हीरापुर चौराहा (धनबाद) : एक बार किसी अंतर्वीक्षा में अमिताभ बच्चन ने कहा था कि फिल्मों में इतने बार माता-पिता के मरने का अभिनय किया कि वास्तविक स्थिति आने पर यह समझ नहीं पा रहे थे कि स्थिति वास्तविक है अथवा अभिनय करना है। अमिताभ बच्चन और मुंबई फिल्म जगत के उन तमाम लोगों से एक सवाल - लाशों के ढ़ेर पर फिल्म बनाकर, पैसे कमाकर कभी उन मृतकों के परिवार और परिजनों की वेदना-संवेदना को जानने की कोशिश किये? शायद नहीं। यह दुःखद है।
चासनाला कांड को हुए पचास वर्ष बीत गए। चासनाला को आधार मानकर बनी फिल्म काला पत्थर को 46+ वर्ष। चासनाला कांड में कुल 375 श्रमिक मृत्यु को प्राप्त किये थे और काला पत्थर सिनेमा 2 करोड़ की लागत पर छ: करोड़ धन अर्जित किया था। क्या इन 46 वर्षों में अमिताभ बच्चन कभी उन श्रमिकों के परिवार अथवा परिजनों से रूबरू हुए? उनकी दर्द को समझने की कोशिश किये? क्या चासनाला कांड में मृत्यु को प्राप्त किये श्रमिकों की विधवाओं, उनके अनाथ बच्चों की आंसू पोछने के लिए ही सही, चासनाला क्षेत्र पधारे? शायद नहीं। अमिताभ बच्चन एक दृष्टान्त हैं। बम्बई फिल्म जगत के आज अनेकानेक निदेशक, लेखक, कहानीकार, अदाकार, अदाकारा हैं तो लाश को बेचकर सिनेमा बनाते हैं, पैसा तो कमाते हैं लेकिन कभी गलती से भी उस लाश के परिवार और परिजनों की बहती आँसुओं पर व्यथित नहीं होते।
अख़बार की दुनिया में नौकरी की शुरुआत हो गयी थी। जय प्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के सालगिरह पर पटना से प्रकाशित दी इंडियन नेशन - आर्यावर्त पत्र समूह में पत्रकारिता की सबसे नीचली सीढ़ी पर कदम रख दिया था। तारीख 18 मार्च 1975 था, जब सेवाभार लिया था। अखबारी दुनिया में आने के साथ ही तत्कालीन संपादक दीनानाथ झा और सम्पादकीय विभाग के वरिष्ठ संवाददाताओं और समाचार सम्पादकों ने एक ब्रह्म वाक्य कान में फूंक दिए थे - चाहे जितनी भी व्यस्तता हो, प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया (पीटीआई) और यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया (यूएनआई) के टेलीप्रिंटर पर कम से कम एक घंटा नित्य खड़े होने की आदत जरूर डाल लेना। उनका कहना था कि आने वाले दिनों में जब आप संवाददाता बनेंगे तो कहानी लिखते समय वाक्य के निर्माण में, विन्यास में पीटीआई और यूएनआई की कहानी मददगार होगी।
