हीरापुर चौराहा (धनबाद) : उस दिन रणधीर प्रसाद वर्मा के नाम से यहाँ कोई चौराहा नहीं था। शहर में रणधीर प्रसाद वर्मा का नामोनिशान नहीं था। कालखंड सत्तर-अस्सी का था। नब्बे के दशक के प्रारंभिक वर्षों में सरकारी आदेश से धनबाद में पुलिस अधीक्षक के रूप में पदस्थापित हुए। कोइ 37-वर्ष उम्र थी उस समय। उस समय यह स्थान हीरापुर चौक के नाम से विख्यात था। पटना सचिवालय में लालू प्रसाद यादव के आगमन 10-माह पहले हुआ था। रणधीर वर्मा तो शायद जानते भी नहीं थे कि जिस शहर में वे पुलिस अधीक्षक के रूप में अपनी सेवा देने आये हैं, इसी शहर में वे अपनी अंतिम सांस लेंगे और हीरापुर चौराहा उनके नाम से अंकित किया जायेगा ।
39-वर्ष मृत्यु का वर्ष नहीं होता है। लेकिन सं 1952 में जन्म लिए रणधीर प्रसाद वर्मा की अंतिम सांस हीरापुर स्थित बैंक ऑफ़ इण्डिया में आतंकवादी गोली से होना था, यही प्रारब्ध था, वही हुआ । 3 जनवरी, 1991 को आतंकवादियों ने बैंक को लूटने का प्रयास किया था। रणधीर वर्मा, जो उस समय व्यायाम कर वापस घर आये थे। मौत तक्षण उन्हें बैंक खींच कर ले आयी । डकैती का प्रयास तो विफल हो गया, लेकिन आतंकवादी के हथियार से निकली एक गोली उनकी सांस रोकने में सफल हो गयी। हीरापुर के इस चौराहे से चारो दिशाओं में जाने वाली सडकों पर जन सैलाव एकत्रित हो गया था। बिनोद बिहारी महतो के नाम से अंकित बाजार की ओर जाने वाली सड़क पर पैर रखने का जगह नहीं था। लोग स्तब्ध थे, दुःखी थे।धनबाद में शायद पहली बार ऐसी घटना हुई थी जब एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मृत्यु को प्राप्त किये थे। छोटे पद पर कार्य करने वाले पुलिस कर्मी तो ढ़ेर होते आये थे शहर के अपने अपराधियों, माफिया के हाथों।
आज मुद्दत बाद रणधीर प्रसाद वर्मा के नाम से अंकित चौराहे के बाएं तरफ लुबी सर्कुलर रोड के नुक्कड़ पर बैठा हूँ। विगत साढ़े तीन दशक में सबकुछ बदला सा लगता है। लेकिन यहाँ की मिट्टी जानी-पहचानी सी लगती है। मेरे पैरों के नीचे मिट्टी मेरे शरीर के वजन से दब रही थी, लेकिन खुश थी। कुछ साल पहले इस स्थान से दो सौ कदम दूर दाहिने हाथ स्थित जिला न्यायालय परिसर में खुलेआम एक अपराधी को गोली से छल्ली कर दिया गया था। जिला प्रशासन के आला अधिकारी ही नहीं, जिला के आला न्यायकर्ताओं का कार्यालय पचास कदम के क्षेत्रफल में ही स्थित था। मेरे सामने से गुजरती सड़क उस दिन के आइएसएम और आज के आईआईटी धनबाद को लांघते, रणधीर वर्मा को नमस्कार करते आगे धनबाद रेलवे स्टेशन के रास्ते आगे नया बाजार, वासेपुर, बैंकमोड़, झरिया, कतरास, भूली की ओर जाती है।
मेरे बाएं हाथ जाने वाली सड़क लुबी सर्कुलर रोड का नामकरण आईसीएस ऑफिसर रहे टी लुबी के नाम पर है। वे धनबाद नगरपालिका के पहले अध्यक्ष थे। धनबाद नगरपालिका का साै साल पुराना इतिहास है। 1 नवंबर 1956 काे धनबाद जिला अस्तित्व में आया, जबकि अप्रैल 1919 में धनबाद नगपालिका अस्तित्व में आई थी। इसी तरह धनबाद रेलवे स्टेशन के रास्ते 1894 में कतरासगढ़ तक रेलवे लाइन बिछायी गयी थी। बाद में धनबाद-फुलारीटांड, धनबाद-पाथरडीह लाइन बिछी। आज धनबाद रेलवे स्टेशन भारतीय रेल का प्रमुख रेलवे स्टेशनों में एक है जो हावड़ा और नई दिल्ली को जोड़ती है। इस रेल लाइन को ग्रैंड कॉर्ड लाइन कहा जाता है।
