* क्या आप जानते हैं कि भारत में न्यूनतम 250000+ खासकर 10-19 वर्ष की आयु वाली महिलाएं “विधवा” हैं। वैसे देश में बाल-विवाह प्रथा पर प्रतिबंध है।
* क्या आप जानते हैं कि पूरे भारतवर्ष में तकरीबन 60000000 महिलाएं (विभिन्न आयु की, मसलन 20 वर्ष से ऊपर) “विधवा” हैं और देश में “पति की मृत्यु बाद, यानी विधवा के सम्मानार्थ/रक्षार्थ कोई कानून नहीं है।” और यही कारण है कि एक महिला के पति के मृत्योपरान्त परिवार, उसके बाल-बच्चे भी पूछते हैं अब कहाँ रहेगी? कहीं मेरे गले न पड़ जाय !! – बसर्ते, उक्त महिला के पास लाखों-करोड़ों-अरबों-खरबों की संपत्ति नहीं हो।
गाजियाबाद / नई दिल्ली: विगत दिनों गाजियाबाद के इंदिरापुरम के ज्ञानखंड-III स्थित शिप्रा रिवेरा आवासीय कॉलोनी के प्रवेश द्वार पर एक वृद्ध, बीमार, लाचार महिला को शायद उसका संतान छोड़कर चला गया। शरीर पर गंभीर चोटों के निशान, टूटी हुई हाथ की हड्डी और जगह-जगह जख़्मों से भरे शरीर के साथ सड़क के किनारे पड़ी मिली थी वह महिला। यह महज शारीरिक यातना की कहानी नहीं है, इससे कहीं अधिक गहरी पीड़ा - एक मां की टूटी हुई आत्मा, जिसे उसी की संतान ने त्याग दिया। उसे उसके जीवन के अंतिम बसंत में 'बोझ मानकर' बेसहारा छोड़ गया।
बाद में, आवासीय कॉलोनी के नागरिक कल्याण संघ (आरडब्यूए) की मदद से उन्हें तुरंत इलाज के लिए अस्पताल पहुंचाया गया। साथ ही, एक वृद्धाश्रम में आश्रय दिलाया गया। गाजियाबाद स्थित शिप्रा रिवेरा आवासीय कालोनी की यह कहानी एक दृष्टान्त है। इसी दृष्टान्त को लेकर आइये चलते हैं बनारस। विधवाओं, परित्यक्ता माताओं को समझने के लिए विगत वर्ष 'इंडियाज एबंडंट मदर्स' पर काम कर रहा था। दुर्भाग्य यह है कि आज भारत के समाज में परिवार तो टूट ही रहा है, देश में अनाथालय, वृद्धाश्रम, विधवा और विधुर आश्रमों की संख्या उत्तरोत्तर बढ़ रही है। कहते हैं हम 'विकसित' हो रहे हैं, लेकिन यह विकास समाज को किस दिशा की ओर ले जा रहा है - गहन शोध का विषय है।
उनके 8' x 6' के कमरे में तिलचट्टा और चिपकिल्ली का साम्राज्य था। कोने में प्लास्टिक के डब्बे में रखे लाल रंग का मसूर दाल पर कभी-कभी चिपकिल्ली चढ़कर नीचे उतर रहा था। छोटे-छोटे चूहों के लिए मानो समस्त क्षेत्र खुला मैदान हो और वे बाधा – दौड़ का अभ्यास लगातार कर रहे हों। दरवाजे के चौखट से घर में गिरे पानी एक सुराग से बाहर निकल रहा था। यह पानी कुछ देर पहले बर्तन साफ़ करने में गिरा था। भात के कुछ अंश अभी भी वहां गिरा था जो पानी की कमी के कारण बाहर नहीं निकल पाया था और वह तिलचट्टे के लिए भोजन था।
