पटना / नई दिल्ली : भारतवर्ष में अपवाद छोड़कर बिरले ही कोई भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी होंगे, आज भी, जो दफ्तर अथवा आवास में बजने वाली फोन की घंटी को स्वयं फोन उठाकर शांत करते होंगे। फोन के दूसरे छोड़ से ' 'हेलो' कहने वालों को 'हैल्लो' कह कर जबाब देते होंगे, उनकी बात सुनते होंगे, उचित सलाह देते होंगे और अंततः उनकी शिकायतों पर उचित कार्रवाई का आदेश देते होंगे। क्योंकि आज वे स्वयं फोन नहीं उठाते, अलबत्ता आज उनके राजनीतिक आका फोन की घंटी बजाकर उन्हें उठाते हैं।
मेरे जीवन काल में अब तक तीन ऐसे घटनाएं हुई हैं जब दूसरी छोड़ पर वही व्यक्ति फोन उठाये, जिनसे बात करने के लिए मैं देर रात फोन किया था। नब्बे के दशक में 1994 से 1997 तक भारत के सर्वोच्च न्यायालय के 26वां मुख्य न्यायाधीश रहे न्यायमूर्ति ए. एम. अहमदी को देर रात 1 बजे फोन किया था एक खास उद्देश्य से। साल 1995 में बम्बई उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए.एम. भट्टाचार्जी एक पुस्तक प्रकाशन के मामले में फंस गए थे। बम्बई बार एसोसिएशन, जिसका नेतृत्व इक़बाल चागला कर रहे थे, न्यायाधीश का त्यागपत्र की मांग को लेकर देशव्यापी आंदोलन कर रहे थे। आरोप था कि न्यायमूर्ति भट्टाचार्जी किताब के प्रकाशन के मामले में प्रकाशक से अच्छी खासी रकम लिए थे।
इस खबर की पुष्टि के लिए इंडियन एक्सप्रेस के बम्बई संस्करण के तत्कालीन संपादक दिल्ली को फोन कर खबर की पुष्टि के साथ-साथ 1500 शब्द की कहानी की मांग तक्षण किये। मैं उस रात अपने संवाददाता कक्ष में रात्रिकालीन पाली में था। तभी रात्रिकालीन पाली के समाचार संपादक राजेश्वर प्रसाद दौड़ते आये और तत्काल खबर की पुष्टि कर खबर लिखने, मुंबई भेजने का आदेश दिए। मैं दिल्ली उच्च न्यायालय देखता था, लेकिन न्यायमूर्ति अहमदी से एक बार मिला था। वे अपना नंबर भी दिए थे। अब तक रात का एक बज गया था। मैं तत्काल उनके द्वारा दिए नंबर पर आवास पर फोन की घंटी टनटना दिया। दूसरे छोड़ से जो आवाज थी और न्यायमूर्ति अहमदी की ही थी। मैं सवाल पूछा, वे सकारात्मक उत्तर दिए और फिर मैं 1500 शब्दों की कहानी मुंबई के प्रातः संस्करण में प्रथम पृष्ठ पर नाम के साथ कहानी प्रकाशित हुयी।
दूसरी घटना भी नब्बे के दशक में ही हुई जब दिल्ली के कनॉट प्लेस क्षेत्र में देर रात सीवर लाइन ब्लास्ट हुआ था। दुर्भाग्य से उसी दिन एक्सप्रेस के प्रथम पृष्ठ पर एक कहानी प्रकाशित हुई थी जिसमें सांख्यिकी के आधार पर यह कहा गया था कि दिल्ली पुलिस दिल्ली के वेश्या वाले इलाके से, यानी श्रद्धानन्द मार्ग (जी बी रोड) स्थित कोठों से वेश्याओं से पैसा वसूलती है। वह कहानी शहर ही नहीं, दिल्ली पुलिस में कोहराम मचा दी थी।
उसी रात जब ब्लास्ट हुआ, मंदिर मार्ग के पुलिसकर्मी हम दो जनों को - संजीव सिन्हा (अब दिवंगत) और मुझे - बहुत मारी थी। बाद में राम मनोहर लोहिया अस्पताल में चिकित्सा हुआ। उस रात मैं मंदिर मार्ग थाना से तत्कालीन केंद्रीय गृह राज्य मंत्री पी.एम. सईद को फोन किया था। रात के करीब 1 बजा था। सईद साहब गृह मंत्रालय के कार्य को निष्पादित कर रहे थे। अपनी सारी बातें उन्हें बताये। वे तत्काल दफ्तर जाकर पूरी कहानी लिखने, प्रकाशित करने को कहे; साथ ही, दिल्ली पुलिस आयुक्त निखिल कुमार को आदेश देकर तत्काल प्रभाव से उन पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई करने का आदेश भी दिए।

