शेरशाह सूरी मार्ग (दिल्ली उच्च न्यायालय)/जेल रोड (तिहाड़ जेल), नई दिल्ली: कितना विरोधाभास है। कल, यानी सोमवार, 11 अगस्त को, दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) को तिहाड़ जेल के अंदर चल रहे एक जबरन वसूली रैकेट के आरोपों की प्राथमिकी दर्ज करने और पूरी जाँच करने का निर्देश दिया। इस वसूली रैकेट में यह आरोप लगाया गया है कि इसमें कथित तौर पर कैदी और जेल अधिकारी दोनों शामिल हैं।
मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की पीठ ने आरोपों को "आश्चर्यजनक" बताया और कहा कि सरकार को "शीघ्र" और "गंभीर" ध्यान देना चाहिए। यह निर्देश सीबीआई द्वारा अपनी प्रारंभिक जाँच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के बाद आया, जिसमें अदालत ने कहा कि इससे जेल के भीतर अवैध और भ्रष्ट गतिविधियों में कैदियों और जेल कर्मचारियों की संलिप्तता का संकेत मिलता है।
इसके विपरीत, निवेशकों को 39,000 करोड़ रूपये वापस नहीं करने के जुल्म में सहारा समूह के मुखिया सुब्रत रॉय 'सहारा' जब तिहाड़ कारावास में बंद थे, वे विश्व के निवेशकों के साथ वार्तालाप करने के लिए न्यायालय से वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से बैठकें करने हेतु इंटरनेट एवं वाई-फाई की सुविधाओं के साथ मोबाईल फोन और लैपटॉप की मांग किये थे। उन्होंने यह भी कहा था कुछ कर्मचारियों की उपस्थिति भी कारावास में में हो उनके कार्यों को देखने के लिए। न्यायालय इसकी इजाजत दे दी थी।
न्यायालय ने यह आदेश दिया कि आशुलिपिकों (स्टेनोग्राफर्स) एवं सहायकों के स्टाफ को प्रातः 6 बजे से रात 8 बजे तक वहां ठहर सकते हैं। लेकिन तिहाड़ कारावास को इन सुविधाओं को उपलब्ध कराने के एवज में 12300000/- करोड़ रुपये का भुगतान करना पड़ेगा। सुब्रत रॉय को कोई आपत्ति नहीं हुई। वे न्यायालय के आदेश का पालन किये। पैसे दिए और सुविधाओं का लाभ भी उठाये।

कल न्यायालय ने आदेश दिया कि वसूली रैकेट में आरोपियों के खिलाफ सीबीआई प्राथमिकी दर्ज कर जान करे। न्यायालय का आदेश का पालन होगा। लेकिन विगत दिनों केंद्र सरकार का कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने अपने वार्षिक रिपोर्ट में यह बताया कि सीबीआई के पास 1025 मामले लंबित हैं, जिसमें 943 प्राथमिकी और 82 प्रारंभिक जांच (पीई) शामिल है। यह आंकड़ा 2022-23 का बताया था। स्वाभाविक है इन उन आकँड़कों में कल तक कमी नहीं, बल्कि इजाफा ही हुआ होगा।
विगत दिनों केंद्रीय कारा तिहाड़ के पूर्व जेलर सुनील कुमार गुप्ता, जो अपनी सेवा काल के अंतिम चरण में तिहाड़ के अंदर होने वाली गतिविधियों को वजागर करने के लिए जब दिल्ली सरकार में बैठे तत्कालीन नेताओं और तिहाड़ जेल में पदस्थापित शिर्षथ अधिकारियों के सामने मुंह खोला था, वे उन सभी लोगों का कोपभाजन का शिकार हुए थे। सेवा काल के अंतिम चरण में उनके विरुद्ध कई अनुशासनिक कार्रवाई की गयी थी, पेंसन रोक दिया गया था। पूर्व जेलर गुप्ता और दिल्ली के एक पत्रकार सुश्री चौधरी ने किताब भी लिखा - ब्लेक वारंट। बाद में इस किताब के आधार पर नेटफ्लिक्स पर सिनेमा भी दिखाया गया - क्या-क्या हुआ था, क्या-क्या होता है तिहाड़ कारावास के अंदर? किसकी-किसकी मिलीभगत होती थी या है भी। खैर।
