गाज़ियाबाद : इधर इंदिरापुरम कालोनी के लिए गाज़ियाबाद नगर निगम का एक अलग क्षेत्र बनाने का निर्णय हुआ कि नहीं इंदिरापुरम के करीब साढ़े चार लाख आवादी के साथ-साथ गाजियाबाद के कुल 54 लाख निवासियों पर प्रशासन का नया करारोपण तलवार जैसा लटक गया है। तलवार की धार को काम करने के लिए गाजियाबाद नगर निगम के कई पार्षद अपनी आवाज को लखनऊ तक पहुँचाने के लिए तैयार हो रहे हैं। सं 1994 गठित निगम में कुल 100 पार्षद हैं जिसमें सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के कुल 66 और विपक्ष के 34 पार्षद है।
वैसे विगत वर्ष 18 जनवरी, 2024 को गाजियाबाद की मेयर सुनीता दयाल कहीं थी कि गाजियाबाद में हाउस टैक्स नहीं बढ़ाया जाएगा और मौजूदा दरें ही लागू रहेंगी। एक वर्ष बाद नए ढांचे की कर-व्यवस्था लागू हो गई, जिसमें करारोपण में चार से पांच गुना की वृद्धि हो गई है। यह बाद भी मेयर ही कही हैं। कहते हैं कि नए ढांचे के तहत कर लगाने का प्रस्ताव सबसे पहले 2022 में रखा गया था, लेकिन पार्षदों द्वारा समय-समय पर उठाई गई आपत्तियों के कारण इसे आज तक लागू नहीं किया जा सका है। संपत्ति कर में तीन घटक शामिल हैं - गृह कर, जल कर और सीवेज/जल निकासी कर।
सांख्यिकी के अनुसार शहर में करीब 4.80 लाख पुराने कर दाता हैं और अब तक दो लाख नई संपत्तियों की पहचान हुई है। नयी व्यवस्था के अनुसार सड़क की चौड़ाई के आधार पर डेढ़ गुना अधिक कर लगाया गया है।टैक्स वृद्धि डीएम सर्किल रेट से नहीं, बल्कि शासन के निर्देशानुसार हो रही है। वैसे गाजियाबाद में टैक्स दर 1.32 रुपये है, जो मेरठ (5.58 रुपये), मुरादाबाद (3.71 रुपये) और लखनऊ (2.60 रुपये) से कम है। वैसे विगत वर्ष की बैठक में डीएम सर्किल रेट के बराबर हाउस टैक्स बढ़ाने का प्रस्ताव दिए जाने और सुझाव मांगे गए थे। कहते हैं कि शहर में सर्किल रेट की गणना क्षेत्र में सड़क की चौड़ाई के आधार पर की जाती है। मौजूदा हाउस टैक्स 1.61 रुपये प्रति वर्ग फीट से लेकर 2.45 रुपये प्रति वर्ग फीट तक है, जबकि प्रस्तावित दर अधिकतम 4 रुपये प्रति वर्ग फीट है।
इंदिरापुरम के शिप्रा आवासीय कालोनी के ही श्रीमती श्रुति ठाकुर का कहना है कि "मध्यम वर्गीय गृहणी की नित्य दिन की शुरुआत एक नई चिंता के साथ होती है। कभी दूध के बढ़े दाम परेशान करते हैं, तो कभी स्कूल की फीस, कभी सब्जियों की महंगाई तो कभी बिजली-पानी का बिल। अब नगर निगम द्वारा अचानक बढ़ाया गया हाउस टैक्स, मानो मध्यम वर्ग की कमर तोड़ने ही आया हो ! मैं एक साधारण गृहिणी हूं ,मेरा जीवन घर के बजट को संतुलित रखने की लगातार कोशिश में बीतता है। हर महीने तय आय के अनुसार राशन, बच्चों की पढ़ाई, बड़ों की दवा और आने वाले त्योहारों की तैयारी सब कुछ समेटना होता है , लेकिन जब एक दिन डाक से आया हाउस टैक्स का बढ़ा हुआ नोटिस हाथ में आया, तो लगा जैसे किसी ने हमारे घर की छत ही उधेड़ दी हो !"