उस दिन शनिवार था। दिसंबर महीना का 27 तारीख और 1975 साल। पटना के मौसम में ठंढ़ से कराहना शुरू हो गया था। आम तौर पर छठ महापर्व के साथ ही पटना में प्राकृतिक मौसम में बदलाव आने लगता था। राजनीतिक मौसम तो ठंढ़ से भी गर्मी कभी कम नहीं होती, न उन दिनों और ना ही आज। प्रदेश के सभी नेता, चाहे रिक्शा चालकों का हों, सब्जी बेचने वालों का हों, ऑटो चालकों का हों, बसों का हों, दुकानदारों को हों, पंचायतों का हों, शिक्षकों का हों, शिक्षकेत्तर कर्मचारियों का हों, विधान सभा और विधान परिषद् में बैठने वाले जनता के प्रतिनिधि हो, अपने-अपने हितों के रक्षार्थ दिन-रात नेतागिरी कर अपने-अपने क्षेत्र के राजनितिक मौसम को गर्माहट दिए रहते थे। उस दिन शनिवार होने के कारण कार्य भी धीमी गति के समाचार जैसा था।

अपरान्ह के कोई साढ़े तीन बजा था। जिस भवन में छापाखाना था, जिसके ऊपर के तल्ले में आर्यावर्त और इंडियन नेशन का सम्पादकीय विभाग था, पुस्तकालय था, अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक का दफ्तर था, प्रसार विभाग था, मिथिला मिहिर मैथिलि पत्रिका का सम्पादकीय विभाग था या फिर सामने के भवन में जिसमें लेखा विभाग और विज्ञापन विभाग था - सम्पूर्ण परिसर में शांति का वातावरण था। पान और चाय के शौक़ीन लोग बाहर बरामदे में खड़े होकर चाय की चुस्की ले रहे थे, पान खा रहे थे।
मैं टेलीप्रिंटर कक्ष की ओर बढ़ रहा था। कहीं कोई उथल-पुथल नहीं था। मैं क्या कोई भी नहीं जानता था कि अगले क्षण ही पूरे दफ्तर में, खासकर सम्पादकीय विभाग में ही नहीं, पुरे प्रदेश और दिल्ली तक भूचाल आने वाला है। भवन के सड़क के तरफ लगे 'फ्लेस न्यूज' वाले बोर्ड पर कई लोग मुस्तैद होने वाले हैं। नीचे डाक बंगला की और से आने वाली सड़क जो पटना जंक्शन की ओर जाती है, पर यातायात रुकने वाला है। अख़बार के दफ्तर के सामने स्थित केंद्रीय कारा के प्रवेश द्वार और कारावास के अंदर बंद लोग भी संवेदनशील होने वाले हैं।
मैं टेलीप्रिंटर पर आ गया था। सामने इंडियन नेशन के सम्पादकीय विभाग में दिन की पाली वाले, जो डाक संस्करण निकालते थे, ब्रजनंदन सिंह, राजकुमार झा, श्यामा नन्द जी आदि बैठे थे। तभी टेलीप्रिंटर पर खट-खट-खट-खट-खट / खट-खट-खट-खट-खट / खट-खट-खट-खट-खट FLASH FLASH FLASH छपने लगा। उस कागज पर कोई आठ पंक्ति में यह शब्द छपा था। आगे लिखा था ATTN EDITORS ATTN EDITORS इसे देखते, पढ़ते इतना समझ में आ गया था कि कुछ भयंकर हुआ है। दिल्ली के सिंहासन पर प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी थी। यह सोचते कि शायद कोई भयंकर राजनीतिक घटना घटी है, मैं सम्पादकीय विभाग के दरवाजे पर खड़े होकर जोर से चिल्लाया - कुछ भयंकर हुआ है।
पीटीआई के टेलीप्रिंटर पर प्रकाशित हुआ CHASNALA COAL MINES INUNDATED, OVER 350 FEARED DEAD.
