आज 18 वीं लोकसभा के लिए छठे चरण का चुनाव हो रहा है। धनबाद संसदीय क्षेत्र में भी आज ही चुनाव है अपने जनप्रतिनिधि के चयन के लिए। यह अलग बात है कि विगत कई दशकों से कोई भी प्रतिनिधि अपने संसदीय क्षेत्र के विकास के लिए एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाये। अगर बढे तो विधायक, सांसद और मंत्री बनने के लिए ताकि भ्रष्टाचार के रास्ते लक्ष्मीजी का आगमन होता रहे बिना किसी व्यवधान के। यह बात सिर्फ धनबाद संसदीय क्षेत्र के लिए ही नहीं, बल्कि भारत के कुल 543 संसदीय क्षेत्रों पर लागू होता है। किस सांसद, विधायक और मंत्री सही मामले में अपने-अपने मतदाताओं के उत्थान के लिए कार्य किये, यह तो उनकी आत्मा ही जानती है - चाहे वे जीवित हों अथवा शरीर से मृत्यु को प्राप्त कर लिए हों, क्योंकि 'आत्मा तो अमर' है।
आइए आगे बढ़ते हैं इस कोठी की ओर आते हैं जिसने मुझ जैसा अदना सा अखबारवाला को पत्रकार बनाया और अखबारवाला001 ने नाम से विख्यात कर रहा है कोई साढ़े तीन दशक बाद। इस कोठी से ३६ का नाता नहीं बल्कि ६३ का रिस्ता रहा, उन दिनों भी और आज भी। जो धनबाद के लोग होंगे शायद इस स्थान से परिचित होंगे। धनबाद रेलवे स्टेशन से हीरापुर के रास्ते कोयलानगर जाने वाली सड़क जब धनबाद समाहरणालय के सामने से हीरापुर चौराहे से आगे इण्डियन स्कूल ऑफ़ माइंस की ओर निकलती थी, हीरापुर चौराहे से कोई पच्चीस कदम आगे बाएं हाथ एक रास्ता पुलिस अधीक्षक के आवास की ओर जाता था। इस बायीं जाती सड़क के नुक्कड़ पर हीरापुर बिजली कार्यालय था। हीरापुर चौराहे से दाहिने हाथ एक रास्ता श्री बिनोद बिहारी महतो के बाजार (धनबाद बुक स्टोर्स) की ओर और बाएं लुबी सर्कुलर रोड निकलता था। लुबी सर्कुलर रोड पर भी महिलाओं का एक महाविद्यालय था (आज भी होगा) एसएसएलएनटी महिला महाविद्यालय के नाम से ।
इस महाविद्यालय के सामने ही जिले के दूसरे नागरिक, यानी पुलिस कप्तान का घर था। यही रास्ता आगे शहर के पहले नागरिक उपायुक्त के आवास की ओर जाता था। लुबी सर्कुलर रोड जब चौराहे से आगे दाहिने निकलता था, बाएं हाथ एक विशाल खेतहुआ करता था सड़क के नीचे लुढ़कते इलाके में। इस परिसर में जो भी महानुभाव रहते थे, सब्जियां खूब उपजाते थे। अक्टूबर महीने के शुरूआती दिनों से मार्च-अप्रैल तक इस खेत में आलू, बैंगन, गोभी, टमाटर, पालक साग, सेम, मूली, परवल और न जाने कई प्रकार की सब्जियां उपजती थी। सब्जी उपजाने का कुछ पाठ यहीं सीखा था चाहे मिट्टी गमले के बराबर ही क्यों न हो। क्योंकि मुझे अपनी आर्थिक औकात हमेशा पता होता था कि हम खेत नहीं खरीद सकते हैं।
यहाँ से जो रास्ता बिजली कार्यालय से आगे एसएसएलएनटी महिला महाविद्यालय की ओर निकलता था, बाएं हाथ तो बिजली कार्यालय था, लेकिन दाहिने हाथ कोने पर धनबाद जिला के एक न्यायाधीश का आवास था। उनके आवास के बाद विशाल क्षेत्र में स्थित आवास में रहते थे जिले के तत्कालीन वरिष्ठ उप समाहर्ता श्री सूर्य नारायण मिश्र साहब। यह कोठी उन्हीं के नाम से धनबाद समाहरणालय के दस्तावेज पर आवंटित था - जब तक सेवा में हैं। मिश्रा साहब की लम्बाई भले पांच फीट सात इंच थी, वे जमीन के अंदर सत्तर फीट और जमीन के ऊपर 700 फीट पकड़ रखने वाले अधिकारी थे, जहाँ तक ईमानदारी का सवाल था । धनबाद जैसे शहर में जहाँ उन दिनों कोयला माफियाओं का वर्चस्व थे और जिले के आला अधिकारी की फटती थी, श्री मिश्रा साहब का नाम सुनकर कोयला माफिया भी शांत हो जाते थे। सभी जानते थे कि इस अधिकारी का चरित्र कोयला क्षेत्र में रहने के बाद भी दूध जैसा सफ़ेद है - बेदाग़ ।
साठ के दशक के उत्तरार्ध जब पटना की सड़कों पर पटना से प्रकाशित अख़बारों - आर्यावर्त, इण्डियन नेशन, सर्चलाइट, प्रदीप, कौमी आवाज - बेचा करता था, उन दिनों अख़बारों के पन्नों पर दक्षिण बिहार के कोयला माफियाओं की ख़बरें प्रमुखता के साथ प्रकाशित होती थी। ख़बरों की शीर्षकों को पढ़कर तत्कालीन माफिआओं के नामों से वाकिफ हो गए थे। मैं नहीं जातना था की एक दिन कोयलांचल के कतरास, भूली, झरिया आदि क्षेत्रों में पालथी मारकर मैं भी वहां की रक्तरंजित मिट्टियों की कथा-व्यथा सुनेंगे, चश्मदीद गवाह बनेंगे। उधर विदेशी मौद्रिक बाजार में भारतीय रुपये का मोल बढ़ रहा था, इधर कोयलांचल में कोयले की नजर लगे लोगों की जिंदगी सस्ती होती जा रही थी – ठांये ठांये ठांये।
मैं जब धनबाद आया तो प्रारम्भ के एक महीने अपने एक सम्बधी भद्रु भाई (श्री भद्रनाथ मिश्र) के पास रहा। यहाँ से तेलीपाड़ा स्थित एक कमरे के मकान में किराया पर पहुंचा। लिखने की तीव्रता जैसे-जैसे बढ़ने लगी, मालिक मकान व्याकुल होने लगे कहीं ठांय - ठांय न हो जाय माफिया द्वारा। मकान छोड़ने की सूचना जारी हो गयी। तभी श्री सूर्यनारायण मिश्र 'सूर्य' जैसा अवतरित हुए और बेहिचक कहे: "मैं अपने पूरे परिवार के साथ इतने-लम्बे-चौड़े ब्रितानिया सरकार के कालखंड में बने दो कमरे की कोठी में रहता हूँ। मेरे पास गाड़ी-घोड़ा नहीं है। अतः गाड़ी रखने के स्थान के बगल में एक कमरा है। कमरा गुल्लड़ के पेड़ के नीचे है। पकने पर गुल्लड़ देर रात भी ढिशुम-ढिशुम कमरे के ऊपर एस्बेस्टस पर गिरता है। अगर कोई दिक्कत नहीं हो तो उस कार के स्थान पर पत्रकार रह सकता है। और दूसरे दिन उनके दोनों पुत्रों के सहयोग से सफाई का कार्य संपन्न हुआ। उन दिनों 'स्वच्छ भारत अभियान' नहीं चला था। हम सभी स्वयं शौचालय भी साफ़ करते थे। शौचालय का कॉर्पोरेटाइजेशन भी नहीं हुआ था। फिर टंग गया एक बोर्ड 'यहाँ कार नहीं - पत्रकार रहता है," और खुले मैदान के कोने पर पीपल वृक्ष के मोटे टहनी पर ठुक गया The Telegraph, Calcutta का बोर्ड।