श्रीमती ठाकुर का कहना है कि "यह न सिर्फ़ एक आर्थिक झटका है, बल्कि मानसिक तनाव भी। यह नया कर मेरे जैसे हज़ारों परिवारों को अपनी बुनियादी ज़रूरतों में कटौती के लिए मजबूर कर रहा है। बच्चों की ट्यूशन कुछ समय के लिए रोकनी पड़ी, रसोई का सामान सस्ता करना पड़ा, और कई बार खुद की दवा भी टाल दी। मध्यम वर्ग न तो गरीब है कि उसे सरकारी योजनाओं की छाया मिले, और न ही अमीर कि वह किसी भी परिस्थिति को बिना असर झेले पार कर ले। वह हमेशा नीतियों के बीच की चक्की में पिसता है। सबसे ज़्यादा टैक्स वही देता है, बिना विरोध किए। नियमों का पालन सबसे पहले वही करता है, बिना सवाल पूछे , लेकिन जब बदले में उसे सिर्फ़ महंगाई, कर वृद्धि और उपेक्षा मिलती है, तो यह चुप्पी धीरे-धीरे आंतरिक घाव बन जाती है।"
शिप्रा आवासीय कालोनी के ही श्रीमती श्रुति ठाकुरउनके अनुसार, "सरकार और स्थानीय निकायों को यह समझना होगा कि राजस्व वृद्धि के नाम पर एक मेहनती और ईमानदार वर्ग पर निरंतर बोझ डालना नीतिगत असंतुलन है। विकास तभी सार्थक है जब उसमें समाज के हर वर्ग की हिस्सेदारी हो, और हर वर्ग को राहत मिले। बढ़ते हाउस टैक्स को लागू करने से पहले ज़मीनी हालात, महंगाई और आम नागरिक की आय को ध्यान में रखना ज़रूरी है। केवल कागज़ों पर बनाए गए आंकड़े घरों की रसोई का गणित बिगाड़ देते हैं और यह कोई आंकड़ा नहीं, एक सच्ची पीड़ा है। मध्यम वर्ग सरकार से राहत नहीं है।"
नगर निगम के सूत्रों के अनुसार 1963 करोड़ रुपये विकास के मद पर खर्च करने के लिए आँका गया है जो सड़क, नाला, पार्क, पेयजल आपूर्ति और प्रकाश व्यवस्था में सुधार पर खर्च होगी। सूत्रों के अनुसार, सड़कों की मरम्मत और सौंदर्यीकरण/निर्माण विभाग के कार्यों पर 194.40 करोड़ रूपये, पेयजल आपूर्ति सुधार, नलकूप मरम्मत, सीवर सुधार सम्बन्धी कार्यों के लिए जलकल विभाग को 139 करोड़ रुपये, पार्कों और सार्वजनिक स्थलों पर नई लाइटिंग व्यवस्था पर प्रकाश विभाग को 33 करोड़ रुपये, नालों की सफाई, कूड़ा निस्तारण, संक्रामक रोग रोकथाम के लिए स्वास्थ्य विभाग को 219 करोड़, पार्कों का सौंदर्यीकरण, हरियाली बढ़ाने के लिए कार्य के लिए उद्यान विभाग को 62 करोड़, शिक्षा, खेलकूद और पुस्तकालय के के रख-रखाव पर 7 करोड़ करोड़ रुपये, संपत्ति एवं प्रवर्तन विभाग को 23 करोड़ रूपये, विधि विभाग को 25 करोड़ और नजारत विभाग को 161 करोड़ रूपये का आवंटन किया गया है।

नगर आयुक्त विक्रमादित्य मलिक के अनुसार, "बोर्ड का निर्णय अब आगे की कार्रवाई और निर्देशों के लिए राज्य सरकार को भेजा जाएगा। हम इस संबंध में सरकार के निर्देशों पर काम करेंगे।" अधिकारियों ने कहा कि उन्होंने नए कर ढांचे के आधार पर नई (कर रहित) संपत्तियों पर कर बिल भेजना शुरू कर दिया है, जबकि सभी पुरानी संपत्तियां अगले चार वर्षों के भीतर स्वचालित रूप से इसके दायरे में आ जाएंगी। अधिकारियों ने कहा कि ऐसा इसलिए है क्योंकि सभी संपत्तियां हर चार साल में संशोधन की प्रक्रिया के अधीन हैं।
