पटना/कोलकाता/लखनऊ और नई दिल्ली : सत्तर के दशक में हम पटना कॉलेज के मुख्य प्रवेश द्वार के ठीक सामने दक्षिण दिशा की ओर जाने वाली सड़क एनी बेसेंट रोड में रहते थे। प्रवेश के साथ अंतिम छोड़ तक बायीं ओर 10 मकान और दाहिने हाथ 11 मकान था। अंतिम छोड़ पर मनोरमा विद्यापीठ बालिकाओं के लिए विद्यालय था। इस सड़क के प्रवेश के साथ दाहिने हाथ थियोसोफिकल सोसायटी का एक भवन था जिसमें छात्रों के लिए छात्रावास भी था और छोटे-छोटे बच्चों का विद्यालय।
इसी सड़क पर बीच में डॉ. के के दत्ता हे घर के सामने हम रहते थे। मेरे घर से कोई बीस कदम मजदुर संघ के नेता श्री अशोक कुमार त्रिवेदी, उनके अनुज त्रिवेदी अंबरीश, डॉ. प्रेम कुमार, डॉ. ज्योति शेखर और सबसे महत्वपूर्ण सबके अभिभावक प्रोफेसर पी के अम्बष्ठा साहेब रहते थे। श्री अम्बष्ठा साहब पटना कॉलेज के प्राचार्य भी रहे थे। उनके दो बेटे पटना विश्वविद्यालय में प्राध्यापक थे। उस सड़क पर देवी सरस्वती की विशेष कृपा थी।
औसतन उस इलाके में रहने वाले छात्र-छात्राएं पैदल पटना विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में नित्य आया-जाया करते थे। एक निश्चित समय पर जाना और पुनः एक निश्चित समय पर वापसी। उनके आने-जाने पर घड़ी की सुई भी मिलाई जा सकती थी। उन दिनों पटना के चार पुस्तकालयों में बैठना प्रतिष्ठा का विषय समझा जाता था। जो वहां बैठते थे, आलमीरा में रखे किताबों को निकालकर पढ़ते थे, अपने नाम निर्गत कराकर ले जाते थे, वे कॉलेज/विश्वविद्यालय के संभ्रातों में गिने जाते थे।
उन दिनों पटना विश्वविद्यालय (व्हीलर सीनेट हॉल के बगल में) पुस्तकालय के अतिरिक्त खुदाबक्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी, ए.एन सिन्हा इंस्टीट्यूट, सच्चिदानंद सिन्हा पुस्तकालय की गिनती बेहतरीन पुस्तकालयों में होती थी। यहाँ आना, किताब पढ़ना, परीक्षा में, प्रतियोगिता में अव्वल आने पर यहाँ के लोगों से मिलना, आशीष लेना - यह सभी बातें एक उत्कृष्ट सामाजिक नियमों के अधीन था जो शैक्षणिक संस्थानों और परिवारों के परिवेश से आता था पुस्तकालयों का अस्तित्व एक और कारण से बहुत महत्वपूर्ण था - मेलजोल। किताबों के पन्नों के बीच, सुंगंधो के बीच एक रिस्ता का जन्म होता था। अनजान, अपरिचित लोग पहचानवाले हो जाते थे। किताबें पुलिंग और स्त्रिन्लिंग के बीच की दूरी मिटा देती थी। उनसे कुछ सीखना और उन्हें कुछ सिखाना के अलावे एक महत्वपूर्ण बात और थी - अगर पढ़ाई में अव्वल आते गए, मन-मिलता गया तो जीवन भर साथ निभाने के लिए सज्ज हो गए।
मैं पटना के सैकड़ों तत्कालीन छात्र-छात्राओं को जानता हूँ, जो पढ़ने में अव्वल तो थे ही, पुस्तकालयों में किताबों के साथ प्रेम किये तो राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में अव्वल आये, नाम कमाए। शोहरत कमाए और अपने प्रियतम या प्रेयसी से विवाह कर जीवन पर्यन्त के लिए एक हो गए। कई अधिकारी आज भी दिल्ली, कलकत्ता, चेन्नई, कानपुर, मुंबई, नागपुर, लखनऊ, हैदराबाद, सिकंदराबाद, आदि शहरों में बड़े-बड़े पदों पर आसीन हैं।