धनबाद क्षेत्र में उन दिनों कलकत्ता से प्रकाशित आनंद बाजार पत्रिका, The Telegraph, वर्तमान, आदि अख़बारों का बहुत महत्व था। उन अख़बारों में लिखने वाले भी महत्वहीन नहीं थे। क्या अधिकारी, क्या पदाधिकारी सभी बहुत सम्मान करते थे। समयांतराल, सम्पूर्ण खुले इलाके को दीवारों से घेरा गया। प्रवेश द्वार भी लगा और अंदर साग-सब्जियों की खेती। उस रास्ते महाविद्यालय की ओर जाने वाली महिलाओं के सम्मानार्थ 'गेंदा', 'गुलाब' और ने सामायिक फूलों की खेती शुरू हुई। इस तस्वीर में आप जो मुख्य कोठी देख रहे हैं उसके बाएं हाथ पीछे ही गाड़ी रखने वाले स्थान के बगल में एक कमरा था जो इस पत्रकार के लिए राष्ट्रपति भवन जैसा महत्व रखता था। उस कमरे के सामने आँगन जैसा स्थान था जिसमें पगडण्डी राह छोड़कर दोनों तरफ देशी-विदेशी गुलाबों का सेज था। गजब की दुनिया थी वह। साल अस्सी के दशक का उत्तरार्ध था। आठवीं लोक सभा का कालखंड आधा समाप्त हो गया था और नवमी लोकसभा चुनाव का दश्तक दे दिया था। नवमी लोकसभा चुनाव के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर देश का कमान संभाले थे। आज अठारहवीं लोकसभा का छठे चरण का चुनाव हो रहा है।

धनबाद कालखंड के दौरान यह कमरा और इस कमरे में बैठकर लिखी कहानियां, जो बाद में धनबाद डाकघर से दूरभाष/टेलीप्रिंटर/टेलेक्स के माध्यम से कलकत्ता के दी टेलीग्राफ पत्र और फिर बाद में संडे पत्रिका के कार्यालय में पहुंचा मुझे अपनी पहचान बनाने में अहम् भूमिका अदा की। कल जब यह तस्वीर मिली तो इस कमरे में लिखी बातें, कहानियां, घटनाएं दोहराने से रुक नहीं सका। खासकर कोयलांचल का माफिया युद्द, रक्तरंजित मिट्टी, ठगते अधिकारी/मंत्री, ठगाते मतदाता, प्राण देते माफिया के अनुयायी - इत्यादि-इत्यादि।
उस दिन कुण्डी में कागज का एक टुकड़ा लगा था। मैं सुवह कोई तीन बजे घर से निकलकर झरिया पहुंचा था। विधान सभा चुनाव का घोषणा हो चुका था। बिहार और झारखंड का विभाजन नहीं हुआ था। धनबाद लोक सभा क्षेत्र में छह विधानसभा क्षेत्र – सिंदरी, निरसा, धनबाद, झरिआ, टुंडी और बाघमारा – उन दिनों भी थे। लेकिन आज की तरह उन दिनों भी झरिया विधानसभा क्षेत्र राजनीति में बहुत महत्वपूर्ण था। शेष विधान सभा के विजय नेता भी अन्य विधायकों की श्रेणी में पंक्तिबद्ध हो जाते थे, या फिर झरिया के विधायक बाबू सूर्यदेव सिंह के सामने टकटकी निगाहों से आँखों-आँखों से ‘मदद’ की गुहार करते रहते थे।
यह अलग बात है कि सं 1990 चुनाव के बाद न केवल भारतीय राजनीति में, बल्कि धनबाद के सरायढ़ेला स्थित भारत के 11 वें प्रधान मंत्री चंद्रशेखर (अब दिवंगत) के अनन्य मित्र बाबू सूर्यदेव सिंह के आवास सिंह मैंशन में भी जो परिवर्तन हुए, उसे मानवीय-मापदंड पर तो नहीं मापा जा सकता है। पारिवारिक, न्यायिक और अन्य मापदंडों पर मापने का कार्य तो जारी है, लेकिन समय के साथ साथ रक्तों के रंग भी बदलने लेंगे हैं। चुनाव के दौरान न केवल भारत, बल्कि विश्व की मिडिया अपने-अपने दिल्ली, कलकत्ता के संवाददाताओं के माध्यम से धनबाद-झरिया कोल बेल्ट में चहलकदमी करते दीखते थे।
उन अख़बारों में प्रकाशित होने वाली हज़ार शब्द की कहानियों में सिंदरी, निरसा, धनबाद, टुंडी और बाघमारा विधान सभा क्षेत्रों के बारे में एक अथवा दो पैरा लिखा जाता था, जबकि झरिया के उम्मीवार बाबू सूर्यदेव सिंह कैसे चलते हैं, कैसे बैठते हैं, किस हाथ से अपने धोती का खूंट पकड़ते हैं, कहाँ भाषण देते अपने कुर्ता को ऊपर चढ़ाते हैं, शब्दों में कहाँ मतदाताओं से विनती होता है, कहाँ आदेश होता है, कहाँ भय दिखाया जाता है, कहाँ प्रेम दिखाया जाता है – पत्रकार बंधू बांधव बहुत तन्मयता के साथ शब्दों के साथ खेलते थे।
अभी अपरान्ह के चार बज गए थे। मैं अपने दरवाजे पर दस्तक दे दिया था। जंजीर में लटके कागज का टुकड़ा खोला। उसमें लिखे शब्दों को देखकर स्वयं पर हंसी भी आ रही थी और गौरवान्वित भी महसूस कर रहा था। कागज के टुकड़े के लेखक थे कलकत्ता से प्रकाशित दी टेलीग्राफ समाचार पत्र के सहायक संपादक सौमित्र बनर्जी यानी बॉबीदा। वे मेरे ‘अहंकार-रहित बॉस’ थे। आम तौर पर उस ज़माने में आनंद बाजार पत्रिका समूह में कार्य करने वाले, खासकर दी टेलीग्राफ और संडे पत्रिका के पत्रकार सहकर्मी मुझे बहुत पसंद करते थे, क्योंकि वे मेरे शब्दों को पढ़ते थे।
