बाबा खड़गसिंह मार्ग (नई दिल्ली) के नुक्कड़ से : बहुत विरोधभास है। आप माने अथवा नहीं। एक तरफ जहाँ भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राष्ट्रीय ध्वज के सम्मानार्थ 'प्लास्टिक' से बने 'तिरंगे' का बेचना 'प्रतिबंधित' है, वहीँ गणतंत्र और स्वाधीनता दिवस पर भारत की सड़कों पर धड़ल्ले से बिक कर कोई 680 करोड़ प्रतिवर्ष का व्यवसाय बन गया है प्लास्टिक का तिरंगा - अगर देश का 25 फीसदी आवाम के हाथों में प्लास्टिक से निर्मित भारत का राष्ट्रध्वज है।
वहीँ दूसरी ओर भारत सरकार का खादी और ग्रामोद्योग आयोग इस बात को स्वीकारा है कि आज़ादी के बाद पहली बार 2023-24 वित्तीय वर्ष में आयोग के उत्पादों की बिक्री 155000 करोड़ रूपये के आंकड़े को पार कर गई है। खादी और ग्रामोद्योग आयोग ‘हर घर तिरंगा, हर घर खादी’ अभियान के अंतर्गत खादी स्टोर पर 3X2 फीट के विशेष राष्ट्रीय ध्वज 198 रुपये में बेच रहा है।
सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्यम मंत्रालय तथा खादी और ग्रामोद्योग आयोग के अध्यक्ष मनोज कुमार ने कहा, “पिछले 10 वर्षों में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के मार्गदर्शन में नये भारत की नयी खादी ‘विकसित भारत की गारंटी’ बन गई है। खादी ग्रामशिल्पा लाउंज में ‘हर घर तिरंगा’ अभियान की शुरुआत करते उन्होंने कहा कि ‘हर घर तिरंगा, हर घर खादी’ अभियान के अंतर्गत खादी स्टोर पर 3X2 फीट के विशेष राष्ट्रीय ध्वज 198 रुपये में मिल रहे हैं। आजादी के अमृतकाल में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की विरासत खादी को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की ब्रांड शक्ति से केवीआईसी ने नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के ‘हर घर तिरंगा अभियान’ को भारतवर्ष के घर-घर तक पहुंचाने के लिए केवीआईसी पूरे देश में ‘हर घर तिरंगा, हर घर खादी’ अभियान चला रहा है।
इस अवसर पर राज्यसभा सांसद श्री अरुण सिंह ने देशवासियों से आग्रह किया कि हर घर तिरंगा अभियान के अंतर्गत स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर सभी लोग अपने घरों पर खादी के बने राष्ट्रीय ध्वजों को फहराये ताकि खादी और ग्रामोद्योग आयोग से जुड़े कारीगरों को रोजगार के अवसर उपलब्ध हों। इसी का परिणाम है कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार वित्त वर्ष 2023-24 में खादी और ग्रामोद्योग आयोग के उत्पादों की बिक्री 1 लाख 55 हजार करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर गई है। यह तो हुआ एक पक्ष।

दूसरा पक्ष यह है कि आप विस्वास भले नहीं करें लेकिन भारत में गणतन्त्र दिवस और स्वाधीनता दिवस के अवसर पर कोई 680 करोड़ रुपये का व्यवसाय है प्लास्टिक से बना तिरंगा और तिरंगे की इस माफियागिरी में समाज के सैकड़ों लोग लगे हैं। इससे भी बड़ा दुर्भाग्य तो यह है कि इस तिरंगे के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले क्रान्तिकारियों, शहीदों और उनके जीवित वंशजों को कौन पूछता है ? इतना ही नहीं, इससे भी ह्रदय विदारक बात यह है कि जिस व्यक्ति ने इस तिरंगे की रचना की, उसे मरणोपरांत तिरंगा नसीब नहीं हुआ। देश के आवाम के लिए इससे बड़ी शर्मनाक बात कुछ और नहीं हो सकती।