विगत दिनोंवयोवृद्ध पत्रकार के. विक्रम राव की दो कहानियां देखने का अवसर प्राप्त हुआ। यह दोनों कहानियां पुस्तकालयों से ही सम्बंधित थी। एक थी दिल्ली के लाला हरदयाल पुस्तकालय से और दूसरी अमरीका के वेल विश्वविद्यालय पुस्तकालय की। वैसे हमने लाला हरदयाल पुस्तकालय पर पुनः कहानी भी की और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से निवेदन भी किया कि शिक्षा की स्थिति के मद्देनजर इस पुस्तकालय के कर्मचारियों को शीघ्रातिशीघ्र वेतन के राशि निर्गत की जाय। करीब सौ से आधी कर्मचारियों को 33 महीनों से वेतन नहीं मिली है।
लाला हरदयाल पुस्तकालय में पौने दो लाख पुस्तकों में आठ हजार तो दुर्लभ पांडुलिपियां हैं। अकबर के नवरत्न अबुल फजल (इब्न मुबारक) द्वारा लिखित आईने अकबरी और अकबरनामा है। इनमें मुगलकालीन समाज तथा सभ्यता का बेहतरीन वर्णन मिलता है। अबुल फजल का ही फारसी में महाभारत भी है, जिसमें आकृतियां सुनहरी हैं। सूफी संत ख्वाजा हसन निजामी का फारसी लिपि में लिखा कुरान है। महान ज्योतिष-ग्रंथ भृगु संहिता हैं, जिससे कुंडली तैयार होती है। यहां ब्रिटिश लेखक सर वाल्टर रेले द्वारा 1607 में लिखी : “हिस्ट्री ऑफ द वर्ल्ड (1607) की मूल प्रतियां हैं।
राव साहब लिखे भी इस पुस्तकालय में मेसोपोटामिया पर रोम की फतह से क्रमबद्ध इतिहास लिखा गया है। वाल्टर रेले का लंदन में स्टुअर्ट बादशाह जेम्स प्रथम ने सर कलम करा दिया था। रेले को ब्रिटेन ट्यूडर वंश की अविवाहिता महारानी एलिजाबेथ प्रथम का आशिक बताया जाता है। अन्य महत्वपूर्ण पुस्तकों में हैं : 1705 की वोयेज अराउंड द वर्ल्ड (जॉन फ्रैंकिस जेनेली कोरिरि),1828 की तजकीरा अल वकयात(चाल्र्स स्टेवर्ड),1794 की ट्रेवल्स इन इंडिया(विलियम होजेज), 1854 में लिखी गई रिगवेद संहिता (एचएच विल्सन), 1881 में सत्यार्थ प्रकाश(स्वामी दयानंद सरस्वती), 1928 में लिखी गई कुरान ए मजिद और औरंगजेब की मूल रचना की अनुवादित रचना आयते ऑफ कुरान प्रमुख हैं। सवाल है कि यह सब अनमोल कृतियां कब तक बची रहेंगी ? सभी बेशकीमती धरोहर हैं। इतना ही नहीं, पुस्तकालय में भी पाठकों के मोहब्बत के किस्से भी हैं।
चांदनी चौक स्थित इस पुस्तकालय का नाम मूलतः लॉरेंस इंस्टिट्यूट था। पुस्तकालय 1902 में बना। इसी स्थल पर दिसंबर 1912 में हाथी पर सवार वायसराय हार्डिंग पर बम फेंका गया था। वे बच गये थे। बम कांड में स्वतंत्रता सेनानी मास्टर अमीरचंद, भाई बालमुकुंद, मास्टर अवध बिहारी और बसंत कुमार विश्वास को फांसी दे दी गई। ये स्वतंत्रता सेनानी हरदयाल के साथी थे। अंग्रेजों के भारत से जाने के बाद 1970 में हार्डिंग लाइब्रेरी का फिर नामकरण हुआ। स्वतंत्रता सेनानी हरदयाल का नाम दिया गया।