बॉबी दादा उस पुर्जी में लिखे थे: “वे आज दोपहर कलकत्ता से आये हैं। आने के बाद सूर्यदेव को फोन किए। सूर्यदेव सिंह के चुनाव प्रचार-प्रसार में उनके साथ रहकर कवर करना चाहते हैं । चार-पांच कहानियां करनी है। शायद पूरा पन्ना भी छपे। वे बैंक मोड़ स्थित पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री दरबारा सिंह के पुत्र के होटल स्काई लार्क में रुके हैं। सूर्यदेव सिंह का कहना था कि वे मेरे बिना बात नहीं करेंगे। साथ ही, चुनाब प्रचार-प्रसार में मेरी उपस्थिति अनिवार्य है। मैं अपने अख़बार के संपादक के इन शब्दों को पढ़कर हैरान हो गया। सोचा एक संपादक अपने हाथ से इन शब्दों के द्वारा एक छोटा सा रिपोर्टर को कितना महत्व दे रहा है। फिर सोचा इसमें हैरानी की क्या बात क्या है ? आखिर अखबार भी तो दी टेलीग्राफ है – सच लिखने में कोई कोताही न उन दिनों करता था और आ ही आज।
तभी गुल्लर के पेड़ के नीचे स्थित हमारे आऊट हॉउस के सामने दो गाड़ियां रुकी। यह आवास धनबाद के एक एडीएम श्री सूर्यनारायण मिश्र जी का था । मिश्रा जी पटना के मशहूर प्रकाशक ज्ञानपीठ प्रकाशन के मालिक श्री मदनमोहन पांडेय, जिन्हे हम सभी बड़े बाबूजी के रूप में सम्बोधित करते थे, की सबसे बड़ी बेटी के पति थे। निहायत अनुशासित व्यक्ति। जैसे देखने में चेहरे पर चमक था, अन्तःमन से उतने ही स्वच्छ थे। आज के युग में ऐसे व्यक्ति को “युधिष्ठिर” कहा जा सकता है। धनबाद जैसे शहर में जहाँ उनके बराबर के ही नहीं, बल्कि, उनके घुटने और एड़ियों तक के अधिकारी सुवह शाम लक्ष्मी से स्नान करते थे, धनबाद से दूर अपने-अपने गाँव में खेत खलिहानों में एकड़-दर-एकड़ जमीन जोड़ते जा रहे थे, अपने पुरखों का नाम रोशन कर रहे थे; मिश्रा जी किसी भी समय अग्नि-कुंड में प्रवेशकर अपनी ईमानदारी की परीक्षा देने को सज्ज रहते थे।
इनके आवास और हीरापुर से एसएसयलएनटी कालेज के रास्ते धनबाद के आरक्षी अधीक्षक का आवास होते हुए जाने वाली सड़क के बीच कोई दीवार नहीं था। सपाट – खुला हुआ, जैसे उनका व्यक्तित्व था। अपने प्रांगण में अपरिचित गाड़ियों को देखकर वे मेरी ओर देखे। वैसे उन गाड़ियों का रंग-रूप उनके लिए भले अपरिचित था, लेकिन एक सरकारी मुलाजिम होने के नाते गाड़ियों का नंबर प्लेट से वाकिफ थे वे । उन्हें इस बात का भय हो गया था कि कहीं कुछ ‘गड़बड़’ न हो जाय। दोनों गाड़ियों से कोई पांच महाशय नीचे उतड़े। सभी सम्मानित मिश्रा जी को ह्रदय से पहचानते थे, सम्मान करते थे। कई मर्तबा उनके हस्ताक्षर से ही उन लोगों के विरुद्ध अनुशासनिक कार्रवाई हुई थी। सभी मिश्रा जी को बहुत श्रद्धा से प्रणाम कर मेरे बारे में पूछे। मिश्रा जी मेरे कमरे को ओर इशारा करते अंदर चले गए।
उन महाशयों में चार अंगरक्षक थे और पांचवें बाबू सूर्यदेव सिंह के सबसे प्रिय और आज्ञाकारी भाई बच्चा बाबू (बच्चा सिंह) थे। मुझे देखकर वे मुस्कुराये और कहे कि “झाजी…. भैय्या तुरंत बुलाये हैं।” मैं भी उनकी बातों का सम्मान करते मुस्कुराया। टेबुल पर रखे पानी वाले जग से बच्चा बाबू पानी पिए। फिर एक छोटका ताला सिकड़ी में लटका कर मैं भी गाड़ी में सवार हो गया। बॉबी दादा का कागज अपने बुशर्ट के ऊपरी जेब में रख लिया था। मैं जानता था बाबू सूर्यदेव सिंह इन्हीं बातों पर चर्चा करेंगे। मिश्रा जी अपने समस्त परिवार के साथ मुझे देख रहे थे जैसी मेरी अंतिम विदाई हो रही हो।
सिंह मैंशन में प्रवेश के साथ बाएं हाथ पोर्टिको के ठीक सामने वाले कक्ष में अपनी कुर्सी पर धोती-कुर्ता-बंडी (आजकल पढ़े-लिखे लोग जैकेट कहते हैं) पहने, बाएं पैर को दाहिने पैर पर रखे प्रसन्न मुद्रा में बाबू सूर्यदेव सिंह बैठे थे। उन दिनों सिंह मैंशन में प्रवेश का अर्थ होता था आप जिला का सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं और आपकी पहुँच कोयला क्षेत्र के सर्वशक्तिमान मानव तक है – जो आपके दुःख में, सुख में आपके साथ है। बसर्ते आप उसे ‘चुटी’ नहीं काटें। चाहे आप मजदुर हों या कोयला क्षेत्र में कार्य करने वाले सबसे नीचले कर्मी, चाहे पत्रकार हों या नेता। एक तरह से सिंह मैंशन उन दिनों कोयला क्षेत्र का सीसीटीवी था। कोई 45-किलो वजन वाले शरीर पर हीरापुर बाजार से पांच रुपये मीटर वाले कपड़े का बुशर्ट और स्टेचलोन पैंट और हवाई चप्पल पहने मनुष्य को देखते ही सूर्यदेव बाबू सम्मान में खड़े हो गए। मुझ जैसे व्यक्ति को इतना सम्मान सूर्यदेव बाबू देंगे, मैं जीवन में कभी सोचा नहीं था।
सूर्यदेव बाबू कहते थे: “झाजी, आप ब्राह्मण हैं और मैं राजपूत। मुझ जैसा राजपूत आप जैसे ब्राह्मणों का हमेशा से सम्मान करता आया है। धनबाद में आप हमारे सबसे प्रिय पत्रकार हैं। सच लिखने में तनिक भी कोताही नहीं करते। कुछ साल पहले आपको याद होगा जब आप अपने अखबार में मेरी बेटी किरण के बारे में लिखे थे। वह मेरे-उसके जीवन में पहली घटना थी। पहली बार उसका नाम अखबार में छपा था। आप यह भी लिखे थे कि मैं पत्रकारों से जब भी बात करता हूँ, किरण, हमारी प्यारी बेटी, हमेशा मेरे सामने के दरवाजे के पास खड़ी रहती है। सामने खड़े बच्चा बाबू मुझे और अपने बड़े भाई को देखकर कभी मुस्कुरा रहे थे, तो कभी गर्दन हिला कर उनके शब्दों का सम्मान कर रहे थे।”
