सोनी लिव ओरिजिनल एक वेब-सीरीज देख रहा हूँ "स्कैम 1992: द हर्षद मेहता स्टोरी। यह वेब सीरीज हंसल मेहता द्वारा निर्देशित है। हर्षद मेहता द्वारा किए गए 1992 के भारतीय शेयर बाजार घोटाले के आधार पर, श्रृंखला को पत्रकार सुचेता दलाल और देबाशीष बसु की 1993 की पुस्तक द स्कैम: हू विन, हू लॉस्ट, हू गॉट अवे पर बनाई गयी है। इस वेब सीरीज में प्रतीक गांधी, श्रेया धनवंतरी, हेमंत खेर और निखिल द्विवेदी बेहतरीन भूमिका अदा किये हैं।
सुचेता दलाल से निजी तौर पर मैं मिला नहीं हूँ। लेकिन पिछले कई वर्षों से अख़बारों के पन्नों पर नाम और कहानी पढ़कर उनके सम्पर्ण व्यक्तित्व से परिचित हूँ। अस्सी के दशक के बाद से संडे, द टेलीग्राफ, द इण्डियन एक्सप्रेस, द स्टेट्समैन, सहारा टाइम, द एशियन ऐज, दैनिक भास्कर, एएनआई, तहलका, एसबीएस रेडियो, ऑस्ट्रेलिया आदि अख़बारों और रेडियो के लिए खासकर पुलिस, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो, भारत सरकार का गृह मंत्रालय , प्रवर्तन निदेशालय, नीचली अदालत, उच्च न्यायालय, प्रशासन आदि क्षेत्रों में कार्य करने के कारण अपनी पहचान की कभी किल्लत नहीं हुई मुझे।
लोग, चाहे सहकर्मी थे या अन्य समाचार पत्रों में काम करने वाले, अधिकारी थे या पदाधिकारी - एक बेहतरीन संवाददाता मानते थे और आज भी मानते हैं। इसे अपने मियां मिठ्ठू नहीं समझेंगे। वजह यह थाऔर आज भी वजह वही है कि दिल्ली सल्तनत में मेरा को "आका" नहीं थे और आज भी नहीं हैं । मेरी मेहनत ही मेरी पहचान है। इस पहचान में मेरी मूंछ कुछ और इजाफ़ा कर दी।
हर्षद मेहता की कहानी को मुंबई के दलाल स्ट्रीट से मुंबई पुलिस, सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय, गृह मंत्रालय, वित्त मंत्रालय के अधिकारियों, तत्कालीन नेताओं के कक्ष में आते देखा। दक्षिण दिल्ली के कुतुब इंस्टीट्यूशनल एरिया स्थित चंद्रास्वामी के आश्रम से मेहता की आवाज को उठते सुना। इसलिए जब वेब सीरीज देखने लगा तो देखने की इक्षा और तीव्र हुई। एक आम संवाददाता को कितने पापड़ बेलने होते हैं एक कहानी को छोटी डायरी से एक कागज पर टाइपराइटर मशीन के खट खट ध्वनि से ठोकते-पीटते शब्दों में रूपांतरित होते, बड़े-बड़े मशीनों के बीच से निकलकर अख़बारों के पन्नों तक पहुँचने में कितनी मेहनत और मसक्कत करनी होती है।
सुश्री सुचेता दलाल जब हर्षद मेहता की कहानी को 'ब्रेक' करना चाह रही थी, उनके पास 'आधिकारिक' तथ्य नहीं था। लेकिन उनके पास जितनी जानकारियां थी, किसी भी संवाददाता के लिए पर्याप्त होता है। उन दिनों द टाइम्स ऑफ़ इण्डिया के संपादक थे श्री दिलीप पडगौंकर साहब और मुंबई संस्करण के प्रमुख श्री राजदीप। फिल्म में दिखाया गया है। सुश्री सुचेता की कहानी इसलिए पहले नहीं प्रकाशित हुई क्योंकि उनके पास कोई आधिकारिक नाम नहीं था जिसके मुख से दो शब्द लिखा जाए - उस कहानी की सत्यता उनके दो शब्द कर देंगे।