एक अन्य कहानी में राव साहब लिखते हैं: यह कहना गलत नहीं होगा कि पुस्तकालय केवल पढ़ने ही लोग नहीं जाते। अगर अमेरिकन लाइब्रेरी एसोसिएशन की वार्षिक रपट देखें तो पता चलता है कि करीब 43 प्रतिशत लोग पढ़ने नहीं आते। कई लोग यहां मित्र बनाने आते एक दृष्टान्त: अमेरिका के येल यूनिवर्सिटी का जिसकी स्थापना 1701 में की गई थी। आज इसे याद करते हैं। केवल छात्रों, शोधकर्ताओं और विद्वानों के लिए ही नहीं, वरन रोमांस और प्रणय लीला के लिए भी। अमेरिका के बयालीसवें राष्ट्रपति बिल क्लिंटन का सहपाठी हिलेरी से यहीं प्रेम हुआ था। फिर वे दंपति बने। बात 1971 की है। दोनों येल विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई करते थे। लाइब्रेरी में हिलेरी को छुप-छुप कर बिल घूरते रहते थे। किताबों की ओट से। एक बार खीजकर हिलेरी ने टोका कि : “क्या चाहते हैं ?” परिचय हुआ, आत्मीयत बढ़ी, शादी हो गई। अर्थात किताबों के बहाने बात बढ़ी थी।
राव के अनुसार आधुनिक सार्वजनिक पुस्तकालयों का विकास वास्तव में प्रजातंत्र की बड़ी देन है। शिक्षा का प्रसारण एवं जनसामान्य को सुशिक्षित करना प्रत्येक राष्ट्र का कर्तव्य है। जो लोग स्कूलों या कालेजों में नहीं पढ़ते अथवा जिनकी पढ़ने की अभिलाषा है और पुस्तकें नहीं खरीद सकते तथा अपनी रुचि का साहित्य पढ़ना चाहते हैं, ऐसे वर्गों की रुचि को ध्यान में रखकर जनसाधारण की पुस्तकों की माँग सार्वजनिक पुस्तकालय ही पूरी कर सकते हैं। यूनेस्को जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन ने बड़ा महत्वपूर्ण योगदान किया है। प्रत्येक प्रगतिशील देश में जन पुस्तकालय निरंतर प्रगति कर रहे हैं और साक्षरता का प्रसार कर रहे हैं। वास्तव में लोक पुस्तकालय जनता के विश्वविद्यालय हैं, जो बिना किसी भेदभाव के प्रत्येक नागरिक के उपयोग के लिए खुले रहते हैं।"
वे कहते हैं कि हालांकि स्कॉटलैंड के 18वीं सदी के लेखक टामस कार्लाइल ने उम्दा किताबों के संग्रहालय को ही लाइब्रेरी बताया था। मगर छठी सदी में दूसरे खलीफा उमर इब्न खतब की राय भिन्न थी। जब इस्लामी फौज के सेनापति ने विश्व के महान पुस्तकालय को मिस्र के एलेक्जेंड्रिया पर हमले के बाद कब्जा कर लिया था तो उसने खलीफा से पूछा कि उन लाखों प्राचीन पुस्तकों का क्या किया जाए ? खलीफा उमर का जवाब निहायत सरल था : “यदि वे पुस्तकें कुरान शरीफ से असहमत हैं तो जला दो। यदि सहमत हैं तो अनावश्यक हैं, जला दो।” इस्लामी सैनिकों ने सारी लाइब्रेरी जला दी। मानव ज्ञान सैकड़ों साल पिछड़ गया। ठीक वैसा ही डकैत बख्तियार खिलजी ने महान नालंदा विश्वविद्यालय के साथ किया। बौद्ध और हिंदू शोध पुस्तकें भस्म हो गई थी।