एक दूसरे कोने में प्लास्टिक के एक बाल्टी में पानी रखा था। इस बाल्टी का क्षेत्रफल भी कमरे के क्षेत्रफल से अधिक नहीं था, जिसमे पांच लीटर पानी से अधिक जाना, यानि कमरे में बाढ़ आने के बराबर था। सामने पचास के दसक में बने मोटे एल्युमिनियम के चादरों से बना एक बक्सा, जो अपने जवानी में चमकता रहा होगा, आज इस वृद्धा की तरह जीवन की अंतिम साँसे खींच रहा था। न जाने हवा और मिट्टी की कितनी परतें इसके चादरों को ढंककर काला कर दिया था। ऐसा लगता था जैसे उस घर में रखा एक-एक सामान उस वृद्ध महिला को देख रहा हो और इंतज़ार कर रहा हो की कब सभी गँगा की धाराओं में समर्पित होंगे अपनी संगनी के साथ।
उस दिन से कोई 60 वर्ष पहले 20 वर्ष की आयु में उनके घर के लोग उन्हें बनारस लाये थे। पति की मृत्यु के बाद गंगा स्नान कराने के उद्देश्य से। ललिता घाट स्थित गंगा के किनारे सभी एक साथ थे। पहले पुरुष लोग स्नान किये। फिर कुछ महिलाएं एक साथ स्नान करने नीचे उतरीं। हर-हर गंगे -हर – हर गंगे कर जब पानी से मुख को बाहर निकालीं, भगवान सूर्य को जल अर्पित करने, तब तक घर के सभी अपने “पराये” हो चुके थे। उधर सूर्यदेव आसमान पर ऊपर आये, इधर सभी सगे-संबंधी जो बहुत ही विश्वास के साथ कलकत्ता से साथ आये थे, अस्ताचल में चले गए। अब तो किसी का चेहरा तक याद नहीं है उन्हें। हाँ, इनके पति के पास उस समय कोई 300 से अधिक बीघा जमीन थी। विवाह के कोई आठ महीने बाद ही समय ने अपना रुख मोड़ा था इनसे और ये विधवा हो गयीं।
उत्तर में वरुणा नदी और दक्षिण में अस्सी नदी के बीच बसा बनारस और बनारस की सैकड़ों गालियां न जाने कितनी विधवाओं के इतिहास को समेटे हुए हैं – निःशब्द। आज भी बनारस की गलियों में, विधवा आश्रमों में कई हज़ार विधवाएं अपने जीवन की अंतिम बसन्त को समाप्त होते देख रहीं हैं। गंगा की ओर जाती बनारस की पुरानी गलियों में जैसे दो घरों की दीवारें बांस-बल्लों के सहारे एक-दूसरे को संभाले हुए हैं, इस विस्वास के साथ की दोनों एक-साथ गिरेंगे; भारत के गाओं, शहरों से बनारस के घाटों पर, बनारस की तंग गलियों में अपने ही परिवारों, परिजनों, सन्तानो द्वारा फेकीं गयी, पटकी गयी विधवाओं को अब सिर्फ महादेव का सहारा है उनका शरणागत होने के लिए।
इसी तरह, जब आप कृष्ण की नगरी, राधा की नगरी मथुरा-वृन्दावन में कृष्ण से मिलने, उनके प्रेम-पिपासु सहस्त्रकाल से प्रतीक्षा करती चली आ रही विधवाओं को देखेंगे, जो अपने जीवन की एक-एक साँस को जोड़ते-छोड़ते जी रही हैं, उन विधवाओं से मिलकर पूछेंगे की आखिर जीवन के अन्तिम बसन्त को वे क्यों देखना चाहती हैं? क्यों अब जीना चाहती हैं ? क्यों जीने की अभिलाषा मरने के समय बढ़ती जा रही है? क्यों उनसे मिलने के लिए मन बेचैन रहता हैं? आपको उत्तर मिल जायेगा – क्योंकि उनका “अभागा” सन्तान अपनी “विधवा माता” को मथुरा-वृन्दावन की तंग गलियों में, सड़कों पर मरने के लिए छोड़ दिया है और अब उनकी रक्षा ”कलयुग के चैतन्य” कर रहे हैं, जो उनके लिए “महाप्रभु” हैं।
