संसद मार्ग (नई दिल्ली) : पचास से लेकर नब्बे के उत्तरार्ध और आगे तक अख़बारों में काम करने वाले पत्रकार, गैर-पत्रकार जिनका सम्पादकीय विभाग में आना-जाना रहा होगा, वे इस दस्तावेज के प्रारूप से अवगत होंगे। मुद्दत तक भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय से निर्गत दस्तावेजों में सबसे ऊपर चेतावनी स्वरूप लिखा होता था "NOT TO BE PUBLISHED BEFORE ...." भारत के तत्कालीन वायसराय और गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी द्वारा भारत का गणतंत्र राष्ट्र घोषित होने के पूर्व संध्या पर पत्र सूचना कार्यालय द्वारा निर्गत इस ऐतिहासिक प्रेस विज्ञप्ति में भी लिखा था - NOT TO BE PUBLISHED BEFORE JANUARY 26, 1950. शायद भारत के इतिहास में वह दिन एक ऐतिहासिक दिन था, जब भारत सम्पूर्णता के साथ एक गणतंत्र राष्ट्र घोषित होने जा रहा था। अपने देश के नागरिकों के लिए, देश में अपना कानून का राज स्थापित करने के लिए 26 नवम्बर 1949 को संविधान सभा द्वारा अपनाये गए ऐतिहासिक संविधान 'भारत का संविधान' लागू होने जा रहा था।
भारत 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ था और 26 जनवरी 1950 को इसे संविधान को आत्मसात किया गया, जिसके अनुसार भारत देश एक लोकतांत्रिक, संप्रभुता तथा गणतंत्र देश घोषित किया गया। 26 जनवरी 1950 को देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने 21 तोपों की सलामी के साथ ध्वजारोहण कर भारत को पूर्ण गणतंत्र घोषित किया। संविधान लागू होने के बाद डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने वर्तमान संसद भवन के दरबार हॉल में राष्ट्रपति की शपथ ली थी और इसके बाद पांच मील लंबे परेड समारोह के बाद इरविन स्टेडियम में उन्होंने राष्ट्र ध्वज फहराया था।
नई पीढ़ी को शायद ही यह मालूम हो कि देश की राजधानी दिल्ली में 26 जनवरी 1950 को पहला गणतंत्र दिवस समारोह राजपथ के बजाय इरविन स्टेडियम में मनाया गया था। उस दौरान स्टेडियम की चारदीवारी नहीं थी। खुले मैदान के सामने स्थित पुराना किला साफ दिखाई देता था। इसके बाद 1954 तक गणतंत्र दिवस समारोह कभी स्टेडियम, किंग्सवे (राजपथ), लाल किला तो कभी रामलीला मैदान में मनाया गया। राजपथ पर इस परंपरा की नियमित शुरुआत वर्ष 1955 से हुई।
एडवर्ड फ्रेडरिक लिंडले वुड, जिन्हें सामान्यतः लॉर्ड इरविन के नाम से जाना जाता है, 1930 के दशक के एक वरिष्ठ ब्रिटिश कंजर्वेटिव राजनीतिज्ञ थे, 3 अप्रैल 1926 से 18 अप्रैल 1931 तक ब्रिटिश भारत के वायसराय थे। उनके कार्यकाल में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कई प्रमुख घटनाएं घटीं, जिससे ब्रिटेन में उनकी प्रतिष्ठा भारत पर शासन करने वाले सबसे योग्य वायसराय के रूप में स्थापित हो गई। अक्टूबर 1925 में, भारत के सचिव लॉर्ड बर्कनहेड ने किंग जॉर्ज पंचम के सुझाव पर लॉर्ड इरविन को भारत के वायसराय के पद की पेशकश की। अपनी नई भूमिका स्वीकार करते हुए, वे 1 अप्रैल 1926 को भारत पहुंचे।
भारत सरकार अधिनियम 1919 ने प्रशासन की 'द्वैध शासन' प्रणाली की शुरुआत की थी, जिसका मतलब था कि स्थानीय स्तर पर सत्ता ब्रिटिश और भारतीयों के बीच साझा की जाएगी। अधिनियम के लागू होने के 10 साल बाद, यह जांचने के लिए एक आयोग बनाया जाएगा कि क्या आगे और सुधारों की आवश्यकता होगी। जबकि लॉर्ड इरविन का मानना था कि भारतीयों द्वारा स्वशासन आवश्यक था, उन्हें लगा कि स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न गुट प्रस्तावित आयोग का हिस्सा बनने पर एक समझौते पर नहीं पहुंचेंगे। उनकी सलाह थी कि साइमन कमीशन में केवल अंग्रेज़ शामिल होंगे, कोई भारतीय नहीं, लेकिन कमीशन के बारे में उन्होंने जो निर्णय लिया, उस पर उन्हें बहुत पछतावा हुआ।