जहाँ बैठा हूँ यहाँ से पचास कदम आगे एसएसएलएनटी कॉलेज की ओर जाने वाली सड़क के दाहिने हाथ एक सरकारी अधिकारी के 'आउट-हॉउस', जो गुल्लड़ के पेड़ के नीचे था, कई वर्ष जीवन बिताया था। उन दिनों कलकत्ता से प्रकाशित दी टेलीग्राफ और सन्डे पत्रिका का संवाददाता था। तत्कालीन कोयला माफियाओं पर, दबंगों पर, अपराधियों पर, बालू माफियाओं का, कॉल इण्डिया लिमिटेड और उसके अन्य संस्थानों, मसलन भारत कोकिंग कोल लिमिटेड, सेंट्रल कोलफील्ड लिमिटेड आदि के भ्रष्ट अधिकारियों के बारे में, कोयला माफियाओं के साथ उनके साठ-गाँठ के बारे में, असफल पुलिस और जिला प्रशासन पर सैकड़ों कहानियां लिखा था।

तत्कालीन पत्रकारों ने 'ट्रेटर' की उपाधि से भी अलंकृत किये थे क्योंकि अख़बारों में 'सच लिखा था। सच उन दिनों भी न पत्रकारों को, न स्थानीय सम्पादकों को, न स्थानीय अधिकारियों को हजम होता था। अख़बारों के पन्नों में, पत्रिकाओं के पन्नों में, रेडियो की ध्वनि में सभी अपना-अपना चेहरा देखना चाहते थे, नाम पढ़ना चाहते थे, राज सुनना चाहते थे। आज उस सड़क की मिट्टी तो पहचान रही है, लेकिन वहां बने भवनों के ईंट-पत्थर के लिए अनजान हूँ मैं। वहां की मिट्टी के साथ जो वेदना और संवेदना जुड़ा, वह नयी पीढ़ी के साथ नहीं हो पाया। रणधीर वर्मा अक्सरहां इसी सड़क के रास्ते अपनी कोठी जाते थे।
जहाँ मैं बैठा हूँ यहाँ से न केवल सरायढ़ेला और वासेपुर की दूरी लगभग बराबर है, बल्कि दोनों तरफ अपना-अपना प्रभुत्व रखने वाले अपराधियों द्वारा उतनी ही संख्या में लोगों के जीवित, रक्त संचारित शरीर भी पार्थिव बना था। धनबाद, बैंकमोड़, झरिया, भूली, टुंडी, तोपचांची, निरसा , जोरापोखर, केंदुआडीह, लोयाबाद, लोदना, सिंदरी, कतरास थानों में धूल चाटती, लाल कपड़ों में बंधे दस्तावेज गवाह हैं । आज हालात यह है कि विगत छह दशक में जिन-जिन लोगों की तूती बोली जाती थी, आज अल्लाह और ईश्वर के दरवार में अपनी-अपनी उपस्थिति दे चुके हैं। उनकी दूसरी पीढ़ियां अर्थ और सत्ता की लड़ाई में अदम्य मेहनत कर रहे हैं अपनी वर्चस्व स्थापित करने। भाई भाई को मार रहा है। गोतनी गोतनी की दशम हो गयी है। चाचा-भतीजा एक दूसरे पर बन्दुक उठाये है। कई मृत्यु को प्राप्त किये, कई शहर को छोड़कर भाग गए - सांस लेने के लिए। यह अलग बात है कि वैश्विक स्तर पर भारतीय मुद्रा का मोल में जबरदस्त गिराबट के बावजूद आज भी पैसों के प्रति लालच कम नहीं हुयी है। खैर।
इस कहानी श्रृंखला के पहली कड़ी में पहले धनबाद पर चर्चा करते हैं। पुराने मानभूम जिले के एक भाग के रूप में धनबाद ने 20वीं सदी के पहले दशक के स्वदेशी आंदोलन में भाग लिया था। इस जिले में कोयला खदानों का विकास और ट्रेड यूनियनवाद की प्रगति उल्लेखनीय रही और इसने स्वतंत्रता संग्राम में स्थानीयता का स्पर्श पैदा किया। जब महात्मा गांधी ने अन्य नेताओं की मदद से अखिल भारतीय स्तर पर असहयोग आंदोलन को प्रायोजित किया, तो मानभूम जिले के एक भाग के रूप में धनबाद ने सहयोग की पेशकश की। अगस्त 1920 में भागलपुर में एक व्यापक रूप से उपस्थित प्रांतीय सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें धनबाद के लोगों ने बड़ी संख्या में सक्रिय भाग लिया। सम्मेलन में असहयोग का प्रस्ताव पारित किया गया। सितंबर 1920 में कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का एक अधिवेशन आयोजित किया गया जिसमें महात्मा गांधी के नेतृत्व में पूरे भारत में असहयोग आंदोलन शुरू करने का प्रस्ताव पारित किया गया।