आम तौर पर किसी भी समाचार पत्र अथवा पत्रिका में संपादक मालिक से बहुत डरता है। मालिक व्यवसायियों से बहुत डरता है। मालिक सरकार से बहुत डरता है। मालिक आयकर विभाग से, विज्ञापन दाताओं से, मंत्री-संत्री से, प्रधानमंत्री कार्यालय या प्रधानमंत्री कार्यालय के इर्द गिर्द घूमने वाले लोगों से बहुत डरता है। और इसका सीधा कारण है - व्यवसाय में कमी, समाचार पत्र के प्रकाशन के लिए मिलने वाले कागजों में कमी, सरकारी विज्ञापनों में कमी इत्यादि-इत्यादि।
लेकिन सबसे पहला फायदा वही लेता हैं। आम तौर पर किसी भी ऐसी संवेदनशील कहानियों के प्रकाशन के बाद उस अखबार या पत्रिका का संपादक सबसे पहले 'सम्पादकीय' लिखता है, सरकारी गलियारों में उस कहानी के एक-एक शब्दों से अपनी छवि में चार चांद लगाने की कोशिश करता है। बहुत सी बातें हैं एक छोटे संवाददाता के लिए जो वह कहानी लिखने से लेकर उसके प्रकाशन तक झेलता है। सुश्री सुचेता दलाल के लिए हर्षद मेहता की कहानी सबसे महत्वपूर्ण थी। वह सभी प्रयास की, परन्तु सफल नहीं हो रही थी।
आम तौर पर ऐसे अवसर पर बड़े-बड़े अख़बारों में कहानियों का 'अपहरण' हो जाता है अथवा उक्त कहानियों में उस अखबार के संपादक या वरिष्ठ पत्रकार जो उक्त कहानी के लेखक से वरीय तो होता ही है, संपादक, मालिक और सरकार, व्यवस्था के बीच कड़ी का काम करता है, अपने नाम के साथ उस संवाददाता का नाम जोड़ता है - अगर कहानी प्रकाशित हो गयी।
सुश्री सुचेता दलाल इस मामले दिन बहुत भाग्यशाली थी। वह भाग्यशाली इसलिए भी थी कि उसे सलाह दिया गया कि आखिर भारतीय स्टेट बैंक से ही क्यों न पूछा जाय। भारतीय स्टेट बैंक के अध्यक्ष या वरीय अधिकारी को ही क्यों न फोन किया जाए। वह ऐसा ही की और अंततः कहानी प्रकाशित हुई। लेकिन मुंबई द टाइम्स ऑफ़ इण्डिया के श्री श्रीराजदीप अपनी कलम चला ही दिए। कुछ शब्द को क़तर दिए जो कहानी की महत्ता को सम्पूर्णता तक नहीं पहुँचने दिया।
आम तौर पर समाचार पत्रों में ऐसे लोगों की किल्लत नहीं होती है। खैर, कहानी प्रकाशित हुई और हर्षद मेहता प्रकरण भारत के समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, टेलीविजन पर दाखिला ले लिया। फिर तो पूरा देश हर्षद मेहतामय हो गया। उधर प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर भारत के सैकड़ों नामी-गरामी राजनेताओं से लेकर, वित्तीय क्षेत्र से जुड़े सैकड़ों लोगों के हलफ सुख रहे थे क्योंकि न केवल कहानियां अख़बारों में प्रकाशित हो रही थी, बल्कि हर्षद मेहता 'बिगबुल' बन गए थे और कारावास आ गए थे।