तभी वे कहते हैं : “कलकत्ता से कोई बंगाली बाबू आये हैं। उनका फोन आया था। होटल स्काई लार्क में रुके हैं। वे कह रहे थे कि वे मेरे साथ चुनाब प्रचार में रहना चाहते हैं। परन्तु मैं उनसे कह दिया कि आप जो भी हों, मैं आपका बहुत सम्मान करता हूँ, लेकिन जब तक झाजी ‘हाँ’ नहीं कर देंगे, मेरे तरफ से ‘ना’ ही समझें और आप अन्य पत्रकारों की तरह कहानियां गढ़ें, लिखें, छापें।” मैं बाबू सूर्यदेव सिंह का अपने प्रति इतना विस्वास देखकर, सुनकर बहुत प्रसन्न था । यह विस्वास सिर्फ मेरी खड़ी बोली और सत्य शब्दों का चयन था, जो कलकत्ता के दी टेलीग्राफ अख़बार में, सन्डे पत्रिका में प्रकाशित होता था।
बाबू सूर्यदेव सिंह के आगे ‘कोल माफिया’ शब्द का उपसर्ग आखिर भारत के बड़े-बड़े पत्रकारों ने, सम्पादकों ने, जो व्यवसायी घरानों से जुड़े थे, लगाए थे। अनेक दृष्टान्त हैं जब भारत में सबसे अधिक बिकने वाला अंग्रेजी अखबार का मालिक भी धनबाद के कोयला भवन और कलकत्ता के कोल इण्डिया भवन में कुर्सियों पर बैठे अधिकारीयों को भेजा करते थे एक ‘पुर्जी’ जिसमें कभी प्राईम कोल के हज़ारो हज़ार टन निर्गत के लिए, तो कभी गरीबों के घरों में कोयलों की बुकनी के लिए, जिसे मिटटी के साथ ‘गुलों’ का निर्माण किया जाता था, के आवंटन के बारे में लिखा होता था । यानी स्टील जगत में इस्तेमाल होने वाले कोयलों से लेकर गरीबों के घरों में इस्तेमाल होने वाले गुलों तक के नाम पर बिना किसी प्रशासनिक पहरे से ‘व्यापार होता था। वैसे कोल इण्डिया या बीसीसीएल को क्या करना था ? अधिकारियों को डर होता था, कहीं ‘अखबार वाले कुछ लिख न दें। कोई अपने घर से दे रहे हैं वे। वे सभी समाज के संभ्रांत थे। अखबारों के मालिक थे, खुद का पत्रकारिता से मीलों दूर का कोई वास्ता नहीं था, अलबत्ता दर्जनों पत्रकारों को नौकरी पर अवश्य रखते थे। आखिर अखबार के मालिक थे। बहुत बड़ा ‘नेक्सस’ था उन दिनों। उम्मीद है आज भी कमोबेश यही नेक्सस होगा – लेकिन वे कभी ‘माफिया, ‘माफियोसो’, ‘सरगना’ ‘दबंग’ शब्दों से अलंकृत नहीं हुए। खैर। समय किसे छोड़ा है।
बाबू सूर्यदेव सिंह चुनाव से सम्बंधित कुछ और बातें करते हुए मुझे कहे कि ‘बंगाली बाबू को कह दें कल आठ बजे सुबह झरिया कार्यालय में पहुँच जायेंगे। अभी चुनाव से संबंधित जो बातें हुई हैं उसे आप बंगाली बाबू को लिखकर दे देंगे, क्योंकि बहुत बातें चुनाव प्रचार-प्रसार के दौरान नहीं हो पाएगी। फिर एक क्षण रुके और कहते हैं: ‘बंगाली बाबू तो कंपनी के खर्च पर आये हैं, आप हीरापुर से झरिया कैसे आएंगे? और जोर से हंस दिए।
उस दिन अपरान्ह का कोई 3 बजा था। मैं धनबाद के तत्कालीन उपायुक्त मदन मोहन झा से मिलने जाना था। समय तय था। मैं दी टेलीग्राफ अखबार में हुमच कर लिखना शुरु कर दिया था। मेरे लिखने से धनबाद से प्रकाशित ‘आवाज’ और ‘न्यू रिपब्लिक’ के मालिक मुझसे काफी खफा हो गया थे। कुछ महीनों के लिए मैं न्यू रिपब्लिक में सेवा की शुरुआत किया था। पटना के रविरंजन बाबू (ईश्वर आपकी आत्मा को शांति दें) मुझे वहां भेजे थे। मैं कभी नहीं चाहता था की मुझे धनबाद में “न्यू रिपब्लिक” का टैग लगे और यही कारण था कि उत्तम सेन गुप्ता मुझे दी टेलीग्राफ अखबार के लिए रास्ता बना दिए थे। सेनगुप्ता साहेब मुद्दत तक दी टेलीग्राफ के विशेष संवाददाता थे बिहार के। एम जे अकबर, शेखर भाटिया, उमेश आनंद, राजीव बागची आदि पत्रकारों के सहयोग से मैं अपनी कहानी के माध्यम से कलकत्ता में प्रफुल्ल सरकार स्ट्रीट आनंद बाज़ार पत्रिका समूह के दफतर में स्थान बन रहा था, पहचान बन रही थी। धनबाद डेटलाइन से दी टेलिग्राफ में मेरी एक कहानी अखबार के प्रथम पृष्ठ पर नीचे आठ कलम में अवतरित हो चुका था।
इस कहानी को करने में तीन पन्ने का कागज महत्वपूर्ण था। किसी भी सरकारी अधिकारी का कोट, पैजामा या गमछी का होना कोई आवश्यक नहीं था। जो बोल रहा था, कागज बोल रहा था, जो लिखा था वही कहानी थी। यह समाचार कोयला खदानों में “बालू” भरने से संबंधित थी, जिसमें धनबाद के कई सफ़ेद वस्त्रधारी भी सम्मिल्लित थे, जो धनबाद के सामाजिक मंच पर चढ़कर, बैठकर क़्वींटल-क़्वींटल गेंदा-गुलाब का माला गर्दन में लटकाते आ रहे थे। कुछ सफ़ेदपोस कोयला व्यापारी थे, कुछ सफ़ेद पोश लोहा व्यापारी थे, कई सफेदपोश स्लरी के व्यापारी थे। इस कहानी का महत्वपूर्ण अंग यह था कि भारत कोकिंग कोल और कॉल इण्डिया के खदानों में कोयला निकालने के बाद उक्त माइंस को कागज पर तो बालू से इस कदर भर दिया गया था कि एक-सांस हवा भी अंदर प्रवेश नहीं कर सकता था; लेकिन हकीकत में वह माइंस बांस-बल्ला-लकड़ियों के सहारे कभी भी ध्वस्त होकर न केवल अपना, बल्कि सैकड़ों कामगारों के जीवन अस्तित्व समाप्त करने पर सज्ज था।
यह समाचार कई परिचित, कई अपरिचित महामानवों को मेरी ओर आकर्षित किया। इस कहानी को धनबाद के तत्कालीन उपायुक्त मदन मोहन झा भी पढ़े थे। लेकिन अब तक न तो मैं ‘एम.एम. झा’ से मिला था और ना ही वे मुझे देखे थे। उस कहानी को लिखने में मुझे किसी सरकारी “कोट” की ज़रूरत नहीं हुई थी। जिला प्रमुख होने के कारण मिलने की इच्छा थी । देखना चाहता था उस अधिकारी को जिसे स्थानीय अखबार, पटना का अखबार “इतना बेहतर” मानता था । हम तो “बेहतर होने का कारण ढूंढने” निकला था।