कल, यानी सोमवार, 11 अगस्त को, दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को तिहाड़ जेल के अंदर चल रहे एक जबरन वसूली रैकेट के आरोपों की प्राथमिकी दर्ज करने और पूरी जांच करने का निर्देश दिया। इसमें कथित तौर पर कैदी और जेल अधिकारी दोनों शामिल हैं। मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की पीठ ने आरोपों को "आश्चर्यजनक" बताया और कहा कि सरकार को "शीघ्र" और "गंभीर" ध्यान देना चाहिए। यह निर्देश सीबीआई द्वारा अपनी प्रारंभिक जाँच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के बाद आया, जिसमें अदालत ने कहा कि इससे जेल के भीतर अवैध और भ्रष्ट गतिविधियों में कैदियों और जेल कर्मचारियों की संलिप्तता का संकेत मिलता है।
पीठ ने आदेश दिया, "स्थिति रिपोर्ट और प्रारंभिक जांच रिपोर्ट का अवलोकन करने के बाद, हम निर्देश देते हैं कि उसके आधार पर, सीबीआई द्वारा एक प्राथमिकी/आरसी दर्ज की जाए और जांच की जाए।" साथ ही, यह भी कहा कि 13 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई में प्रगति पर एक सीलबंद स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत की जानी चाहिए। अदालत ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि केंद्रीय जेल 8 और अर्ध-खुली जेल के निरीक्षण न्यायाधीश के निष्कर्षों - जो एक सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत किए गए थे - में "बेहद परेशान करने वाले तथ्य" सामने आए हैं, जिनमें "कुत्सित गतिविधियों को बढ़ावा देने" के लिए जेल के आधिकारिक लैंडलाइन का दुरुपयोग और कैदियों और बाहर के लोगों के बीच संदिग्ध कॉल रिकॉर्ड शामिल हैं।

निराशा व्यक्त करते हुए, पीठ ने सवाल किया कि उच्च सुरक्षा वाली जेल में इस तरह के अवैध संचालन कैसे जारी रह सकते हैं:"क्या हमारे पास एक मजबूत जेल नहीं हो सकती? जब कैदियों को बुनियादी मानवीय जरूरतें प्रदान करने की बात आती है, तो आप विफल हो जाते हैं। लेकिन जो कोई भी उसी व्यवस्था से लाभ उठाने की स्थिति में है, वह वहाँ अपने जीवन का आनंद ले रहा है। उन लोगों के बारे में सोचें जो ऐसे साधन वहन नहीं कर सकते। उनका क्या?"
अदालत ने दोहराया कि राज्य सभी कैदियों को बुनियादी न्यूनतम सुविधाएं प्रदान करने के लिए बाध्य है, साथ ही यह सुनिश्चित करना भी सुनिश्चित करता है कि इस व्यवस्था का धनवान या प्रभावशाली लोगों द्वारा शोषण न हो। पिछली सुनवाई में, दिल्ली के गृह विभाग के प्रमुख सचिव को प्रशासनिक और पर्यवेक्षी विफलताओं के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान करने के लिए एक तथ्य-खोजी जाँच का काम सौंपा गया था। सोमवार को, सरकार ने इस जाँच को पूरा करने के लिए और समय माँगा। दिल्ली कारागार महानिदेशक को पूर्ण सहयोग करने का निर्देश दिया गया है। सीबीआई को भी अपनी जाँच का दायरा जेल कर्मचारियों से आगे बढ़ाकर, कैदियों के किसी भी रिश्तेदार या यहाँ तक कि स्वयं याचिकाकर्ता को भी, यदि दोषी पाया जाता है, शामिल करने के लिए कहा गया है।
1958 से पहले, दिल्ली के दिल्ली गेट क्षेत्र में एक छोटी जेल स्थित थी। 1958 में, जेल को दिल्ली गेट से नई दिल्ली के पश्चिमी भाग में तिहाड़ गाँव की भूमि पर स्थानांतरित कर दिया गया था। शुरुआत में, केवल एक केंद्रीय जेल चालू थी जिसकी क्षमता 1273 कैदियों की थी। 1966 तक, दिल्ली जेलों का प्रशासनिक नियंत्रण पंजाब राज्य सरकार के पास था। 1966 में इसे दिल्ली प्रशासन, दिल्ली को हस्तांतरित कर दिया गया। अप्रैल 1988 तक दिल्ली जेल मैनुअल दिल्ली की जेलों पर लागू था, जब दिल्ली जेल मैनुअल का मसौदा तैयार किया गया और लागू हुआ। वर्तमान में दिल्ली की जेलों का संचालन नई दिल्ली जेल मैनुअल (2018) के अनुसार किया जा रहा है, जिसका मसौदा तैयार किया गया और जनवरी 2019 में लागू हुआ।