पीटीआई की खबर टेलीप्रिंटर पर समाप्त अभी हुआ भी नहीं था कि यूएनआई के मशीन पर भी एक टेक में कहानी छपने लगी। दोनों मशीनों पर टिकर के अंत में MORE लिखने का सिलसिला देर रात 2 बजे तक भी नहीं रुका। अब तक सम्पूर्ण भवन में कोलाहल मच गया था। रेडियो पर खबर उद्घोषित हो रहा था। सामने फ़्लैश बोर्ड पर दर्जनों व्यक्ति क्षण-क्षण का समाचार देने खड़े थे। नीचे सड़क पर आवक-जवाकों की भीड़ लग गयी थी। कोयला क्षेत्र के राष्ट्रीयकरण के बाद धनबाद से कोई 20 किलोमीटर दूर कॉल इण्डिया लिमिटेड की भारत कोकिंग कोल लिमिटेड के क्षेत्राधिकार वाले चासनाला कोयला खदान में घटी यह घटना जिसमें कोई 375 श्रमिक मृत्यु को प्राप्त किये, पहली बड़ी घटना थी। घटना की जानकारी दिन का करीब 1:35 बजे खदान के पास आयी थी।
चासनाला कोलियरी के पिट संख्या 1 और 2 के ठीक ऊपर स्थित एक बड़े तालाब में जमा करीब पांच करोड़ गैलन पानी, खदान की छत को तोड़ता हुआ अचानक अंदर घुस गया और इस प्रलय कालीन बाढ़ में वहां काम कर रहे सभी लोग फँस गये। आनन-फानन में मंगाये गये पानी निकालने वाले पम्प कम पर गए। पाइप छोटे पर गये। कलकत्ता स्थित विभिन्न प्राइवेट कंपनियों से संपर्क साधा गया, तब तक काफी समय बीत गया था। भूमिगत खदान में फंसे श्रमिक अंतिम सांस ले चुके थे।
संस्थान ने नोटिस बोर्ड में मारे गये लोग की लिस्ट लगा दी। उस समय केंद्र और राज्य दोनों जगह सत्ताधारी कांग्रेस का अधिवेशन चंडीगढ़ में चल रहा था। जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, बिहार के मुख्यमंत्री डा जगन्नाथ मिश्र, खान मंत्री चंद्रदीप यादव, श्रम मंत्री आदि भाग ले रहे थे। खान दुर्घटना की बात आग के तरह फैली। पटना के ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के पत्रकार, छायाकार चासनाला की ओर निकल गए थे। शहर में, माइंस क्षेत्र में हाहाकार मच गया था। कानून व्यवस्था तत्कालीन आरक्षी अधीक्षक तारकेश्वर प्रसाद सिन्हा तथा उपायुक्त लक्ष्मण शुक्ला के पास थी।

चासनाला कांड के 14 वर्ष बाद रानीगंज के महावीर कोलियरी में एक ह्रदय विदारक घटना घटी - वह भी भूमिगत खदान में पानी के प्रवेश से ही जुड़ा था। उस माईनस में 6 श्रमिक कभी नहीं निकल सके। उस दिन सोमबार था और नबम्बर महीने का 13 तारीख और 1989 साल। कोल इण्डिया लिमिटेड के ईस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड के अधीन रानीगंज में आता है महावीर कोलयरी। खदान के एक सीम में कोयला तोड़ने के लिए किये गए ब्लास्ट के कारण पानी रिसने लगा था। प्रारम्भ में रिसाव अधिक नहीं था, लेकिन समय के साथ-साथ पानी उत्प्लावित होने लगा। भूमिगत खदान के अंदर काम करने वाले श्रमिक अपनी और नेतृत्व की सूझ-बुझ के कारण खदान के ऊपरी हिस्से की ओर बढ़े स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए।
परिस्थिति की नाजुकता को देखते माइनिंग इंजिनियर जसवंत सिंह गिल ने एक स्टील का कैप्सूल बनाया। गिल साहब इंडियन स्कुल ऑफ़ माइंस से शिक्षा प्राप्त किये थे। जिस समय महावीर कोलियरी में घटना घटी थी, उस समय आइएसएम के निदेशक थे डॉ. डीके सिन्हा। मैं उन दिनों कलकत्ता से प्रकाशित दी टेलीग्राफ अखबार के लिए कार्य करता था। घटनास्थल पर सिंह के नेतृत्व में एक बोरहोल खोदा गया। एक कैप्सूल बनाया गया और फिर उस कैप्सूल की सहायता से 65 श्रमिकों को सुरक्षित बाहर निकला गया। छह श्रमिक मृत्यु को प्राप्त किये।
1989 रानीगंज कोलियरी काण्ड के बाद 26 सितंबर 1995 को भारत कोकिंग कॉल लिमिटेड के गजलीटांड़ कोलियरी में पानी भर गया। उस दिन मंगलवार था। गजलीटांड़ कोलियरी में कटी नदी का बाँध टूटने के कारण पानी कोलियरी के पीट नंबर छह में पानी भर गया। 1989 की उस रात को हुई मूसलाधार बारिस को यादकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। गजलीटांड़ कोलियरी में 64 श्रमिक मृत्यु को प्राप्त किये थे। मूसलाधार वर्षा के कारण उस रात भारत कोकिंग कॉल लिमिटेड के अन्य खदानों में भी करीब 15 श्रमिक भी अंतिम सांस लिए थे। उस रात कोई सवा नौ बजे बिजली चली गयी थी। कहते हैं खानों में 3000 मिलियन गैलन पानी भर चुका था। दुर्घटना की जांच के लिए सरकार ने न्यायमूर्ति एन.के. मुखर्जी की अध्यक्षता में आयोग गठित किया। 26 जून 1998 को आयोग ने अपनी रिपोर्ट तो सौंपी। परन्तु .....