उधर, मेयर सुनीता दयाल के अनुसार, "नए ढांचे के अनुसार कर लगाने का मतलब है कि कर में लगभग 4-5 गुना वृद्धि होगी। मैं ऐसा नहीं होने दूंगी और इस मुद्दे से राज्य को फिर से अवगत कराऊंगी। अगर निगम को अधिक राजस्व उत्पन्न करना है, तो उन्हें मौजूदा संपत्तियों पर सही तरीके से कर लगाना चाहिए। कई निरीक्षणों के दौरान, मैंने पाया कि कुछ मॉल पर कम कर लगाया गया था और यह पिछले कई सालों से चल रहा है। इससे हमारे राजस्व में कमी आई है।" अब सवाल यह है कि नगर आयुक्त वनाम मेयर में जीत किसकी होती है, यह तो लखनऊ ही निर्धारित करेगा। लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि चुनाव की दृष्टि से लखनऊ इतना कड़ा रुख नहीं ले सकता।
नए कर ढांचे के तहत आवासीय कॉलोनियों को तीन श्रेणियों - ए, बी और सी में बांटा गया है। श्रेणी ए में प्रमुख और उच्च स्तरीय इलाके शामिल हैं; श्रेणी बी में कम विकसित इलाके शामिल हैं, जबकि श्रेणी सी में सबसे कम विकसित इलाके शामिल हैं। सूत्रों के अनुसार, गाजियाबाद नगर निगम ने प्रमुख सुधार पेश किए हैं, जिसमें वार्षिक संपत्ति कर में 4,000-5,000 रुपये की बढ़ोतरी, संशोधित वेंडिंग शुल्क और मोबाइल ऐप से जुड़ी एक स्मार्ट पार्किंग प्रणाली शामिल है। नई संपत्ति कर दरें सड़क की चौड़ाई और डीएम सर्किल दरों पर आधारित होंगी, जिसमें 24 मीटर से अधिक चौड़ी सड़कों पर संपत्तियों के लिए 4 रुपये प्रति वर्ग फीट की दर निर्धारित की गई है। एकीकृत पार्किंग प्रबंधन प्रणाली, वास्तविक समय में पार्किंग की उपलब्धता, स्तरीय मूल्य निर्धारण और उन्नत सुविधाएँ प्रदान करेगी। शहरी प्रबंधन को बढ़ाने के लिए ने दिल्ली, पुणे और बेंगलुरु के मॉडल का अनुसरण करते हुए निर्दिष्ट वेंडिंग ज़ोन भी पेश किए।
सूत्रों का कहना है कि नगर निगम ने राजस्व सृजन में सुधार और शहर प्रबंधन को बढ़ाने के उद्देश्य से कई नए उपाय शुरू किए हैं। इन पहलों में संपत्ति कर दरों में बदलाव, एक नई वेंडिंग शुल्क संरचना का कार्यान्वयन और मोबाइल एप्लिकेशन से जुड़ी एक आधुनिक पार्किंग प्रणाली की शुरुआत शामिल है। प्रमुख प्रस्तावों में से एक संपत्ति कर दर में औसतन 4,000 रुपये से 5,000 रुपये की वार्षिक वृद्धि है, जो जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) सर्किल दर के साथ संरेखित होगी, न्यूनतम मूल्य जिस पर एक संपत्ति बेची या हस्तांतरित की जा सकती है। संशोधित कर दरें सड़क की चौड़ाई और स्थान जैसे कारकों पर निर्भर करेंगी। उदाहरण के लिए, 24 मीटर या उससे अधिक चौड़ाई वाली सड़कों पर स्थित संपत्तियों पर 4 रुपये प्रति वर्ग फुट की दर से कर लगाया जाएगा, जबकि 12 मीटर और 24 मीटर चौड़ी सड़कों पर स्थित संपत्तियों पर 3.20 रुपये प्रति वर्ग फुट की दर से कर लगाया जाएगा। इस परिवर्तन का उद्देश्य संपत्तियों के बाजार मूल्य को बेहतर ढंग से दर्शाना है, जिसमें डीएम सर्किल दर संपत्ति कर का आकलन करने में एक प्रमुख निर्धारक के रूप में कार्य करेगी।
