गली क़ासिम जान (पुरानी दिल्ली) / कर्तव्यपथ ( नई दिल्ली) : कल की ही तो बात है। पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक इलाके की गली कासिम जान, बल्ली मारान में लकड़ी छीलने और सब्जी बेचने वाली दूकानों से पांच कदम आगे तक गया था मिर्जा असदुल्लाह बेग खान साहब के घर। 19वीं सदी में बेग साहब यानी मिर्जा ग़ालिब यहीं रहते थे। यहाँ से लाल किला भी नजदीक था और जामा मस्जिद भी। आज 'विरासत' तो है, 'कहने के लिए', लेकिन 'हकीकत' में यह स्थान दिल्ली सल्तनत के आला लोगों के लिए, हिंदी-उर्दू-फ़ारसी या भारत के लगभग १२१ भाषाओँ के ज्ञाताओं के लिए, लेखकों, कवियों के लिए कितना 'महत्वपूर्ण' है, यह तो देखकर ही समझ सकते हैं, अगर वेदना और संवेदना की गहराई तक जा सकते हों।

वैसे भारत में साहित्य के क्षेत्र में आज भी दिग्गजों की किल्लत नहीं है, लेकिन उन लाखों दिग्गजों में ग़ालिब के बगल में सिर्फ और सिर्फ एक ही संभ्रांत अपने नाम के साथ बैठे हैं। साल १९३४ के जनवरी माह में आये ऐतिहासिक भूकंप के आठवें महीने में १८ अगस्त १९३४ को एक बच्चे का जन्म हुआ था। नामकरण के बाद सम्पूरण सिंह कालरा के नाम से प्रसिद्द हुआ। आज हिंदी सिनेमा जगत के प्रसिद्द गीतकार, कवि, पटकथा लेखक, निर्देशक, शायर के नाम से जाने जाते हैं। विश्व के लोग उन्हें गुलजार के नाम से जानते हैं।
भारत ऐसे देश में जहाँ १२१ भाषाओँ के लेखक, अभिभाजित और विभाजित भारत के करीब ६४९४८१ गावों से सम्बन्ध रखते हैं, साहित्य के पन्नों में स्वयं को दर्ज होने का दावा करते हैं, ग़ालिब की हवेली में नदारत हैं। राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र में दो दिवसीय साहित्य सम्मेलन का आयोजन सम्पूरण सिंह कालरा यानी गुलजार साहब के माथे की ही उपज है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में शायद यह पहला अवसर है जब राष्ट्रपति भवन में भारत के साहित्यकारों की अगुवाई करते गुलजार साहब कर्तव्य पथ के रास्ते विजय चौक को लांघते रायसीना पहाड़ तक ले गए हैं। इस साहित्य समागम से साहित्य को क्या मिलेगा यह तो आने वाले समय में स्वर और व्यंजन ही बता पायेगा। खैर।
पहली जनवरी को अंतर्राष्ट्रीय वैश्विक दिवस से लेकर 26 दिसंबर को केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल स्थापना दिवस तक साल के ३६५ दिनों में करीब १९१+ दिनों का अलंकरण महत्वपूर्ण दिवसों के रूप में अंकित है। इन ३६५ दिनों में ३५१ और ३५८ दिन ‘हिन्दी’ किसी दीवार से सटकर चुपचाप सहमी पड़ी होती है। अकस्मात् ७ दिन (हिन्दी सप्ताह) और १४ दिन (हिन्दी पखवाड़ा) के लिए ‘फूल-माला पहनाकर, सुसज्जित कर लोगबाग, अधिकारी, पदाधिकारी, मंत्री, संत्री उसे सामने की मेज पर बैठा देते हैं ‘दर्शनार्थ’ और फिर कहते भी नहीं थकते है ‘हिंदी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा।’