मार्च 1986 तक दिल्ली कारागार के महानिरीक्षक का कोई पूर्णकालिक पद नहीं था और यह कार्यभार अतिरिक्त रूप से दिल्ली के उप-आयुक्त द्वारा संभाला जा रहा था। 1986 में, महानिरीक्षक का पूर्ण पद सृजित किया गया और इसका नेतृत्व एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी को सौंपा गया। जैसे-जैसे जेलों में कैदियों की संख्या बढ़ती गई, कई नई जेलों और सुधारक कार्मिकों की स्थापना की गई। विभाग का नेतृत्व करने के लिए नए पदों की आवश्यकता उत्पन्न हुई और तत्पश्चात, जेल विभाग के प्रमुख के रूप में अतिरिक्त महानिदेशक और महानिदेशक के पद सृजित किए गए।
बहरहाल, विगत दिनों भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति (अब सेवानिवृत्त) डॉ. न्यायमूर्ति धनञ्जय वाई. चंद्रचूड़ सर्वोच्च न्यायलय के सेंटर फॉर रिसर्च एंड प्लानिंग के तत्वावधान में निष्पादित और प्रकाशित Report on Prisons In India: Mapping Prisons Manual and Measures for Reformationa and Decongestion – 2024 के प्रस्तावना में लिखा है कि “हम कैदियों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, यह एक समाज के रूप में हमारे बारे में और मानवाधिकारों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता के बारे में बहुत कुछ बताता है। भारतीय न्यायपालिका ने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि हर इंसान के आंतरिक मूल्य को पहचाना और संरक्षित किया जाना चाहिए। इसमें जेलों में बंद व्यक्ति भी शामिल हैं। गरिमापूर्ण जेलों की अवधारणा केवल एक आकांक्षा नहीं है, बल्कि एक संवैधानिक अनिवार्यता है, जो सभी नागरिकों को दिए गए मौलिक अधिकारों पर आधारित है।”
उन्होंने आगे लिखा है: “गरिमापूर्ण जेलें प्रभावी पुनर्वास के लिए भी आवश्यक हैं, क्योंकि वे आत्म-चिंतन, व्यक्तिगत विकास और अंततः समाज में पुनः एकीकरण के लिए अनुकूल वातावरण बनाती हैं। भारत में जेलों का गहन अध्ययन करने का विचार जेल मैनुअल में निहित औपनिवेशिक अतीत के अवशेषों की पहचान करने और देश की सुधार प्रणाली का मूल स्वरूप बनाने वाली जेल संस्थाओं को मानवीय बनाने के लिए बनाया गया था। साथ ही, हमारी जेल प्रणालियों के भीतर सामाजिक-आर्थिक भेदभाव का अध्ययन हमारे राष्ट्र के लिए सबसे महत्वपूर्ण विषय है। हमारी जेलें, जो सुधार और पुनर्वास की संस्थाएं हैं, उन्हें उन असमानताओं और पूर्वाग्रहों को कायम नहीं रखना चाहिए जो हमारे समाज को व्यापक रूप से प्रभावित करती हैं। इसके अलावा, यह समझना कि कैसे प्रौद्योगिकी का अभिनव उपयोग जेलों में भीड़भाड़ को कम करने में मदद कर सकता है और अधिक मानवीय सुधार प्रणाली में योगदान दे सकता है, इसमें परिवर्तनकारी क्षमता है।”
न्यायमूर्ति ने यह भी लिखा है कि “एक मानवीय जेल प्रणाली को अकेले हासिल नहीं किया जा सकता। इसके लिए न्याय प्रशासन प्रणाली के सभी संस्थानों से समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है, जिसका उद्देश्य कैदियों की स्वतंत्रता और गरिमा को सुरक्षित रखना है। जिला न्यायालयों द्वारा जमानत देने और न्याय तक पहुँच को आसान बनाने, कारावास के वैकल्पिक तरीकों को विकसित करने और मामलों का समय पर निपटान सुनिश्चित करने के लिए अभिनव उपायों को देने में बढ़ती अनिच्छा पर अधिक चर्चा होनी चाहिए।” प्रस्तावना में उन्होंने लिखा है कि “यह रिपोर्ट जेलों की कानूनी संरचना की एक तस्वीर पेश करने और यह आकलन करने का एक प्रयास है कि जेलें सजा के बजाय सुधार और देखभाल के लिए कैसे एक स्थान बन सकती हैं।