अब स्वदेश आइये। यराष्ट्रीय पुस्तकालय, कलकत्ता की स्थापना श्री जे. एच. स्टाकलर के प्रयत्न से 1836 ई. में हुई। इसे अनेक उदार व्यक्तियों से एवं तत्कालीन फोर्ट विलियम लिट थे। कालेज से अनेक ग्रंथ उपलब्ध हुए। प्रारंभ में पुस्तकालय एक निजी मकान में था, परंतु 1841 ई. में फोर्ट विलियम कॉलेज में इसे रखा गया। सन् 1844 ई. में इसका स्थानांतरण मेटकाफ भवन में कर दिया गया। सन् 1890 ई. में कलकत्ता नगर पालिका ने इस पुस्तकालय का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया। बाद में तत्कालीन बंगाल सरकार ने इसे वित्तीय सहायता दी। इंपीरियल लाइब्रेरी की स्थापना 1891 ई. में की गई। लार्ड कर्जन के प्रयत्न से कलकत्ता पब्लिक लाइब्रेरी तथा इंपीरियल लाइब्रेरी को 1902 में मिला दिया गया। उदार व्यक्तियों ने इसे बहुमूल्य ग्रंथों का निजी संग्रह भेंट स्वरूप दिया।
लखनऊ विश्वविद्यालय के टैगोर लाइब्रेरी का भी भारतीय पुस्तकालयों में महत्वपूर्ण स्थान है। अब टैगोर लाइब्रेरी में एक सदी से चली आ रही रीति को खत्म कर अब उसकी जगह बारकोड स्कैन कर किताबें दी जायेंगी। इस पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत इस सत्र से कर दी गई है। विश्वविद्यालय में कुल पांच लाख किताबें हैं, जिसमें लगभग साढ़े तीन लाख टैगोर लाइब्रेरी में है, बाकी डिपार्टमेंटल लाइब्रेरियों में हैं। छात्रों की सहूलियत के लिए किताबें डिजिटल करने की व्यवस्था भी शुरू की गई है। इससे लाइब्रेरी की किताबों का भी डेटाबेस एक क्लिक पर उपलब्ध रहेगा।
टैगोर लाइब्रेरी की विकास यात्रा में 1974 में एक महत्वपूर्ण सोपान आया जब पुस्तकालय विज्ञान भी अध्ययन कोर्स के सिलेबस में सम्मिलित किया गया। इस विभाग के संस्थापक-अध्यक्ष थे स्व. प्रो. सी. जी. विश्वनाथन जिन्होंने 18 पुस्तकें लिखी। उसमें प्रमुख है कैटलॉगिंग पर। इसे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया था। प्रो. विश्वनाथन आंध्र विश्वविद्यालय (विशाखापट्टनम) में भी आचार्य रहे। वहीं डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन तब कुलपति थे। दोनों परस्पर संबंधी भी थे। जब राधाकृष्णन काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति बने तो प्रो. विश्वनाथन भी वहीं के लाइब्रेरी विभाग में आ गए थे। उसके पूर्व लखनऊ के मशहूर अमीरद्दौला लाइब्रेरी में 1939 में वे रहे थे। प्रो. विश्वनाथन के नाम से लखनऊ विश्वविद्यालय में लाइब्रेरी विज्ञान की परीक्षा में श्रेष्ठ छात्र के लिए वार्षिक स्वर्ण पदक भी रखा गया है। उनकी पुत्री डॉ. के. सुधा राव (रिटायर्ड रेल चिकित्सा मुख्य निदेशक) के. एन राव की पत्नी हैं।
वैसे अपवाद छोड़कर, आज पुस्तकालयों की स्थिति बहुत बेहतर नहीं है, अपितु 30 जनवरी जैसी ही है। अगर ऐसा नहीं होता तो शायद पटना के सच्चिदानन्द सिन्हा पुस्तकालय का, खुदाबक्श ओरिएंटल पुस्तकालय का यह हस्र नहीं होता?