उसकी स्थिति कुछ वैसी ही होती है जैसे गणतंत्र दिवस पर मातृभूमि के लिए अपने प्राणों को अर्पित करने वाले गीतों का गाना-बजाना। भारत के लोग, शिक्षित, अशिक्षित सभी लोग बजाते हैं। मिथिला सहित, बिहार सहित, देश के सभी ७८७ जिलों, ६४९४८१ गाँवों में तो बजता ही है। बेचारी हिंदी। वैसे चाहे महिला (स्त्रीलिंग) सशक्तिकरण के बारे में लोगबाग, समाज, सरकार और व्यवस्था कितना भी ढ़ोल पिट लें, महिला जानती है समाज के संभ्रांत लोग, राजनेता, दबंग कितना सशक्त होने दिए हैं – उसी तरह जैसे गुड़ का मार धोकड़ा।
अंग्रेजी में ‘कॉन्सोनेंट’ और ‘वॉवेल’ तो नर्सरी के बच्चे भी जानते हैं परंतु क्या आपने कभी अपने बच्चों से पूछा है कि ‘हिन्दी’ को किस ‘लिपि’ में लिखा जाता है ? कभी आपने अपने बच्चों को यह बताया है कि हिन्दी को जिस लिपि में लिखा जाता है उसमें कितने ‘स्वर’ और कितने ‘व्यंजन’ होते हैं ? आपने कभी अपने बच्चों को पूछा है अथवा बताया है कि भारत में किस भाषा को भारतीय संविधान के तहत फक्र से ‘राजभाषा’ के रूप में स्वीकार किया गया है ? कभी आप यह जानने और अपने छोटे स्कुल जाते बच्चे-बच्चियों को, विशेषकर जिन्हें राजनीति शास्त्र पढ़ने में, भारत में प्रजातन्त्र के स्वरुप को जानने-समझने में उत्सुकता है, बताने में अपनी अभिरुचि दिखाये हैं कि भारत के संसद में किन-किन संसदीय कार्य के लिए ‘केवल हिन्दी का प्रयोग’; किन-किन कार्यों के लिए हिन्दी और अंग्रेजी, दोनों का प्रयोग निर्धारित है और यह भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद के तहत आवश्यक है ? या फिर, कभी आपने पूछा कि हम हिंदी दिवस क्यों मानते हैं? नहीं न ! वैसे मन करे तो अपने बच्चों से एक बार पूछिए जरूर कि हम ‘हिंदी दिवस क्यों मानते हैं? और किस दिन मनाते हैं?

एक ज़माने में हमारे बड़े-बुजुर्ग हिन्दी अथवा स्थानीय भाषा के समाचार-पत्र, पत्रिका हाथ में देकर कहते थे ‘इसे पढ़ो, जोर से पढ़ो’, ‘इसे देखकर लिखो, शब्दों और वाक्यों में शुद्धि पर विशेष ध्यान रखना’ – हम सभी ऐसा करते थे और हिन्दी भाषा बलबान थी, हम बलबान थे, सुदृढ़ थे । आज “हिन्दुस्तान में ही हिन्दी लंगड़ी, लुल्ही हो रही है। लेखक से लेकर समाज के लोग और सरकार की नजर में यह कोई अहमियत नहीं रख पा रही है – इसलिए बेचारी लुढकती चली जा रही है।
बहरहाल, स्वतंत्र भारत के इतिहास में शायद पहली बार राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र में दो दिवसीय साहित्य सम्मेलन का उद्घाटन किया। यह सम्मेलन ‘कितना बदल चुका है साहित्य?’ शीर्षक से आयोजित किया जा रहा है। इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि छात्र जीवन से ही उनमें साहित्य और साहित्यकारों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भावना रही है। समय के साथ साहित्य के प्रति विशेष सम्मान की यह भावना और भी गहरी हो गई है। उन्होंने इच्छा व्यक्त की कि राष्ट्रपति भवन में कई साहित्यकार आएं। उन्होंने इस सम्मेलन के आयोजन के लिए संस्कृति मंत्रालय और साहित्य अकादमी की सराहना की।

