पटना/नई दिल्ली: उन दिनों जब डाक बंगला चौराहे से आर्यावर्त-इण्डियन नेशन अखबारों के दफ्तर की ओर बढ़ते थे तो चौराहे के बाएं हाथ नुक्कड़ पर लखनऊ स्वीट हॉउस की दूकान होती थी। दूकान-भवन का क्षेत्र समाप्त होते बायीं ओर एक गली जाती थी। यहीं होता था भारत काफी हॉउस। इस नुक्कड़ पर भारतीय प्रशासनिक सेवा के श्री विजय शंकर दुबे जी (उन दिनों पटना के जिलाधिकारी थे), आज के केंद्रीय पॉवर मंत्री श्री राजकुमार सिंह (पटना के जिलाधिकारी थे) खड़े होने में तनिक भी 'शर्म' नहीं महसूस करते थे। आज की पीढ़ी शायद नाम भी नहीं सुनी होगी। इस गली के नुक्कड़ पर ऐतिहासिक होटल बन रहा था। होटल के आगे मेरे एक मित्र की दवाई की दूकान थी। इस दूकान के बाद फिर अंदर जाने वाली एक गली और उसके बाद विशालकाय 'सिकंदर मंजिल' का अहाता। सड़क के किनारे और इस अहाते के सीमा रेखा पर लोहे का रेलिंग था जिसका अंतिम छोड़ एक पलास के वृक्ष के नीचे मुद्दत से बैठे हनुमान की प्रतिमा से जुड़ा था। आगे एक होटल, फिर एक गली और कोने पर डी लाल एंड संस की दूकान।
डी लाल एंड संस दिनों पटना की संभ्रांत दुकानों में एक थी। इस दूकान में मुझ जैसा टुच्चा - पुच्चा ग्राहक प्रवेश नहीं लेता था । मंत्रियों, संतरियों, अधिकारियों, पदाधिकारियों की गाड़ियां यहाँ लगती थी। उससे पहले ही तत्कालीन ट्रैफिक डीएसपी श्री बनबारी बाबू यहाँ सिटी बजाने लगते थे। इस दूकान के बाद पहले तो एक खाली भवन था, बाद में उसमें साईकिल की एक दूकान खुली। इसके बाद फिर एक गली जिसमें बाद के दिनों में 'आज' अख़बार का प्रकाशन शुरू हुआ था। इसके आगे दो दुकानें फिर ऐतिहासिक पॉम ट्री और फिर आर्यावर्त-इण्डियन नेशन अखबारों का विशालकाय दफ्तर।
इस दफ्तर के दाहिने कोने पर पीपल वृक्ष के नीचे एक हनुमान जी बैठे थे। इस सड़क के दाहिने हाथ सबसे पहले ऐतिहासिक डाक बंगला था जिसके नाम पर यह चौराहा है। इसी तरफ पीटीआई समाचार का कार्यालय, सम्राट होटल, माड़वाड़ीवासा, ऐतिहासिक केंद्रीय कारा स्थित था। केंद्रीय कारा का अंतिम दीवार स्टेशन स्थित हनुमान जी के मंदिर के सामने होता था। उन दिनों इस क्षेत्र के किसी भी हनुमान जी का 'कॉर्पोरेटइजेशन' नहीं हुआ था। हनुमान जी मेरे जैसे गरीब-गुरबा के लिए श्रद्धेय थे। वे भी सबों की बात सुनते थे बिना किसी जाति, सम्रदाय, वर्ण-व्यवस्था को देखे। आज तो उनकी भी चांदी है। जबकि प्रदेश में गरीबी रेखा के नीचे करोड़ों लोग धंस गए हैं।
खैर पटना की सड़कों की बात इसलिए यहाँ कर रहा हूँ कि उस ऐतिहासिक मंजिल के कोने पर उस विशालकाय लाल-लाल फूल वाले पलास के वृक्ष के नीचे श्री जगदीश-रामाशीष भाइयों की एक दूकान थी। जगदीश-रामाशीष भाई और उनके बाल-बच्चे उसी दूकान से पलते थे और हम लोग भी अपनी-अपनी जेबों, बटुओं के वजन के अनुसार उनके हाथों बना मसाला वाला निम्बू चाय, 'लिट्टी और आलू-बैगन का चोखा' (चवन्नी में प्लेट जिसमें दो लिट्टी, चोखा और एक दोना में काला चना का घुघनी) खाते-पीते थे। रिक्शावाला से लेकर हम लोग जैसा श्रमजीवी तक, खाकर मानसिक भूख बढ़ाने के लिए, जीने के लिए उदर की भूख शांत करते थे।