वैसे आजादी के 75 वें वर्षगांठ पर श्री पिंगली वैंकय्या के सम्मानार्थ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज़ादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर “घर-घर तिरंगा” का आह्वान कर राष्ट्रध्वज के रचयिता को भारत के 135 करोड़ लोगों के तरफ से सम्मान देने का वचन दिया है। लेकिन भारत का सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्लास्टिक से बने तिरंगे पर प्रतिबंध होते हुए भी, साथ ही, भारत के लोगों से यह भी अपेक्षा होती है कि वे संविधान द्वारा पारित झण्डा नियमों का अक्षरसः पालन करें। लेकिन, कपड़े से बने तिरंगे की बात छोड़िये, औसतन गणतन्त्र दिवस और स्वाधीनता दिवस पर भारत की सम्पूर्ण आवादी के प्रत्येक हाथ में न सही, प्रत्येक चौथे हाथ में तिरंगा अवश्य होता है और वह भी प्लास्टिक वाला। यह अलग बात है कि देश की सम्पूर्ण आबादी में प्रत्येक 100 में 80 + व्यक्ति तिरंगे के आकार-प्रकार से वाकिफ नहीं हैं, कोई बताने वाला भी नहीं है-माता-पिता सहित।

प्रत्येक चौथे हाथ में तिरंगा का अर्थ हुआ 25 फीसदी आवादी के पास तिरंगा, यानि 136 करोड़ आवाम में 34 करोड़ लोगों के हाथ प्लास्टिक का तिरंगा है । इस दृष्टि से, गणतन्त्र दिवस और स्वाधीनता दिवस पर (34 करोड़ + 34 करोड़) 68 करोड़ तिरंगा भारत के बाज़ारों में, सड़कों पर, गलियों में, चौराहों पर “बिकने” के लिए मौजूद होते हैं। अब जरा तिरंगे का गणित देखिये – इन अवसरों पर एक तिरंगे की कीमत भारत की सडकों पर न्यूनतम 10 रुपये निर्धारित है वह भी प्लास्टिक वाला; भले ही भारत के सर्वोच्च न्यायालय प्लास्टिक से बने तिरंगे पर पाबन्दी क्यों न लगा रखा हो । यानि 68 करोड़ तिरंगा x 10 रुपये = 680 करोड़ रुपये का व्यवसाय । इस बात पर बहस नहीं करेंगे की तिरंगे को शाम ढलते सड़कों पर फेंकते हैं या कूड़ेदानों में – यह तो मानसिकता पर निर्भर है।
एक बहुत बड़ा “तिरंगा माफ़िया” जो विभिन्न भेष-भूषाओं में हैं इस व्यवसाय में जुड़े हैं। यहाँ भी स्पष्ट कर दूँ की उन्हें राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत में फर्क नहीं मालुम है और इन दोनों को गाने के लिए समय पाबन्दी कितनी है होती है, यह पूछना तो सबसे बड़ी मूर्खता होगी। ऐसे हालात में जब तिरंगा ही बिक रहा है वहां उस तिरंगे को अपनी उड़ान देने के लिए जिन-जिन क्रान्तिकारियों ने अपने-अपने प्राणों की आहुति दी ताकि देश आज़ाद हो, आज़ाद भारत में उसका तिरंगा आसमान की ऊंचाई छुए – कौन पूछता है।
बहरहाल, हर घर तिरंगा अभियान की शुरुआत करते हुए मनोज कुमार ने कहा कि पूज्य बापू की विरासत खादी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व और एमएसएमई मंत्रालय के मार्गदर्शन में खादी क्रांति के माध्यम से विकसित भारत अभियान को गांव-गांव में नयी शक्ति दे रही है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी देश के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने खादी को बढ़ावा देने के लिए देश-विदेश के हर मंच से आह्वान किया। उन्होंने जब-जब मन की बात में लोगों से खादी खरीदने की अपील की, खादी की बिक्री में ऐतिहासिक वृद्धि दर्ज हुई। हाल ही में, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने मन की बात के 112वें संस्करण में देशवासियों से स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा यात्रा अभियान से जुड़ने के साथ-साथ खादी के वस्त्र खरीदने की अपील की है। अपनी अपील में उन्होंने कहा, “आपके पास भांति-भांति के वस्त्र होंगे और आपने अब तक अगर खादी के वस्त्र नहीं खरीदे तो इस साल से शुरू कर दें। अगस्त का महीना आ ही गया है। ये आजादी मिलने का महीना है। क्रांति का महीना है। इससे बढ़िया अवसर और क्या होगा, खादी खरीदने के लिए।”
मनोज कुमार ने कहा कि प्रधानमंत्री की अपील खादी कारीगरों के लिए संजीवनी है, क्योंकि उनकी ब्रांड शक्ति से पिछले 10 वर्षों में खादी और ग्रामोद्योग उत्पादों की बिक्री में पांच गुना और उत्पादन में चार गुना वृद्धि हुई है। पहली बार इस क्षेत्र में 10.17 लाख नए रोजगार सृजित हुए हैं। उन्होंने बताया कि वित्त वर्ष 2023-24 में प्रधानमंत्री की अपील से हर घर तिरंगा अभियान के अंतर्गत 7.25 करोड़ रुपये के खादी के राष्ट्रीय ध्वजों की बिक्री हुई थी। कुमार ने आगे कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के विजन के अनुसार ‘विकसित और आत्मनिर्भर भारत’ निर्माण के लिए गांव-गांव तक ‘खादी ग्राम स्वराज अभियान’ को सशक्त करने लिए केवीआईसी देशभर में कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दे रहा है। हर घर तिरंगा अभियान के माध्यम से राष्ट्रीय ध्वज बनाने वाले खादी के कारीगरों को अतिरिक्त आय की प्राप्त हो रही है।

बहरहाल, देश के बड़े पत्रकार के विक्रम राव ने लिखा है कि “जिन्हें नाज है हिन्द पर वे सभी जान ले कि राष्ट्रध्वज के रुपरेखाकार पिंगली वैंकय्या एक तेलुगुभाषी निर्धन स्कूल मास्टर थे। वे कंगाली में जन्में (2 अगस्त 1876 : सागरतटीय महलीपत्तनम, आंध्र) तथा अभाव में पले। इस विप्र के शवदाह में पर्याप्त ईधन नहीं मिला। उनका अधूरा ख्वाब था कि तिरंगे में लपेटकर उनकी लाश ले जायी जाये। आज मीडिया और नरेन्द्र मोदी से लेकर सभी उनकी स्मृति में श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। ”घर—घर तिरंगे” के पर्व पर। पिंगली वेंकैया का जन्म आज के ही दिन, यानी 2 अगस्त 1876 को भट्लापेननुमारु में हुआ था और 4 जुलाई, 1963 को विजयवाड़ा में अंतिम सांस लिए। दुर्भाग्य यह रहा कि तिरंगे के रचयिता को मृत्युपरांत तिरंगा नसीब नहीं हुआ।
वैंकय्या ने जीवन में कई ज्वार भाटा देखे। मेधावी छात्र थे। लाहौर के वैदिक महाविद्यालय में उर्दू और जापानी के अध्यापक रहे। कैंब्रिज विश्वविद्यालय से स्नातक डिग्री ली। मगर भारत लौटकर आये तो निजी रेलवे में जीविका पायी। लखनऊ में भी एक शासकीय नौकरी की। उनके रोजगार में विविधता रही। भूविज्ञान तथा कृषि क्षेत्र में निष्णात रहे। खदानों के जानकार रहे। फिर आयी उनके जीवन की विलक्षण बेला। ब्रिटिश सेना का दक्षिण अफ्रीका में बोयर युद्ध हुआ। भारतीय लोग भी वहीं गये। सर्वाधिक महत्वपूर्ण सैनिक था मोहनदास कर्मचन्द गांधी। वे चिकित्सक (स्वयं सेवक) की भूमिका में थे। तभी वैंकय्या भी ब्रिटिश सैनिक के रोल में गये। गांधीजी से भेंट हुयी, परिचय हुआ। फिर भारत में राष्ट्रीय कांग्रेस अधिवेशन में दोनों में प्रगाढ़ता सर्जी।