राष्ट्रपति ने कहा कि हमारे देश में अनेक भाषाएं हैं और साहित्यिक परंपराओं में असीम विविधता है। इस विविधता में भारतीयता की झलक महसूस होती है। भारतीयता की यह भावना हमारे देश के सामूहिक अवचेतन में भी गहराई से समायी हुई है। उन्होंने कहा कि वह देश की सभी भाषाओं और बोलियों को अपनी भाषा और बोली मानती हैं तथा सभी भाषाओं के साहित्य को अपना मानती हैं।राष्ट्रपति ने कहा कि बदलते परिवेश में स्थायी मानवीय मूल्यों की स्थापना ही कालजयी साहित्य की पहचान है। जैसे-जैसे समाज और सामाजिक संस्थाएं बदली हैं, चुनौतियां और प्राथमिकताएं बदली हैं, साहित्य में भी परिवर्तन देखा गया है। लेकिन साहित्य में कुछ ऐसा है जो सदियों बाद भी प्रासंगिक बना हुआ है। स्नेह और करुणा के साहित्यिक संदर्भ बदलते रहते हैं, लेकिन उनकी भावनात्मक पृष्ठभूमि नहीं बदलती। साहित्य से प्रेरणा लेकर मानवीय स्वप्न साकार होते हैं।

राष्ट्रपति का कहना है कि विद्यार्थी जीवन से ही मुझमें साहित्य और साहित्यकारों के प्रति आदर और कृतज्ञता का भाव रहा हहै। समय के साथ, साहित्य के प्रति विशेष सम्मान का यह भाव औरअधिक गहरा होता गया है।" साहित्यिक सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि मैं साहित्यकारों से मिलती रही हूँ। मेरी इच्छा थी कि राष्ट्रपति भवन में अनेक साहित्यकारों का आगमन हो। राष्ट्रपति ने कहा कि लगभग एक सौ चालीस करोड़ देशवासियों के हमारे विशाल परिवार में अनेक भाषाएं हैं और अनगिनत बोलियां हैं तथा साहित्यिक परम्पराओं की असीम विविधता हैं। लेकिन इस विविधता में भारतीयता का स्पंदन महसूस होता है। भारतीयता का स्पंदन महसूस होता है। भारतीयता का यही भाव हमारे देश के सामूहिक अवचेतन में भी रचा-बसा है। देश की सभी भाषाओं और बोलियों को मैं अपनी ही भाषा और बोली समझती हूँ और मानती हूं कि सभी भाषाओं का साहित्य मेरा साहित्य है।

उन्होंने कहा कि साहित्यकार का सत्य, इतिहासकार के तथ्य से अधिक प्रभावी सिद्ध हुआ है, क्योंकि वह जन-गण के जीवन-मूल्यों को व्यक्त करता है। मैं अपने विद्यार्थी-जीवन की एक बात आप सबके साथ साझा करना चाहती हूँ। भारत के सुप्रसिद्ध कथाकार, व्यास कवि फ़कीर मोहन सेनापति द्वारा लिखी गई 'रेवती' नामक अमर कहानी ने मेरे अन्तर्मन पर गहरा प्रभाव डाला था। यह कहानी उन्नीसवीं शताब्दी में लिखी गई थी। इस कहानी के ज़रिये नारी-शिक्षा के प्रति समाज में सकारात्मक सोच उत्पन्न का अमूल्य साहित्यिक प्रयास किया गया था। राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि परिवर्तनशील संदर्भों के बीच स्थाई मानवीय मूल्यों की स्थापना कालजयी साहित्य की पहचान होती है। जैसे-जैसे समाज और सामाजिक संस्थान बदले हैं, चुनौतियां और प्राथमिकताएं बदली हैं, वैसे-वैसे साहित्य में भी बदलाव देखे गए है। लेकिन साहित्य में कुछ ऐसा भी होता है जो सदियों बादभी प्रासंगिक बना रहता है। स्नेह और करुणा के साहित्यिक संदर्भ बदलते रहते हैं किन्तु उनकी भाव-भूमि नहीं बदलती।