उस वृक्ष के नीचे कभी कोई पत्रकार, यहाँ तक कि सामने प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इण्डिया के तत्कालीन संवाददाता, या फिर उसी गली में (बन्दर बगीचा) में स्थित दी इंडियन एक्सप्रेस के बिहार के प्रमुख श्री कृपाकरण जी, हिन्दू/फ्रंट लाईन के श्री उपाध्याय जी, या फिर आकाशवाणी के कोने पर स्थित युनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया (यूएनआई) के डीएन झा, बीएन झा या अन्य लोगबाग सोचे भी नहीं थे कि आने वाले दिनों में बिहार के ही नहीं, भारत के लोग गरीब-गुरबा के भोजन को कॉर्पोरेटाइजेशन कर, बेचकर माला-माल हो जायेंगे और गरीब सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' जैसा पेट-पीठ एक किये मृत्यु को प्राप्प्त करेगा। खैर।
’कॉफी पर चर्चा’ करने के लिए मुंबई के करण जौहर साहेब को छोड़ दें। ‘चाय पर चर्चा’ करने का एकाधिकार भारत के संभ्रांतों को रहने दें। लेकिन अगर ‘मिथिला का मिथिला पेंटिंग’,’सिलाव का खाजा’,’भागलपुर का सिल्क’,’गया का तिलकुट’,’उतवंतनगत का बेलग्रामी’,’मनेर का मोतिचुड़ का लड्डू’,’सरिसब-पाहि का सरौता’,’मुंगेर का कट्टा’, जैसे बिहार के ऐतिहासिक पकबानों को, हथियारों के नामों को भारतीय राजनीतिक बाजार में, व्यापार-जगत में बेचकर अपना-अपना नाम-शोहरत और मुनाफा अर्जित करते हैं; तो प्रदेश के करीब 12 करोड़ लोगों को पटना के गाँधी मैदान से दिल्ली के रामलीला मैदान होते दिल्ली हाट तक ‘लिट्टी और बैगन का चोखा’ पर बिहार के मजदूरों की वास्तविक स्थिति पर भी चर्चा करनी चाहिए।
अगर ऐसा हुआ होता तो ‘गोलघर की कसम’, 76 वर्ष आज़ादी के बाद बिहार के मजदूरों के घरों से पटना के सरपेंटाइन-सर्कुलर रोड के रास्ते दिल्ली के कल्याण मार्ग तक विकास की ‘ऐतिहासिक रेखाएं’ खींच जाती। लेकिन ऐसा नहीं है। क्योंकि चाहे 'लिट्टी चोखा' हो शहरों में 'कचरा'; दोनों महज व्यवसाय है और इन व्यवसायिओं का राजनीतिक गलियारे के लोग राजनीतिकरण कर नाम भी कमा रहे हैं, शोहरत भी कमा रहे हैं और पैसा भी। आज हालात यह है कि पहले जगन कचरा उठाने-बेचने का काम समाज का एक खास वर्ग 'भंगी' करता था, आज इस पेशे में समाज के संभ्रांत और शिक्षित लोग 'ठेकेदार' बन गए हैं। विश्वास नहीं हो तो सरकारी विभागों/निकायों में ठेकेदारों की सूची देख लीजिए।
