की सैन्य शक्ति को बल मिलेगा, प्रोत्साहन मिलेगा, देशवासियों को प्रेरणा मिलेगी, और सैन्य क्षेत्र में जो रिसर्च, इनोवेशन और मैन्युफैक्चरिंग हो रहे हैं, मेड इन इंडिया डिफेंस इक्विपमेंट बन रहे हैं, उसको भी एक बल मिलेगा, और जो भारत के नौजवानों के लिए नए रोजगार के अवसर पैदा करेगा।
भारत में, संसद के आम तौर पर एक वर्ष में तीन सत्र होते हैं: बजट सत्र, मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र। बजट सत्र यह सबसे लंबा सत्र होता है, जो आमतौर पर फरवरी से मई तक आयोजित होता है, और राष्ट्रीय बजट तथा संबंधित वित्तीय मामलों पर चर्चा पर केंद्रित होता है। मानसून सत्र जुलाई से सितंबर तक आयोजित होता है और मुख्य रूप से जनहित के मुद्दों पर चर्चा और सरकारी नीतियों की समीक्षा पर केंद्रित होता है। शीतकालीन सत्र सबसे छोटा सत्र होता है, जो आमतौर पर नवंबर से दिसंबर तक आयोजित होता है, और सदस्यों को अपनी चिंता व्यक्त करने और विधायी कार्यों पर चर्चा करने का अवसर प्रदान करता है।
तस्वीर: इंटरनेट के सौजन्य से
जबकि भारत में प्रत्येक वर्ष दो अलग-अलग प्रकार के मानसून आते हैं। दक्षिण-पश्चिमी मानसून और उत्तर-पूर्वी मानसून। दक्षिण-पश्चिमी मानसून (जून से सितंबर) दक्षिण-पश्चिमी मानसून भारत में बरसात का मुख्य मौसम है। यह देश की अर्थव्यवस्था व इकोलॉजी की जीवन रेखा है। यह खेती को बढ़ावा देता है, नदियों एवं झीलों को भरता है और भूजल के स्तर को बेहतर करता है। भारत की कुल वर्षा का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा इसी मौसम में होता है और इसी वजह से यह सिंचाई, पेयजल और यहां तक कि पनबिजली के जरिए बिजली उत्पादन के लिए भी अहम बन जाता है। इस मौसम की शुरुआत आमतौर पर जून के शुरू में उस समय होती है, जब मानसूनी हवाएं केरल पहुंचती हैं। जुलाई के मध्य तक, देश का अधिकांश हिस्सा इससे प्रभावित हो जाता है। यह प्रक्रिया इसलिए शुरू होती है क्योंकि गर्मियों में स्थल भाग समुद्र की तुलना में तेज़ी से गर्म होता है। इससे उत्तरी और मध्य भारत में कम दबाव की स्थिति बनती है। उधर, हिंद महासागर ठंडा रहता है जिससे समुद्र में उच्च दबाव की स्थिति बनती है। नम हवाएं समुद्र से स्थल भाग की ओर बहती हैं और बारिश लाती हैं।
इन हवाओं को दक्षिण-पश्चिमी हवाएं कहा जाता है क्योंकि ये दक्षिण-पश्चिम दिशा से चलती हैं। ये दो शाखाओं में बंट जाती हैं। एक शाखा अरब सागर के किनारे चलती है और पश्चिमी तट एवं मध्य भारत में बारिश लाती है। दूसरी शाखा बंगाल की खाड़ी को पार करती हुई देश के पूर्वी और उत्तर-पूर्वी हिस्सों तक पहुंचती है। जैसे ही ये हवाएं पश्चिमी घाट और हिमालय जैसी पर्वत श्रृंखलाओं से टकराती हैं, ये ऊपर की ओर उठती हैं, ठंडी होती हैं और बारिश कराती हैं। गर्म बंगाल की खाड़ी के ऊपर बनने वाली मानसूनी मौसम प्रणालियां देश के उत्तरी हिस्सों से गुजरते समय भरपूर बारिश लाती हैं। यह मानसून धान, कपास और गन्ने जैसी फसलों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इस मौसम में देरी या इसकी विफलता खाद्य आपूर्ति, आजीविका और व्यापक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।
तस्वीर: इंटरनेट के सौजन्य से