साहित्य से प्रेरणा लेकर मनुष्य सपने देखता है और उन्हें साकार करता है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है: "मानबेर माझे आमि बांचिबारे चाइ" अर्थात 'मैं मानवता के बीच जीना चाहता हूँ।' भारतीय काव्य-जगत को समृद्ध करनेवाले प्रख्यात ओड़िआ कवि गंगाधर मेहेर ने लिखा है: 'मूँ जे अमृतसागर बिंदु' अर्थात् मैं तो अमृतसागर की एक बूंद हूं. वास्तव में जीवन-प्रवाह अविरल और अनंत है. धाराएं बदलती हैं, जल-तत्व वही रहता है. साहित्य हमें यही संदेश देता हैं। राष्ट्रपति मुर्मू के अनुसार 'आज का साहित्य उपदेशात्मक नहीं हो सकता। आज का साहित्य प्रवचन नहीं हो सकता। आज का साहित्य नीति-ग्रंथ नहीं हो सकता। आज का साहित्यकार सह-यात्री की तरह साथ-साथ चलता है, देखता है और दिखाता है; अनुभव करता है और कराता है और आशा करती हूं कि इस साहित्य सम्मिलन में वक्ताओं और प्रतिभागियों के बीच रचनात्मक संवाद स्थापित होगा।

आइये, इस सम्मलेन कक्ष से बाहर निकल कर हिंदी की वास्तविक स्थितियों से अवगत हों। आज भारत में प्रकाशित अधिकाँश हिन्दी समाचार-पत्रों/पत्रिकाओं में समाचार लिखने वाले पत्रकारों से लेकर, कहानी, राजनीतिक समीक्षा या टिपण्णी लिखने वाले लोग भी, अपने लेखन को पाठकों के सामने ऐसे ‘हिन्दी की टाँग तोड़कर, पट्टी बाँध कर’ परोसते हैं। आज तक भी उसी श्रेणी में हैं। लेखन की क्रिया में ‘अंग्रेजी भाषा का प्रयोग धरल्ले” से हो रही है। कहते हैं किसी राष्ट्र का समाचार पत्र / पत्रिकाएं उस राष्ट्र की भाषा को जीवित रखते हैं, भाषा की वजूदता बरक़रार रखते हुए उसे सुदृढ़ बनाते हैं ताकि आने वाली पीढ़ियों को अपनी भाषा पर गर्व हो, फक्र हो। ऐसा नहीं है कि पहले इन समाचार-पत्रों/पत्रिकाओं में लेखन की क्रिया में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग धड़ल्ले से होता था – प्रयोग ही नहीं होता था, क्योंकि लेखकों के पास ‘शब्दों’ का इतना अपार भण्डार था की ‘वाक्यों के विन्यास में एक शब्द ही संपूर्ण बातों को सामने रख देता था।
भारत में आज बच्चे कबीरदास, तुलसीदास, सूरदास, संत विदास, मीराबाई, रहीम, रसखान, भूषण, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बिहारी, भीष्म साहनी, महाबीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलि शरण गुप्त, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, सियाराम शरण गुप्त, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन ‘अज्ञेय’, मुंशी प्रेमचंद, सुभद्रा कुमारी चौहान, जैनेन्द्र कुमार, यशपाल, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, माखनलाल चतुर्वेदी, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, गया प्रसाद शुक्ल, महादेवी वर्मा, शरतचंद चट्टोपाध्याय, कमलेश्वर, फणीश्वरनाथ ‘रेणु’, गोपाल सिंह ‘नेपाली’, हरिवंश राय ‘बच्चन’, सोहन लाल द्विवेदी, नागार्जुन, सुमित्रानंदन पन्त, दुष्यंत कुमार, त्रिलोचन, भवानी प्रसाद मिश्र का नाम भी नहीं जानते होंगे, क्योंकि आज अधिकांश हिन्दी की किताबों में इनका नाम दीखता ही नहीं, या फिर बड़े-बुजुर्ग इन हिन्दी के हस्ताक्षरों के बारे में अपने बच्चों को बताने की जबाबदेही अपने कंधे से झटक दिए हैं।