साइमन कमीशन के गठन की घोषणा होने के बाद, भारतीय नेता भड़क गए और उन्होंने इसका पूरी तरह से बहिष्कार कर दिया। ब्रिटिश पुलिस और स्वतंत्रता सेनानियों के बीच हिंसा की घटनाएं भी हुईं, जिसमें लाला लाजपत राय की जान चली गई। साइमन कमीशन ने बहुत कम प्रगति की, लेकिन लॉर्ड इरविन का मानना था कि भारतीय नेताओं को बातचीत की मेज पर लाने के लिए एक प्रतीकात्मक इशारा आवश्यक होगा। लंदन में गृह सरकार की मौन स्वीकृति के साथ, लॉर्ड इरविन ने घोषणा की कि ब्रिटेन भारत के अंतिम प्रभुत्व की स्थिति के लिए प्रतिबद्ध होगा। 'इरविन घोषणा' का ब्रिटिश संसद के रूढ़िवादी गुटों ने विरोध किया। लेकिन उसे अभी भी एंग्लो-इंडिया संबंधों में दरार माना जाता था, फिर भी 29 दिसंबर को दिल्ली सम्मेलन में बहुत कम परिणाम मिले।
उस कालखंड में कोई प्रगति न होते देख महात्मा गांधी ने नमक सत्याग्रह शुरू किया, प्रतीकात्मक रूप से 24 दिनों में समुद्र तक मार्च किया और नमक पर सरकार के एकाधिकार को खत्म किया। इसके लिए लॉर्ड इरविन ने महात्मा गांधी और अन्य कांग्रेस नेताओं को गिरफ्तार करवा दिया, लेकिन इसके परिणामस्वरूप हुई सख्ती ने दुनिया की राय को भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ कर दिया।
नवंबर 1930 में, किंग जॉर्ज पंचम ने लंदन में प्रथम गोलमेज सम्मेलन का उद्घाटन किया; किसी भी कांग्रेस प्रतिनिधि ने भाग नहीं लिया क्योंकि गांधी जेल में थे। जनवरी 1931 में महात्मा गांधी को रिहा कर दिया गया और इरविन के निमंत्रण पर उन्होंने एक साथ आठ बैठकें कीं। पखवाड़े भर चली चर्चा के परिणामस्वरूप 5 मार्च 1931 को गांधी-इर्विंग समझौता हुआ, जिसके बाद सविनय अवज्ञा आंदोलन और ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार को स्थगित कर दिया गया और इसके बदले में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें सभी हितों का प्रतिनिधित्व किया गया।
दिल्ली स्थित दिल्ली उच्च न्यायालय के समीप स्थित कल का इर्विंग स्टेडियम, बाद में नेशनल स्टेडियम ने नाम से अंकित हुआ और फिर बाद में मेजर ध्यानचंद राष्ट्रीय स्टेडियम के नाम से जाना जाने लगा। यह एक बहुउद्देशीय स्टेडियम है जो पहले इरविन एम्फीथिएटर के नाम से भी जाना जाता था। 1951 के एशियाई खेलों से पहले इसका नाम बदलकर नेशनल स्टेडियम कर दिया गया था। साल 2002 में इसमें मेजर ध्यानचंद का नाम जोड़ा गया। यह स्टेडियम मुख्य रूप से मैदानी हॉकी के लिए प्रसिद्ध है और इसकी क्षमता 25,000 दर्शकों की है और यहाँ 2010 में हॉकी विश्व कप (पुरुष) का भी आयोजन किया गया था।
खैर, चलिए पत्र सूचना कार्यालय चलते हैं। 25 जनवरी, 1950 को 349 शब्दों में (1897 कैरेक्टर) टंकित तत्कालीन भारत के अंतिम वायसराय और गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी का यह वक्तव्य वह सब कुछ कह दिया था, जो स्वतंत्र और गणतंत्र भारत के लोगों को उन्हें संबोधित करना था। उन्होंने सबसे पहले "सात शब्दों" में वह सब कुछ कह दिया, जो आज गणतंत्र के 75 वर्ष बाद भी आज के राजनेता अपने देश के नागरिकों को कहने की हिम्मत नहीं जुटा सके। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने कहा था "हर किसी को अपना काम करना चाहिए।" लेकिन आज इन सात शब्दों को दोहराने वाले कितने हैं?