शिप्रा रिवेरा आवासीय कॉलोनी की श्रीमती श्रुति ठाकुर कहती है: "वह महिला हमारे सोसाइटी के पा मिली। यह सोच के परे है कि कैसे कोई संतान अपने माता-पिता को इस कदर उपेक्षित कर सड़क के किनारे फेंक देता है। यह भारत के समाज से, देश के 136 करोड़ लोगों के लिए एक ही सवाल है - आखिर ‘माता-पिता के वृद्धावस्था होने पर, अथवा माँ को विधवा होने पर, या पिता को विधुर होने पर आज भी भारत के लोग, सिर्फ अनपढ़ और अशिक्षित ही नहीं; पढ़े-लिखे विद्वान और विदुषी भी, धनाढ्य भी, उच्च पदों पर पदस्थापित अधिकारी भी – अपने माता-पिता को विधवा आश्रम या वृद्धा आश्रम में क्यों भेज देते हैं? क्या उनकी जवानी जीवन पर्यन्त बरकरार रहेगी? क्या उनके सन्तान इन्ही बातों को भविष्य में दोहरा नहीं सकेगा?”
सामाजिक स्तर पर नकारात्मक दृष्टिकोण की वजह से विधवाओं को कई कठिनाइयों और अभावों का सामना करना पड़ता है। समाज द्वारा उन पर और उनके क्रियाकलापों पर कई प्रकार की पाबंदियां लगा दी जाती है।पितृसत्तात्मक रीति-रिवाजों, धार्मिक मान्यताओं और विरासती अधिकारों का भेदभाव पूर्ण असर होता है। कई विधवा महिलाओं को परिजनों द्वारा उपेक्षा और उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है। संपत्ति विवादों में अक्सर मामले विधवाओं से ही जुड़े होते है। विधुर पुरुषों के मुकाबले विधवाओं के पुनर्विवाह के मामले बहुत कम सामने आते हैं।
तमाम सांस्कृतिक बंधनों में दबी ऐसी औरतों को अक्सर समाज और स्थानीय समुदाय नजरअंदाज कर देता है। वैवाहिक संपत्ति के बंटवारे में और बच्चों पर अधिकार में महिलाओं को वंचित कर दिया जाता है। कम संपत्ति और आय वाले परिवारों में विधवाओं को पूर्ण रूप से दरकिनार कर देने, यहां तक विधवा आश्रमों में भेज देने का भी चलन है। विधवा औरत की यह स्थिति बिल्कुल शरणार्थियों जैसी होती है. देश के कई शहरों में विधवाओं का आश्रम है, जहां निराश्रित महिलाओं शेष जीवन गुजार रही है।
आप माने अथवा नहीं, शिव की नगरी बनारस से लेकर कृष्ण की नगरी मथुरा-वृन्दावन सहित देश की लगभग 3.60 करोड़ विधवाएं आज भी अपनी अंतिम सांस की प्रतीक्षा में शेष साँसे ले रही हैं। कभी मौका मिले तो समाज की किसी गली में, नुक्कड़ पर, चौराहे पर किसी “पति-विहीन” महिला, यानि एक विधवा से पूछिए की वह कैसे जी रही है? कुछ बताये अथवा नहीं – उसकी आंसू कई ग्रन्थ लिख देंगे भारत में। बहुत चिंताजनक स्थिति है। पति चाहे कैसा भी हो, स्वयं को जितना सुरक्षित मानती है, उसकी मृत्यु के बाद उसका ब्रह्माण्ड समाप्त हो जाता है।
सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन, जो एक दशक और अधिक समय से बनारस, वृन्दावन की विधवाओं के कल्याणार्थ कार्य कर रहा है, के एक अधिकारी का कहना है कि "समाज में विधवाओं की दयनीय दशा में सुधार के लिए कानून बनाए जाने की दृष्टि से मैंने एक विधेयक का प्रस्ताव किया है। हम चाहते हैं कि सरकार उपेक्षित विधवाओं के संरक्षण, कल्याण और सहायता के लिए कानून बनाकर एक विधवा कल्याण बोर्ड का गठन करे और उनके लिये अलग से निधि बनायी जाए। विधवाएं समाज का अभिन्न हिस्सा हैं और सरकार का यह दायित्व है की वे उनकी रक्षा करे।'