दक्षिण-पश्चिमी मानसून जैसे ही कमजोर पड़ने लगता है, अक्टूबर महीने तक उत्तर-पूर्वी मानसून का आगमन हो जाता है। इसे लौटता हुआ मानसून भी कहा जाता है। यह छोटी अवधि वाला और कम व्यापक होता है, लेकिन फिर भी महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से, दक्षिण भारत के लिए। अक्टूबर तक, समुद्र की तुलना में स्थल भाग तेजी से ठंडी होने लगता है। इससे भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर एक उच्च दबाव वाला क्षेत्र और निकटवर्ती समुद्रों पर एक कम दबाव वाला क्षेत्र बन जाता है। हवा के प्रवाह की दिशा उलट जाती है। अब, हवाएं स्थल भाग से समुद्र की ओर बहने लगती हैं। इन्हें उत्तर-पूर्वी हवाएं कहते हैं। चूंकि ये हवाएं दक्षिण-पूर्वी तट पर पहुंचने से पहले बंगाल की खाड़ी के ऊपर से गुज़रती हैं, इसलिए ये कुछ नमी अपने साथ ले जाती हैं। जैसे ही ये तमिलनाडु, दक्षिणी आंध्र प्रदेश और श्रीलंका के कुछ हिस्सों में पहुंचती हैं, ये बारिश के लिए प्रचुर मात्रा में नमी प्रदान करती हैं। यह बारिश तमिलनाडु जैसे क्षेत्रों के लिए बेहद ज़रूरी है, जहां दक्षिण-पश्चिमी मानसून के दौरान ज़्यादा बारिश नहीं होती। दक्षिणी बंगाल की खाड़ी में बनने वाली मौसम की प्रणालियां दक्षिणी प्रायद्वीप में भरपूर बारिश लाती हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2025 के मानसून सत्र की शुरुआत से पहले संसद परिसर में मीडिया को संबोधित करते उन्होंने कहा कि मानसून सत्र में सभी का स्वागत करते हुए, प्रधानमंत्री ने कहा कि मानसून नवाचार और नवीनीकरण का प्रतीक है। उन्होंने यह भी कहा कि देश भर में वर्तमान मौसम की स्थिति अनुकूल हो रही है जो कृषि के लिए लाभकारी पूर्वानुमान के समान है। उन्होंने कहा कि वर्षा न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था और देश के समग्र आर्थिक ढांचे में, बल्कि प्रत्येक परिवार की वित्तीय भलाई में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्रधानमंत्री ने कहा कि वर्तमान जानकारी के आधार पर, इस वर्ष जलाशयों का स्तर पिछले दस वर्षों की तुलना में तीन गुना बढ़ गया है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि यह वृद्धि आने वाले दिनों में भारत की अर्थव्यवस्था को महत्वपूर्ण रूप से लाभान्वित करेगी।
तस्वीर: इंटरनेट के सौजन्य से
एकता की शक्ति और राष्ट्र को प्रेरित व ऊर्जावान बनाने वाली एकजुटता की भावना पर ज़ोर देते हुए, प्रधानमंत्री ने कहा कि वर्तमान मानसून सत्र विजय उत्सव के रूप में इसी भावना को प्रतिबिंबित करेगा, भारत की सैन्य शक्ति और राष्ट्रीय क्षमता का सम्मान करेगा और 140 करोड़ नागरिकों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा। मोदी ने विश्वास व्यक्त किया कि सामूहिक प्रयास रक्षा क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ेंगे। उन्होंने राष्ट्र से सशस्त्र बलों की ताकत को पहचानने और उसकी सराहना करने का आग्रह किया। जनता और राजनीतिक दलों को संबोधित करते हुए, प्रधानमंत्री ने एकता से मिलने वाली शक्ति और पूरे देश के एक स्वर में बोलने के प्रभाव पर प्रकाश डाला। उन्होंने सभी सांसदों से संसद में इस भावना को आगे बढ़ाने का आह्वान किया। राजनीतिक दलों और उनके संबंधित एजेंडों की विविधता को स्वीकार करते हुए, श्री मोदी ने कहा कि दलीय हितों पर राय अलग-अलग हो सकती है, लेकिन राष्ट्रीय हित के मामलों में इरादों में सामंजस्य होना चाहिए। उन्होंने यह दोहराते हुए अपने संबोधन का समापन किया कि इस सत्र में राष्ट्र के विकास को गति देने, नागरिकों को सशक्त बनाने और भारत की प्रगति को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से कई प्रस्तावित विधेयक शामिल होंगे। उन्होंने सभी संसद सदस्यों को सार्थक एवं बेहतर गुणवत्ता वाली बहस के लिए शुभकामनाएं दीं।