जब देश-प्रदेश की राजनीतिक गलियारे में प्रवेश करने की बात होती है, सत्ता के सिंहासन पर बैठे राजनीतिक महंतों द्वारा लिट्टी-चोखा का’राजनीतिकरण’ होता है, तो पकवान बनाते समय, परोसते समय’लिट्टी-चोखा बनाने का असली कारीगर को मेज से दस मील की दूरी पर रखकर, समाज के संभ्रांत लोग, इत्र से नहाये, अपने-अपने जुल्फों और बाबरियों को सीटे, रंग-बिरंगे वस्त्रों में चाटुकारी और चापलूसी का उत्कर्ष का उदाहरण पेश करते हैं। आश्चर्य तो यह है कि उन हरकतों को संपादित करते समय वे तनिक भी लज्जित नहीं होते हैं। शब्द बहुत कटु हैं, लेकिन अपने-अपने कलेजे पर हाथ रखकर सोचियेगा जरूर, खासकर वे सभी जो मजदूरों के, कामगारों के हितैषी होने का स्वांग करते हैं।
देश-दुनिया की बात नेता को करने दें, एक अखबारवाला के नाते मेरा मानना है कि बिहार के सैकड़े 90 फीसदी मजदूरों की पूरी जिंदगी भूख मिटाने, परिवार चलाने और बीमारी में बीत जाती है। उनको ना तो अच्छा खाना नसीब होता है, न वस्त्र और ना आवास । विश्वास नहीं हो तो कभी बिहार के खेतों से पंजाब और हरियाणा के खेतों में, शहरों में गगनचुम्बी अट्टालिकाओं में काम करती महिलाओं को अवश्य देख लें। चतुर्दिक मालिकों से लेकर ठेकेदारों की निगाहें उस मजदूर के घरों की महिलाओं पर टिकी होती है। और वह असहाय महिला अपनी साड़ी की पल्लू को खींच-खींच कर अपने शरीर के हिस्सों को बारम्बार ढ़कती है – बुरी नजरों से बचने के लिए । आप भले विश्वास नहीं करें, लेकिन बिहार में पेंशन घोटाले की बात छोड़ें; यहाँ तो मृत्यु लाभ से लेकर दाह-संस्कार के लिए सरकारी खजानों में सुरक्षित रखे पैसों में भी “सेंघ” मार रहे हैं लोगबाग, अधिकारी, राजनेता और समाज के तथाकथित संभ्रांत। दावे तो सभी मजदूरों के कल्याण का ही करते हैं, लेकिन बिहार की खेतों की आड़ से दिल्ली के कल्याणमार्ग तक ‘मजदूरों के कल्याणार्थ वाली रेखाएं कहीं दिखेगी नहीं। शिक्षा, स्वास्थ और ने सुविधाओं की तो बात ही नहीं करें।
केंद्र एवं बिहार राज्य सरकारों के द्वारा मजदूरों के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही है जैसे पेंशन योजना, मृत्यु लाभ योजना, नगद पुरस्कार योजना, चिकित्सा सहायता योजना, शिक्षामित्र सहायता योजना, बच्ची के विवाह में वित्तीय सहायता की योजना, भवन मरम्मती अनुदान योजना योजना, दाह संस्कार हेतु आर्थिक सहायता सम्बन्धी योजना, परिवार पेंशन योजना, आयुष्मान भारत योजना और दुर्घटना अनुदान योजना आदि। इसके अलावे ‘मजदूरों के कल्याणार्थ’ अनेकानेक योजनाएं सरकारी फाइलों, कागजों पर दूरंतो एक्सप्रेस, राजधानी एक्सप्रेस, वन्देमातरम एक्सप्रेस की रफ़्तार से चल रही है – लेकिन वे योजनाएं लाभार्थी स्टेशनों पर नहीं रूकती। सरकारी अधिकारी, पंचायत से विधानसभा, विधान परिषद् के रास्ते लोकसभा और राज्यसभा में बैठे राजनेताओं के आदेश और इशारों पर “ट्रेनें” बीच में रूकती है। मालों को उतारा जाता है, कागजों का बदला-बदली होता है – और अंत में सरकारी आंकड़े तैयार हो जाते हैं।