उनका कहना है कि "कानून तो बनना ही चाहिए लेकिन साथ ही विधवाओं को लेकर समाज को अपनी सोच भी बदलनी चाहिए और अल्पायु में विधवा होने वाली युवतियों और महिलाओं के पुनर्विवाह को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए। यह बताते हुए कि देश की कुल आबादी में विधवाओं की संख्या लगभग तीन प्रतिशत के बराबर है और इनमें से 50 प्रतिशत बुजुर्ग, असहाय और अशक्त हैं, जिनके पास आमदनी का कोई जरिया नहीं है।"
कहा जाता है कि विधवाओं की बुरी हालत को देखकर कृष्ण भक्त मध्यकालीन कवि चैतन्य महाप्रभु ने विधवाओं को जीवन के आखिरी पल वृंदावन में कृष्ण भक्ति करते हुए गुजारने की परम्परा डाली और विधवाओं को लेकर वृंदावन आ गए।
तब मकसद यह था कि अपने परिवारों की उपेक्षा झेल रही विधवाओं को मंदिर और आश्रम आसरा देंगे और उनकी जिन्दगी गुजर जाएगी। लेकिन कालांतर में हालात सामान्य नहीं रहे। परिवारों ने अपनी ही अजीज रही विधवाओं को खुद पर बोझ मानना शुरू किया और वृंदावन लाकर उन्हें अपने हाल पर जीने के लिए छोड़ने लगे। कुछ साल पहले तक वृंदावन में विधवाएँ सड़कों पर भीख माँगते दिख जाती थीं। इतना ही नहीं “अमानवीयता का पराकाष्ठा इस बात से लगाया जा सकता है कि गरीबी के कारण जब उनकी मौत हो जाती थी तो उन्हें सामान्य और सहज अन्तिम संस्कार भी नसीब नहीं होता था। उनके शव को टुकड़ों में काटकर बोरी में बाँधकर यमुना में फेंक दिया जाता था।
तरह वर्ष पहले एक स्वयंसेवी संगठन वृन्दावन में विधवाओं की स्थिति को देखकर सर्वोच्च न्यायालय में विधवाओं की हालत सुधारने के लिए जनहित याचिका दायर कर दी। इसी जनहित याचिका पर सुनवाई करते वक्त जब विधवाओं की बदहाली की जानकारी हुई तो सुप्रीम कोर्ट ने साल 2012 में राष्ट्रीय महिला आयोग, उत्तर प्रदेश महिला आयोग, उत्तर प्रदेश सरकार, मथुरा जिला प्रशासन और संबंधित विभागों को जबरदस्त लताड़ लगाई थी। इसकी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और यूयू ललित की सामाजिक पीठ ने कोर्ट के एमिकस क्यूरी से पूछा कि क्या विधवाओं को राहत दिलाने के लिए सुलभ इंटरनेशनल से बात की जा सकती है।