मेयर सुनीता दयालनिगम एकीकृत पार्किंग प्रबंधन प्रणाली (आईपीएमएस) के कार्यान्वयन को भी मंजूरी दी। इस प्रणाली में मोबाइल एप्लीकेशन से जुड़ा एक एकीकृत नियंत्रण कक्ष शामिल होगा, जिससे निवासियों को वास्तविक समय में पार्किंग स्थलों पर लोगों की संख्या की जांच करने की सुविधा मिलेगी। पार्किंग स्थलों में कई उन्नत सुविधाएं होंगी, जिनमें प्रवेश और निकास बिंदुओं पर चमकते संकेत, गुलाबी शौचालय, अग्निशमन प्रणाली, सीसीटीवी कैमरे और पावर बैकअप शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, पार्किंग प्रणाली में अलग-अलग मूल्य निर्धारण शुरू किया जाएगा: तीन पहिया वाहनों के लिए पहले दो घंटों के लिए 40 रुपये, प्रत्येक अतिरिक्त दो घंटों के लिए 20 रुपये और भारी वाहनों के लिए पहले दो घंटों के लिए 80 रुपये, प्रत्येक अगले दो घंटों के लिए 40 रुपये।
इंदिरापुरम के शिप्रा रिवेरा आवासीय कालोनी में रहने वाली श्रीमती पूनम बंसल का कहना है कि 'इंदिरापुरम टैक्स देने में कभी भी पीछे नहीं रहा है अगर आप सरकारी अधिकारियों से पूछेंगे तो उनका कहना होगा कि चाहे बिजली बिल या हाउस टैक्स हो या अन्य टैक्स इंदिरापुरम क्षेत्र उन्हें फर्टाइल क्षेत्र नजर आता है। लेकिन जितना इंदिरापुरम के लोगों ने टैक्स दिया है उनको सुविधा नहीं दी गई है क्योंकि यह शहर नया बसा था इसलिए 20 से 25 साल तो यह काम चल गया, लेकिन अब वह व्यवस्थाएं इतनी ध्वस्त हो चुकी है कि उनको तत्काल प्रभाव से मरम्मत करने की जरूरत है, हमारी मांग है कि पहले हमें सुविधा दी जाए उसके बाद हम टैक्स देंगे।
श्रीमती बंसल के अनुसार, "अधिकारियों का कहना है कि सर्किल रेट के हिसाब से टैक्स लगता है भाई सर्किल रेट के हिसाब से सुविधा भी तो दी जाती हैं अगर आप सर्किल रेट के हिसाब से टैक्स ले रहे हैं तो यहां सुविधा भी आपको इस प्रकार से देनी होगी। इंदिरापुरम का सीवर सिस्टम पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है। रेन ड्रेन सिस्टम पूरी तरीके से बैठ चुका है। हर जगह अतिक्रमण का बोलबाला है। सड़के या तो बनी नहीं है या उन पर सिर्फ फौरी तौर पर मरम्मत करके दिखा दी गई है। इंदिरापुरम की शान कहे जाने वाली स्वर्ण जयंती पार्क या अवंतिका बाई पार्क आज जर्जर हालत में है। उन पेड़ों को पानी और खाद चाहिए जिन सूखे पेड़ों पर कलर करके आप वहां हरियाली दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। पूरे इंदिरापुरम में कहीं भी घूम कर देख लीजिए गंदगी का आलम है हर जगह गंदगी के ढेर लगे हुए हैं यह तो अब तक लोगों का गुस्सा इसलिए नहीं फूटा है क्योंकि यहां ज्यादातर गेटेड सोसायटी हैं जो की गेट के अंदर अपनी सुविधाओं को चुस्त दुरुस्त रखती हैं वह भी अपने खर्चे पर उनमें नगर निगम, या जीडीए का कोई हाथ नहीं है।"

श्रीमती बंसल का मानना है कि "ऐसा तो नहीं है कि आपने अब तक टैक्स नहीं बढ़ाया था हर साल आप 10% वैसे भी बढ़ा रहे थे सीवर टैक्स आपने एक ही बार में 10 साल का हम लोगों से इकट्ठा लिया है उसके बाद हर साल आप उसमें 10% की वृद्धि करते रहे हैं और हम लोग लगातार दे रहे हैं फिर एकदम से 4 से 5 गुना वृद्धि करने का मतलब क्या है जिस तरह से हर साल आप बड़ा रहे थे उसी तरीके से बढ़ाइये। शायद अधिकारियों को यह लग रहा है कि यहां से लोग आसानी से दे देते हैं यहां के लोग विरोध नहीं करते हैं इसलिए उनको लग रहा है कि हम जो करेंगे वह लोग आसानी से मान जायेंगे। अभी एक नया ड्रामा और शुरू किया है पहले हम टैक्स देते थे बाद में जैसे अभी हमने टैक्स दिया 2024 से 2025 का अभी क्या हुआ है की एडवांस में टैक्स भेज दिया गया है जो कि सरासर गलत है क्योंकि उनको लग रहा है कि यहां अंधा कानून चल रहा है, कोई कहने वाला नहीं कोई पूछने वाला नहीं - हम इस कार्रवाई का विरोध करते हैं।