मुझे उम्मीद है कि इस रिपोर्ट की सामग्री को जेल परिदृश्य को फिर से जीवंत करने के लिए सकारात्मक कार्रवाई के आह्वान के रूप में लिया जाएगा। मेरा मानना है कि यह रिपोर्ट नीति निर्माताओं, सुधारात्मक संस्थानों, न्यायपालिका और अकादमिक बिरादरी के लिए सहायक होगी क्योंकि वे भारत में जेल प्रणाली को मजबूत करने के लिए रणनीति तैयार करते हैं। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे, मुझे उम्मीद है कि यह रिपोर्ट हमारे सामूहिक प्रयास में सहायता करेगी ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि समानता और सम्मान के सिद्धांत हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली के हर पहलू में परिलक्षित हों। सुधार का मार्ग चुनौतीपूर्ण हो सकता है, लेकिन यह एक ऐसी यात्रा है जिसे हमें अपने संविधान, लोकतंत्र और समाज के मूल्यों को बनाए रखने और प्रत्येक व्यक्ति के निहित मूल्य की रक्षा करने के लिए करना चाहिए।”
विगत दिनों केंद्रीय कारा तिहाड़ के पूर्व जेलर सुनील कुमार गुप्ता से मिला था एक कहानी के क्रम में। जेल में दबंग, खूंखार, पैसे वाले कैदियों द्वारा सामानांतर प्रशासन चलाने से लेकर, जेल के अंदर जेल कर्मियों, यहाँ तक कि ऊँचे-ऊँचे पदों पर बैठे अधिकारियों द्वारा ‘जबरदस्ती बसूली’ के साथ-साथ ‘अवैध सुविधा उपलब्ध कराने के लिए छोटी-छोटी राशियों की बसूली तक, अनेकानेक विषयों पर चर्चा हुई। आंकड़ों के अनुसार देश में अभी कुल 1412 कारावास हैं, जिसमें 137 केंद्रीय कारा, 394 जिला कारावास, 732 सब-जेल, 20 महिलाओं के कारावास, 20 बोरोस्टल जेल, 64 खुला जेल, 42 स्पेशल जेल और तीन अन्य प्रकार के जेल। इन सभी कारावासों को मिलकर 380876 कैदियों को रखने की क्षमता है।
हकीकत यह है कि आज़ादी के 78 वर्ष बाद आज भी भारत में 1412 कारावासों की स्थिति बेहतर नहीं है। आज भी कारावासों की संख्या बढ़ाने के लिए बैठकें होती है। सरकारी कोष से पैसे निकलते हैं लेकिन प्रशासन से लेकर समाज सुधारक तक, अधिकारियों से लेकर कैदियों तक – इन बातों पर बहस नहीं करते, सकारात्मक पहल नहीं करते जिससे कारावासों की संख्या बढे नहीं, बल्कि कैदियों की संख्या कम को। खैर।
वार्तालाप के दौरान सुनील गुप्ता इस बात को स्वीकार किये कि दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री केजरीवाल ‘भ्रष्टाचार के विरोध’ में बहुत काम किये और उनके प्रति उनका (गुप्ता का) सम्मान बहुत अधिक था और है भी। लेकिन यह बात स्पष्ट नहीं हो सका कि’तिहाड़ के आतंरिक स्थिति, खासकर सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय के बारे में जब उन्होंने अपनी बात सिर्फ केजरीवाल और तत्कालीन जेल मंत्री सत्येंद्र जैन को ही विश्वास पर बताये, वह भी बंद कमरे में; फिर मुख्यमंत्री केजरीवाल के आवास के उस बंद कमरे की बात कोई 20 किलोमीटर दूर स्थित तिहाड़ के तत्कालीन कारावास के महानिदेशक अलोक वर्मा के कक्ष तक कैसे पहुँच गयी? अगर केजरीवाल या फिर सत्येंद्र जैन उन बातों (शिकायतों) की चर्चा तत्कालीन कारा महानिदेशक के साथ नहीं किये तो फिर अचानक आलोक वर्मा के व्यवहार में परिवर्तन कैसे हो गया?