1920 में असहयोग आंदोलन की शुरुआत के साथ ही धनबाद जिले में तीव्र राजनीतिक गतिविधियाँ देखने को मिलीं। 1921 के दौरान श्री राजेंद्र प्रसाद, मज़हरुल हक, स्वामी विश्वानंद, पंडित मोतीलाल नेहरू और अन्य लोगों ने धनबाद का दौरा किया। शुरुआती कांग्रेस नेताओं ने कोयला क्षेत्रों को संगठित करने और कांग्रेस कोष के लिए धनबाद क्षेत्र के धनी उद्योगपतियों और कोयला खदान मालिकों से धन जुटाने की आवश्यकता को समझा। पंडित मोतीलाल नेहरू ने 21 मार्च, 1921 को कोयला क्षेत्रों का एक त्वरित दौरा किया और धनबाद तथा झरिया में आयोजित सभाओं को संबोधित किया, जिसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।
इससे जो हलचल पैदा हुई, वह बेरोकटोक जारी रही और सितंबर महीने में कराची में खिलाफत सम्मेलन के प्रस्ताव पारित होने के कारण मुहम्मद अली, सौकत अली, किचलू और अन्य लोगों की गिरफ्तारी हुई। कराची में खिलाफत सम्मेलन में प्रस्ताव पारित होने के कारण, जो सरकार की राय में सैनिकों की निष्ठा के साथ छेड़छाड़ करने का प्रयास था, धनबाद जिले में भी इसका असर पड़ा। गांधीजी ने अभियान को और तेज़ कर दिया और हर जिले में सैकड़ों सभाएँ होने लगीं, जहाँ कराची प्रस्ताव को शब्दशः दोहराया गया। धनबाद जिले में भी ऐसी ही बैठकें हुईं।
हालाँकि, धनबाद जिले में शराबबंदी आंदोलन चलाया गया, लेकिन उसे ज़्यादा सफलता नहीं मिली। कोयला खदानों के मज़दूरों और औद्योगिक मज़दूरों ने शराब पीना एक सस्ता मनोरंजन बना लिया था और उन्हें इस आदत से छुड़ाना मुश्किल था। 29 नवंबर, 1921 को बिहार के पहले भारतीय राज्यपाल लॉर्ड सिन्हा का इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया। लॉर्ड सिन्हा के इस्तीफे की खबर ग्रामीण इलाकों में काफ़ी आशंकाओं के साथ सुनी गई। 1921 के अंत तक और लॉर्ड सिन्हा के इस्तीफे के लगभग तुरंत बाद, नेताओं की व्यापक गिरफ़्तारी हुई और कांग्रेस कार्यालयों के रिकॉर्ड ज़ब्त कर लिए गए। इस प्रक्रिया में, धनबाद भी कोई अपवाद नहीं था।
पहला मानभूम राजनीतिक सम्मेलन 1929 में रामचंद्रपुर गांव में श्री सुभाष चंद्र बोस की अध्यक्षता में हुआ था और दूसरा सम्मेलन अप्रैल, 1929 में झालदा में श्री एम. सेन गुप्ता की अध्यक्षता में हुआ था। इन दोनों सम्मेलनों में धनबाद के लोगों ने बड़े पैमाने पर भाग लिया था। पुरुलिया में उन्नत राष्ट्रीय विचारों के नेताओं के साथ एक मजबूत राजनीतिक समूह पहले से ही बन चुका था, जिसमें व्यापक रूप से प्रसारित बंगाली साप्ताहिक मुक्ति के संपादक श्री निबरन चंद्र दास गुप्ता शामिल थे। यह समूह अंततः लोक सेवक संघ के रूप में जाना जाने लगा और मानभूम जिले की राजनीति पर इसका काफी प्रभाव था।