बहरहाल, इसे देखते मन में कई विचार उठने लगा। कई बातें जो आज से तीस वर्ष और अधिक समय पहले घटी थी अख़बारों के दफ्तरों में, याद आने लगी। देश में तक़रीबन 125000 से अधिक समाचार पत्र/पत्रिकाओं का प्रकाशन होता है। वैसे 900+ निबंधित निजी टीवी चैनल हैं, लेकिन भारत के आसमानों के रास्ते कोई 4000 चैनेल्स 140 करोड़ लोगों के टीवी स्क्रीन पर पहुँचता है। पहले कहा जाता था कि 'जहाँ न जाय रवि, वहां जाय कवि।" आज बात बदल गई है। आज के परिपेक्ष में 'जहाँ न जाये रवि, वहां जाये टीवी' - लेकिन इसका अर्थ यह नहीं समझें कि यह विस्तार 'समाज के बदलाव ' के लिए हैं। ऐसी गलती नहीं करेंगे सोचने में - यहाँ जैसे जैसे भारतीय मुद्राओं का 'डॉलर, स्टर्लिंग, पौंड, दीनार आदि विदेशी मुद्राओं की तुलना में दिल्ली के कर्तव्य पथ पर मोल गिर रहा है, देश में समाचार पत्र/पत्रिकाओं, टीवी चैनलों, वेबसाइटों के माध्यम से पत्रकारिता के क्षेत्र में बाढ़ आ रही है।
आज जिस तरह देश की सड़कों पर चार पहिया वाहनों में, दो-पहिया वाहनों में नंबर प्लेट के आगे, शीशों पर, अतिरिक्त प्लेट लगाकर 'पत्रकार', 'संपादक', 'संपादक के सहयोगी', 'पत्रकार संघ के अध्यक्ष' लिखा उसी प्रकार दिख रहा है जैसे 'पार्षद के मित्र', विधायकजी का साला' 'मंत्री जी का पोता', 'मंत्री जी के दूर के रिस्तेदार, 'थाना प्रभारी का दामाद / साला' आदि लिखा दिख रहा है। आज तो स्थिति ऐसी है कि वास्तविक रूप में बेहतरीन पत्रकार होने के वाजवूज दफ्तरों में आपकी पूछ नहीं होती होगी, अगर आप सिर्फ अपने कार्य से, अपनी कहानियों से मतलब रखते होंगे। आपको सभी लोग कहते होंगे 'बहुत एटीच्यूड' रखती है/रखता है। आपका काम कैसा है कोई जानने की कोशिश नहीं करता है। आपको सभी 'गधा' समझेंगे। लेकिन आप भी 'सुट्टा पार्टी', 'मादक पार्टी' का सदस्य हो जाये, घर पर, बाहर आयोजन करते रहें - वह-वही लुटते रहें ।
यह बात यहाँ इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि पत्रकारिता में संध्याकाळ 'दो घूंट' लगाने की परम्परा मुद्दत से चली आ रही है। ऐसी ही एक घटना हुई थी "जिह्वा फिसलने' की और उस फिसलन के कारण 'भागलपुर अंखफोड़बा काण्ड' की कहानी जिसकी थी, उसकी नहीं होकर किसी ने 'जिह्वा को फ़िसलाकर' दूसरे के नाम कर दिया। आज के पत्रकारों को शायद मालुम नहीं होगा, यह कहानी तत्कालीन वरिष्ठ पत्रकार एसएनएम आब्दी की थी। लेकिन 'पत्रिका' (संडे) में कार्य करने और किसी का जिह्वा फिसलने के कारण वह कहानी दी इण्डियन एक्सप्रेस की हो गई और लेखक हो गए श्री अरुण सिन्हा। खैर।