छह वर्ष बाद, उस दिन शुक्रवार था। फरवरी महीने का 2 तारीख और 2001 साल। सुबह लगभग 11 बजे, बगल की जयरामपुर कोलियरी की पिट 5 नंबर खदान में पिछले तीन दशकों से जमा लाखों गैलन पानी अचानक अवरोधों को तोड़कर बागडिगी कोलियरी की 12 नंबर खदान की 7 नंबर परत में भर गया, जिससे दो अधिकारियों समेत 29 खनिकों की जल-समाधि हो गई।

चासनाला और गजलीटांड के बाद, धनबाद कोयला क्षेत्र में यह एक और बड़ी दुर्घटना थी। घटना के बाद खदान परिसर में फंसे श्रमिकों व मरने वालों के परिजनों की चीत्कार से हर कलेजा दहल उठा था। खाकी और खादी की फौज कई दिनों तक यहां रही थी। खान में फंसे मजदूरों को निकालने के लिए मुंबई से गोताखोरों की टीम आई थी। घटना के चार दिन बीतने के बाद जब खदान में फंसे श्रमिकों के बचने की संभावना क्षीण हो गई तो उनके परिजनों ने शव निकालने की अपील की। पांच फरवरी की रात बारह बजे गोताखोरों की टीम ने एक बैग में भरकर पहला शव खदान से बाहर निकाला था। क्षत-विक्षत लाश की पहचान कैप लैंप नंबर से की गई थी।
बागडिगी हादसा में खनक सलीम अंसारी जिंदा बच गया था। बिना खाए पीये सात दिन तक खदान के अंधेरे में मौत से संघर्ष कर सलीम ने नई जिंदगी पाई। उसके अनुसार, उस दिन सात नंबर सीम में उसकी ड्यूटी थी। अचानक विस्फोट हुआ और भागो-भागो की आवाजें आने लगी। खदान में पानी भरने लगा। हमारे साथ कई श्रमिक उसमें बहने लगे। तभी हम किसी प्रकार एक कोयले के ढेर पर चढ़ गए। बस इस पर ही सात दिन बैठे रहे। हमारे सामने ही कई साथी पानी में डूबकर दम तोड़ दिया। आठवें दिन तत्कालीन एजीएम श्री प्रसाद रेस्क्यू टीम के साथ खदान में पहुंचे। उन्हें देखकर चिल्लाया। हमें खदान से टीम ऊपर लाई। फिर जीवन के अंतिम साँस तक वह खदान के अंदर नहीं गया।

एक रिपोर्ट के अनुसार धनबाद झारखंड राज्य के 24 जिलों में से एक है। यह झारखंड के मध्य-पूर्वी भाग में स्थित है, जिसके उत्तर में गिरिडीह, पश्चिम में बोकारो, पूर्व में जामताड़ा ज़िला और दक्षिण में पुरुलिया ज़िला (पश्चिम बंगाल का) है। धनबाद जिला विरोधाभासों का क्षेत्र है। इतिहास और व्युत्पत्ति से पता चलता है कि धनबाद जिला एक समृद्ध कृषि क्षेत्र था। हिंदी शब्द धान जिसका अर्थ अनाज होता है और बैद जिसका अर्थ कृषि भूमि होता है, मिलकर धनबाद शब्द बनाते हैं। एक अन्य सिद्धांत खनिजों की उपस्थिति के कारण इस शब्द को धन (धन) और आबाद (समृद्ध) में विभाजित करता है, जिसका अर्थ अत्यधिक धन का स्थान होता है। यहाँ विरोधाभास यह है कि धन की भूमि में भी गहरी गरीबी है। धनबाद जिले के 423,880 परिवारों में से 381,250 परिवार गरीबी रेखा से नीचे हैं।