महामहिम गवर्नर-जनरल द्वारा बुधवार, 25 जनवरी, 1950 को रात्रि 8.30 बजे ऑल इंडिया रेडियो के दिल्ली स्टेशन से प्रसारित भाषण का मूल पाठ इस प्रकार था : "कल गणतंत्र के उद्घाटन के साथ अपने पद से हटने की पूर्व संध्या पर, मैं भारत के उन सभी पुरुषों और महिलाओं को अपनी शुभकामनाएं और बधाई देना चाहता हूं जो अब से एक नए गणतंत्र के नागरिक होंगे। मैं सभी वर्गों के लोगों द्वारा मुझ पर बरसाए गए स्नेह के लिए बहुत आभारी हूं, जिसने मुझे उन कर्तव्यों और परंपराओं का भार उठाने में सक्षम बनाया, जिनसे मैं बिल्कुल अनजान था।"
"मुझे विश्वास है कि हमारी सरकार सभी कठिनाइयों को दूर करेगी और हम लगातार आगे बढ़ेंगे। कुछ लोग ऐसे हैं जो आशा की आवाज़ नहीं सुनते और जिन्हें बुरे संकेतों का स्वाद मिल गया है। काश, यह उदास जमात कम हो जाए। मैं अब उन खुशमिजाज़ पुरुषों और महिलाओं से बात करता हूँ जो निराशा के बजाय आशा रखते हैं और - भगवान उनका भला करे - जो अपने-अपने काम में लगे रहते हैं और मानते हैं कि अगर हम ईमानदारी से काम करते रहेंगे तो सब ठीक हो जाएगा।"
चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने कहा था कि "मैं नहीं मानता कि भारत अचानक आर्थिक रूप से गरीब हो गया है। सापेक्ष मूल्य बदल गए हैं। वितरण में बदलाव किया गया है। ये ज़रूरी बदलाव हैं और इनकी निंदा नहीं की जानी चाहिए, हालांकि ये कुछ समय के लिए परेशान करने वाले हो सकते हैं। जब तक हम काम करते रहेंगे, मैं आपको भरोसा दिलाता हूँ कि कोई आर्थिक आपदा हम पर नहीं आ सकती। हमें अवसाद में नहीं पड़ना चाहिए। राष्ट्रीय संपदा का मूल आधार परिश्रम है और जब तक हम इसे कम होने से बचाते हैं, हम पहले से ज्यादा बदतर नहीं हो सकते और हमें अपनी स्थिति को और बेहतर बनाने के लिए ज़्यादा प्रयास करने होंगे।"
"हमें व्यक्तिगत उतार-चढ़ाव को समग्र रूप से देश की समृद्धि से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। "हमारे पास देश का मार्गदर्शन करने के लिए योग्य और उससे भी महत्वपूर्ण, अच्छे लोग हैं। आइए हम उनके प्रति अपनी पूरी निष्ठा और सहयोग दें, हम भाग्य के शिकारी न बनें, बल्कि एक महान गणराज्य के समर्पित नागरिक बनें, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को अपना कार्य उत्साह और निष्ठा के साथ करना चाहिए, ताकि हम उन उम्मीदों को पूरा कर सकें जो दुनिया के सभ्य राष्ट्रों ने हमसे की हैं।"
बहरहाल, एक सच्चे देशभक्त, अग्रणी समाज सुधारक, महान विचारक, उभट विद्वान, विदग्ध राजनेता, प्रख्यात वकील, योग्य प्रशासक और सबसे बढ़कर मानवतावादी चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जिन्हें प्यार से उनके प्रशंसक और सहयोगी “राजाजी” कहते थे, का जन्म 10 दिसम्बर, 1878 को मद्रास प्रांत * के सेलम जिले के थोरापल्ली गांव में हुआ था। उनके पिता चक्रवर्ती अयंगर, जिन्हें वेंकट आर्य के नाम से भी जाना जाता था, होसूर तालुका के मुंसिफ थे। राजगोपालाचारी की प्रारम्भिक शिक्षा उनके गांव के स्कूल में ही हुई। उन्होंने सेंट्रल हिन्दू कॉलेज, बंगलौर से स्नातक डिग्री प्राप्त की और मद्रास के लॉ कॉलेज में प्रवेश लिया। वर्ष 1899 में उन्होंने विधि स्नातक की परीक्षा में उत्तीर्ण होकर सेलम में वकालत प्रारम्भ की। अपनी वापटुता और अनूठी प्रतिभा के कारण उन्होंने सेलम के प्रतिष्ठित वकीलों में अपना स्थान बना लिया।