श्री निबरन चंद्र दास गुप्ता को 3 मार्च, 1929 को साधारण कारावास की सजा सुनाई गई। दास गुप्ता की इस कैद ने धनबाद सहित मानभूम जिले में राजनीतिक आंदोलन को बढ़ा दिया। श्री निबरन चंद्र दास गुप्ता ने अध्यक्षता की। मानभूम में नमक सत्याग्रह की शुरुआत हुई और बाजारों में खुलेआम अवैध नमक बेचा जाने लगा। मानभूम जिला सत्याग्रह समिति को एक गैरकानूनी संगठन घोषित कर दिया गया और मानभूम के कई कांग्रेसियों, जैसे विभूति भूषण दास गुप्ता, शिव शरण जायसवाल, मोहन दास बाबाजी, मुक्त के संपादक बीर राघवाचार्य और अन्य को गिरफ्तार कर लिया गया। इस सब से धनबाद स्वाभाविक रूप से काफी उत्तेजित था।
जिले के छात्रों में नई देशभक्ति की भावना भर गई और उनमें से सैकड़ों ने स्कूल और कॉलेज छोड़ दिए और झरिया में एक राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना की गई। बिहार और बंगाल के अन्य हिस्सों से राजनीतिक नेता अक्सर इस क्षेत्र का दौरा करते थे। कई छात्रावास के छात्रों ने भी हड़ताल में भाग लिया। झरिया राज स्कूल के प्रधानाध्यापक को छात्रावास के प्रमुख छात्रों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ा और उन्हें छात्रावास खाली करने का नोटिस दिया गया। श्री श्याम प्रसाद सिंह, श्री रामचंद्र मुखर्जी, श्री रंगलाल चौधरी और अन्य लोगों ने छात्र आंदोलन में भाग लिया। यह कई दिनों तक चला और अंततः पुलिस ने कुछ छात्रों के साथ-साथ अन्य नेताओं, अर्थात् उस समय के मज़दूर नेता श्री पी. सी. बोस और शिब काली बोस को भी गिरफ्तार कर लिया।
तोपचांची और अन्य क्षेत्रों में श्री बैकुंठ नाथ चौधरी और अन्य लोगों ने आंदोलन के समर्थन में सभाएँ, जुलूस आदि आयोजित करके ग्रामीण क्षेत्रों को संगठित और लामबंद करने में खुद को पूरी तरह लगा दिया। झरिया और कतरास में शराब की दुकानों के सामने और यहाँ तक कि चिरकुंडा, गोविंदपुर और तोपचांची जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में भी अक्सर धरना दिया जाता था। बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियाँ की गईं और लोग काफी उत्तेजित हो गए। श्री पी. सी. बोस को गिरफ्तार कर धनबाद उप-कारागार लाया गया और इस प्रकार आंदोलन तेज हो गया। 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन ने जिले में एक नई गति पकड़ी। सरकार ने इसके खिलाफ कड़े कदम उठाए। सभाओं और जुलूसों को जबरन तितर-बितर कर दिया गया। कांग्रेस नेताओं पर भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमा चलाया गया। कई प्रमुख कांग्रेसियों को दोषी ठहराया गया।
बाद की राजनीतिक घटनाएं और धनबाद जिले पर उनका प्रभाव लगभग उसी तरह था जैसा अन्य जिलों में था, जिसकी कहानी मुंगेर और अन्य जिला गजेटियरों में कुछ विस्तार से शामिल की गई है। कांग्रेस और असहयोग आंदोलन के प्रत्यक्ष प्रभाव के रूप में श्रम और ट्रेड-यूनियनवाद के संगठन को बहुत प्रोत्साहन मिला। पूरे बिहार में 1937-38 में 11 श्रमिक हड़तालें हुईं और अगले वर्ष और अधिक हुईं। कहते हैं जवाहरलाल नेहरू ने ट्रेड यूनियनवाद की पहली शिक्षा धनबाद में ही प्राप्त की थी। एक उग्र ट्रेड यूनियनवाद और एक सतर्क औद्योगिक शक्ति के बिना, इस जिले में स्वतंत्रता का प्रयास सफल नहीं हो पाता।