उस दिन शायद 1989 साल का मार्च का महीना था। प्रथम तल्ले उनके दरवाजे पर दस्तक देकर मैं उनके कार्यालय में प्रवेश लिया। धनबाद जिला मानभूम का हिस्सा था। मानभूम को काटकर बोकारो और धनबाद बनाया गया था। ‘बंगाली संस्कृति’ की उपस्थिति धनबाद के उपायुक्त के कार्यालय में दिख रहा था। उपायुक्त साहब कुछ कार्य में व्यस्त थे। सामने कुछ लाल-पीला-हरा ‘पताखा ‘ लगा फ़ाइल टेबुल पर रखा था। मुझे गर्दन उठाकर ‘हूँ’ ‘हाँ’ करते स्वागत किये और इशारे में बैठने को कहा। उनके कथन का स्वागत करते मैं बैठ गया। घड़ी की सेकेण्ड की सूई टिक-टिक करते आगे निकल रही थी। कोई 90 सेकेण्ड के बाद, कलम को ढक्कन में घुसाते कहते हैं: “जी, कहा जाय।”
मेरे पास उन्हें कहने की कोई बात ही नहीं थी। फिर भी मैं उनसे कहा कि आपसे मुलाकात नहीं हुई थी, देखा नहीं था, अतः देखना, मिलना चाहता था। मैं शिवनाथ झा हूँ। उनकी शारीरिक भाषा मुझे अच्छी नहीं लगी। फिर प्रणाम करते मैं कमरे से बाहर की ओर उन्मुख हो गया। उस के बाद मैं उन्हें जीवित रहते कभी नहीं मिला, आवश्यक नहीं समझा। काफी समय वे दिल्ली में भी थे, मैं भी था इण्डियन एक्सप्रेस दिल्ली में – लेकिन मेरी पत्रकारिता में उनकी जरुरत कभी नहीं पड़ी – क्योंकि मैं चापलूस नहीं था।
धनबाद में ए के उपाध्याय के बाद 20 मई, 1986 को मदन मोहन झा पदार्पित हुए थे, जो मई 26 मई 1989 तक कुर्सी पर रहे। इस दौरान उन्हें पटना सचिवालय में मुख्य मंत्री की कुरी पर बैठे बिंदेश्वरी दुबे, भागवत झा आज़ाद का वरदहस्त मिला। दुबेजी धनबाद और कोयला क्षेत्र में ‘इंटक’ की स्थिति से चिंतित थे। वे खुद एक ‘श्रमिक नेता’ थे। आज़ाद जी दिल्ली से अवतरित हुए थे। दक्षिण बिहार के जिलों को छोड़कर बिहार में ‘प्रशासन का डंडा’ चलाने का अवसर बिहार के किसी भी जिले में नहीं था – आज तो है ही नहीं – यह तो बिहार के नेता से अधिकारी तक जानते हैं।
और यह भी जानते होंगे कि कैसे दुबे बाबा पटना के पत्रकारों, विशेषकर फोटोग्राफर पर, जो चमचावाज नहीं थे, ‘हथ्थे से कबर” गए थे; जब उनकी एक तस्वीर प्रांतीय से राष्ट्रीय दैनिक तक, पटना के बुद्धमार्ग से लेकर कस्तूरबा गाँधी मार्ग तक छपी थी – बिहार के द्वितीय नागरिक बिंदेश्वरी दुबे मुंह फाड़ के मुर्गा के दाहिने टांग को अपने जबड़े से पकड़कर खिंच रहे थे, टांग से रस टप-टप नीचे जमीन पर टपक रहा था और उधर धनबाद में बाबू सूर्यदेव सिंह के विरूद्ध ‘अनुशासनिक कार्रवाई’ चल रही थी – मदनमोहन झा के द्वारा । बाबू सूर्यदेव सिंह की ठेंघुने और कमर कमजोर होते देख धनबाद से पटना और दिल्ली तक सैकड़ों लोग खुश हो रहे थे, कई अन्तःमन से दुखी। कोई प्रशासनिक क्रिया कलाप को ‘कहर’ कह रहे थे, तो कोई प्रशासन पर ‘कोहरा’ आने का समय का ‘दूर’ दर्शन कर रहे थे। यह सभी कार्य तब किये गए थे जब सूर्यदेव सिंह कारावास में बंद थे। झरिया स्थित बिहार भवन, बिहार टॉकीज, उस परिसर में स्थित अन्य दुकानों को खाली कराया जाने की सभी कार्रवाई पूरी हो गयी थी।
बहरहाल, कतरास मोड़ की मिटटी कहती है कि सन 1967 में रामदेव सिंह, फिर 1967 में ही चमारी पासी, 1977 में श्रीराम सिंह की हत्या हुई। सं 1978 में बीपी सिन्हा को गोली मारी गयी। पांच साल बाद सन 1983 में शफी खान, फिर 1984 में मो असगर, 1985 में लालबाबू सिंह, 1986 में मिथिलेश सिंह, 1987 में जयंत सरकार की हत्या हुई। हत्या का सिलसिला अभी रुका नहीं था। इसके बाद 1986 में अंजार, 1986 में शमीम खान, 1988 में उमाकांत सिंह, 1989 में मो सुल्तान की हत्या हुई। उसी वर्ष 1989 में ही राजू यादव को मौत के घाट उतारा गया। 15 जुलाई, 1998 को धनबाद जिले के कतरास बाजार स्थित भगत सिंह चौक के पास दिन के उजाले में मारुति कार पर सवार कुख्यात अपराधियों ने अत्याधुनिक हथियारों से अंधाधुंध गोलियां चलाकर विनोद सिंह की हत्या कर दी।
25 जनवरी, 1999 को दोपहर के लगभग साढ़े बारह बजे सकलदेव सिंह सिजुआ स्थित अपने आवास से काले रंग की टाटा जीप पर धनबाद के लिए निकले ही थे। हीरक रोड पर पहुंचते ही दो टाटा सूमो (एक सफेद) सकलदेव सिंह की गाड़ी के समानांतर हुई। सूमो की पिछली खिड़की का काला शीशा थोड़ा नीचे सरका और उसमें से एक बैरेल सकलदेव सिंह को निशाना साधकर दनादन गोलियां उगलने लगी। जवाब में सकलदेव सिंह की गाड़ी से भी फायरिंग होने लगी। दोनो गाड़ियां काफी तेज चल रही थी और साथ में फायरिंग भी हो रही थी और अंतत : बंदूक की गोलियों ने सकलदेव सिंह को हमेशा के लिए खामोश कर दिया।
कोयलांचल में खून की होली के लिए ‘होली पर्व’ का होना आवश्यक नहीं है। यहाँ वर्चस्व स्थापित करने के लिए, वर्चस्व बनाये रखने के लिए कभी भी, कहीं भी खून की होली हो जाती है। सं 1994 में मणींद्र मंडल, 1998 मो नजीर, 1998 में ही विनोद सिंह की हत्या हुई। सन 2000 में रवि भगत, 2001 जफर अली और नजमा व शमा परबीन, 2002 गुरुदास चटर्जी की हत्या हुई। उसी वर्ष 2002 में ही सुशांत सेनगुप्ता की हत्या हुई। सन 2003 प्रमोद सिंह, फिर 2003 में राजीव रंजन सिंह, 2006 में गजेंद्र सिंह, 2009 में वाहिद आलम, 2011 में इरफान खान, सुरेश सिंह, 2012 में इरशाद आलम उर्फ सोनू और 2014 में टुन्ना खान तथा 2017 में रंजय सिंह की हत्या हुई।