निवर्तमान गवर्नर जनरल श्री सी. राजगोपालाचारी को औपचारिक विदाई के अवसर पर
राजगोपालाचारी तथा उनके सहयोगियों के लिए लाई कर्जन द्वारा साम्प्रदायिक आधार पर बंगाल के विभाजन का निर्णय एक आघात पहुंचाने वाली घटना थी। राजगोपालाचारी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के उस आह्वान से बहुत प्रभावित हुए जिसमें उन्होंने प्रत्येक भारतीय को पूर्ण स्वराज के लिए अंग्रेजी साम्राज्य से लड़ने की अपील की थी। उन्होंने लोकमान्य तिलक को अपना गुरु मान लिया जिन्होंने सभी सुख-सुविधाओं, भौतिक समृद्धि एवं राजकीय सम्मान का त्याग कर दिया था।
राजगोपालाचारी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली। जुलाई, 1917 में राजगोपालाचारी को सेलम नगरपालिका का चेयरमैन मनोनीत किया गया। उन्होंने अनुभव किया कि इससे उन्हें जनता की सेवा करने, अपनी प्रशासनिक क्षमताओं का प्रदर्शन करने तथा गरीब एवं दलितों को राहत देने का सुअवसर प्राप्त होगा। उन्होंने अछूतों के इलाकों में जल-आपूर्ति आरम्भ की। उनके निर्देश पर अधिक-से-अधिक स्कूलों ने पिछड़े वर्गों और अछूतों के बच्चों को अपने यहां प्रवेश दिया। अपने राजनीतिक कार्यों एवं नगरपालिका के दायित्वों का निर्वाह करते हुए राजगोपालाचारी के पास वकालत के लिए समय नहीं रहा, लेकिन उन्होंने अपने कर्त्तव्यों को विश्वास के साथ निभाया।
सेलम जिले के निकट तिरुचेन्गोड के जमींदार ने आश्रम के लिए राजगोपालाचारी को चार एकड़ भूमि दान में दी, जिसका औपचारिक उद्घाटन फरवरी, 1925 में किया गया था। राजगोपालाचारी ने आश्रम में एक अस्पताल खोलने की कल्पना की थी जिसमें एक योग्य डॉक्टर हो। राजगोपालाचारी ने ग्रामीणों को उन परिवारों, जो शराब पीने की आदत से बर्बाद हो चुके थे, के उदाहरण देकर इस आदत की बुराइयों के बारे में समझाया। उन्होंने ग्रामीणों को यह भी बताया कि कुटीर उद्योगों पर निर्भर रह कर ही वे अपनी आर्थिक स्थिति सुधार सकते हैं। अपने घनिष्ठ सहयोगियों के साथ वह ग्रामीण पुनर्निर्माण का संदेश लेकर पड़ोस के गांवों में भी गए। जन उत्साह बढ़ा और आश्रम ग्रामीण कार्यों का केन्द्र बन गया। आश्रम में दो पत्रिकायें प्रकाशित होती थीं– तमिल में “विमोचनम्” (मुक्ति) और अंग्रेजी में “प्रोहिबिशन"। 'विमोचनम्' ग्रामीणों की आवश्यकता की पूर्ति करती थी। प्रौढ़ शिक्षा इस आश्रम का एक प्रमुख कार्यक्रम बन गया।