अपने सुलभ होप फाउण्डेशन के जरिए वृंदावन की विधवाओं को पहले एक हजार रुपए महीना और बाद में दो हजार रुपए महीने की सहायता देनी शुरू की। इससे वृंदावन की विधवाओं की हालत सुधर गई है। अब उन्हें भोजन के लिए भीख माँगने की जरूरत नहीं पड़ती। गौरतलब है कि सुलभ फाउण्डेशन के तहत वृन्दावन, वाराणसी तथा उत्तराखण्ड आदि में रहकर भजन-कीर्तन और भिक्षावृत्ति के सहारे अपना बाकी जीवन जैसे-तैसे काट रहीं विधवा एवं परित्यक्त महिलाओं को सम्मानजनक जीवन देने का प्रयास कर रहा है। अब तक कई हज़ार विधवाओं को सुलभ ने गोद लिया है। प्रतिमाह 3000 रुपये के अतिरिक्त इन महिलाओं को रोटी, कपड़ा और मकान मुहैया कराने के अलावा सामाजिक सम्मान दिलाने के लिए होली, दिवाली, रक्षाबंधन तथा दुर्गापूजा आदि त्यौहारों के अवसर पर समाज के अन्य वर्गों के समान ही खुशी मनाने तथा खुशियां बांटने का मौका देने की शुरुआत की गई।
वृन्दावन के एक अधिकारी का कहना है कि 'सुलभ के पराया से विधवाओं की नगरी के रूप में वृन्दावन शहर में अब हालात बदल रहे हैं। कुछ वर्ष पहले तक जहाँ मथुरा-वृन्दावन में गलियों में, सड़कों पर, चौराहों पर, शहर के हर कोने और चौक पर वृद्ध विधवा स्त्रियां दिखाई देती थी अपने-अपने जीवन-मरण को देखती, महसूस करती, अब नहीं हैं। अब सभी विधवाएं आश्रमों में रहती हैं, टीवी देखती हैं, भजन गाती हैं। उनके लिए वहां जीवन की मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं। इसके आलावा अगरबत्ती बनाना, कपड़े सिलना, फूल के माला बनाना, मोमबत्ती बनाना। इससे जो आमदनी होती है वह उनके सर्वांगीण विकास पर खर्च की जाती है ताकि उन चेहरे पर प्रसन्नता रहे।'
विधवा पुनर्विवाह
बहरहाल, आज 23 जुलाई है। उस दिन 16 जुलाई था जब समाज सुधार आंदोलनों के दौर में करीब 160 साल पहले एक महत्वपूर्ण घटना ने आज की तारीख को भारतीय इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज करा दिया। 16 जुलाई, 1856 को समाज सुधारकों के महती प्रयास के बाद देश में ऊंची जाति की विधवाओं को पुनर्विवाह करने की अनुमति मिली। इससे पहले हिन्दुओं में ऊंची जाति की विधवाएं दोबारा विवाह नहीं कर सकती थीं।
शायद आज की पीढ़ी महान दार्शनिक और समाजसेवी राजा राममोहन रॉय और ईश्वरचन्द विद्यासागर को नहीं जानता हो या उनके नामों से परिचित नहीं हो, लेकिन इतिहास साक्षी है कि आज से कोई 169 साल पूर्व, इधर जब मेरठ में मातृभूमि की स्वतन्त्रता के लिए क्रान्तिकारियों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बिगुल बजाया था; उधर भारतीय सामाजिक व्यवस्था में एक महान परिवर्तन के लिए ईश्वरचन्द विद्यासागर भारत में एक उच्च जाति की विधवा महिला की दोबारा विवाह कराया था। वर्ष था 1856 और तारीख 7 दिसंबर। इससे पहले भारतीय समाज में उच्च जातियों में विधवा को पुनर्विवाह की अनुमति नहीं थी।