धनबाद शहर को भारत की कोयला राजधानी कहा जाता है और इसमें भारत की कुछ सबसे बड़ी कोयला खदानें हैं। इसका खनन इतिहास लगभग 200 वर्षों का है। यह भारत में उपलब्ध उच्चतम गुणवत्ता वाले कोयले में से एक प्रदान करता है। इस प्रकार, इसने लंबे समय से खनन गतिविधियों को आकर्षित किया है। भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (बीसीसीएल), टिस्को, टाटा स्टील, ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ईसीएल) और इंडियन आयरन एंड स्टील कंपनी (आईआईएससीओ) कुछ प्रमुख कंपनियां हैं जो धनबाद जिले में खनन में शामिल हैं।

वर्तमान में, लगभग 112 आधिकारिक कोयला खदानें और लगभग उतनी ही अवैध कोयला खदानें हैं। सांख्यिकी के अनुसार, 68.55% आबादी के पास आजीविका के लिए कोई गतिविधि नहीं है, इसलिए ज़्यादातर लोग 'अवैध' खनन को अपनी आय का स्रोत मानते हैं (जनगणना, 2011)। 1992 के बाद से स्थायी आधार पर मज़दूरों की कोई भर्ती नहीं हुई है, सभी मज़दूरों की भर्ती ठेके के आधार पर की गई है। जहाँ स्थायी मज़दूर 700 रुपये और 1,000 रुपये प्रतिदिन कमाते हैं और उन्हें कंपनी आवास, स्वास्थ्य सेवा और अन्य लाभ मिलते हैं, वहीं ठेके पर रखे गए मज़दूरों को बिना किसी प्रोत्साहन के 100 रुपये प्रतिदिन दिए जाते हैं। कोयला बेचकर आसानी से मिलने वाली कमाई के कारण, बच्चों को शिक्षा के बजाय खदानों से अवैध रूप से कोयला निकालने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
खनन परियोजनाओं का दूसरा पहलू पर्यावरण के साथ-साथ खदानों के आसपास रहने वाले लोगों पर पड़ने वाला हानिकारक प्रभाव है। खदानों, विशेषकर खुली खदानों के खराब प्रबंधन के कारण, जल, वायु प्रदूषित हुई है, भूमिगत आग अनियंत्रित रूप से फैल रही है और भूमि धंसने की कई घटनाएँ हुई हैं। इसका एक बड़ा प्रभाव कृषि पर पड़ा है। कहते हैं कि कोयला खनन के बाद खदानों को छोड़ देने के इस सामान्य चलन ने कृषि के लिए समतल भूमि की कमी की समस्या को बढ़ा दिया है। समतल भूमि के नुकसान की समस्या के अलावा, खनन से मिट्टी प्रदूषित होती है क्योंकि इसमें सल्फर की मात्रा अधिक होती है, इसकी अस्थिरता और कई पर्यावरण के प्रति संवेदनशील कार्बनिक और खनिज तत्व जैसे Fe, Mg, Bi, Al, V, Cu, Cd, Ni, Pb और Mn आदि होते हैं। इसका मतलब है कि धनबाद के कई हिस्सों की मिट्टी में कुछ भी पैदा करने की क्षमता नहीं है। खनन के कारण वनों की भारी कटाई भी हुई है। इसके अलावा, खराब पर्यावरणीय स्थिति के कारण लोगों में अस्थमा, तपेदिक, टाइफाइड, हैजा, पेचिश, दस्त जैसी जल जनित बीमारियाँ और बच्चों में निमोनिया, वायरल रोग, कुपोषण जैसी स्वास्थ्य समस्याएँ आम हो गई हैं।