प्रधानमंत्री के अनुसार, ये दशक हम एक प्रकार से देख सकते हैं कि शांति और प्रगति कंधे से कंधा मिलाकर के आगे बढ़ने के कदम-कदम पर प्रगति का एहसास हम करते रहें हैं। देश कई प्रकार की हिंसक वारदातों का शिकार रहा है, लंबे अरसे तक शिकार रहा है, देश आजाद हुआ तब से हम इस समस्या को झेल रहे हैं। चाहे आतंकवाद हो, नक्सलवाद हो, कोई प्रारंभ में शुरू हुआ होगा, कोई बाद में शुरू हुआ होगा। लेकिन आज नक्सलवाद का, माओवाद का दायरा बहुत तेजी से सिकुड़ रहा है। माओवाद को, नक्सलवाद को जड़ से उखाड़ने के संकल्प के साथ देश के सुरक्षा बल एक नए आत्मविश्वास से, तेज गति से सफलता की ओर कदम रख रहे हैं। और मैं गर्व से कह सकता हूं, देश में सैकड़ो जिलें नक्सल की चपेट में से निकलकर के आज मुक्ति का सांस ले रहे हैं। हमें गर्व है कि बम, बंदूक और पिस्तौल के सामने हमारे देश का संविधान जीत रहा है, हमारे देश का संविधान विजयी हो रहा है। देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए साफ दिख रहा है कि कल तक जो रेड कॉरिडोर थे, वो आज ग्रीन ग्रोथ जोन में परिवर्तित होते नजर आ रहे हैं।
तस्वीर: इंटरनेट के सौजन्य से
जबकि, भारतीय मानसून एक ऐसी जटिल मौसम प्रणाली है, जो कई प्राकृतिक शक्तियों द्वारा आकार लेती है। ये शक्तियां तय करती हैं कि बरसात कब होगी, कितनी बारिश होगी और बरसात का मौसम कितने समय तक चलेगा। जहां कुछ कारक वैश्विक स्तर पर काम करते हैं, वहीं कुछ स्थानीय स्तर के कारक भी हैं। ये सब मिलकर हवाओं के प्रवाह, बादलों के उठने और देशभर में वर्षा के प्रसार को निर्देशित करते हैं। भारत में हर जगह एक जैसी वर्षा नहीं होती। कुछ इलाकों में बहुत भारी वर्षा होती है, जबकि अन्य अधिकतर सूखे रहते हैं। भारत में औसत वार्षिक वर्षा लगभग 125 सेंटीमीटर होती है, लेकिन इसमें स्थानिक भिन्नताएं बहुत अधिक होती हैं। यह असमान स्वरुप मानसूनी हवाओं के मार्ग और भूमि के आकार से जुड़ा हुआ है। चूंकि मानसूनी हवाएं वर्ष-दर-वर्ष आधार पर बदलती रहती हैं, इसलिए वर्षा हमेशा एक जैसी नहीं होती। इस भिन्नता को वर्षा संबंधी बदलाव कहा जाता है। भारतीय मानसून समय के पैमाने पर दैनिक, समकालिक, उप-मौसमी, अंतर-वार्षिक, दशकीय और शताब्दी के आधार पर बदलाव का एक व्यापक फलक (स्पेक्ट्रम) पेश करता है। मानसूनी वर्षा के सक्रिय व विराम वाले चक्र भारतीय मानसून की उप-मौसमी बदलाव का प्रतिनिधित्व करते हैं। मानसूनी वर्षा के अंतर-वार्षिक विविधताओं का एक महत्वपूर्ण अंश उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय महासागरीय जलवायु से जुड़ा हुआ है।
पश्चिमी तट और पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों में सबसे अधिक वर्षा होती है। इन इलाकों में हर साल 400 सेंटीमीटर से अधिक वर्षा होती है। अरब सागर से आने वाली हवाएं पश्चिमी घाट से टकराती हैं, जिससे हवा ऊपर की ओर उठती है। जैसे-जैसे हवा ऊपर उठती है, वह ठंडी होती जाती है और बादल बनते हैं, जिससे भारी बारिश होती है। इसे पर्वतीय वर्षा कहते हैं और यह पहाड़ी ढलानों पर आम है। इसी तरह, पूर्वोत्तर की पहाड़ियां अवरोधों की तरह काम करती हैं और मेघालय एवं अरुणाचल प्रदेश जैसे इलाकों में भारी मात्रा में वर्षा कराती हैं। इसके उलट, पश्चिमी राजस्थान के कुछ हिस्सों और गुजरात, हरियाणा और पंजाब के आस-पास के इलाकों में