गुप्ता ने अपने किताब “ब्लैक वारंट” में लिखा है कि “सहारा समूह के मालिक सुब्रत राय भारतीय जेलों के इतिहास में पहला कैदी था, जिसे वातानुकूलित स्थान उपलब्ध कराया गया था। वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से बैठकें करने हेतु इंटरनेट एवं वाई-फाई की सुविधाओं के साथ मोबाईल फोन और लैपटॉप में उपयोग की अनुमति भी प्रदान की गयी थी। आशुलिपिकों (स्टेनोग्राफर्स) एवं सहायकों के स्टाफ को प्रातः 6 बजे से रात 8 बजे तक वहां ठहरने की इजाजत दी गई थी। इन सुविधाओं के एवज में उच्चतम न्यायालय ने तिहाड़ कारावास को 1. 23 करोड़ रुपये का भुगतान का आदेश भी दिया था।
लेखनी के अनुसार, “मार्च 2014 में उच्चतम न्यायालय ने सुब्रत राय को अपने निवेशकों के 39000 करोड़ रुपये वापस लौटने की असमर्थता के कारण तिहाड़ भेज दिया गया था। 64-वर्षित ऐश्वर्यपूर्ण कारोबारी, जो आये दिन अमिताभ बच्चन, अनिल अम्बानी और ऐश्वर्या राय जैयसी फ़िल्मी हस्तितियों के साथ पार्टियां किया करता था, तिहाड़ का कैदी बन गया था और बाजार नियंता भारतीय प्रतिभूति एवं विनियम्य बॉडी (सेबी) ने कहा था की उसे तब तक जमानत नहीं दी जाय, जब तक कि वह अपनी देनदारी के बराबर राशि न अर्जित कर ले। परन्तु सुब्रत राय के वकीलों ने न्यायालय को इस बात के लिए राजी कर लिया कि उसे बांछित राशि एकत्रित करने तक कारोबार करने की अनुमति दी जाय।”

एक सौ तेईस लाख रुपये कम नहीं होते। भारत का निनानब्बे फीसदी आवाम इस राशि के बारे में सोच नहीं सकता, देखने, अपना होने की बात या फिर किसी को देने की बात तो मीलों दूर। लेकिन 39,000/- करोड़ रुपये निवेशकों को वापस करने में असमर्थता जाहिर करने के कारण सहारा समूह के प्रमुख सुब्रत रॉय (अब दिवंगत) दिल्ली सरकार द्वारा संचालित और नियंत्रित केंद्रीय कारा तिहाड़ में ‘कई प्रकार की सुविधाओं को उपलब्ध कराने के लिए तिहाड़ प्रशासन को 1.23 करोड़ रूपये का भुगतान किये थे। सुविधा के लिए भुगतान करने का आदेश भारत का उच्चतम न्यायालय ने दिया था।
वैसी स्थिति में दिल्ली के तत्कालीन राजनीतिक आकाओं से यह उम्मीद करना कि वे तिहाड़ में बंद उस ‘कैदी’ के विरुद्ध प्रशासनिक कार्रवाई करेंगे, चाहे कार्रवाई करने वाला तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हो या तत्कालीन जेल मंत्री सत्येंद्र जैन – व्यर्थ था। लेकिन, एक अधिकारी के रूप में ‘शिकायत’ की गई और अंततः, पूरे 35-वर्षों के सेवा काल में वह अधिकारी जिस निकृष्टता से बचता रहा, अवकाश के बाद ‘विदाई के उपहार’ के रूप में आच्छादित करती नजर आई। यही राजनीति है और राजनीति में पैसों का मोल भी।
किताब के पृष्ठ संख्या 228 पर गुप्ता-चौधरी ने लिखा है कि “न्यायालय ने नियंत्रित अवधि के लिए तिहाड़ के सम्मलेन कक्ष को सुब्रत राय की कोठरी के रूप में उपयोग करने की अनुमति प्रदान कर दी, जिसका अर्थ यह था की वह भारतीय जेलों के इतिहास में पहला कैदी था, जिस वातानुकूलित स्थान उपलब्ध कराया गया था। वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से बैठकें करने हेतु इंटरनेट एवं वाई-फाई की सुविधाओं के साथ मोबाईल फोन और लैपटॉप में उपयोग की अनुमति भी प्रदान की गयी थी। यह सुविधा उसे 57 दिनों की निर्धारित अवधि हेतु प्रदान की गयी थी, ताकि वह अपनी सुविधा संपन्न संपत्ति को बेचने के लिए मोल-भाव कर सके; परन्तु सुब्रत राय को उसकी दो वर्षों की समूची अवधि के निवास के दौरान शाही (रेड कार्पेट) सुविधाएँ उपलब्ध कराई गई।”