1971-1973 में, खनन का राष्ट्रीयकरण और मशीनीकरण किया गया और बीसीसीएल खनन उद्योग में प्रमुख खिलाड़ी बन गया। लोगों की परेशानियाँ बढ़ गईं, कई श्रमिकों की नौकरियाँ चली गईं, लोग अपनी ज़मीनों से बेदखल और विस्थापित हो गए। हालांकि, खान अधिनियम, 1952 और कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 135 के तहत कंपनी द्वारा तैयार की गई सीएसआर नीति के तहत, कंपनियों को स्थानीय क्षेत्र और उसके आसपास के क्षेत्रों को प्राथमिकता देने का अधिदेश है जहां वे सीएसआर गतिविधियों के लिए अपनी कमाई का कम से कम 2% खर्च करते हैं। जिला खनिज फाउंडेशन (DMF) खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम (MMDR), 2015 के तहत बनाई गई एक और संस्था है जो खनन प्रभावित क्षेत्रों के साथ खनन लाभ साझा करने के उद्देश्य से हर साल लगभग 230 करोड़ रुपये जारी करती है। यह संस्था 15 सितंबर, 2015 को अस्तित्व में आई।
हालांकि अधिकांश क्षेत्रों में काम हुआ है, लेकिन यह ज्यादा से ज्यादा आधा-अधूरा ही हुआ है। जिले में स्थिति को मापने के लिए शिक्षा, पेयजल, स्वच्छता, रोजगार और आजीविका, सार्वजनिक स्वास्थ्य, पर्यावरण, खाद्य सुरक्षा और पोषण जैसे संकेतकों पर विचार किया गया DISE रिपोर्ट के अनुसार, धनबाद में ग्रेड 5 के सरकारी स्कूल के बच्चों का साक्षरता स्तर निजी स्कूलों में ग्रेड 2 या ग्रेड 3 के बच्चों से मेल खाता है। सरकारी स्कूल केवल चलने के लिए चल रहे हैं और केवल मध्याह्न भोजन योजना के कारण कार्यात्मक हैं। मध्याह्न भोजन योजना के अनुसार, स्कूलों में बच्चों को कार्य दिवसों पर मुफ्त दोपहर का भोजन प्रदान किया जाता है।

खनन प्रभावित क्षेत्रों और वहां रहने वाले लोगों की समस्याओं के कारण क्षेत्र में बड़े पैमाने पर 'संघर्ष' होते हैं। प्रशासनिक कार्यालयों के सामने विरोध प्रदर्शन या खदान के गेट और स्थानीय समाचार पत्रों के सामने धरना प्रदर्शन या विरोध प्रदर्शनों की खबरों से भरे मुख्यधारा के अखबारों में स्थानीय समाचारों का खंड धनबाद में नियमित घटनाएं हैं। यह संघर्ष सर्वहारा वर्ग के विभिन्न समूहों का है जैसे स्थायी कर्मचारी, ठेकेदारों के माध्यम से काम पर रखे गए कर्मचारी, बेरोजगार और विस्थापित ग्रामीण। प्रत्येक समूह खदानों से अपने विशिष्ट संबंध के आधार पर और अपनी विशिष्ट मांगों के लिए संघर्ष करता है। खनन कंपनियों के खिलाफ उनका संघर्ष निरंतर रहा है।
अब आइये मुद्दे पर। भारत के कुल 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में झारखंड भी एक राज्य है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश के इन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की 806 जिलों में धनबाद भी एक जिला है। हाँ, देश का अधिकांश जिला राजनीतिक मानचित्र पर तो है, लेकिन आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक मानचित्र में ढूंढने से किसी तरह मिल जाता है। वजह यह है कि देश का अधिकांश जिला धनबाद की तरह दुधारू नहीं है। धनबाद की एक खास विशेषता यह है कि यहाँ के कोयला माफियाओं, अपराधियों, दबंगों, व्यापारियों का उदय किसी न किसी के लाशों पर हुयी है। यानी अर्थ कमाने के लिए अन्य राज्यों की तुलना में यहाँ भी विचार और विषय का व्यापारीकरण होता है। वैसे मुंबई फिल्म