राजगोपालाचारी एक छोटी सी कुटिया में रहते थे। उन्होंने आश्रम के कार्यकलापों को बढ़ाया। मधुमक्खी पालन एक लाभप्रद शौक बन गया। अखाद्य तेलों से साबुन-निर्माण कार्य में बहुतों को काम मिला। अच्छी किस्म के बीजों के उत्पादन, बेहतर खाद तथा व्यवस्थित कृषि पर बल देना काफी लाभप्रद सिद्ध हुआ। स्वास्थ्य तथा सफाई कार्यक्रमों से रोगों का प्रकोप भी घटा। सादे और सामूहिक रहन-सहन ने आश्रम को एक असाधारण शांति प्रदान की। इन सभी कार्यों से राजगोपालाचारी, गरीबों के मित्र और उन लोगों के मार्गदर्शक और उपदेशक बन गये जो उनके पास उनके परामर्श और सांत्वना हेतु आते थे। दिनांक 12 मार्च, 1930 को गांधी जी ने ऐतिहासिक “दांडी मार्च” पर रवाना होने की योजना बनाई। मद्रास प्रांत में राजगोपालाचारी ने नमक कानून तोड़ने के लिये समुद्र तट की ओर एक लम्बी यात्रा का नेतृत्व किया। उन्होंने तिरुची से वेदारण्यम तक की यात्रा की योजना बनाई। दिनांक 13 अप्रैल, 1930 को राजगोपालाचारी के नेतृत्व में एक दल तिरुची से चला। लोगों ने यात्रा की सफलता के लिए खुलकर इसमें भाग लिया।
इस दल का तंजौर, कुम्भकोणम, तिरुथिरायपोंडी तथा रास्ते में अन्य सभी स्थानों पर पूरी गर्मजोशी के साथ स्वागत किया गया। सोलह दिन चलने के पश्चात् राजगोपालाचारी के नेतृत्व में यह दल वेदारण्यम पहुंचा। वे सभी नीचे झुके तथा उन्होंने अपनी-अपनी मुट्ठी में नमक भरा, तभी उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के पश्चात् तेजी से सुनवाई हुई और उसके बाद राजगोपालाचारी को छह माह के कारावास की सजा सुनाई गई।“सत्याग्रह” की लहरें वेदारण्यम तक पहुंच चुकी थीं। हजारों ने नमक कानून तोड़ा। हजारों लोगों के हाथों और हथेलियों पर चोट पहुंचायी गयी जिससे उन्होंने इस बहुमूल्य नमक को उठाया था। राजाजी वेदारण्यम सत्याग्रह से एक राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरे।
14 जुलाई, 1937 को राजगोपालाचारी ने तत्कालीन मद्रास प्रांत के प्रधानमंत्री का पदभार सम्भाला। सिविल सेवा में उच्च स्तर पर अधिकांशतया अंग्रेज थे, जिन्हें पहली बार भारतीयों से आदेश लेना पड़ा था। राजगोपालाचारी ने इस स्थायी सेवा के अधिकारियों तथा निर्वाचित प्रतिनिधियों के बीच अपनी प्रबुद्ध नीति से विश्वास पैदा करने का कार्य किया। उन्होंने इन नीतियों को क्रियान्वित करने के लिए अधिकारियों को काफी अधिकार दिए। उन्होंने संकेत दिया कि जो नीतियां एक बार मंत्रालय द्वारा निश्चित कर दी जायें, अधिकारियों द्वारा उन्हें उचित अमली जामा पहनाया जाना चाहिए। राजगोपालाचारी को गवर्नर लार्ड इर्सकाइन का समर्थन प्राप्त था।

उन्होंने एक 'दलित' को मंत्रिमंडल का सदस्य बनाया और यह सिद्ध कर दिया कि वह वास्तव में सभी जातीय पूर्वाग्रहों से दूर हैं। 'दलितों', जो अधिकतर कृषि मजदूर थे, के जीवन स्तर को उठाने के इच्छुक राजगोपालाचारी ने 'जमींदारी' समाप्त करनी चाही। राजगोपालाचारी की सरकार का मुख्य ध्येय सामाजिक और आर्थिक सुधार करना था। इन दोनों ही क्षेत्रों में राजगोपालाचारी ने अत्यधिक सफलता प्राप्त की। राजगोपालाचारी ने जिन अन्य कार्यक्रमों को अत्यन्त उत्साह से कार्यान्वित किया वे थे— 'खादी' का प्रचार, 'ग्रामीण' उद्योगों को बढ़ावा देना और स्कूलों में 'हिन्दी' की पढ़ाई शुरू करना। अधिकांश राष्ट्रीय मुद्दों पर राजगोपालाचारी का दृष्टिकोण स्वनिर्मित था। राजाजी अपने राजनीतिक आदर्शों के प्रबल रक्षक के रूप में जाने जाते थे और वह जनता के सामने अपने निकटतम सहयोगियों और मित्रों का विरोध करने में भी नहीं झिझकते थे। भारत छोड़ो आंदोलन के संबंध में उनका अपना दृष्टिकोण था।