राइट टू रिकॉल के कागजातों ने दाबा किया है कि “हमारे पूर्वजों के लम्बे संघर्षां के बाद हमें आजादी तो मिली, परन्तु आजादी के 75 सालों के बाद भी अपने दैनिक जीवन में हम अपने ही आस-पास हजारों व्यक्तियों को देखते हैं जो कि अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं को भी पूरा नहीं कर पाते हैं। बिहार राज्य की सार्वजनिक सेवाओं के जिन कामो के लिए जिन पदाधिकारियों को नियुक्त किया जाता है एवं चुनावों के माध्यम से जिनका चयन किया जाता है उन्हे सरकारी खजाने से हजारो करोड़ रूपये प्रतिवर्ष भुगतान भी किया जाता है और इसके एवज में समाज को वह जो भी देते है – देखकर आमजन को क्षोभ, निराशा और कुंठा ही मिलती है ।”
दस्तावेज में आगे लिखा है कि “बिहार में ग्रामोउद्योगों का पतन, कृषि की पिछड़ी दशा, त्राटिपूर्ण शिक्षा स्वास्थ व्यवस्था, बेरोजगारी, भ्रष्टाचारी, शोषण नीति पर आधरित पूंजीवादी अर्थव्यवस्था और पुलिस/ प्रशासन अपराध्यिं एवं जनप्रतिनिध्यिं का गठजोड़ आदि के कारण जन सरोकार से जुड़ी दर्जनों समस्याओं से हम सभी व्यक्ति गुजर रहे हैं। प्रत्येक आदमी हर छोटी-बड़ी समस्याओं से संघर्ष कर रहा है । वैसे जनता के सहयोग व विकास के लिए कई सरकारी गैर-सरकारी संस्थाएँ काम कर रही हैं। कई स्तरों पर जनप्रतिनिधियों क्रियाशील है मगर फिर भी आम आदमी बेवस व लाचार बना हुआ है। बिहार में शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, भ्रष्टाचारी, महँगाई कम होने अथवा स्थिर होने के बजाय दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही है। राज्य में कई ऐसे गुमनाम मौतें हो रही है जिसका मूल कारण भुखमरी अथवा उचित इलाज का न मिलना है। ऐसा लगता है कि राज्यवासी को स्वंय बदलने के लिए उसे अकेला छोड़ दिया गया है।”
आजादी के बाद से ही जन-सरोकार की समस्याओं को लेकर कई योजनाएं बनाई गईं परन्तु मूल समस्याओं को ध्यान में ही नहीं रखा गया। जनता के लिए रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास एवं भुखमरी से निपटने के लिए सरकार ने कोई ठोस व कारगर कदम नहीं उठाई है। आम आदमी के लिए जो भी योजनाएं बनाई गई है वो मात्र एक दिखावा है और उसमें भी लूट-खसोट की जा रही है। उनकी समस्याओं के निवारण के लिए न तो कोई जन प्रतिनिधि अथवा पदाधिकारी ही चिन्तित है और न तो कोई सरकार अथवा राजनीतिक पार्टी। इसलिए इसके निवारण हेतु, पूर्ण न सही, आंशिक ही सही, बिहार में जन-सरोकार से जूड़ी समस्याओं के लिए पुनः मांग करने की जरूरत महसूस होने लगी है।
हमारे किसान, मजदूर, बेरोजगार, संविदा-कर्मी भाई-बहन एवं अन्य संगठन आदि अपने-अपने अधिकारों और जरूरतों के लिए बराबर आन्दोलनरत् रहे है यह सब जानते है। सरकार निदान का कोई रास्ता नहीं निकाल पा रही है। अतएव बिहार में आम आदमी की सभी समस्याओं के निदान के लिए ‘‘जन-सरोकार समस्याओं” सरकार और व्यवस्था के सम्मुख लेन का प्रयास कर रही है, साथ ही, आशा भी करती है कि सरकार इसपर अवश्य विचार करेगी।