बनाने वाले किसी भी विषय पर फिल्म बनाकर बाजार से पैसे कमाते हैं। धनबाद की घटनाएं भी अछूता नहीं रहा। विगत पचास वर्षों में न जाने यहाँ कितने महिलाओं के सुहाग धुले, कितनी बहने अपने अंतिम सांस तक अपने भाइयों के कलाइयों पर राखी नहीं बाँध सकी, कितने बच्चे जन्म के साथ अनाथ हो गए - लेकिन फिल्म बनाने वाले कभी उन परिवारों की ओर, चीखती, बिलखती विधवाओं की ओर, कराहते बच्चों की ओर नहीं देखा।
साल 1975 में दर्दनाक चासनाला कांड, जिसमें 375 श्रमिक मृत्यु को प्राप्त किये थे, उस घटना को केंद्र मानकर, यश चोपड़ा ने काला पत्थर फिल्म का निर्माण किया। यह सिनेमा यशराज फिल्म के बैनर के नीचे बनी थी। उस सिनेमा में अमिताभ बच्चन, जो 'दीवार (1975), कभी-कभी (1976), त्रिशूल (1978) फिल्म से शिखर पर चढ़ने लगे थे, के साथ-साथ शशि कपूर, शत्रुघ्न सिन्हा, राखी, परवीन बॉबी, नीतू सिंह, प्रेम चोपड़ा आदि कलाकार कार्य किये थे। वैसे फिल्म के निर्माता इस फिल्म को मजदूरों के शोषण, असुरक्षित परिस्थियाँ जैसे विषय को भी समावेश किया था। 'काला पत्थर' फिल्म चासनाला कांड के चार साल बाद 24 अगस्त, 1979 को भारत के सिनेमा घरों में प्रदर्शित हुआ। कहते हैं कि व्यावसायिक दृष्टि से इस सिनेमा का बजट दो करोड़ था, जबकि इससे कमाई करीब छह करोड़ और अधिक की हुई। इस फिल्म को 27 वे फिल्मफेयर पुरस्कार - सर्वश्रेष्ठ फिल्म, सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, सर्वश्रेठ अभिनेता, सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता, सर्वश्रेठ सहायक अभिनेत्री - के लिए भी नामांकित हुआ।
लेकिन सन 1979 से आज 2025 तक भारतवर्ष से प्रकाशित किसी भी अखबार, किसी भी पत्रिका, रेडियो, टीवी पर कुछ सेकेंड्स के लिए ही सही, इस बात के लिए एक भी शब्द पढ़ने को नहीं मिला, सुनने के लिए कान तरस गया कि 'काला पथ्थर' सिनेमा के निर्माता से लेकर अदाकार और अदाकारा तक चासनाला काण्ड में मृत्य को प्राप्त किये परिवारों, परिजनों के घरों में जाकर अपनी वेदना और संवेदना अर्पित किये हों। काला पत्थर सिनेमा से अर्जित धनराशि के दशमलव पांच फीसदी भी उन मृतक श्रमिकों के अनाथ बच्चों की शिक्षा पर व्यय किये हों। उनकी अनाथ बेटियों की शादी पर खर्च करने में मदद किये हों। असहाय विधवाओं, बेटियों, माताओं, पिताओं के स्वास्थ की देखरेख के लिए मदद हेतु हाथ बढ़ाये हों।

अब आइए दीपक किंगरानी और पूनम गिल की कहानी, विपुल के रावत की पटकथा, दीपक किंगरानी का संवाद, टीनू सुरेश देसाई के निर्देशन में वाशु भगनानी, दीपशिखा देशमुख, जैकी भगनानी और अजय कपूर द्वारा उत्पादित, अक्षय कुमार और परिणीति चोपड़ा द्वारा अभिनीत 'मिशन रानीगंज' फिल्म पर आते हैं। पश्चिम बंगाल के रानीगंज जिलाक्षेत्र में ईस्टर्न कोलफील्ड्स के रानीगंज माइंस में साल 1989 में हुई घटना, जिसमें छह खनक मृत्यु को प्राप्त किये थे और 65 खनकों को मृत्यु के मुख से कोल इण्डिया के अभियंता जसवंत सिंह गिल द्वारा निर्मित कैप्सूल से बचाकर जल से उत्प्लावित भूमिगत माइंस से बचाकर लाया गया था - पर आधारित फिल्म बनी थी। वैसे मिशन रानीगंज बॉक्स ऑफिस पर पीट गयी और अपेक्षा के अनुकूल आर्थिक लाभ नहीं हुआ। फिल्म जगत के लोग कहते हैं कि उस सिनेमा को 60 करोड़ की भी कमाई नहीं हुई।