एक रिपोर्ट के अनुसार 1894 में सच्चिदानंद सिन्हा की मुलाकात जस्टिस खुदाबक्श खान से हुई। जस्टिस खुदाबक्श छपरा के थे। उन्होंने पटना में 29 अक्टूबर, 1891 में खुदाबक्श लाइब्रेरी की बुनियाद रखी, जो भारत के सबसे प्राचीन पुस्तकालयों में से एक है। जब जस्टिस खुदाबक्श खान से सच्चिदानंद जुड़े उसके बाद बहुत सारे कामों में डॉ सिन्हा उनकी मदद करते थे। जब उनका तबादला हो गया तो उनकी लाइब्रेरी की पूरी जिम्मेबारी सिन्हा ने अपने कन्धों पर ले ली। उन्होंने 1894-1898 तक खुदाबक्श लाइब्रेरी के सेक्रेटरी के हैसियत से नई जिम्मेदारी को संभाला।
खुदाबक़्श पुस्तकालय की शुरुआत मौलवी मुहम्मद बक़्श जो छपरा के थे उनके निजी पुस्तकों के संग्रह से हुई थी। वे स्वयं कानून और इतिहास के विद्वान थे और पुस्तकों से उन्हें खास लगाव था। उनके निजी पुस्तकालय में लगभग चौदह सौ पांडुलिपियाँ और कुछ दुर्लभ पुस्तकें शामिल थीं। खुदाबक्श खान को यह संपत्ति अपने पिता से विरासत में प्राप्त हुई जिसे उन्होंने लोगों को समर्पित किया। खुदाबक़्श ने अपने पिता द्वारा सौंपी गयी पुस्तकों के अलावा और भी पुस्तकों का संग्रह किया तथा 1888 में लगभग अस्सी हजार रुपये की लागत से एक दो मंज़िले भवन में इस पुस्तकालय की शुरुआत की और 1891 में 29 अक्टूबर को जनता की सेवा में खुदाबक्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी के रूप में समर्पित किया।
उस समय पुस्तकालय के पास अरबी, फ़ारसी और अंग्रेजी की चार हजार दुर्लभ पांडुलिपियां थीं। सन 1969 में भारत सरकार ने संसद में पारित एक विधेयक के जरिये खुदा बख्श लाइब्रेरी को राष्ट्रीय महत्व के संस्थान के तौर पर मान्यता दी। लाइब्रेरी में फ़िलहाल अरबी, फारसी, संस्कृति और हिंदी की लगभग 21,000 से अधिक पांडुलिपियां और 2.5 लाख से अधिक किताबें हैं- उनमें से कुछ बहुत ही दुर्लभ हैं। फिर अपनी पति के नाम से ‘श्रीमती राधिका सिन्हा संस्थान एवं सच्चिदानंद सिन्हा पुस्तकालय की स्थापना की।
इसी तरह, जब संविधान की पहली बैठक हुई जिसमें कांग्रेस के अध्यक्ष जे बी कृपलानी अस्थायी अध्यक्ष के लिए डॉ सच्चिदानंद सिन्हा के नाम का प्रस्ताव रखा, जिसे आम सहमति से पारित किया गया। डॉ सिन्हा पहले और एक मात्र भारतीय थे जिसे सरकार में एक्ज्यूक्युटिव काउंसिलर के बतौर फाइनेंस मेंबर बनने का अवसर मिला था। जब संविधान की मूल प्रति तैयार हुयी तब डॉ सिन्हा की तबियत काफी ख़राब हो गई थी। उनके हस्ताक्षर के लिए मूल प्रति दिल्ली से विशेष विमान से डॉ राजेंद्र प्रसाद पटना लाये। डॉ राजेंद्र प्रसाद डॉ सिन्हा को अपना गुरु मानते थे। फरवरी 14, 1950 को डॉ सिन्हा ने संविधान की मूल प्रति पर डॉ राजेंद्र प्रसाद के सामने हस्ताक्षर किये। बीस-दिन बाद, 6 मार्च, 1950 को डॉ सिन्हा अंतिम सांस लिए।