भारत में हिन्दी की स्थिति चाहे सामाजिक दृष्टि से देखें, साहित्यिक दृष्टि से देखें, सांस्कृतिक दृष्टि से देखें, बोलचाल की दृष्टि से देखें या फिर आप जिस भी नजर से भी देखें “मरी” तो नहीं है, परंतु मुद्दत से मरणासन्न” होती चली जा रही है। कब दम तोड़ देगी, कहा नहीं जा सकता ! बिडम्बना यह है कि हिन्दी को, जिसे भारतीय संविधान के तहत राजभाषा का दर्जा प्राप्त है – अलग बात है की भारत के पंचायत से संसद तक होने वाले संपूर्ण कार्यों में, यहाँ तक की बोलचाल की भाषा में भी, हिन्दी का प्रयोग “अछूत” की तरह किया जाता है – सरकारी-स्तर पर प्रत्येक साल संपूर्ण देश के सरकारी, गैर-सरकारी, स्वायत्त और निजी संस्थानों में “हिन्दी सप्ताह, हिन्दी – पखवारा” मनाकर लोग-बाग़ अपनी हिन्दी, राजभाषा को नमन और श्रद्धांजलि अगले एक साल के लिए पुनः दे देते हैं। यानि, साल के ३६५ दिनों में ३५१ और ३५८ दिन ‘हिन्दी किसी दीवाल से सटकर चुपचाप पड़ी होती है और अकस्मात् ७ दिन (हिन्दी सप्ताह) और १४ दिन (हिन्दी पखवाड़ा) के लिए ‘फूल-माला पहनाकर, सुसज्जित कर सामने की मेज पर बैठा दी जाती है।
संसद में विचार व्यक्त करने के लिये आज भी धड़ल्ले से अंग्रेजी का प्रयोग हो रहा हो। हिन्दी के आवेदन पत्र पर अंग्रेजी में ही अपनी राय, विचार लिखने की परम्परा हावी हो गयी है । अंग्रेजी बोलने वालों को तेज तरार, बुद्धिमान एवं प्रतिष्ठित समझने एवं हिन्दी बोलने वालों को अनपढ़, गवार जानने के परम्परा हावी हो गयी । अंग्रेजी विद्यालय में बच्चों को शिक्षा के लिये भेजना शान शौकत बन चुका है , तो कैसे कोई कह सकता है, यह वही देश हैं जिस देश की 90 प्रतिशत जनता हिन्दी जानती समझती एवं बोलती है और जिस देश की राष्ट्रभाषा हिन्दी है।

राष्ट्रभाषा राष्ट्र की आत्मा होती है। जिसमें पूरा देश संवाद करता है। जिससे राष्ट्र की पहचान होती है । यह तभी संभव है जब हम सभी दोहरी मानसिकता को छोड़कर राष्ट्रभाषा हिन्दी को अपने जीवन में अपनाने की शपथ मन से लें। तभी सही मायने में हिन्दी का राष्ट्रीय स्वरूप उजागर हो सकेगा। हिन्दी के राष्ट्रीय स्वरुप उजागर होने की आज महत्ती आवश्यकता है। जिसमें देश की एकता अस्मिता समाहित है। वैसे हिन्दी भाषा की एक लंबी संघर्ष–यात्रा रही है। आज भी हिंदी से जुड़े अनेक यक्ष प्रश्नों का समाधान अपेक्षित है, जैसे– हिंदी भाषा की आज क्या स्थिति है? सूचना प्रौद्योगिकी की भाषा के रूप में हिंदी भाषा कितनी उपयुक्त है? देश में हिंदी भाषा का क्या स्थान है? अंतर्राष्ट्रीय फलक पर हिंदी का प्रसार संतोषजनक है अथवा नहीं? हिंदी में अनुवाद की क्या स्थिति है? हिंदी भाषा कहाँ और किस रूप में होनी चाहिए? हिंदी भाषा का साहित्यिक रूप कैसा हो? मीडिया की भाषा के रूप में हिंदी भाषा से क्या अपेक्षाएं हैं? संपर्क भाषा के रूप में तथा अध्ययन के माध्यम की भाषा के रूप में हिंदी भाषा के स्वरूप में क्या अंतर होना चाहिए? हिंदी भाषा के मानकीकरण को प्रभावी बनाने के लिए क्या प्रावधान होने चाहिए?