आठ दिसंबर, 2011 की रात लगभग साढ़े नौ बजे करोड़पति कोयला व्यवसायी और कांग्रेस नेता सुरेश सिंह (55) की धनबाद क्लब में गोली मार कर हत्या कर दी गयी। इतना ही नहीं, अनेकों बार एस के राय जो इंटक के नेता भी थे, पर हमला हुआ। कोयलांचल की इसी खुनी होली और कोयले से कमाई के कारण ही बिनोद बिहारी महतो, शिबू सोरेन आदि नेता भी बने। इसी कमाई के कारण अविभाजित बिहार और बाद में झारखण्ड के साथ-साथ देश के सभी राज्यों के नेताओं की नजर, केंद्र में बैठे मंत्रियों की पैनी नजर इस काले सोने की ओर लगी होती है। काला होने के बाद भी सभी इसे प्यार करते हैं।
25 जनवरी 1999 को भूली मोड़ के पास सकलदेव सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, उस मुकदमें में धनबाद के जिला एवं सत्र न्यायाधीश, रिजवान अहमद की अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए उनकी रिहाई का फैसला सुनाया था, लेकिन आज वे बिनोद सिंह हत्या कांड के अपराध में कारावास में ही रहे। उन्हें उम्र कैद की सजा है। बिनोद सिंह बिहार जनता खान मजदुर संघ के महामंत्री और जनता दल के नेता सकलदेव सिंह के भाई थे। उनकी हत्या 15 जुलाई, 1998 को की गई। कहते हैं सकलदेव सिंह – विनोद सिंह के पिता मुखराम सिंह अविभाजित बिहार के छपरा ज़िले के उरहर पुर गांव से धनबाद के सिजुआ आये थे रोजी-रोटी की तलाश में।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार 15 जुलाई, 1998 को कतरास हटिया शहीद भगत सिंह चौक के पास ताबड तोड़ गोलियों से हमला कर विनोद सिंह और उनके चालक मन्नु अंसारी को मौत के घाट उतार दिया गया था। उस समय सुबह का कोई 8.40 बजा था। विनोद सिंह कोल डंप जाने के लिए अपनी नई एम्बेस्डर कार से निकले थे। उस कार को मन्नु अंसारी चला रहा था। पंचगढी बाजार में गाडियां जाम में थोडी देर फंसी रही। सुबह-सवेरे जैसे ही कतरास हटिया भगत सिंह चौक के पास जैसे ही पहुंचे, एक सादे रंग की मारुति कार दोनों गाडियों को ओवरटेक कर आगे रुकी, मारुति से तीन लोग उतरे और विनोद सिंह की गाड़ी पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। विनोद सिंह और मन्नु खून से लथपथ गिरे हुए थे।
कहते हैं उस हमलावरों में रामधीर सिंह और राजीव रंजन सिंह शामिल थे। रामधीर सिंह झरिया के पूर्व विधायक स्वर्गीय सूर्यदेव सिंह के पांच भाइयों में सबसे छोटे है। रामधीर सिंह को ‘सिंह मेन्शन’ के रणनीतिकार के रूप में देखा जाता रहा है।कहते हैं वे सूर्य देव सिंह के द्वारा स्थापित जनता मजदूर संघ के वह अध्यक्ष भी रह चुके है। लेकिन सजायाफ्ता होने के बाद उन्हें इस पद से हटा दिया गया। विनोद सिंह हत्याकांड में लोअर कोर्ट ने 2015 में रामधीर सिंह को उम्र कैद की सजा सुनाई थी। डेढ़ साल से अधिक समय तक फरार रहने के बाद उन्होंने धनबाद कोर्ट में सरेंडर किया था।
विधि का विधान देखिये उनकी पत्नी इंदू देवी धनबाद नगर निगम की मेयर रह चुकी हैं। विनोद सिंह हत्याकांड में विगत 25 अगस्त को झारखंड हाईकोर्ट की डिवीजन-बेंच ने रामधीर सिंह की अपील पर सुनवाई पूरी कर ली थी और फैसला सुरक्षित रख लिया था। इतना ही नहीं, रामधीर सिंह के बेटे शशि सिंह पर कोयला कारोबारी व कांग्रेस नेता सुरेश सिंह की हत्या का भी आरोप है। सुरेश सिंह की हत्या 7 दिसंबर 2011 को हुई थी। इस हत्या के बाद शशि सिंह धनबाद से फरार हो गए। धनबाद पुलिस अभी भी शशि सिंह को ढूंढ रही है। सुरेश सिंह कांग्रेस के टिकट पर झरिया से चुनाव भी लड़ चुके थे।
बहरहाल, यह कमरा इस बात का भी गवाह है कि धनबाद की काली, रक्तरंजित मिट्टी इस बात को स्वीकार करती है कि कोयले की अवैध कमाई की पृष्ठभूमि 1950 में बिंदेश्वरी प्रसाद सिन्हा @बीपी सिन्हा ने डाली थी। उन दिनों सम्पूर्ण कोयलांचल में सिन्हा साहब का एकछत्र राज था। सिन्हा साहेब बरौनी के रहने वाले थे और राजनीति में उनकी विशेष पकड़ थी। वे सर्वप्रथम सं 1950 में धनबाद पदार्पित हुए। उनमें बहुत बातें ईश्वरीय थी। लिखना, बोलना जैसा सरस्वती की देन थी। उनका वही आकर्षण तत्कालीन कोलियरी मालिकों को आकर्षित किया। वे इंटक से जुड़े और ताकतवर मजबूत नेता के रूप में उदित हुए। उसी समय उन्होंने कोयलांचल में युवा पहलवानों की फौज बनाई, जिसमें सूर्यदेव सिंह इनके सबसे विश्वासपात्र थे। इनका इतना दबदबा था कि उन्हीं की मर्जी से कोयला खदान चलती थी। सिन्हा का आवास व्हाइट हाउस के रूप में मशहूर हुआ करता था और पूरे इलाके में माफिया स्टाइल में उनकी तूती बोलती थी।
उस दिन मार्च महीने का 29 तारीख था और साल 1978 था। धनबाद के गांधी नगर स्थित आवास सह कार्यालय में सिन्हा साहेब रेकर्ड प्लेयर पर अपने पोते गौतम के साथ गाना सुन रहे थे। घर में उस वक्त आसपास के चार-पांच लोग अपनी फरियाद लेकर पहुंचे। अचानक दो-तीन लोग बरामदे में पहुंचे और एक ने पूछा साहेब हैं? जवाब हां में मिलने पर वे लोग लौट गये। इस बीच अचानक बिजली गुल हो गयी और कुछ सेकेंड में बिजली आ भी गयी। सिन्हा साहब को पूछने वाले लोग इतने में ही 10-11 व्यक्तियों को साथ ले कर बरामदे में शोर करते हुए प्रवेश किये। शोर सुन कर साहेब पूछते हैं कौन आया है? क्या हो रहा है? जवाब मिलता है डाकू आये हैं। इतने में सिन्हा साहेब जैसे ही कमरे से बाहर निकलते हैं मोटा सा एक आदमी लाइट मशीन गन से गोलियों की बौछार करने लगा । करीब सौ गोलियां चली । सिन्हा साहेब के शरीर को तब तक कई गोलियां बेध चुकी होती थी। सिन्हा साहेब खून से लथपथ होकर जमीन पर गिर पड़े थे। शरीर पार्थिव हो गया था। उस वक्त उनकी उम्र करीब 70 साल रही होगी। पूरे धनबाद ही नहीं, कोयलांचल से लेकर कलकत्ता तक, धनबाद से लेकर पटना के रास्ते दिल्ली तक कोहराम मच गया।