वैसे आज के समय में बिहार में तो “लैंड-ग्रेबरों” की संख्या बिहार सरकार के गृह मंत्रालय, मुख्य मंत्री कार्यालय के पास भी नहीं होगी और शायद बिहार विधान सभा के नव निर्वाचित 243 सदस्यों के साथ-साथ विधान परिषद् के माननीय सदसयगण भी इस बात से अनभिज्ञ होंगे की जिस भवन में बैठकर वे सभी कुर्सी तोड़ते हैं, गीता पर हाथ रखकर शपथ तो खाते हैं लोक-कल्याण का लेकिन “लोक” और “कल्याण” का कभी “मिलन” नहीं हो पाता यह जमीन डॉ सच्चिदानन्द सिन्हा ने दान दिया था। या फिर जय प्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से देश के विभिन्न शहरों, दूसरे देशों के लिए हवाई यात्रा करते हैं, यह जमीन भी डॉ सिन्हा साहेब की ही थी, दान दे दिए। या फिर बिहार से प्राथमिक शिक्षा उत्तीर्ण किये हैं – जिस कार्यालय से डिग्री हस्तगत करते हैं – वह भवन डॉ सिन्हा का आवास था, बहुत प्रेम से सन 1924 में उन्होंने बनबाया था, दान दे दिए।
खैर। अभिभाजित भारत राष्ट्र के मानचित्र पर बक्सर का नाम बिहार के नामकरण के कोई 148 वर्ष पहले आ गया था जब ईस्ट इण्डिया कंपनी के हेक्टर मुर्नो की अगुआई में बक्सर में मीर कासिम, सुजाउद्दौला शाह आलम – II के बीच सं 1764 में युद्ध हुआ था, जिसे बैटल ऑफ़ बक्सर के नाम से जाना जाता है । बाद में सं 1912 में अंग्रेज सरकार बंगाल प्रेसीडेन्सी को काटकर 22 मार्च, 1912 को बिहार को अपना एक अलग पहचान दिया।
लेकिन शायद बहुत कम लोग जानते होंगे कि 1912 से कोई 19-वर्ष पहले बक्सर का ही एक व्यक्ति बिहार का नामकरण कर दिए थे। वह व्यक्ति और कोई नहीं बल्कि पटना के टी के घोष अकादमी के पूर्ववर्ती छात्र और भारत के संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ सच्चिदानन्द सिन्हा थे। 10 नवंबर 1871 को मुरार गांव, (चौंगाईं- डुमराव) जिला आरा (अब बकसर) के एक मध्यम वर्गीय सम्मानित कायस्थ परिवार में उनका जन्म हुआ और प्रारम्भिक शिक्षा गांव में ही हासिल कर मैट्रिक की परीक्षा उन्होंने जिला स्कूल आरा से अच्छे नंबरों से पास किया।
डॉ सिन्हा देश का प्रसिद्द सांसद, शिक्षाविद, पत्रकार, अधिवक्ता, संविधान सभा के प्रथम अध्यक्ष, प्रिवी काउन्सिल के सदस्य, एक प्रान्त का प्रथम राज्यपाल और हॉउस ऑफ़ लॉर्ड्स का सदस्य डॉ सच्चिदानन्द सिन्हा आज तक एकलौता बिहारी रहे जिनका नाम प्रदेश के नाम से पूर्व आता है यानि बिहार का इतिहास सच्चिदानन्द सिन्हा से शुरू होता है क्योंकि राजनीतिक स्तर पर सबसे पहले उन्होंने ही बिहार की बात उठाई थी।