गुप्ता आगे लिखे हैं: “बोतल बंद पानी और रेस्तरां के भोजन को तो भूल जाइये, जेल में बनाये गए विशेष न्यायालय परिसर में अब उन्मुक्त मद्द्य प्रवाह हो रहा था। अतीत में कैदी एक या दो पैग का जुगाड़ का लेते थे, परन्तु यहाँ कारोबार की बैठकों की आड़ में ‘विस्की भी अनुमत्य थी। उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित किये गए सचिवालय कर्मचारियों को देय भत्ते के कारण महिलाएं भी अति विशिष्ठ लोगों (वीआईपी) से सम्मलेन कक्ष में मिलने में सक्षम थीं। सहारा के दो कर्मचारियों को भी सुब्रत राय के साथ जेल में बंद किया गया था। गुप्ता ने अपनी पुस्तक में लिखा है: “वह मुझे हर बार यही यही सन्देश देते थे की ‘हमें आलोक वर्मा को रेंज हाथ पकड़ने की आवश्यकता है। और मैं हर बार उनसे यही कहता था की ‘इसका दायित्व आप लोगों पर है। मेरा कर्तव्य था आपको सूचित करना।”

तिहाड़ की हवाएं बदल गयी थी। एक महीने बाद “आलोक वर्मा ने मुझे ऑफिस में बुलाया,” गुप्ता ने पृष्ठ संख्या 231 पर अलोक वर्मा को उद्धृत करते लिखा : “तुम सत्येंद्र जैन को कैसे जानते हो? उन्होंने पूछा और कहा की जैन तुम्हारी बहुत प्रशंसा करते हैं।” गुप्ता कहते हैं कि “मैंने उन्हें बताया की वह मेरे स्थानीय विधायक थे और चुकी वह जेल मंत्री थे, इसलिए मैं सरकारी कारणों से उनसे मिलता रहता था। अब तक मैं थोड़ा असहज था। अगले दिन मुझे आलोक वर्मा के कार्यालय में पुनः बुलाया गया। इस बार मुझे थोड़ी देर प्रतीक्षा करने के लिए कहा। जब मैं उनके कमरे के अंदर गया तो उनके व्यवहार में विशिष्ठ परिवर्तन देखा। राजनितिक नेताओं के पास जाकर उनसे आवश्यकता है? क्या तुम्हे यह नहीं मालूम कि यह आचरण नियमों के विरुद्ध है?
बहरहाल, विगत दिनों कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) ने अपनी 2022-23 की वार्षिक रिपोर्ट में खुलासा किया है कि केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) के पास कुल 1,025 मामले लंबित हैं, जिनमें 943 प्राथमिकी और 82 प्रारंभिक जाँच (पीई) शामिल हैं। रिपोर्ट में खुलासा किया गया है, "इन 1,025 मामलों के अलावा, वर्ष के अंत तक 23 लोकपाल संदर्भ भी लंबित थे। 943 नियमित मामलों में से 447 एक वर्ष से अधिक समय से जाँच के अधीन थे। इसी प्रकार, 82 प्रारंभिक जाँचों में से 60 तीन महीने से अधिक समय से जाँच के अधीन थे।" रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जिन मामलों में जाँच पूरी हो चुकी है, उनमें वर्ष के अंत तक विभिन्न अदालतों में 10,732 मामले विचाराधीन थे। डीओपीटी ने अपनी रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया है कि वर्ष 2022 के दौरान, अदालतों ने सीबीआई के 557 मामलों में फैसले सुनाए थे। इनमें से 364 मामलों में दोषसिद्धि हुई, 111 मामलों में बरी हुए, 13 मामलों में आरोपमुक्त हुए और 69 मामलों का निपटारा अन्य कारणों से किया गया। दोषसिद्धि दर 74.59 प्रतिशत रही।