सिन्हा साहब की हत्या धनबाद कोयलांचल में कोयला माफिया और राजनीति के गठबंधन के इतिहास की पहली बड़ी घटना थी। बंदूक व बाहुबल की ताकत के समानांतर ताकत रखने वाले सिन्हा साहेब की हत्या में उनके करीबी कई लोगों का नाम आया। सिन्हा साहेब का ‘अंत’, सूर्यदेव सिंह का ‘सूर्योदय’ था। सम्पूर्ण कोयलांचल सूर्यदेव सिंह की ऊँगली पर चलने लगी और भारत कोकिंग कोल मुख्यालय जाने के प्रवेश द्वार से कोई 100 कदम पर स्थित सिंह मैंशन इतिहास रचना प्रारम्भ कर दिया। कहा जाता है कि मजदूरों को काबू में रखने के लिए इन्होंने पांच लठैतों की एक टीम बनाये थे। इसमें बलिया के रहने वाले सूर्यदेव सिंह और स्थानीय वासेपुर के शफी खान आदि शामिल थे। उसी समय से उनकी दुश्मनी वासेपुर के शफी खान गैंग्स से शुरू हुई। सिन्हा साहेब की हत्या में सूर्यदेव सिंह का नाम आया था, लेकिन कुछ समय बाद वे इस काण्ड से बरी हो गए। उन दिनों सूर्यदेव सिंह अपने उत्कर्ष पर थे।
उत्तर प्रदेश के बलिया से आकर एक साधारण कोयला मजदूर के रूप में काम शुरू करने वाले सूर्यदेव सिंह ने कोयला मजदूरों की ट्रेड यूनियन की अगुवाई कर इतनी शोहरत हासिल की कि धनबाद की धरती पर पत्ता भी उनकी इक्षा के बिना नहीं हिलता था। जितने दबंग, उतने ही सामाजिक कार्यों में रुचि दिखाने वाले सूर्यदेव सिंह की लोकप्रियता का आलम रहा। चंद्रशेखर अब तक प्रधानमंत्री बने नहीं थे और जब प्रधानमंत्री बने तब भी सूर्यदेव सिंह को अपना परम-मित्र ही माना और कहा भी। चंद्रशेखर से नजदीकी के कारण उनका राजनीतिक रसूख परवान पर था। 1977 में सूर्यदेव सिंह पहली बार झरिया से विधायक बने।
उनकी मौत के बाद बच्चा सिंह उस सीट से विधायक बने। उसके बाद सूर्यदेव सिंह की पत्नी कुंती सिंह और अभी उनके बेटे संजीव सिंह झरिया से विधायक बने। सन 1977 से 2014 तक के विधान सभा चुनाव में झरिया विधान सभा सीट पर हमेशा सिंह मेंशन परिवार का ही कब्ज़ा रहा। केवल 1995 में राजद के टिकट पर आबो देवी को इस सीट से जीत मिल सकी थी। नवम्बर 1990 में जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने थे, तब वह सूर्यदेव सिंह से मिलने धनबाद आये थे। जून 15 सन 1991 में हार्ट अटैक से हुई उनकी मौत के बाद परिवार के बीच ही विवाद हो गया और सभी भाइयों के बीच वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई। सूर्यदेव सिंह के निधन के बाद उनकी पत्नी कुंती देवी को लोगों ने धनबाद जिले के झरिया विधानसभा क्षेत्र से दो बार विधायक बनाया।
उनकी राजनीतिक जमीन झरिया में इतनी पुख्ता थी कि उनके बेटे संजीव सिंह को लोगों ने विधानसभा भेजा। सूर्यदेव सिंह का धनबाद में बना आवास सिंह मेंशन आज भी है, फर्क सिर्फ इतना ही है कि सिंह मेंशन में रहने वाले पांच भाइयों में चार का कुनबा आज बिखर गया है। सूर्यदेव सिंह पांच भाई थे। विक्रमा सिंह अपने पैतृक गाँव बलिया में ही रह गये। जबकि राजन सिंह, बच्चा सिंह और रामधीर सिंह सूर्यदेव सिंह के साथ रहे। बाद में बच्चा सिंह ने सूर्योदय बना लिया तो राजन सिंह के परिवार ने रघुकुल। रामधीर सिंह का बलिया-धनबाद आना-जाना लगा रहा, लेकिन उनकी पत्नी इंदू देवी और बेटा शशि सिंह मेंशन में ही रहते हैं।
सिंह मेंशन हमेशा सुर्खियों में रहा और कोयला कारोबार से लेकर राजनीति तक इस परिवार का दबदबा रहा। एक रिपोर्ट के अनुसार सियासत में मजबूत दखल का प्रमाण यह है कि धनबाद नगर निगम की कुर्सी इन्हीं परिवारों के बीच रही। धीरे-धीरे नीरज सिंह भी राजनीति में तेजी से उभरने लगे। पिछले विधानसभा चुनाव में वह कांग्रेस के टिकट पर झरिया से खड़े हुए थे, जबकि उसके चचेरे भाई संजीव सिंह भाजपा के टिकट पर। इस चुनाब के बाद परिवार के बीच विवाद और खुलकर सामने आ गया। नीरज सिंह 2019 के लोकसभा चुनाव में खड़े होने वाले थे, लेकिन नीरज सिंह की हत्या करा दी गई। माना जा रहा है कि कोयले की लोडिंग प्वाईंट पर आउटसोर्सिंग कंपनियों पर कब्जे को लेकर हत्या हुई। आउटसोर्सिंग पर वर्चस्व के लिए बात-बात पर खून की होली खेली जाती है। यह भी कहा जाता है कि आउटसोर्सिंग कम्पनियां कमीशन के रूप में करोड़ों रुपए माफिया को देती हैं और इसके बदले माफियाओं द्वारा इनको सुरक्षा प्रदान की जाती है। यह भी कहा जाता है कि कोयलांचल में पदस्थापित पुलिस अधिकारियों की कमाई करोड़ों में होती है और ये धंधा बेरोकटोक चलता है।
एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार कोयलांचल में आठ बड़े गैंग में चार सौ करोड़ रुपए से भी अधिक की रंगदारी को लेकर खूनी खेल चलता रहता है। पिछले तीन दशकों में 350 से भी ज्यादा लोगों की हत्याएं माफियाओं ने कर दी, जबकि छोटे-छोटे प्यादे तो लगभग रोज ही मारे जाते हैं। कोयलांचल में 40 वैध खदाने हैं, जबकि इससे कहीं अधिक अवैध खनन। इन वैध खदानों से लगभग 1.50 लाख टन कोयले का उत्पादन होता है, जबकि इस उत्पादन में लोडिंग, अनलोडिंग और तस्करी में लगभग 400 करोड़ रुपए की रंगदारी माफिया के गुर्गे करते हैं। वैसे पिछले 50 साल से कोयलांचल में वर्चस्व की लड़ाई चल रही है, हर रोज एक छोटा गैंग उभरकर सामने आ जाता है।
पर कोयलांचल में अभी भी ‘‘सिंह मेंशन’’ का ही दबदबा है, अब फर्क सिर्फ यह हो गया है कि सिंह मेंशन में भी बंटवारा हो गया और चारों भाईयों एवं उनके बेटों का अलग गैंग हो गया है। इतने समय के बाद भी, इतने पैसे के बाद भी, इतनी हत्याओं के बाद भी, इतने नेताओं की उपस्थिति के बाद भी धनबाद में कोई ‘आमूल’ परिवर्तन नहीं हुआ। जिस अधिकारी के सेवा काल में सूर्यदेव सिंह पर कमान कैसा गया, सैकड़ों अधिकारी आये, दर्जनों डिप्टी कमिश्नर बदले गए, दर्जनों पुलिस अधीक्षक आये-गए; सैकड़ों – हज़ारों नेता बने, कोई पटना एक्सपोर्ट हुए तो कोई रांची और कोई दिल्ली; लेकिन हमारे शहर में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। आज भी गरीबी उतनी है है, आज भी कुत्तों के साथ जी बच्चे खाते हैं। पढ़ने के लिए स्कूल नहीं भेज पाते माता-पिता। इन सभी दृश्यों को अपने कैमरे में क्लिक-क्लिक करते, अख़बारों में छापते लगता जीवन गुजर गया, लेकिन उनके चेहरों पर आज तक हंसी नहीं देख पाया हूँ।
अगर ऐसा नहीं होता तो सं 1956 से अब तक धनबाद समाहरणालय में कोई 49 – उपायुक्त का नाम पीतल के अक्षरों में गोदना के तरह नहीं गोदाया होता। सं 1956-2021 यानी 65 साल, यानी औसतन एक समाहर्ता का धनबाद समाहरणालय में सेवा अवधि एक साल तीन महीना है। अब आप ही सोचिये, कि एक उपायुक्त अपने जिले में एक साल तीन महीने में क्या कर लेगा? जिन उपायुक्त को अधिक समय तक रखा गया, इसका अर्थ होता था कि वे ‘फलनमा मुख्यमंत्री’ के ‘नुमायंदे’ हैं, मुख्यमंत्री कार्यालय में उनके मालिक बैठे थे और मुख्यमंत्री महोदय दिल्ली के सिंहासन पर बैठे प्रधान मंत्री की इक्षा पर ।
इतना ही नहीं, सं 1985 में जब ए के उपाध्याय जी उपायुक्त थे, उस समय से लेकर कोयला क्षेत्र में आधिकारिक शब्दों से अलंकृत कोयला माफिआओं की समाप्ति तक और झारखण्ड राज्य के निर्माण तक 14 उपायुक्त की लम्बी सूची नहीं बनती। विशेषकर मई 1986 के बाद से जैसे जैसे पटना में मुख्यमंत्री कार्यालय में नए नए चेहरे दीखते थे, धनबाद में समाहर्ताओं का रंग-रूप,आकार-प्रकार और नाम भी बदल जाता था। मुख्य मंत्री बदलते ही ‘गजबे’ का परिवर्तन होता था धनबाद समाहरणालय के आला अधिकारियों के नाक-नक्शा में। लेकिन ‘चमचावाज’, ‘मक्खनवाज’ अधिकारीगण तो ‘टमाटर’ के रूप में स्वयं को ढाल लेते थे। जैसे टमाटर सभी सब्जियों में ‘मिलनसार’ होता है, ‘ऐसे अधिकारी जल्द ही चीनी जैसा घुल-मिल जाते थे। लक्ष्मी जी का गजब स्वभाव है।
उन दिनों धनबाद के समाहरणालय में जो भी आला अधिकारी जिला का कमान सँभालते थे, सर्वप्रथम स्थानीय अख़बारों से लेकर पटना, दिल्ली, कलकत्ता के संवाददाताओं की सूची अपनी जेब में रखते थे, साथ ही उनका दूरभाष नंबर, मोबाईल तो जन्म नहीं लिया था और धनबाद शहर भी स्मार्ट शहर में दर्ज नहीं हुआ था। किसी भी प्रकार का “प्रशासनिक” कार्रवाई होने पर तत्काल उन “महानुभावों” को फोन कर बताया जा सके ताकि पटना में बैठे मुख्यमंत्री सहित धनबाद के उपायुक्त का नाम अख़बारों के पन्नों पर सुबह सवेरे चमकता रहे। आज भी वह परंपरा जारी होगा ही। वैसे एक तरह से इसे भी “छपास-नेक्सस” कहा जा सकता है। आधिकारिक तौर पर घुटने से लेकर ठेंघुने तक के नेता ऐसे लेकर अधिकारी तक कोई इस बात से इंकार नहीं कर सकते हैं कि उन्हें अपना नाम या चेहरा अख़बारों के पन्नों में प्रकाशित अचकघा नहीं लगता होगा।
मैं टुकुर-टुकुर बाबू सूर्यदेव सिंह के चेहरे और मुख से निकलते शब्दों से चेहरे के भाव को पढ़ रहा था। मैं जिस व्यक्ति के सामने बैठा था, उस व्यक्ति के सामने बैठने के लिए ‘हिम्मत’ की नहीं ‘उसके प्रति भाव’ की जरुरत होती थी। उस दिन मेरी उम्र उनकी उम्र से आधी से दो चार साल अधिक थी। शारीरिक वजन 60 फीसदी कम। शब्दों के साथ उनके चेहरे से अपने विधानसभा क्षेत्र झरिया और झरिया के लोगों के लिए जो सम्मानार्थ-प्रेम भाव दिख रहा था, उसे शब्दों में नहीं बांधा जा सकता है। बाबू सूर्यदेव सिंह आगे कहते हैं: “हमारे लिए जैसे बच्चा है, जैसे रामाधीर है, जैसे राजन है, जैसे हमारे बच्चे हैं, जैसे उसके बच्चे हैं; झरिया और कोयला क्षेत्र के लोग हैं। हम खून के सम्बद्ध के आधार पर भावनात्मक और संवेदनात्मक संबंधों को नहीं बाँट सकते हैं। यह एक संवेदनात्मक सम्बन्ध है। हम सभी अगर झरिया को छोड़ देंगे तो कोई और लपक लेगा। प्रकृति का यही नियम है।”
झरिया विधानसभा क्षेत्र बाबू सूर्यदेव सिंह का कर्मभूमि था। उनकी पहचान थी। झरिया में उनकी परछाई दिखती थी। बाबू सूर्यदेव सिंह झरिया से चार बार क्रमशः 1977, 1980, 1985 और 1990 में विधानसभा चुनाव जीते। उनकी बातों को मैं सुन रहा था और मन ही मन मुस्कुरा रहा था। मेरी हंसी को वे अन्यथा नहीं ले रहे थे। वे समझ रहे थे आगे कुछ शब्द निकलने वाले हैं।