कल पचास साल बाद पहली बार एक और फोन किया। यह फोन सं 1974-1977 के कालखंड में पटना के जिलाधिकारी के नंबर पर था। विजय शंकर दुबे स्वयं फोन उठाये। सम्मानित दुबे जी की यह आदत उनके जीवन में अमूल्य स्थान रखता है और अपने उसी निजी गुण के कारण वे भारतवर्ष के अन्य प्रशासनिक अधिकारियों से अलग हैं, आज भी। पटना ही नहीं, अविभाजित और विभाजित बिहार के सैकड़ों प्रशासनिक सेवा के अधिकारी, जो आज स्वयंभू मठाधीश बने बैठे हैं, इन्हीं गुणों की किल्लत के कारण कभी लोगों के हृदय में नहीं उतर सके। दुबेजी आज लाखों नहीं, करोड़ों चाहने वालों के हृदय में बैठे हैं। वैसे इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते हैं कि आज उनके भी आलोचक हैं, छलनी से उनके भी दोषों को छानने की कोशिश करते हैं, लेकिन इसकी संख्या अधिक नहीं है ।
बहरहाल चलते हैं साल 1974 के मई-जून महीने में। नए नए जिलाधिकारी के रूप में आए थे दुबे जी । उम्र 32-33 वर्ष के होंगे और विवाह भी नया नया हुआ था। जिले के सभी कार्यों को निपटा कर कुछ महत्वपूर्ण फ़ाइलों का अवलोकन कर रहे थे । वह कालखंड खाद्यान्न की किल्लत के साथ साथ कला बाज़ारी, चोर बाज़ारी का हो गया था। वैसे प्रदेश ही नहीं, देश में तत्कालीन सत्ता के सिंहासन पर बैठी इंदिरा गांधी को उखाड़ कर फेंकने की शुरुआत हो गई थी।
जिस तरह उम्र के साथ युवाओं के चेहरे पर मूँछ की लकीरें निकलने लगती है, प्रदेश में कुकुरमुत्तों की तरह गली- कुचियों में नेता रातो-रात जन्म ले रहे थे। सुबह होते सड़कों पर जुलूस भी निकालने लगते थे और शाम होते प्रदेश के आला नेताओं के साथ बैठकर दो दो चार भी करते थे। प्रदेश में विकास की दर और नेताओं की उत्पत्ति में कोई तारतम्य नहीं था। नेता अधिक बन रहे थे, विकास बहुत पीछे हो गया था। हाँ, विकास अगर हो रहा था तो चोर बाज़ारों का।
अब तक रात का कोई दो बज गया था। तभी जिलाधिकारी के आवास पर पटना टेलीफोन का यंत्र ट्रिंग ट्रिंग किया। दुबे जी स्वयं फोन को उठाये थे। उस समय यह स्पष्ट नहीं हो सका कि किसी ने जानबूझकर समाचार देने के लिए फ़ोन की घंटी टनटनाया था या फिर क्रॉस कनेक्शन था। वैसे बिहार में आर्थिक किल्लत के कारण प्रशासन को, पुलिस को “सूचना देने वालों “ को रखने में दिक्कत होती थी, आज भी स्थिति बेहतर नहीं होगी, लेकिन दुबे जी जैसे कर्मठ पदाधिकारी के लिए सूचना दाताओं की कमी नहीं थी।
दुबे जी कहते हैं: चाहे सूचना देने के लिए फोन किया हो या क्रॉस कनेक्शन, जानकारी मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण थी। फोन पर दो व्यक्ति बात कर रहा था कि राजवंशी नगर के फलाने ठिकाने पर कई बोड़ियों में गेहूं, चावल, चीनी और अन्य पदार्थ, जो पटना के नागरिकों को जन वितरण प्रणाली की दुकानों से बांटने के निमित्त था, कालाबाज़ार में बेच दिया गया था। मैं तत्काल कुछ कर्मियों को लेकर उस स्थान पर पहुँच गया। किसी को कानो कान खबर नहीं थी। मेरे पहुँचने से पहले सामान तो निकल गया था, लेकिन संदिग्ध लोग गिरफ़्तार हो गए, फिर सामान भी पकड़े जाने लगा। वह रात पटना के लोगों के लिए एक टर्निंग पॉइंट था और काला बाजारियों के लिए भी।"