जिस समय यह घटना घट रही थी, उस समय रामसुंदर दास बिहार के मुख्यमंत्री थे। राम सुन्दर दास 21 अप्रैल, 1979 को मुख्यमंत्री के पद पर आसीन हुए थे और 17 फरवरी, 1980 तक कुल 302 दिन विराजमान रहे। उस समय तक यह जुल्म प्रारम्भ हो गया था कमोवेश, लेकिन प्रकाश में नहीं आ पाया था। फरवरी 17, 1980 से राष्ट्रपति शासन लगा और शासन 8 जून, 1980 को समाप्त हुआ, जब प्रदेश का कमान डॉ जगन्नाथ मिश्र के हाथों आया। इन दिनों भागलपुर में आँख फोड़ने और उसमें तेज़ाब डालने की प्रक्रिया चल रही थी। खासकर जब प्रदेश में राष्ट्रपति शासन था, पुलिस की शक्ति भी उत्कर्ष पर थी, जिसका फायदा उसने उठाई थी, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति ने पुनर्वास के लिए भी आदेश दिए। पीड़ितों के नाम से 30-30 हज़ार रुपये स्टेट बैंक में जमा कराये गए और मुआवजे के तौर पर उन्हें, उनके परिवार को 750/- रुपये प्रतिमाह देने का आदेश दिया गया। मानवीय दृष्टि से वह सब कुछ हुआ – परन्तु वह नहीं हुआ जो होना चाहिए था – क़ानूनी तौर पर न्याय यानी अपराधियों को सजा देना कानून का काम है लेकिन अपराधियों के लिए खुद के हाथों में अपराध लेना, ये कहीं से उचित नहीं है।
बहरहाल, स्वतंत्र भारत में दंड प्रक्रिया संहिता, यानी Code of Criminal Procedure, 1973 को लागू हुए महज पांच साल ही तो हुए थे । यह दंड प्रक्रिया भारत में आपराधिक कानून के क्रियान्यवन के लिये निर्मित क़ानूनी प्रक्रिया है। यह सन् 1973 में पारित हुआ तथा 1 अप्रैल 1974 से लागू हुआ। इस में 37 अध्याय और कुल 484 धाराएं हैं। जबकि, भारतीय दण्ड संहिता ब्रिटिश काल में सन 1860 में लागू हुई। इसके बाद इसमें समय-समय पर संशोधन होते रहे। सन 1979-1980 के दौरान भागलपुर शहर और जिले की गलियों में, सड़कों पर, खेतों में लोगों की आखों को फोड़कर, उसमें तेज़ाब डालकर ‘विश्व का जघन्य अमानवीय घटना’ को अंजाम नहीं दिया गया था । पुलिस एक रास्ता अख्तियार की – पहले अपराधियों को पकड़ना, उसका आँख फोड़ना और फिर उसमें तेजाब डाल देना । यह परंपरा लगभग 2 साल चली और कोई 33 अपराधियों को इस तरह से सजा दी गई । खैर।
बात नब्बे के दशक के पूर्वार्ध की है। आनंद बाजार पत्रिका समूह से प्रकाशित 'संडे' पत्रिका के दिल्ली कार्यालय से निकलकर बहादुरशाह ज़फर मार्ग से प्रकाशित 'दी इण्डियन एक्सप्रेस' आया था। यहाँ सुरक्षाकर्मी से लेकर संपादक तक अंग्रेजी में बात करते थे। मैं अंग्रेजी पत्र-पत्रिका में कार्य करने के बाद भी दिल्ली की सड़कों जैसी चिकनी अंग्रेजी मेरी नहीं थी। बोलते, बात करते समय सिर्फ होंठ' हिलते थे, गर्दन और कमर में कोई लचक नहीं होता था। वैसे अंग्रेजी बोलने में उन दिनों भी परहेज रखते थे, आज भी रखते हैं। दिल्ली सल्तनत में आज भी अंग्रेजी के विद्वानों और विदुषियों को देखता हूँ तो ऐसा लगता है कि वे बोलते समय 'व्यायाम' भी करते हैं। शब्दों की तो बात ही छोड़िये। कितने बार 'दीर्घशंका' (s ...... t) वाले 'शब्द' से, 'बलात्कार' (f ......k ) वाले शब्दों को छंद, अलंकार के रूप में प्रयोग करते, कह नहीं सकता। मैं 'दी इण्डियन एक्सप्रेस' में नया-नया था।