पश्चिम मिदनीपुर के बिरसिंघा गांव में 26 सितंबर 1820 जन्म लिए ईश्वरचंद विद्यासागर के प्रयासों से 26 जुलाई 1856 को विधवा विवाह को कोलकाता (तब कलकत्ता) के तत्कालीन गवर्नर जनरल ने मंजूरी दी थी। उनकी उपस्थिति में 7 दिसम्बर 1856 को उनके मित्र राजकृष्ण बनर्जी के घर में पहला विधवा विवाह सम्पन्न हुआ था । कहा जाता है कि 1853 में हुए एक सर्वे के अनुमान कलकत्ता में लगभग 12000 हज़ार से भी अधिक वेश्याएं रहती थीं। ईश्वरचन्द विद्यासागर उसकी इस हालत को परिमार्जित करने के लिए हमेशा प्रयासरत रहते थे। अक्षय कुमार दत्ता के सहयोग से ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने विधवा विवाह को हिन्दू समाज में स्थान दिलवाने का कार्य प्रारंभ किया। उनके प्रयासों द्वारा १८५६ में अंग्रेजी सरकार ने विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित कर इस अमानवीय मनुष्य प्रवृत्ति पर लगाम लगाने की कोशिश की।
विद्यासागर नारी शिक्षा के समर्थक थे और उनके प्रयास से ही कलकत्ता में लड़कियों के लिए कई जगह स्कूलों की स्थापना हुयी थी। उन्हें सुधारक के रूप में राजा राममोहन राय का उत्तराधिकारी माना जाता है। इतिहास साक्षी है कि 1856-60 के बीच इन्होंने 25 विधवाओं का पुनर्विवाह कराये थे। उस समय हिन्दू समाज में विधवाओं की स्थिति बहुत ही शोचनीय थी। विधवा-पुनर्विवाह कानून पारित तो हुआ था लेकिन समाज में इसे लागू करना आसान नहीं था। तब विद्यासागर ने अपने इकलौते पुत्र का विवाह एक विधवा से करवाया था।
1841 में वह कोलकाता के फोर्ट विलियम कालेज में पढ़ाई करने लग गये। 1847 में संस्कृत महाविद्यालय में सहायक सचिव और फिर प्राचार्य बने। वे शिक्षा में विद्या के सागर और स्वभाव में दया के सागर थे। एक बार उन्होंने देखा कि एक महिला असहाय पड़ी है। उसके शरीर पर से दुर्गंध आ रही थी। लोग उसे देखकर मुंह फेर रहे थे पर वे उसे उठाकर घर ले गये। उसकी सेवा की और उसके भावी जीवन का प्रबंध किया। जिन दिनों महर्षि दयानंद सरस्वती बंगाल के प्रवास पर थे तब ईश्वरचंद्र जी ने उनके विचारों को सुना। वे उनसे प्रभावित हो गये। उन दिनों बंगाल में विधवा नारियों की हालत बहुत दयनीय थी। बाल विवाह और बीमारी के कारण उनका जीवन बहुत कष्ट में बीतता था। ऐसे में उन्होंने नारी उत्थान के लिए प्रयास करने का संकल्प लिया।
वे पूछते थे कि यदि विधुर पुनर्विवाह कर सकता है तो विधवा क्यों नहीं। उनकी उपस्थिति में 7 दिसम्बर 1856 को उनके मित्र राजकृष्ण बनर्जी के घर में पहला विधवा विवाह सम्पन्न हुआ। इससे बंगाल के परम्परावादी लोगों में हड़कम्प मच गया। ईश्वरचंद का सामाजिक बहिष्कार होने लगा। उन पर तरह-तरह के आरोप लगाये गये। लेकिन इसी बीच उन्हें बंगाल की एक अन्य महान विभूति श्रीरामकृष्ण परमहंस का समर्थन भी मिल गया। उन्होंने नारी शिक्षा का प्रबल समर्थन किया। उन दिनों बंगाल में राजा राममोहन राय सती प्रथा के विरोध में काम कर रहे थे। ईश्वरचंद्र जी ने उनका भी साथ दिया और फिर इसके निषेध को भी शासकीय स्वीकृति प्राप्त हुई। नारी शिक्षा और उत्थान के प्रबल समर्थक ईश्वर चंद्र विद्यासागर का 29 जुलाई 1891 को हृदय रोग से निधन हो गया।