धनबाद जिले के कुमारदुभी, धनबाद, कतरास, मोदीडीह, चांच जैसे विभिन्न औद्योगिक केंद्रों में हड़तालें हुई थीं। कोलियरी मजदूर और औद्योगिक इकाइयों में औद्योगिक कर्मचारी संगठित हो रहे थे। श्री माणिक होमी अपने श्रमिक संघ को पंजीकृत कराने में सफल रहे लेकिन वे हड़तालों के सफल समाधान के लिए प्रो. अब्दुल बारी की बातचीत का विरोध कर रहे थे। 1937-38 में कोयला खदानों के मजदूर और अन्य इकाइयों के मजदूर बेहद उत्तेजित थे और इस उत्तेजना को प्रो. अब्दुल बारी और अन्य लोगों ने एक दिशा दी और एक आकार दिया।
1942-43 में धनबाद की राजनीतिक तस्वीर बिहार प्रांतीय युद्ध समिति के आह्वान पर राष्ट्रीय युद्ध मोर्चा के गठन से शुरू होती है, जिसका गठन ब्रिटिश नौकरशाही ने कांग्रेस की अधिकांश गतिविधियों का प्रतिकार करने के लिए किया था। विचार यह था कि राष्ट्रीय युद्ध मोर्चा युद्ध के खतरे और उससे उत्पन्न बुराइयों से लड़ने के लिए जन समर्थन जुटाने का प्रयास करेगा। लेकिन अन्य आंदोलनों की तरह राष्ट्रीय युद्ध मोर्चा भी असफल रहा, हालाँकि कुछ विशिष्ट व्यक्तियों के प्रभाव के कारण स्थानीय क्षेत्रों में उसे कुछ हद तक सफलता मिली होगी। एक उदाहरण यह दिया जा सकता है कि मई 1942 में धनबाद में 1,500 लोगों की एक बड़ी सभा ने राष्ट्रीय युद्ध मोर्चा आंदोलन के प्रांतीय और अन्य स्थानीय नेताओं का भाषण सुना और वे "गांधीजी की जय" के नारे के साथ तितर-बितर हो गए!
6 जुलाई, 1942 को वर्धा में कांग्रेस कार्यकारिणी द्वारा पारित भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव, जिसे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की अगली बैठक में बंबई में रखा गया, ने भारत सरकार और बिहार की प्रांतीय सरकार के रुख को कठोर बना दिया। अध्यादेशों और नए कानूनों की एक श्रृंखला के साथ, बिहार सरकार ने निर्णय लिया कि वे स्थिति को और बिगड़ने नहीं दे सकते। नए आंदोलन को दबाने के लिए ठोस कदम उठाने की सक्रिय तैयारी की गई और नेताओं की गिरफ्तारी के लिए कदम उठाए गए। कैदियों के वर्गीकरण और यहां तक कि उनके कारावास के स्थानों के साथ एक अस्थायी सूची तैयार की गई।

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक शुरू होने से पहले, डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने बिहार के लोगों को वर्धा प्रस्ताव की सामग्री और महत्व से परिचित कराने और इस पर उनके विचारों को बताने के लिए आवश्यक कदम उठाए। डॉ. राजेंद्र प्रसाद उस समय बीमार थे और उन्हें अपनी बीमारी के कारण पटना में ही रहना पड़ा। पटना के अंजुमन इस्लामिया हॉल में डॉ. अनुग्रह नारायण सिन्हा द्वारा संबोधित एक बैठक में छात्रों से आने वाले संघर्ष के लिए खुद को तैयार करने का आह्वान किया गया। स्थिति सचमुच विद्युतीकृत हो चुकी थी और विस्फोट के लिए बस एक चिंगारी की ज़रूरत थी।
6 और 7 अगस्त, 1942 को बम्बई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के ऐतिहासिक अधिवेशनों में भारत छोड़ो प्रस्ताव पर विचार किया गया और इसे भारी बहुमत से पारित किया गया। 9 अगस्त की सुबह-सुबह गांधीजी और कांग्रेस कार्यकारिणी के सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया गया। उसी दिन देशभर में विभिन्न स्थानों पर कई गिरफ्तारियां हुईं। पटना में डॉ. राजेंद्र प्रसाद को अन्य व्यक्तियों के साथ गिरफ्तार कर बांकीपुर जेल ले जाया गया। डॉ. श्रीकृष्ण सिन्हा को 10 अगस्त को गिरफ्तार किया गया, जबकि श्री अनुग्रह नारायण सिन्हा को अगले दिन गिरफ्तार किया गया। सरकार ने तुरंत अध्यादेश लागू कर दिया और 9 अगस्त को प्रकाशित बिहार राजपत्र के एक असाधारण अंक में राज्य सरकार ने बड़ी संख्या में समितियों और संघों को गैरकानूनी घोषित करते हुए अधिसूचना जारी कीं।