उस रात मैं किसी अन्य सहकर्मी के स्थान पर रात्रिकालीन ड्यूटी पर था। मेरी नौकरी 'पक्की' नहीं हुई थी। एक्सप्रेस ब्यूरो में तो बड़े-बड़े संवाददाता थे, उसमें एक 'सर्वोच्च न्यायालय' कवर करते थे। श्री नायर साहब नाम था उनका। मैं निचली अदालत के साथ साथ दिल्ली उच्च न्यायालय कवर करता था। उस रात कोई साढ़े-बारह के करीब 'एक्सप्रेस बम्बई' कार्यालय से एक फोन आया, साथ ही, कम्प्टयूटर पर संवाद भी। संवाद था कि बम्बई उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए एम भट्टाचार्जी द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अज़ीज़ मुसब्बर अहमदी (25 अक्टूबर, 1994 से 24 मार्च, 1997) को अपना त्यागपत्र प्रेषित करना। न्यायमूर्ति ए एम भट्टाचार्जी के विरुद्ध चर्चा हो गई थी कि वे मुस्लिम लॉ और संविधान से सम्बंधित एक किताब के लिए एक लन्दन स्थित प्रकाशक से $ 80 000 स्वीकार किये थे, साथ ही, एक दूसरे 'मैन्युस्क्रिप्ट' के लिए $ 75 000 का ऑफर भी स्वीकार के अधीन था।" उस ज़माने में यह एक बहुत बड़ी घटना थी।
बहरहाल, एक्सप्रेस के डेस्क से सहायक समाचार संपादक श्री राजेश्वर प्रसाद साहब ड्यूटी पर थे। वे रिपोर्टर्स कक्ष में दौड़ते-भागते आये। मुझे देख लम्बी सांस लेते कहते हैं: "ओ माई गॉड !!!! शिवनाथ !!! यह कहानी बम्बई से है। तुम सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से बात कर इसे 'कन्फर्म' करो और कोई 1500 + शब्दों में कहानी लिखकर तत्काल प्रेषित करो। यह आज का लिड है और बम्बई कार्यालय बैठा है इस कहानी के लिए।" प्रसाद साहेब सारी बातें एक सांस में बोल गए। सम्पादकीय विभाग (डेस्क) पर भूचाल आ गया था। प्रथम पृष्ठ का ले-आउट बदल गया था। उन दिनों श्री पी सी एम त्रिपाठी जी समाचार संपादक थे।मैं श्री प्रसाद साहेब का अपने प्रति यह विश्वास देखकर उछल गया। प्रसाद साहेब कहते हैं: "तुम अपने काम में लग जाओ पहले। मैं तुम्हारे काम में हाथ बंटाता हूँ।" उधर श्री प्रसाद साहब लाइब्रेरी जाकर न्यायमूर्ति ए एम भट्टाचार्जी से सम्बंधित जितने भी समाचार प्रकाशित हुए थे, का कतरन लाने में लग गए। अब तक रात का कोई 12 बजकर 40 मिनट हो गया था और छोटी-बड़ी सुइयों की रफ़्तार भी ह्रदय गति जैसी बढ़ गई थी । उस समय मोबाईल सिर्फ और सिर्फ हमारे मेट्रो एडिटर श्री अश्विनी सरीन के पास था जो घर पर थे।
इस घटना के कोई एक महीना पहले न्यायमूर्ति अज़ीज़ मुसब्बर अहमदी साहब से मेरी मुलाककट हुई थी एक कार्यक्रम में। मैं उनसे निजी तौर पर मिला था। जब मैं बताया कि मैं "एक्सप्रेस" का रिपोर्टर हूँ, वे मुझे पीठ ठोके और कहे कभी भी, किसी भी समय आप बात कर सकते हैं। उनका इतना बोलना था कि मैं अपनी डायरी और कलम उनके तरफ कर दिया ताकि 'अंदर वाला नंबर' मिल जाय। वे अपने शयन कक्ष वाला नंबर लिख दिए। एक रिपोर्टर को और क्या चाहिए। शायद यही मेरस प्रारब्ध था और समय भी यह चाह रहा था। अब तक प्रसाद साहब मेरे सामने बैठ गए थे 'पैडिंग' वाला अंश कंप्यूटर पर लिख रहे थे। नीचे डेस्क से लोगों का आना जाना बढ़ गया था।