स्वतंत्रता के बाद राजगोपालाचारी को बंगाल का राज्यपाल नियुक्त किया गया। उनकी सादगी आडंबर रहित स्वभाव, विभिन्न मामलों के प्रभारी राजनीतिज्ञों के साथ सामंजस्य तथा जनता के प्रति अगाध प्रेम ने उन्हें एक आदर्श राज्याध्यक्ष बना दिया था। वर्ष 1947 में जब स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर-जनरल लार्ड माउंटबेटन का कार्यकाल समाप्त हुआ, तो चक्रवर्ती राजगोपालाचारी इस पद के लिए चुने गये। वह पूरे देश में घूमे, लोगों से मिले, उनकी समस्याएं सुनी तथा प्रशासन की सामान्य प्रणाली के माध्यम से उनका समाधान करने का प्रयास किया। उन्होंने मुसलमानों की भावनाओं को शांत किया। उनसे अपील की कि वे बीती हुई बातों को भूल जाएं तथा राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल हो जाएं तथा हमारे धर्मनिरपेक्ष समाज का अभिन्न अंग बनें। दिसम्बर, 1950 में सरदार पटेल के निधन के बाद राजगोपालाचारी गृह मंत्री नियुक्त किए गए। उन्होंने संसद में निरोधक नजरबंदी अधिनियम प्रस्तुत किया था जिस पर विपक्ष ने आलोचनात्मक टिप्पणियां की थीं। यहां तक कि अनेक कांग्रेसजनों ने भी यह महसूस किया था कि इस विधेयक में सत्तावाद की बू आती है।
लेकिन राजगोपालाचारी ने यह कहते हुए इस विधान की हिमायत की थी कि राष्ट्र की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ऐसी आवश्यक न्यूनतम शक्तियां तो सरकार के पास होनी ही चाहिएं। प्रथम पंचवर्षीय योजना तैयार करने, कश्मीर के नाजुक मसले का हल ढूंढ़ने और देश में नई शासन व्यवस्था के अधीन प्रथम राष्ट्रीय चुनाव की तैयारी करने में भी उनकी सलाह ली गई थी। दिसम्बर, 1951 में उन्होंने केन्द्रीय मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। वर्ष 1952 में हुए आम चुनावों में, मद्रास प्रांत में कांग्रेस हार गई थी। दिनांक 29 मार्च, 1952 को मद्रास कांग्रेस ने सी. सुब्रमणियम द्वारा प्रस्तुत एक संकल्प पारित किया जिसके तहत राजगोपालाचारी को राज्य विधान सभा में कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व संभालने को कहा गया।

राजगोपालाचारी ने अपने खराब स्वास्थ्य के बावजूद अपनी पार्टी के अनुरोध को स्वीकार कर लिया। उन्होंने विधायकों द्वारा दिन- प्रतिदिन के प्रशासन में हस्तक्षेप करने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित किया। उन्होंने सभी विधायकों को निर्देश दिया कि वे अपने अपने निर्वाचन क्षेत्र में काम करें और जनता से संपर्क बनाए रखें। राजगोपालाचारी को राष्ट्र के प्रति उनकी सराहनीय सेवाओं के लिए सन् 1954 में 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया। वह इस सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित किए जाने वाले पहले व्यक्ति थे। राजाजी ने सन् 1959 में ‘स्वतंत्र’ पार्टी बनायी जिसने बाजार आधारित अर्थव्यवस्था हेतु सक्रिय अभियान चलाया। राजाजी के अनुसार स्वतंत्र पार्टी एक राजनीतिक दल होने