प्रतिक्रिया स्वरूप, पूरे प्रांत में व्यापक उथल-पुथल हुई और धनबाद इसका अपवाद था। झरिया और कतरास सहित धनबाद क्षेत्र में हड़तालें, धरने, सभाएँ और जुलूस निकाले गए। पुरुलिया का शिल्प आश्रम, जो मानभूम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष श्री निबरन चंद्र दास गुप्ता, विभूति भूषण दास गुप्ता की गतिविधियों का केंद्र था, पर 10 अगस्त को छापा मारा गया और आश्रम को जब्त कर लिया गया। अतुल चंद्र घोष की पत्नी और बेटी सहित बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार कर जेल में बंद कर दिया गया। बंबई से लौटने पर अतुल चंद्र घोष को भी गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन इन गिरफ्तारियों ने और अधिक उत्तेजना का अवसर दिया। आंदोलन उग्र हो गया और एक वर्ग भूमिगत हो गया।
पूरे पुरुलिया और मानभूम में, हस्तलिखित और साइक्लोस्टाइल वाले पर्चे वितरित किए गए, जिनमें लोगों से इस आंदोलन में समान रूप से उठ खड़े होने का आह्वान किया गया। झरिया में 14 अगस्त को कांग्रेस कार्यालय को पुनः प्राप्त करने का प्रयास किया गया, जिसे सरकार ने 10 अगस्त को जब्त कर लिया था। वहां एक बैठक करने के बाद भीड़ मोदीडीह कोलियरी गई और उस दिन पंचघरी बाजार और कतरी पुल पर टेलीफोन लाइनें काट दी गईं। एक बड़ी भीड़ ने 16 अगस्त को कतरास रेलवे स्टेशन पर छापा मारने की कोशिश की। पुलिस को हमलावरों को रोकने के लिए गोलियां चलानी पड़ीं और कुछ लोग हताहत हुए। स्थानीय ए.एफ.आई. और ई.आई.आर. रेजिमेंट को धनबाद और गोमो रेलवे स्टेशनों पर तैनात किया गया था। कोयला क्षेत्रों में श्रमिक आबादी उत्तेजित थी और धनबाद जिले के विभिन्न हिस्सों में छिटपुट विस्फोट हुए, जिन्हें क्रूर बल से दबाना पड़ा।
जो वर्ग भूमिगत हो गए थे, उन्होंने बहुत भ्रम, रुकावट, ट्रेनों की नाकाबंदी आदि पैदा की। 17 अगस्त, 1942 को धनबाद में छात्रों के जुलूस को गिरफ्तारी और जत्थे के हमले से तोड़ दिया गया। उसी दोपहर झरिया स्थित कांग्रेस कार्यालय में आयोजित एक बैठक के बाद, कुछ हद तक अराजकता फैल गई और बड़ी संख्या में लोग उग्र मनोदशा में टेलीग्राफ के तार काटने और झरिया डाकघर तथा झरिया रेलवे स्टेशन में आग लगाने लगे। अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक ने कैप्टन एलिस की टुकड़ी की मदद से 10 लोगों को गिरफ्तार किया। अगली सुबह ही सार्वजनिक स्थानों पर पाँच से अधिक व्यक्तियों के एकत्र होने पर प्रतिबंध लगाने और धनबाद, झरिया और कतरास क्षेत्रों में शाम 6 बजे से सुबह 5 बजे के बीच कर्फ्यू लगाने के आदेश जारी कर दिए गए।