स्ट्रीट वेंडिंग के क्षेत्र में, जीएमसी ने एक नई वेंडिंग शुल्क प्रणाली प्रस्तावित की है, जिसमें विक्रेताओं के लिए निर्दिष्ट क्षेत्रों का निर्माण शामिल है। इन क्षेत्रों को पीली रेखाओं से चिह्नित किया जाएगा, और विक्रेताओं को इन रेखाओं से आगे काम करने की अनुमति नहीं होगी। इस कदम का उद्देश्य वेंडिंग संचालन को सुव्यवस्थित करना है, यह सुनिश्चित करना है कि विक्रेताओं को उचित रूप से विनियमित किया जाए और साथ ही सार्वजनिक स्थानों पर व्यवस्था बनाए रखी जाए। अतीत में, दिल्ली जैसे शहरों में ऐसे उपाय लागू किए गए हैं, जहाँ नगर निगम ने भीड़भाड़ को कम करने और सार्वजनिक व्यवस्था में सुधार करने के लिए स्ट्रीट वेंडिंग को इसी तरह विनियमित किया है।
यदि किसी का घर अधिक पुराना है तो उसे टैक्स से ज्यादा छूट मिल रहा है। यह छूट अधिकतम 61 फीसदी तक हो सकती है। यदि कोई 10 साल पुराने घर में रह रहा है तो उसके सालाना बिल में 25 फीसदी की रियायत दी जाएगी। 10 से 20 साल पुराने घर के मामले में यह डिस्काउंट 32.5 फीसदी तक होगी। 20 से 40 साल पुराने घर के मामले में यह छूट 40 फीसदी तक है। यदि कोई 31 जुलाई तक हाउस टैक्स जमा करवाता है तो उसे 20 फीसदी की और छूट दी जाएगी। ऑनलाइन जमा करवाने पर यह छूट 1 फीसदी और बढ़ जाएगी। इस हिसाब से अधिकतम एक करदाता को 61 फीसदी तक छूट मिल सकती है। वहीं, न्यूनतम यह छूट 46 फीसदी तक रहेगी।

कहते हैं कि पहले निगम कवर्ड एरिया पर हाउस टैक्स की वसूली करता था। अब कारपेट एरिया पर हाउस टैक्स की वसूली की जाएगी। कवर्ड एरिया कारपेट एरिया से थोड़ा बड़ा होता है। बताया जा रहा है कि आवासीय क्षेत्रों में कारपेट एरिया से ही हाउस टैक्स वसूलने का नियम है। निगम अब तक पब्लिक से कवर्ड एरिया से हाउस टैक्स की वसूली कर रहा था। इतना ही नहीं, पहले जिन लोगों का घर सर्विस रोड पर होता था। वह 12 मीटर सड़क के दायरे में आते हुए उसके हिसाब से हाउस टैक्स देते थे, लेकिन निगम ने सड़क की चौड़ाई को लेकर नए नियम तय किए हैं। इसमें किसी घर से मुख्य सड़क, फुटपाथ, डिवाइडर, सेंट्रल वर्ज, ग्रीन बेल्ट, पार्किंग स्थान, सर्विस रोड और नाला-नाली को सड़क की चौड़ाई में शामिल कर लिया है।
इस नए नियम के तहत अब शहर के अधिकांश घर 24 मीटर से अधिक चौड़ाई वाली सड़क के दायरे में आ जाएंगे। ऐसे में इन घरों में रहने वाले लोगों को नए नियम के हिसाब से टैक्स देना होगा। इसका सबसे अधिक असर कविनगर, शास्त्रीनगर, लोहियानगर, राजनगर, संजयनगर, गोविंदपुरम, स्वर्णजयंतीपुरम के अलावा ट्रांस हिंडन एरिया के अधिकांश घरों के हाउस टैक्स पर देखने को मिलेगा। इतना ही नहीं, सड़क के किनारे दुकान चलाने वाले लोगों के लिए निगम ने वेंडिंग शुल्क का रेट तय कर दिया है। इनके रजिस्ट्रेशन के लिए 200 रुपये लिए जाएंगे। एक स्थान पर खड़े होकर