से अधिक एक आंदोलन था। उनका विश्वास था कि विभिन्न प्रकार के नियंत्रणों से राष्ट्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में उनके सर्वप्रथम कार्यों में से एक था- खाद्यान्नों के वितरण और उनके मूल्यों को नियंत्रणमुक्त करना। वर्ष 1962 में राजगोपालाचारी ने परमाणु-परीक्षणों पर प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर गांधी शांति न्यास के तहत संयुक्त राज्य अमरीका गए शिष्टमंडल का नेतृत्व किया। राजगोपालाचारी राष्ट्रपति केनेडी से अपने निजी सम्पर्क के अच्छे परिणामों की उम्मीद लेकर वापस लौटे। राजगोपालाचारी ने संयुक्त राष्ट्र संघ का भी दौरा किया।
तत्कालीन महासचिव यू. थांट ने राजगोपालाचारी का स्वागत किया और उनके इस सुझाव को सुना कि महासभा संकल्प पारित करके संयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत संघ, दोनों ही को सभी परमाणु-परीक्षण बंद करने के लिए कहे। राजगोपालाचारी ने मांग की कि महासभा को परमाणु-परीक्षणों पर पूर्णतया प्रतिबंध लगाने के बारे में गंभीर प्रयास करना चाहिए और उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ से अनुरोध किया कि जो राष्ट्र परमाणु-प्रसार पर प्रतिबंध का पालन करने में असफल रहें, उनको इस विश्व-संस्था से निष्कासित किए जाने की चेतावनी दी जाए।

दिनांक 25 दिसम्बर, 1972 को 93 वर्ष की आयु में इस विख्यात राजनेता और भारत के महान सपूत का देहावसान हो गया। वह अपने पीछे अपनी राजनैतिक, दार्शनिक और साहित्यिक कृतियों का एक विशाल कोष छोड़ गए, जो आने वाले समूचे काल के लिए राष्ट्र के पास धरोहर के रूप में रहेगा। भारत के इस महान सपूत के निधन पर समूचे राष्ट्र– संसद, राज्य विधानमंडलों, समाचारपत्रों व जीवन के हर क्षेत्र के नेताओं और विदेशों के विशिष्ट व्यक्तियों ने दुख व्यक्त किया।
दिवंगत आत्मा के प्रति भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने कहा थाः "उनकी प्रसिद्धि उन पदों के कारण नहीं थी, जिन पर वह रहे बल्कि वह अपनी असाधारण, उत्कृष्ट और अपार बुद्धि तथा न केवल भारत, बल्कि समूची मानवता के प्रति समर्पण की भावना के कारण प्रसिद्ध हुए थे।'
लोक सभा में श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए तत्कालीन अध्यक्ष, डॉ. जी.एस. ढिल्लों ने कहा थाः “किसी भी राष्ट्र के इतिहास में ऐसे बहुत ही कम क्षण आते हैं जब वहां के लोग जाति धर्म, राजनीतिक संबद्धता आदि से ऊपर उठकर ऐसे व्यक्ति के निधन पर शोक प्रकट करते हैं, जिसने उनके बीच रहकर विशिष्टता अर्जित की हो । राजाजी के नाम से लोकप्रिय यह व्यक्ति त्याग और सरलता के कारण अपने-आप में एक संस्था बन गया था।"
राज्य सभा में, तत्कालीन उप राष्ट्रपति एवं राज्य सभा के सभापति, श्री जी.एस. पाठक ने कहा थाः “...राजगोपालाचारी भारतीय जीवन और संस्कृति में व्याप्त उत्कृष्टता के प्रतीक थे। वह एक दूरदर्शी राजनीतिज्ञ और उच्च कोटि के विद्वान थे जिन्होंने पचास से भी अधिक वर्षों तक देश के नेतृत्व की अग्रिम पंक्ति में अपना स्थान बनाए रखा।"
तस्वीरें: राष्ट्रपति भवन के सौजन्य से