बहुत कम बारिश होती है। इन इलाकों में सालाना 60 सेंटीमीटर से भी कम वर्षा होती है। दक्कन के पठार और सह्याद्रि पहाड़ियों के पूर्व के इलाकों में भी कम बारिश होती है। ये इलाके वृष्टिछाया वाले क्षेत्र में आते हैं, यानी पहाड़ियां वर्षा वाली हवाओं को रोकती हैं। लद्दाख का लेह भी अपनी ऊंचाई और ठंडी रेगिस्तानी जलवायु के कारण बहुत कम वर्षा वाला एक और इलाका है। भारत के अधिकतर हिस्सों में मध्यम वर्षा होती है। बर्फबारी हिमालयी क्षेत्र तक ही सीमित रहती है।
तस्वीर: इंटरनेट के सौजन्य से
जबकि प्रधानमंत्री ने कहा कि एक के बाद ऐसी घटनाएं देशभक्ति के लिए, देश की भलाई के लिए संसद में पहुंचे हुए हर माननीय सांसद के लिए गौरव का पल हैं। और संसद के इस सत्र में ये गौरवगान पूरा देश सुनेगा, हर सांसद से सुनेगा, हर दल से सुनेगा। जबकि जलवायु परिवर्तन भारतीय मानसून के व्यवहार को नया रूप देने लगा है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के पूर्व सचिव डॉ. राजीवन माधवन नायर के अनुसार, देशभर में कुल वर्षा ने भले ही राष्ट्रीय औसत को लेकर कोई स्पष्ट दीर्घकालिक रुझान नहीं दर्शाया है, फिर भी इसमें स्थानिक आधार पर काफी अंतर है। केरल, पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों और पूर्वी मध्य भारत जैसे कुछ क्षेत्रों में मानसून के मौसम में कम वर्षा हो रही है। इसके उलट उत्तरी कर्नाटक, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे क्षेत्रों में वर्षा में वृद्धि देखी गई है। उन्होंने यह भी बताया है कि अत्यधिक वर्षा की घटनाओं, विशेष रूप से एक दिन में 150 मिलीमीटर से अधिक, की आवृत्ति आम होती जा रही है और हर दशक में लगभग दो ऐसी घटनाओं की बढ़ोतरी हो रही है।
विशेषज्ञों ने पाया है कि मध्य भारत में 1950 से 2015 के बीच 150 मिलीमीटर से अधिक की अत्यधिक दैनिक वर्षा की आवृत्ति में लगभग 75 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। ग्रीष्मकालीन मानसून के दौरान शुष्क वाली अवधि में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वर्ष 1951 से लेकर 1980 तक की तुलना में 1981 से लेकर 2011 के बीच शुष्क वाली ये अवधि 27 प्रतिशत अधिक आम हो गई है। इसके साथ ही, अखिल भारतीय स्तर पर कम वर्षा वाले वर्षों की संख्या में भी वृद्धि हुई है। मौसम विज्ञान विभाग की भाषा में अधिक उप-विभागों में भी वर्षा में कमी महसूस की जा रही है, जो कि सूखे की बढ़ती आवृत्ति और इसके व्यापक भौगोलिक प्रसार की ओर इशारा करता है। मानसून की बदलती प्रकृति के कृषि पर गंभीर परिणाम हो रहे हैं। जहां लंबी शुष्क वाली अवधि की आवृत्ति बढ़ रही है, वहीं छोटी अवधि वाली बारिश की घटनाएं तेज होती जा रही है। डॉ. नायर ने यह भी बताया है कि अब मौसम की लगभग आधी वर्षा केवल 20 से 30 घंटों के भीतर ही हो जाती है, जो मानसून की अवधि के केवल लगभग 20 प्रतिशत हिस्से को ही कवर करती है। शेष 50 प्रतिशत वर्षा 80 प्रतिशत समय में हल्की से मध्यम वर्षा के रूप में होती है। यह असमान वितरण जल उपलब्धता, मिट्टी की सेहत और फसल की उत्पादकता को प्रभावित करता है।