मैं डायरी में न्यायमूर्ति अज़ीज़ मुसब्बर अहमदी द्वारा लिखित नंबर निकला। सामने ऊँगली घुसाकर डॉयल करने वाला फोन को अपनी ओर खिंचा और फिर सात अंकों पर सात बार उनलगी घुसाकर गोलचक्कर को घुमाया। तत्काल दूसरे छोड़ पर 'ट्रिंग-ट्रिंग' होने लगी। कुछ ही सेकेण्ड बाद दूसरे छोड़ से आवाज आई "हेल्लो" - इससे पहले की दूसरे छोड़ से मुझसे पूछा जाता, न्यायमूर्ति का 'हेल्लो' शब्द को पहचान लिया और सुनते ही मैं बोल पड़ा: "सर प्रणाम। मैं एक्सप्रेस वाला शिवनाथ झा बोल रहा हूँ। माफ़ कर देंगे इतनी रात फोन करने के लिए। लेकिन नौकरी का सवाल है।"
मेरी बात वे समझ गए थे। आखिर देश के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश थे वे। मैं बोलता रहा: "सर !! बम्बई कार्यालय से अभी एक संवाद आया है कि न्यायमूर्ति ए एम भट्टाचार्जी अपना त्यागपत्र आपके पास प्रेषित कर दिए हैं?" न्यायमूर्ति अज़ीज़ मुसब्बर अहमदी कहते हैं: "उस दिन का नंबर आज आपको काम आ गया। जी। वे अपना त्यागपत्र शाम में भेजे हैं। शेष कहानी आप जानते ही हैं। लेकिन आप मुझे उल्लिखित नहीं करेंगे।" न्यायमूर्ति का 'हाँ' शब्द मेरे लिए दिल्ली सल्तनत का किला फ़तेह जैसा था। ऐसा लग रहा था कि लाल किले पर मैं अपना झंडा गाड़ दिया हूँ आज रात। प्रसाद साहब का चेहरा चमक रहा था। वे झट से उठे और कहते नीचे डेस्क की ओर भागे : "शिवनाथ !!!! तुम्हारे लॉगिन में टाइप किया है। उसे निकालकर कहानी में जोड़ लेना। शेष और बातें जोड़ते दस मिनट के अंदर स्टोरी रिलीज कर देना। मैं बम्बई ऑफिस को बताता हूँ। वह इंतज़ार कर रहा है। वेल डन शिवनाथ।"
उस रात मैं "शेर" था "एक्सप्रेस" में। अभी तक रात का 1.10 हो गया था। कोई 1800 शब्दों की कहानी बन गई थी। श्री प्रसाद साहेब का चेहरा चमक रहा था। कहानी को मेरे नाम से तत्काल बम्बई कार्यालय प्रेषित किया गया। बम्बई कार्यालय उस समाचार को देखकर बहुत खुश हुआ। वहां यह समाचार 'डीप डबल कॉलम (ऊपर से नीचे बॉटम तक) मेरे नाम से प्रकाशित हुआ By Shivnath Jha ।
इधर दिल्ली में घड़ी की सुइयाँ आपसे में लड़ रही थी। कभी छोटी सुई ऊपर तो कभी बड़ी सुई ऊपर। फोन चार कोने पर चार लोग बैठे थे। राजनीति हो रही थी क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय कवर करने वाले संवाददाता (श्री नायर साहब) और दिल्ली संस्करण की सम्पादिका श्रीमती कुमी कपूर मुझ जैसे छोटे से रिपोर्टर के वजूद पर प्रश्न चिन्ह लगा रहे थे। कह रहे थे कि लोवर जुडिसियरी कवर करने वाला रिपोर्टर का क्या वजूद है की देर रात सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश फोन पर इस कहानी को कन्फर्म करे।" श्री प्रसाद साहेब 'हताश' हो गए। श्रीमती कुमी कपूर मेरी कहानी को 'अंडर प्ले' कर दी - 1800 शब्दों की कहानी 'एक पैरा' में सुबह के दिल्ली संस्करण के प्रथम पृष्ठ पर एक कोने में प्रकाशित हुआ। भारतीय स्वाधीनता संग्राम में ग्वालियर के महाराजा भी कुछ ऐसा ही किये थे। भारतीय स्वाधीनता संग्राम में अपने प्राणों की आहुति देने को तत्पर भारतीय क्रांतिकारियों के साथ छल कर गए थे - अपने स्वार्थ के लिए - अंग्रेजों से हाथ मिला लिए थे। खैर। देश तो आज़ाद हुआ ही और भारतीय इतिहास में ग्वालियर राजा का नाम भी किस तरह लिखा गया - सर्वविदित है।
अगले दिन सुबह की मीटिंग में अश्विनी सरीन के साथ-साथ मेरे मेट्रो के सभी रिपोर्टर उपस्थित थे। सरीन साहब 'शेर' की तरह गरज रहे थे। वजह भी था - उनके रिपोर्टिंग रूम और रिपोर्टर को 'अंडर इस्टीमेट' किया गया। तभी श्रीमती कुमी कपूर का प्रवेश हुआ। कुमी कपूर के चेहरे के भाव से यह विदित था कि वे 'राजनीति' में फंस गई थी रात को। अपना निर्णय लेने में चूक गयी थी वे। इससे पहले भी कुमी कपूर एक गलती की थी उसका जिक्र बाद में करूँगा। उनकी नजर उठ नहीं रही थी। मैं तो उनके सामने बहुत छोटा सा रिपोर्टर था, लेकिन वे भी समझ रही थी कि 'मैं उन्हें आंक लिया हूँ' अब तक, जहाँ तक पत्रकारिता का सवाल है।
इससे पहले की रिपोर्टर कक्ष में श्री सरीन साहब का गर्जन तेज हो - श्रीमती कुमी कपूर कहती हैं: "सॉरी शिवनाथ, आप सही थे, आपकी कहानी सही थी। आपकी बात देर रात जस्टिस अहमदी से हुई थी। दिल्ली में आपकी कहानी के साथ जस्टिस नहीं हुआ । सॉरी। "
इन्डियन एक्सप्रेसमें ही एक और घटना हुयी। कानून के दर से विदेश से भागे और भारत में शरण लिए एक महोदय पर कहानी कर रहा था। कहानी सम्पूर्ण दस्तावेजों पर आधारित था। कोई 1800-शब्द की कहानी थी जिसे दो भाग में बनाया गया था। आम तौर पर मैं जब कोई विशेष कहानी करता था, इसकी जानकारी सिर्फ तीन लोगों को होती थी - मुख्य संवाददाता, मेट्रो संपादक और समाचार संपादक। उन दिनों मुख्य संवाददाता थे श्री राकेश सिन्हा, मेट्रो प्रमुख श्री अश्विनी सरीन और समाचार संपादक थे श्री पीसीएम त्रिपाठी। सबों का निर्णय था कहानी डॉन भागों में प्रकाशित हो। देर रात कोई साढ़े बारह बजे पहला भाग छोड़ा गया। कहानी निर्गत होते ही तत्कालीन संपादक का प्रश्न आया 'कोट' कहाँ हैं? यानी उन्हें सरकारी दस्तावेजों से अधिक महत्व उस व्यक्ति विशेष के 'कोट' से था। दोनों 'पंजाबी' भाषा अधिक बोलते थे। उस कक्षं मुख्य संवाददाता से लेकर समाचार संपादक तक 'हतप्रत' थे। कुछ काल बाद संपादक का फोन आया समाचार संपादक को कि 'कहानी रोक लिया जाय और जब तक कोट नहीं हो तब तक उसे प्रकाशित नहीं किया जाय।" अगले दिन जिनका कोट लेना था 'विदेश यात्रा" पर निकल गए। बड़े-बड़े शहरों में सम्पादकों का खेल गजब निराला होता है।