रेहड़ी लगाने वालों से 600 रुपये प्रतिमाह लिया जाएगा। जबकि मोबाइल ठेले वालों से 300 रुपये प्रति माह लिया जाएगा, लेकिन इन्हें पहचान पत्र के लिए 40 रुपये का भुगतान करना होगा। वहीं, साप्ताहिक बाजार लगाने वाले दुकानदारों से यूजर चार्ज लिए जाने का फैसला हुआ है। इसमें जो मोबाइल ठेले से 200 रुपये प्रतिमाह लिया जाएगा। जबकि एक जगह खड़े होकर ठेला लगाने वालों से 50 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से वसूला जाएगा।
बहरहाल, गाजियाबाद स्थित सैकड़ों ग्रुप हाऊसिंग सोसाइटी के साथ-साथ जिले के पार्षदों द्वारा नए कर नीति के विरोध में आंदोलन तेज हो रहा है। विगत दिनों 50 से अधिक पार्षद एकजुट होकर नगर निगम कार्यालय पहुंचे और प्रशासन के निर्णय को तानाशाही बताया। लोगों ने आरोप लगाया कि जनता पर बिना चर्चा के अतिरिक्त टैक्स लगाना उचित नहीं है। पार्षदों ने नगर निगम प्रशासन पर मनमानी का आरोप लगाया है। पार्षदों की प्रमुख मांग है कि इस मुद्दे पर तत्काल विशेष सदन की बैठक बुलाई जाए। साथ ही, टैक्स वृद्धि पर पुनर्विचार किया जाए।
बहरहाल, नए कर प्रणाली के विरोध में गाजियाबाद नगर निगम के आयुक्त को स्थानीय लोगों के द्वारा हज़ारों-हज़ार पत्र प्रेषित किये जा रहे हैं। अजित कुमार का कहना है कि "हाल ही में नगर निगम द्वारा हाउस टैक्स में की गई एकतरफा और अत्यधिक वृद्धि से हम मध्यम वर्गीय नागरिकों पर गहरा आर्थिक बोझ पड़ा है। यह निर्णय न केवल अनुचित है, बल्कि वर्तमान आर्थिक परिस्थिति में संवेदनहीन भी प्रतीत होता है। मध्यम वर्ग पहले से ही बढ़ती महंगाई, बच्चों की शिक्षा, चिकित्सा, और दैनिक आवश्यकताओं के बीच आर्थिक संतुलन बनाए रखने के लिए संघर्षरत है। ऐसे में हाउस टैक्स में इस तरह की बिना विचार-विमर्श की गई वृद्धि एक और आर्थिक आघात जैसा है।"

उनका कहना है कि "नगर निगम द्वारा टैक्स तो लिया जा रहा है, लेकिन सुविधाओं के नाम पर ज़मीन पर कुछ भी ठोस दिखाई नहीं देता। हमारी सोसाइटी को अपने स्तर पर ही सफाई, जल निकासी, सुरक्षा, स्ट्रीट लाइट, कूड़ा प्रबंधन जैसी मूलभूत आवश्यक सेवाएं स्वयं उपलब्ध करानी पड़ती हैं। इन सभी सुविधाओं पर हर वर्ष लगभग ₹10,000 तक का खर्च प्रति परिवार वहन करना पड़ता है। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि जब नागरिक अपनी आवश्यकताएं खुद पूरी कर रहे हैं, तो नगर निगम की ओर से किस सेवा के बदले में यह हाउस टैक्स वसूला जा रहा है? और यदि सुविधाएं नहीं मिल रही हैं, तो क्या यह टैक्स केवल राजस्व संग्रहण का माध्यम बनकर रह गया है?"
वे लिखते हैं कि "हमें यह भी खेद है कि हर बार नीतियों का सबसे अधिक और सीधा असर केवल मध्यम वर्ग पर ही क्यों पड़ता है। न हमें कोई सरकारी सब्सिडी मिलती है, न ही हमारे पास काले धन की ताकत होती है। फिर भी हर नई नीति की मार हम पर ही पड़ती है। आपसे आग्रह है कि हाउस टैक्स में की गई इस वृद्धि को वापस लिया जाए या पुनः मूल्यांकन कर न्यायसंगत और व्यावहारिक दरें तय की जाएं। साथ ही, नागरिकों को उन मूलभूत सेवाओं की पारदर्शी जानकारी दी जाए, जिन्हें नगर निगम इस टैक्स के बदले उपलब्ध करा रहा है।"