पिछले दिनों हिन्दी के एक लेखक एक जलेबी की दूकान पर गए। लेखक ने दुकानदार से कहा: “पाँच जलेवी देना भैय्या।” दुकानदार बोला: पन्द्रह रुपये देना। लेखक बहुत ही मायूसी के साथ दूकानदार को कहते हैं: मैं तो सिर्फ चार शब्द में याचना किया, और इन चार शब्दों को जब मैं लिखकर किसी पत्र-पत्रिका या कारपोरेट घरानों में हिंदी नहीं जानने वाले पैजामा का नारा पकडे अधिकारी को दूंगा, तो वे मुझे ३० पैसे प्रतिशब्द के हिसाब से (वह भी बहुत याचना के बाद) भुगतान करेंगे, यानी मुझे १ रुपये २० पैसे मिलेंगे। मैं इन पांच जलेबी के लिए पन्द्रह रुपये कहाँ से लाऊंगा ? दुकानदार लेखक की स्थिति को समझते हुए लेखक के हाथ में “एक पाव जलेवी” रखते कहता है: “तभी तो हिन्दी साहित्य की माँ – बहन हो रही है।

वह तो धन्यवाद दीजिये जिस समय रश्मिरथी, कुरुक्षेत्र, मधुशाला, अलंकार, आनन्द मठ, एक गधे की वापसी, गबन, गोदान, गोरा, निर्मला, कबुलीबाला, जीना तो पड़ेगा, अंधायुग, मुद्रा राक्षस उखड़े खम्बे आदि कहानियों, कविताओं की रचना की गई, उन दिनों भारतीय भाषाओँ में लेखक, लेखनी और शब्दों की कीमत थी । लेकिन आज आज़ादी के 75 वर्ष बाद, जबकि देश में अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है, भारतीय मुद्राओं का मोल अंतर्राष्ट्रीय बाजार में लुढ़का, बल्कि हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओँ के शब्दों की कीमत तो लुढ़की ही नहीं; लोगों ने तो उसे “चरित्रहीन” बना दिया नहीं तो आज अपने ही देश में, अपनी ही भाषा २० पैसे से ३० पैसे प्रतिशब्द कैसे बिकती। बाजार में क्रेताओं की संख्या तो भरमार है ही, लेखकों की तो बाढ़ से है – बारहो महीना, छतीसो दिवस। वैसी स्थिति में “मेरे प्यारे देश! देह या मन को नमन करूँ मैं ? किसको नमन करूँ मैं भारत ! किसको नमन करूँ मैं?

यदि देखा जाय तो हिंदी का गला घोटने का प्रयास आज़ादी के बाद से लगातार किया जाता रहा है। जिम्मेदार लोगों द्वारा, अंग्रेजी अनिवार्यता कई परीक्षाओं से लेकर योग्यता का एक अनुचित मापदंड आज भी बनी हुई है। भारतीय समाज में, ऐसे में हिंदी भाषा का जो भी उत्कर्ष हो सका हैं वो इसके अपने विशाल पाठक वर्ग व बड़ी आबादी की बोलचाल की भाषा होने से हो सका हैं जिसके मूल में कहीं न कहीं बाज़ारवादी मजबूरी भी हैं जिसमें ग्राहक की रुचि,भाषा आदि सर्वोपरी हैं! लेकिन बड़ा प्रश्न ये हैं कि हिन्दी लेखन को प्रोत्साहन देना आवश्यक हैं आर्थिक व जनजागरण दोनों स्तर पर क्योंकि हिंदी पत्र पत्रिकाओं में लेखन पर जो पारिश्रमिक दिया जा रहा हैं वो बेहद कम हैं। इससे न तो हिंदी बचेगी और ना ही लेखक। इतना ही नहीं, हिंदी भाषा प्रेमियों और मर्मज्ञों की उदासीनता के चलते भाषा की मूल आत्मा अपने स्वरूप को खो देगी, वैसे भी देवनागरी लिपि को आज हिंगलिश लिपि सोशल मीडिया के दौर में अतिक्रमण कर रही है।
राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र में दो दिवसीय साहित्य सम्मेलन का आयोजन सम्पूरण सिंह कालरा यानी गुलजार साहब के माथे की ही उपज है।