जिस दिन रानीगंज में यह दुर्घटना हुई थी, मैं टेलीग्राफ कलकत्ता के लिए संवाददाता था। गिल इंडियन स्कूल ऑफ़ माइंस से पढाई किये थे, एक निजी क्षेत्र में नौकरी शुरू करने के पहले। उस समय इंडियन स्कुल ऑफ़ माईनस के निदेशक थे डॉ. डीके सिन्हा। सिन्हा का उन दिनों इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट कलकत्ता चैप्टर में निदेशक पद पर नियुक्ति के लिए बातचीत चल रही थी। उधर रानीगंज में माइंस में फंसे खानकों को प्रयास हो रहा था। गिल की कैप्सूल बनाने की बात शुरू हो गयी थी। अख़बार में कहानी लिखने के क्रम में मैं सिन्हा से मिला। वे कैप्सूल बनाने का श्रेय आइएसएम को देना चाहते थे, न कि गिल या कोल इण्डिया के अभियंता को। वजह था गिल माइनिंग इंजीनियरिंग की पढाई आइएसएम से किये थे।
'मिशन रानीगंज' सिनेमा को जसवंत सिंह गिल की मृत्यु के चार साल बाद बनाया गया था। यह सिनेमा 6 अक्टूबर 2023 को सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई, जबकि गिल 26 नवंबर 2019 को जसवंत सिंह गिल का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया।जसवंत सिंह गिल का जन्म अमृतसर के सठियाल मे 22 नवम्बर 1939 को हुआ। गिल धनबाद स्थित इंडियन स्कूल ऑफ माइंस में खनन इंजीनियरिंग में स्नातक किया था। बाद में करम चंद थापर एंड ब्रदर्स (कोल सेल्स) लिमिटेड नामक एक कोयला फर्म में कार्य किया और 1972 में कोल इंडिया लिमिटेड में अपनी सेवा शुरू किये। जिस समय गिल कॉल इण्डिया आये थे, उस समय कॉल इंडिया के अध्यक्ष थे पी मल्लिकार्जुन प्रसाद। उनके कार्यों को देखते कोल इंडिया ने उन्हें पहले कार्यकारी अभियंता बनाया और उसके बाद वे रानीगंज में ही मुख्य महाप्रबंधक ईडी (सुरक्षा एवं बचाव) बनाये गए। साल 1998 में जसवंत सिंह गिल चीफ जनरल मैनेजर ईडी (सेफ्टी एंड रेस्क्यू) के पद से रिटायर हुए।

मिशन रानीगंज में भले जसवंत सिंह गिल की तस्वीर पर सम्मान का माल्यार्पण किया गया हो, वास्तविकता यह है कि रानीगंज माइंस में मृत्यु को प्राप्त किये गया अथवा गिल के अथक प्रयास से जितने भी खनक सुरक्षित बाहर निकाले गए, सिनेमा निर्माता से लेकर कलाकार और अदाकारा शायद ही उन्हें जानते होंगे, पहचानते होंगे अथवा वे उनसे मिले होंगे।बहरहाल, सुनने में आ रहा है कि आजकल आदित्य पंचोली धनबाद कोयला माफिया पर सिनेमा बनाने का मन बनाये हैं और सूर्यदेव सिंह के सिंह मेंशन के लोग उनके आगे पीछे घूम रहे हैं।
क्रमशः ……