प्रधानमंत्री ने कहा की आर्थिक क्षेत्र में भी जब 2014 में आप सबने हमें जिम्मेदारी दी, देश फ्रेजाइल-5 की अवस्था से गुजर रहा था। 2014 के पहले वैश्विक अर्थव्यवस्था में हम 10वें नंबर पर थे, और आज भारत तेज गति से दुनिया की तीसरी नंबर की अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। इन दिनों 25 करोड़ गरीबों का गरीबी से बाहर निकलना, जिसकी विश्व की अनेक संस्थाएं सराहना कर रही हैं। देश में एक जमाना था 2014 के पहले, जब महंगाई का दर, इन्फ्लेशन रेट डबल डिजिट में हुआ करता था, आज 2 परसेंट के आसपास आकर के देश के सामान्य मानवी के जीवन में राहत बन गया है, सुविधा बन गया है। Low inflation के सामने हाई ग्रोथ एक अच्छे विकास यात्रा की दिशा है। डिजिटल इंडिया, यूपीआई आज भारत के एक नए सामर्थ्य को दुनिया देख रही है, पहचान रही है, और ज्यादातर देश में उसके प्रति एक आकर्षण पैदा हो रहा है। यूपीआई ने Fintech की दुनिया में अपना एक नाम कमाया है। रियल टाइम डिजिटल ट्रांजेक्शन दुनिया में सबसे ज्यादा हो रहे हैं, दुनिया में जितने हो रहे हैं, अकेले भारत में उससे ज्यादा हो रहे हैं।

मैं आज राष्ट्रीय हित में किए गए इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए उन सभी सांसदों की सराहना करना चाहता हूं, सभी दलों की सराहना करना चाहता हूं, और इसने देश में एक सकारात्मक वातावरण पैदा किया। विश्व ने भारत की बात को स्वीकार करने की दिशा में अपने मन के द्वार खोले और इसके लिए ये हमारे सांसदगण, हमारे राजनीतिक दल सराहना करने के मेरे लिए सौभाग्य है।हम जानते हैं कि ये स्पिरिट, एक स्वर, एक एकता का वातावरण देश को कितना उत्साह से भर देता है। विजयोत्सव का ये पर्व इस मानसून सत्र में भी उसी भाव से प्रकट होगा, देश की सैन्य शक्ति की सरहाना करेगा, देश के सामर्थ्य का गौरवगान करेगा, और देश के 140 करोड़ नागरिकों को नई प्रेरणा का कारण बनेगा। मुझे विश्वास है कि हम सब मिलकर के डिफेंस के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने के इन प्रयासों को बल दें, सेना के सामर्थ्य की सराहना करें। और मैं आज देशवासियों के सामने जरूर कहूंगा, और देश के राजनीतिक दलों से भी कहूंगा कि देश ने एकता की ताकत देखी है, एक स्वर का सामर्थ्य क्या होता है देखा है, तो सदन में से भी सभी माननीय सांसद उसको बल दें, उसको आगे बढ़ाएं। और मैं ये जरूर कहूंगा राजनीतिक दल अलग-अलग है, हर एक का अपना एक एंजेडा है, अपनी एक भूमिका है, लेकिन मैं इस वास्तविकता को स्वीकार करता हूं कि दल हित में मत भले ना मिले, लेकिन देशहित में मन जरुर मिले। इसी एक भावना के साथ, इस मानसून सत्र से देश के विकास यात्रा को बल देने वाले, देश की प्रगति को बल देने वाले, देश के नागरिकों को सामर्थ्य देने वाले अनेक विधेयक प्रस्तावित हैं, सदन विस्तृत चर्चा करके उसको भी पारित करेगा। मेरी सभी माननीय सांसदों से उत्तम डिबेट चलाने के लिए शुभकामनाएं हैं।
बहरहाल, उधर मौसम विभाग के अनुसार, आकाशीय बिजली गिरना सबसे शक्तिशाली और खतरनाक प्राकृतिक घटनाओं में से एक है। एक बार बिजली गिरने से 100 मिलियन से 1 बिलियन वोल्ट तक बिजली उत्पन्न हो सकती है। इससे अरबों वाट बिजली उत्सर्जित हो सकती है और 35,000 डिग्री फ़ारेनहाइट से भी अधिक तापमान उत्पन्न हो सकता है। यह सूर्य की सतह से भी अधिक गर्म होता है। इसकी ऊष्मा इतनी प्रबल होती है कि यह धातु को पिघला सकती है, यहां तक कि रेत को भी कांच में बदल सकती है। भारत में, विशेषकर मानसून के महीनों में, बिजली गिरना एक गंभीर मौसम संबंधी खतरा बना रहता है। इधर, उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड़ पर आधिकारिक बिजली गिरी और वे उपराष्ट्रपति के कार्यालय से बाहर निकल गए या निकाल दिए गए, इस बात का खुलासा तो आगामी किताब में होगा।