दुबे जी आगे कहते हैं की "सन चौहत्तर का कालखंड में राजनीतिक घटनाओं के अलावे कई एक घटना हुई जिस पर आज भी ग्रंथ लिखा जा सकता है। साल चौहत्तर मूलतः विपन्नता का समय था। खाद्यान्न की किल्लत थी। गेहूँ, चावल, किरासन तेल, चीनी, कपड़ा की किल्लत थी। बिजली से लोगों के घरों में कम, डिबिया और लालटेन से रोशनी होती थी, वह भी काम होते उसके लौ को कम कर दिया जाता था ताकि किरासन तेल का खपत कम हो। गेहूँ के लिए भारत सरकार कनाडा, अमेरिका, रसिया, यूक्रेन के तरफ़ देखता रहता था। देश में खाद्यान्न का उत्पादन बहुत कम था। उन्ही परिस्थितियों का लाभ उठाने के लिए समाज में सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से कालाबाज़ारी सर उठाकर बोलने लगा था। सम्पूर्ण समाज एक तरफ़ जहाँ राजनीतिक भूचाल का सामना कर रहा था, वहीं चोर बाज़ारी के कारण प्रशासन द्वारा चाहने पर भी उन्हें खाद्यान्न नहीं मिल पा रहा था।"

1966-बैच के भारतीय प्रशासनिक अधिकारी विजय शंकर दुबे आगे कहते हैं कि "तभी एक विचार आया की कालाबाजारी को रोका जा सकता है, बशर्ते लोगों को यह विश्वास दिलाया जाय कि वे जाली राशन यूनिट को समर्पित कर, आधिकारिक रूप से जो वास्तविक सदस्यों की संख्या है, उसे उद्धृत करें और उन्हें विश्वास दिलाया जाय की ऐसा करने से प्रशासन प्रति यूनिट सामानों की मात्रा दोगुनी, तीन गुनी कर देगी। पहले लोगों को विश्वास नहीं हुआ। यह एक सूत्री कार्यक्रम था। हमने पटना के चौराहों पर, गलियों के नुक्कड़ों पर, विद्यालयों में सभी जगह सैकड़ों केंद्र खोले। पुरे शहर में, चतुर्दिक विज्ञापनों के माध्यम से, पोस्टरों के माध्यम से, लाउडस्पीकर उद्घोषणा के माध्यम से लोगों को विश्वास दिलाना शुरू किया कि वे प्रशासन के इस प्रयास में मदद करें। वे अपना जाली राशन कार्ड, यूनिट, बिना अपना परिचय दिए समर्पित करते चलें। प्रशासन भी उनके परिचय को गुप्त रखेगी।"
"परिणाम यह हुआ कि उस प्रयास का बहुत ही सकारात्मक असर पड़ा। जहाँ-जहाँ कैम्प लगाए गए थे, लोग-बाग़ कोने में अपना अपना अतिरिक्त यूनिट वाला राशन कार्ड फेंकने लगे। प्रशासन के तरफ से सभी कैम्पों में अधिकारियों को मुस्तैद कर दिया गया था, जो तत्काल लोगों की सुविधा और उनके द्वारा बताये गए परिवार के लोगों की वास्तविक संख्या के आधार पर नया राशन कार्ड और अधिक सामग्रियों की मात्रा को लिखकर देने लगे। आपको आश्चर्य होगा कि सिर्फ दो दिन में दस लाख से अधिक जाली यूनिट का समर्पण हुआ । हमारा यह प्रयास लोगों के हृदय में प्रशासन के प्रति विश्वास जगाया, साथ ही कला बाज़ारी के क्षेत्र में, सरकारी कर्मचारियों में दहशत।"
दुबे जी पटना के जिलाधिकारी के रूप में उस समय आये जब एक ओर शहर में कालाबाज़ारी अपने चेहरे को निर्लज्जता के साथ काले रंग में रंग लिया था, वहीँ दूसरी और पूरा कालखंड खाद्यान्न की किलत के दौर से गुजर रहा था। पटना से प्रकाशित अख़बारों का शायद ही कोई पन्ना ऐसा होता था जहाँ इन मामलों को लेकर खबरें चीत्कार मारते फैली नहीं होती थी। एक ओर जहाँ समाज में काला बाजारों का ‘संरक्षित’ और ‘सुरक्षित’ माफियागिरी सर उठाकर बोल रहा था, वहीँ तत्कालीन पटना के लोग हताश मन से प्रशासन के आला अधिकारियों के कार्यालयों में टटकी निगाहों से देख रहे थे। चोर-चोर मौसेरे भाई का नारा बुलंद हो रहा था।
जब दुबे जी पूछा कि उस काल खंड में वे पटना के युवाओं के लिए एक प्रेरणा बन गए थे, वे मुस्कुराते कहते हैं: "मेरे काम करने का तरीका कुछ अलग था। मैं बनावटी दुनिया में नहीं जीता था, और आज भी नहीं जीता हूँ। मैं अपने कार्यकाल में कभी भी निजी उपयोग के लिए सरकारी तंत्रों, सुविधाओं का इस्तेमाल नहीं किया।"