उस ज़माने में एक्सप्रेस में एक और बात होती थी। जितने भी संवेदनशील कहानियां होती थी, कागजात होते थे क्या हिंदी और क्या अंग्रेजी, किसी न किसी बहाने सम्पादकों के पास जाती थी (हम जानते थे कि उसका फोटोस्टेट) हो जायेगा। फिर बड़ी-बड़ी कहानियां संपादक गण अपने नामों से लिखते थे। अब जब कहानियों का सृजन सम्पादकों के हाथों होने लगता था श पत्र-पत्रिका के छोटे कद के संवाददाताओं को कौन पूछता ? हाँ, उस क्षेत्र में काम करने वाले सभी सहकर्मियों के मुख से चर्चाएं अवश्य सुनता था कि किसने किस कहानी में कितना फायदा उठाया।
एक बार विदेश से एक पत्रकार दिल्ली के हुए। कस्टम में उनका सम्पूर्ण सामान था। यहाँ तक कि बच्चे के दूध पिलाने का सामान भी। देर रात एक सज्जन जो उन दिनों वहीँ काम करते थे, मुझे कहे कि उन सामानों को शीघ्रता से निकलवा दो। सज्जन हमसे बहुत वरीय थे और बड़े-बड़े पत्रकारों के बीच उनका उठना-बैठना था। आम तौर पर दो-तीन दिन अधिक समय भी लगता था उन दिनों। मैं अपने मित्र के फोन की घंटी बजा दिया वे बहुत ही सहजता के साथ कहे कि उन्हें सुबह-सवेरे आठ बजे वहां भेज दो, मैं कह दूंगा, सामान उन्हें तत्काल मिल जायेगा। ऐसा ही हुआ। लेकिन इस सम्पूर्ण प्रकरण में मैं कहीं नहीं था - उनकी नज़रों में। वे इतने महत्वपूर्ण हो गए कि समयांतराल दिल्ली से प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं में संपादक बन गए। ऐसे होते हैं दिल्ली में संपादक।
कोई पच्चीस वर्ष पूर्व एशियन ऐज अखबार में था विशेष संवाददाता। मिथिला में एक कहावत है "गोट बिछनि कहीं कोहवर बैठे!!" यानी सड़क पर कूड़ा-कचरा उठाने वाली कहीं कोहवर में शांति से बैठे। क्योंकि एशियन ऐज अखबार में हिंदुजा भाइयों के नाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की चिठ्ठी, उस पर कहानी और तत्कालीन संपादक का कुठाराघात - कुछ ऐसी ही घटना यहाँ भी हुई और मैं अपना झोला उठाकर घर आ गया।
बहरहाल, भारतवर्ष के महान कार्टूनिस्ट सम्मानित श्री आर के लक्षमण साहब अब नहीं है। जब हर्षद मेहता का मामला उठा था तो श्री लक्ष्मण साहब मुंबई टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में थे और जीवन पर्यन्त रहे। उस दौरान उनसे एक सवाल पूछाएक महिला पत्रकार ने कि 'आपका कॉमनमैन है? क्यों कॉमन महिला नहीं?' सम्मानित लक्षमण साहब मुस्कुराते कहते हैं: "महिला कभी कॉमन नहीं होती, वह सम्मानित होती है।" प्रश्नकर्ता उत्तरदाता की नज़रों में महिला के प्रति सम्मान देखकर अपनी नजर झुका ली। लक्षमण साहब 93 वर्ष की आयु में पुणे में अंतिम सांस लिए। जिस समय यह प्रश्न पूछा गया था, महिला हर्षद मेहता पर कहानी कर रही थी। हर्षद मेहता भी अंतिम सांस पुणे में ही लिए।