बाद में, चार अधिकारियों और 100 जवानों वाली ब्लैक-वॉच रेजिमेंट की एक कंपनी लाकर धनबाद में तैनात की गई। बिना किसी औपचारिक घोषणा के सैन्य शासन ने सत्ता संभाल ली थी। हालाँकि, यह सौभाग्य की बात है कि धनबाद जिले में खुलेआम अराजकता को उस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति तक नहीं पहुँचने दिया गया जो हमें बिहार के कुछ अन्य जिलों में देखने को मिलती है और इसे सेना और सशस्त्र पुलिस की मदद से नियंत्रित किया गया। 1943 के अंत में आंदोलन धीरे-धीरे कम हो गया और कांग्रेस ने एक रचनात्मक नीति अपनाई। सरकार ने भी धीरे-धीरे अपने दमनकारी उपायों में ढील दी। जून 1945 में महात्मा गांधी और कांग्रेस कार्यकारिणी के सदस्यों को रिहा कर दिया गया। द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो गया। सितंबर के महीने में सरकार ने कांग्रेस पर से प्रतिबंध हटा लिया और राजनीतिक कैदियों को रिहा कर दिया गया। इस जिले के शीर्ष नेताओं ने 1943 में पुरुलिया में मुख्यालय के साथ एक रचनात्मक कार्यक्रम शुरू किया। पुरुलिया, हुरा, पुंचा और धनबाद में खादी उद्योग, कागज निर्माण और साबुन बनाने के उद्योग शुरू किए गए। पूरे राज्य में राजनीतिक रुझान एक जैसे थे।
22 दिसंबर, 1953 को भारत के प्रधानमंत्री ने संसद में एक वक्तव्य दिया कि भारतीय संघ के राज्यों के पुनर्गठन के प्रश्न की निष्पक्ष और निष्पक्ष जांच के लिए एक आयोग नियुक्त किया जाएगा ताकि प्रत्येक घटक इकाई के लोगों के साथ-साथ समग्र रूप से राष्ट्र का कल्याण हो सके। इसके बाद, भारत सरकार के गृह मंत्रालय के संकल्प संख्या 53|69|53-सार्वजनिक, दिनांक 29 दिसंबर, 1953 के तहत राज्य पुनर्गठन आयोग की नियुक्ति की गई।
आयोग में तीन सदस्य थे, अर्थात् सरदार कवलम माधव पणिक्कर, श्री हृदय नाथ कुंजरू और श्री सैय्यद फ़ज़ल अली। श्री सैय्यद फ़ज़ल अली आयोग के अध्यक्ष थे, लेकिन बिहार से अपने लंबे जुड़ाव के कारण, उन्होंने बिहार और पश्चिम बंगाल तथा बिहार और उड़ीसा के बीच क्षेत्रीय विवादों की जांच और निर्णय में कोई भूमिका नहीं निभाई थी। आयोग को पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और बिहार सरकार ने पश्चिम बंगाल, बिहार और उड़ीसा के कुछ भूभागों के पुनर्वितरण के संबंध में एक-एक ज्ञापन प्राप्त हुए।
सरकारों के ज्ञापनों के अलावा, सार्वजनिक निकायों और कई संघों के ज्ञापन भी थे। आयोग ने प्रदेश कांग्रेस समितियों की भी सुनवाई की। आयोग ने 4/5 फरवरी, 1955 को धनबाद और 6/6 फरवरी, 1955 को पुरुलिया का दौरा किया। आयोग ने धनबाद और अन्य स्थानों पर बड़ी संख्या में लोगों के साक्ष्य लिए। 5 फ़रवरी, 1955 को आयोग ने कई विधान सभा सदस्यों, संसद सदस्यों, अनुमंडल कांग्रेस समिति के सदस्यों, स्थानीय निकायों के प्रतिनिधिमंडलों, धनबाद बार के कुछ सदस्यों, कुछ कम्युनिस्टों और मे से पार्टी के एक प्रतिनिधि के साक्ष्य लिए। बिहार एसोसिएशन और अन्य का प्रतिनिधित्व करने वाले कुछ लोग भी आयोग के समक्ष उपस्थित हुए। यह कहना सही होगा कि मानभूम ज़िले के कुछ हिस्सों के पुनर्वितरण के प्रश्न पर स्थानीय भावनाएँ बहुत उत्तेजित थीं।-9la06.jpg)
बाद में राज्य पुनर्गठन कानून 1956 के तहत धनबाद को मानभूम से काटकर एक अलग जिला 1956 में बनाया गया। इसके बाद 1991 में धनबाद का विभाजन का बोकारो जिला बनाया गया। (क्रमशः)
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