हिंदी के प्रबुद्धों का कहना है कि हिंदी वालों का सबसे ज्यादा शोषण किया हैं। हिंदी गुटबाजी से निकले तो कुछ हो, नए लोगों को कोई प्रोत्साहित करे तो कुछ हो। आजकल तो एक गुट नयी हिंदी का भी नारा लगाने लगी है, यहाँ भी बंटवारा! सबको मुफ्त में लिखने वाले चाहिए। हिंदी वाले केवल उसी को पैसा देते हैं जो पहले से ही समर्थ और समृद्ध या लोकप्रिय है। बेडा गर्क करके रखा है! लेकिन, उम्मीद है कि ये हालत बदलेंगे! हम तो प्रार्थना ही कर सकते हैं।
सुधीश पचौरी साहब, हिंदी साहित्यकार हैं, लिखते हैं: साहित्य क्या राजनीति से कम है? वहां जाति है, तो यहाँ भी जाती है। वहाँ धर्म है, तो यहाँ भी है। वहां विचारहीनता है, तो यहाॅ॑ भी है। वहां परिवारवाद है, तो यहाँ भी है। वहाॅ॑ ललित और दलित विमर्श है, तो यहाँ भी है। वहां स्त्री विमर्श है, तो यहाँ भी है। वहां सबका साथ, सबका विकास है, तो यहाँ भी है। वहां झूठ-सच है, तो यहां सचमुच का “झूठा-सच” है। इतना ही नहीं, अब तो अखिल भारतीय साहित्यकार मोर्चा भी बन गया है और नारा भी है ‘हर पुस्तक एक मशाल’ है। लेकिन उन्होंने यह भी लिखा कि “जब एक काव्यात्मक पंक्ति राजनीति को बदलने का दावा कर सकती है, तब साहित्य राजनीति को बदलने का दावा क्यों नहीं कर सकता?” इसलिए उन्होंने हरेक छोटे-बडे़, अच्छे-बुरे साहित्यकारों से अपील कर दिए, ‘आवहु मिलकर सब रोवहु भारत आई। हा हा! साहित्य की दुर्दशा न देखी जाई।’ आओ, सब मिलकर चुनाव लड़ो, जीतो और अपनी साहित्यिक सरकार बनाकर दिखा दो कि अब साहित्य ही है, जो समाज, जनतंत्र और आप सबकी रक्षा कर सकता है। यही सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा व स्वास्थ्य दे सकता है। राजनीति की बनाई सड़क टूट सकती है, घर फूट सकता है, लेकिन साहित्य में बनी सड़क न कभी टूटती है, न ही घर फूटता है।”
राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र में
वे आगे लिखित हैं: “बहुत हो लिया इस-उसके दस्तखत के नीचे अपने दस्तखत करना। माँ सरस्वती के वरद पुत्र-पुत्रियों, किस-किस के पिछलग्गू बने रहोगे और कब तक? ये एक्शन के दिन हैं। हे मेरे लेखक, अपने को देख। सब नेता भ्रष्ट और कलंकी। अकेला तू अभ्रष्ट और निष्कलंकी। तू होता भी कैसे? तुझे मौका ही नहीं मिला। एक मौका तो लेकर देख। तेरी सात पुश्तें तर जाएंगी। इसलिए अपनी पार्टी बना। चुनावों में कूद। टिकट दे। टिकट ले। सोच तो। न जाने कितने बजर बट्टू तेरी कविताओं की एक एक दो-दो लाइनें गलत-सलत सुना-सुनाकर गद्दीनशी हो गए। जब कबीर, सूर, तुलसी, रहीम, निराला, दिनकर, गालिब, फैज, दुष्यंत, राहत इंदौरी और नजीर बनारसी की दो-चार लाइनें जपकर मामूली नेता सत्ता तक पहुॅ॑च सकते हैं, तो तू क्यों नहीं पहुॅ॑च सकता?
बहुत रो चुका कि कविता नहीं छपती। कहानी नहीं छपती। राॅयल्टी नहीं मिलती। एक बार कमान हाथ में ले, फिर देख बड़े से बड़ा प्रकाशक तेरी ग्रंथावली छापने के लिए एक लाइन लगाएगा। नोबेल वाले हाथ जोड़े खड़े होंगे। साहित्य का नया युग आएगा। तभी वह राजनीति का चमचा बनने की जगह उसके आगे जलने व चलने वाली मशाल बन सकेगा। इसीलिए मैं ‘जाली नोट’ के गाने की तर्ज पर चेतातू हूॅ॑ कि हे कलम के धनी प्रतिभा पुंज, तू लुंज-पुंज मत बन। ‘छुरी बन कांटा बन ओ माई सन, सब कुछ बन किसी का चमचा नहीं बन!’
तस्वीरें: राष्ट्रपति भवन के आर्काइव से