लिक से हटकर जब उनसे पूछा कि डाक बंगला चौराहे पर स्थित भारत कॉफी हाउस की कोई यादगार बात, वे कहते हैं: "उन दिनों भी मैं भारत कॉफी हाउस भ्रमण-सम्मेलन करने वाले नित्य के लोगों में नहीं था, विवाह हुए बहुत अधिक समय भी नहीं हुआ था, इसलिए महीने-दो महीने में आवास से निकलता था, पचास पैसे में रिक्शावाला घर से डाक बंगला चौराहे पर स्थित भारत कॉफी हाउस पहुँच देता था। वहां चालीस-पचास पैसे में डोसा मिलता था, 15-20 पैसे में काफी, खा-पीकर हँसते-मुस्कुराते रिक्शा से वापस होते थे।”
दुबे जी उन दिनों भी सरकारी वाहनों का निजी अथवा पारिवारिक उपयोग के लिए इस्तेमाल नहीं करते थे। इस बात का जिक्र तत्कालीन अख़बारों में प्रकाशित होते थे। आज की तो बात ही नहीं है। वे कभी सूचित भी नहीं होने देते थे कि वे डोसा खाने या काफी पीने आ रहे हैं सपरिवार। फुलपैंट, चप्पल और हाफ बुशर्ट पहने वाले दुबे जी कहते हैं कि “पटना ही नहीं, भारत में जहाँ-जहाँ काफी हॉउस था, या आज भी है, वह सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, कला, संस्कृति आदि से सरोकार रखने वालों का एक जबरदस्त जमावबाड़ा था। शहर के पत्रकार, संभ्रांत, शिक्षक, अध्यापक सभी संध्याकाळ में एकत्रित होते थे। विभिन्न विषयों पर चर्चाएं करते थे तो तत्कालीन समाज के लिए उपयोगी होता था। गजब का समय था, गजब के लोग थे। आज तो शहर में है ही नहीं।

विजय शंकर दुबे 1998 में बिहार के मुख्य सचिव के रूप में नियुक्त हुए। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा 2000 में झारखण्ड राज्य का निर्माण हुआ, दुबे जी नए प्रदेश के पहले मुख्य सचिव के रूप में कार्यभार संभाला। वे बिहार और झारखण्ड के दो राज्यों के मुख्य सचिव के रूप में कार्य करने वाले एकमात्र आईएएस अधिकारी हैं । 2002 में सेवानिवृत्ति के बाद, विजय शंकर दुबे 2003 से 2009 तक नालंदा ओपन विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में भी कार्य किया। वे बिहार प्रशासनिक सुधार आयोग के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किये। बाद में, झारखण्ड के तत्कालीन राज्यपाल एमओएच फारुख के सलाहकार के रूप में नियुक्त हुए। राष्ट्रपति शासन के दौरान झारखंड के राज्यपाल के सलाहकार के रूप में दुबे ने वित्त, उद्योग, कार्मिक, कैबिनेट सतर्कता, खान और भूविज्ञान, ऊर्जा, सड़क निर्माण, भवन निर्माण, वन और पर्यावरण, राजस्व और भूमि सुधार आदि विभागों का कार्यभार संभाला।
सं 1974 के आंदोलन में पटना विश्वविद्यालय के छात्र के बाद छात्र नेता, नेता से सांसद, सांसद से मुख्यमंत्री बनने वाले यादव की जीवन यात्रा को अगर कोई अधिकारी प्रत्यक्ष गवाह रहे तो वे हैं विजय शंकर दुबे। लालू का उत्थान भी देखे दुबे जी और उनका पतन भी। दुबे जी वही अधिकारी है जब प्रदेश में वित्तीय अनियमितताएं महसूस किये थे और 19 जनवरी 1996 को राज्य के वित्त सचिव की हैसियत से अत्यधिक निकासी के मामलों की जांच के आदेश दिए। उन्होंने 20 जनवरी 1996 को अपने एक सचिव को रांची कोषागार से पशुपालन विभाग द्वारा अत्यधिक निकासी की जांच करने के लिए भेजा। जांच में आपराधिक गड़बड़ी का पता चला जो बाद में ऐतिहासिक चारा घोटाला के रूप में कुख्यात हुआ जिसमें क्या नेता, क्या अधिकारी, क्या ठेकेदार और क्या चपरासी सभी गोंता लगाए थे।
क्रमशः …..