कहते हैं, डा. सिन्हा जब वकालत पास कर इंग्लैंड से लौट रहे थे। तब उनसे एक पंजाबी वकील ने पूछा था कि मिस्टर सिन्हा आप किस प्रांत के रहने वाले हैं। डा. सिन्हा ने जब बिहार का नाम लिया तो वह पंजाबी वकील आश्चर्य में पड़ गया। इसलिए क्योंकि तब बिहार नाम का कोई प्रांत था ही नहीं। उसे यह कहने पर कि बिहार नाम का कोई प्रांत तो है ही नहीं, डा. सिन्हा ने कहा था, नहीं है लेकिन जल्दी ही होगा। यह घटना फरवरी, 1893 की बात है।
डॉ. सिन्हा को ऐसी और भी घटनाओं ने झकझोरा, जब बिहारी युवाओं (पुलिस) के कंधे पर ‘बंगाल पुलिस’ का बिल्ला देखते तो गुस्से से भर जाते थे। डॉ. सिन्हा ने बिहार की आवाज को बुलंद करने के लिए नवजागरण का शंखनाद किया। इस मुहिम में महेश नारायण,अनुग्रह नारायण सिन्हा,नन्दकिशोर लाल, रायबहादुर, कृष्ण सहाय जैसे मुट्ठी भर लोग ही थे।
उन दिनों सिर्फ ‘द बिहार हेराल्ड’ अखबार था, जिसके संपादक गुरु प्रसाद सेन थे। तमाम बंगाली अखबार बिहार के पृथक्करण का विरोध करते थे। पटना में कई बंगाली पत्रकार थे जो बिहार के हित की बात तो करते थे लेकिन इसके पृथक् राज्य बनाने के विरोधी थे। बिहार अलग राज्य के पक्ष में जनमत तैयार करने या कहें माहौल बनाने के उद्देश्य से 1894 में डॉ. सिन्हा ने अपने कुछ सहयोगियों के साथ ‘द बिहार टाइम्स’ अंग्रेज़ी साप्ताहिक का प्रकाशन शुरू किया। स्थिति को बदलते देख बाद में ‘बिहार क्रानिकल्स’ भी बिहार अलग प्रांत के आंदोलन का समर्थन करने लगा।
डॉक्टर सिन्हा ने उसी समय ठान लिया कि वे बिहार को बंगाल से अलग राज्य बनाकर ही दम लेंगें। 1893 में भारत वापिस आ कर उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रैक्टिस शुरू कर दी। भारत वापस आते ही उन्होंने अलग बिहार राज्य के लिये आंदोलन शुरू कर दिया और वकालत के अतिरिक्त पूरा समय उसी में देने लगे।अपनी वकालत की ज्यादा आमदनी भी बिहार आंदोलन पर ही खर्च करते।
सन 1907 में महेश नारायण की मृत्यु के बाद डॉ. सिन्हा अकेले हो गए। इसके बावजूद उन्होंने अपनी मुहिम को जारी रखा। 1911 में अपने मित्र सर अली इमाम से मिलकर केन्द्रीय विधान परिषद में बिहार का मामला रखने के लिए उत्साहित किया। 12 दिसम्बर 1911 को ब्रिटिश सरकार ने बिहार और उड़ीसा के लिए एक लेफ्टिनेंट गवर्नर इन काउंसिल की घोषणा कर दी। यह डॉ. सिन्हा और उनके समर्थकों की बड़ी जीत थी।