राव के अनुसार, तभी का किस्सा है। चालुक्यों की गौरवमयी राजधानी रही काकीनाडा (गोदावरी तटीय) की घटना है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन (26 दिसंबर 1923) हुआ। यह चालुक्यों के सम्राट पुलकेशिन से जुड़ा था। यहीं वैंकय्या ने कांग्रेस में शरीक होकर राष्ट्रीय ध्वज के प्रारुप पर चर्चा किया था। यह अधिवेशन दो घटनाओं के लिये ऐतिहासिक था। यहीं मौलाना मोहम्मद अली ने कांग्रेस अध्यक्ष के रुप में वन्दे मातरम् गाने पर एतराज किया था। वाक आउट किया। तभी से यह राष्ट्रगान अधूरा हो गया। इसी अधिवेशन में राष्ट्रीय कांग्रेस ने तय किया कि स्वतंत्रता के बाद भारत का भाषा के आधार पर पुनर्गठन किया जायेगा। सर्वाधिक निर्धार जब महत्वपूर्ण था कि काकीनाडा अधिवेशन में ही वैंकय्या ने राष्ट्रध्वज की आवश्यकता पर बल दिया था। उनका यह विचार गांधीजी को बहुत पसन्द आया। गांधीजी ने उन्हें राष्ट्रीय ध्वज का प्रारूप तैयार करने का सुझाव दिया।
पिंगली वैंकय्या ने पाँच सालों तक तीस विभिन्न देशों के राष्ट्रीय ध्वजों पर शोध किया और अंत में तिरंगे के लिए सोचा। विजयवाड़ा में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में पिंगली वैंकय्या महात्मा गांधी से मिले थे और उन्हें अपने द्वारा डिज़ाइन लाल और हरे रंग से बनाया हुआ झंडा दिखाया। तब तक ब्रिटिश यूनियन जैक ध्वजा ही कांग्रेस सम्मेलनों में फहरती थी। मगर बाद में तिरंगा फहरने लगा। देश में कांग्रेस पार्टी के सारे अधिवेशनों में दो रंगों वाले झंडे का प्रयोग बंद हो गया। लेकिन उस समय इस झंडे को कांग्रेस की ओर से अधिकारिक तौर पर स्वीकृति नहीं मिली थी। इस बीच जालंधर के हंसराज ने झंडे में चक्र चिन्ह बनाने का सुझाव दिया। इस चक्र को प्रगति और आम आदमी के प्रतीक के रूप में माना गया। बाद में गांधी जी के सुझाव पर पिंगली वैंकय्या ने शांति के प्रतीक सफेद रंग को भी राष्ट्रीय ध्वज में शामिल किया। बाद में 1931 में कांग्रेस ने कराची के अखिल भारतीय सम्मेलन में केसरिया, सफ़ेद और हरे तीन रंगों से बने इस ध्वज को सर्वसम्मति से स्वीकार किया। फिर राष्ट्रीय ध्वज में इस तिरंगे के बीच चरखे की जगह अशोक चक्र ने ले ली।

राष्ट्रध्वज वैंकय्या द्वारा निरुपित हो जाने से गीत का प्रस्ताव आया इसी की पंक्ति थी जो हमलोग गुलाम भारत (1945—46) में स्कूलों में गाते थे। ध्वज गीत की रचना श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ ने की थी। पद वाले इस मूल गीत से बाद में कांग्रेस ने तीन पद (पद संख्या 1, 6 व 7) को संशोधित करके ‘ध्वजगीत’ के रूप में मान्यता दी। यह गीत न केवल राष्ट्रीय गीत घोषित हुआ बल्कि अनेक नौजवानों और नवयुवतियों के लिये देश पर मर मिटनें हेतु प्रेरणा का स्रोत भी बना : ”विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा। सदा शक्ति बरसाने वाला, प्रेम सुधा सरसाने वाला। वीरों को हरषाने वाला, मातृभूमि का तन-मन सारा।”
जब 9 अगस्त 1942 में गवालिया टैंक मैदान मुम्बई (अगस्त क्रांति मैदान) में सारे नेताओं के कैद हो जाने पर क्रांतिकारी अरुणा आसफ अली ने यह ध्वज फहराया था। वे भी गुनगुना रही थी : ”इसकी शान न जाने पाये। चाहे जाने भले ही जाये।”मगर इतिहास की विडंबना है कि भारी विरोध के बाद भी तिरंगा सत्तारूढ़ कांग्रेस का पार्टी झण्डा भी हो गया।