डॉ. सिन्हा का बिहार के नवजागरण में वही स्थान माना जाता है जो बंगाल नवजागरण में राजा राममोहन राय का। उन्होंने न केवल बिहार में पत्रकारिता की शुरुआत की बल्कि सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक विकास के अग्रदूत भी । 1908 में बिहार प्रोविंशियल कांफ़्रेंस का गठन हुआ और 1910 में हुए चुनाव में सच्चिदानन्द सिन्हा इम्पीरियल विधान परिषद मे बंगाल कोटे से निर्वाचित हुए। फिर 1921 में वे केन्द्रीय विधान परिषद के मेम्बर के साथ इस परिषद के उपाध्यक्ष भी रहे। उनकी अनुशंसा पर ही सर अली इमाम को लौ मेंबर बनाया गया, फिर काफ़ी जद्दोजहद के बाद जब हिंदुस्तान की राजधानी कलकत्ता से हटाकर दिल्ली कर दी गयी और 22 मार्च 1912 को बिहार को बंगाल से अलग कर दिया गया। फिर 1916 से 1920 तक डा. सिन्हा बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे।
1918 में उन्होंने अंग्रेजी का अख़बार सर्चलाइट निकाला, तथा 1921 में 5 वर्षों के लिए अर्थ सचिव और कानून मंत्री बनाए गए। वे पहले हिंदुस्तानी थे जो इस पद तक पहुँचे। फिर वे पटना विश्वविद्यालय के प्रथम उपकुलपति बनाए गए। 1924 में उन्होंने अपनी स्वर्गीय पत्नी राधिका सिन्हा की याद में राधिका सिन्हा इंस्टीट्यूट और सिन्हा लाइब्रेरी की बुनियाद रखी, और 10 मार्च 1926 को एक ट्रस्ट की स्थापना कर लाइब्रेरी की संचालन का जिम्मा ट्रस्ट को सौंप दिया।
उन्होंने एमिनेंट बिहार कौनटेम्पोररीस और सम एमिनेंट इंडीयन कौनटेम्पोररीस के नाम से दो किताबें भी लिखीं। 6 मार्च 1950 को 79 साल की उम्र में उनका देहांत हो गया। बहरहाल, 1955 में बिहार राज्य सरकार ने सिन्हा लाइब्रेरी को अपने अधिकार में ले लिया। सूत्रों के अनुसार, यहां एक लाख 80 हजार पुस्तकें हैं। कहा जाता है कि लगभग 20 माह से यहां के कर्मियों को वेतन या मानदेय नहीं मिला है। अपवाद छोड़कर आज पटना ही नहीं, भारत की किसी भी शहर में पुस्तकालयों की स्थिति तीस जनवरी से बेहतर नहीं है। आज पुस्तकालयों में पढ़ने वालों की कतार नहीं लगते। टेबुल-कुर्सियों पर मिटटी की परत-दर-परत जम रही है।
इसका अन्य कारणों के अलावे सबसे महत्वपूर्ण कारण है - पुस्तकालयों क्वे प्रति अभिरुचि नहीं होना, शासन-प्रशासन के लोगों को, खासकर राजनेताओं, मंत्रियों, अधिकारियों का 'बहुत अधिक शिक्षित नहीं होना। जिसे शिक्षा की भूख नहीं होगी, वह किताबों का महत्व क्या समझेंगे? गूगल महाशय का प्रादुर्भाव देश के पुस्तकालयों को भी प्रभावित किया है। कल गूगल 'संज्ञा' के रूप में आया था। विगत ढ़ाई दसकों में लोगों का मानसिक वजन गूगल पर इतना अधिक हो गया कि गूगल संज्ञा से क्रिया हो गया। अब तो पढ़ने-पढ़ाने, सहेजने, पुस्तकालय, कतरन, सांख्यिकी सभी तरह का कार्य गूगल ही कर रहा है। मिलने-मिलाने का कार्य 'गूगल चैंटिंग' पर हो रहा है तो पुस्तकालय की ओर क्यों आएंगे