गरीबी भारत की एक देशव्यापी समस्या है। परन्तु अन्य राज्यों की अपेक्षा बिहार में निर्धन परिवारों की संख्या अधिक है। परन्तु सरकार ने निर्धनता को दूर करने के लिए कोई प्रयास नहीं किया है। अपने दैनिक जीवन में हम ऐसे अनेक व्यक्तियों को देखते हैं जो कि अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं को भी पूरा नहीं कर पाते हैं। इनमें भूमिहीन, कृषि-श्रमिक दैनिक मजदूर, बाल श्रमिक, पफुटपाथ पर सोने वाले, भीख माँगनेवाले, कूड़ेदान चुनने वाले, रिक्शा-ठेला चलाने वाले आदि। बिहार में अनुमानतः 100 व्यक्तियों पर लगभग 40 व्यक्ति निर्ध्नता या गरीबी से पीड़ित है। राज्य की सार्वजनिक सेवाएं औअधेसंरचनाएं देश में सबसे बदतर है।
बिहार पहले उद्योग प्रधान राज्य हुआ करता था, जो आज उद्योग विहीन हो गया है। झारखंड के अलग हो जाने पर इस दिशा में रत्ती भर प्रयास नहीं किया गया। जिसके कारण बिहार के लोग लाखों की संख्या में दूसरे राज्यों/देशों में काम करने चले जाते है। बिहार में रोजगार उत्पन्न करने के लिए नए उद्योग/कारखाने तो लगा नहीं गए परन्तु चल रहे उद्योग/कारखाने बन्द जरूर किए गए हैं। यथाः- सन 1980 के दशक में चीनी उद्योग एक सम्पन्न उद्योग था, उस वक्त बिहार देश के कुल चीनी उत्पादन का 40 प्रतिशत पैदा करता था। अब यह मुश्किल से 4 प्रतिशत रह गया है। आजादी से पहले बिहार में 33 चीनी मिलें चालू थी जिनमें से अब जैसे-तैसे 9-11 बचे हैं। जिनकी सिर्फ साँसे चल रही है।
भागलपुर एक समय में सिल्क सिटी के नाम से जाना जाता था। लाखों बुनकर इससे रोजगार पाते थे, परन्तु आज लगभग बन्द है। पपपण् बेगूसराय जिले में कभी बड़े और मध्यम उद्योग-धंधों का केन्द्र हुआ करता था। खाद कारखाना, रिपफायनरी, रेल यार्ड आदि जो कि सरकारी नीतियों को भेंट चढ़ गयी। इसी तरह, रोहतास जिला एक जमाने में डालमिया नगर के नाम से देश भर में विख्यात था। यहाँ वनस्पति, सिमेंट, कागज आदि के बड़े कारखाने थे। अण् सारण जिले के मढ़ौरा में सारण इंजिनियरिंग, सारण डिस्ट्रलरी, मार्टन मिल, चीनी मील आदि दर्जनों कारखाने थे।
सन 1969 में समस्तीपुर रेल मंडल की स्थापना हुई थी जो बंद है। मुंगेर में देश के मशहुर आईटीसी ग्रूप के कारखाने थे, बन्दूक फैक्ट्री थी जो अब बन्द है। कभी आईटीसी के कारखाने में ब्रांडेड सिगरेट का बड़े पैमाने पर निर्यात होता था। मधेपुरा में घोषित इलेक्ट्रिक इंजन कारखाना भी गुम हो गई है। छपरा रेल चक्का निर्माण कारखाना में अब-तक उत्पादन शुरू नहीं हुआ है। सीमांचल के जिले-कटिहार, पूर्णिया आदि में जूट मिले थी जो बंद है। मढ़ौरा डीजल इंजन कारखाना भी पूरा होने की प्रतीक्षा कर रहा है। नालन्दा जिला में हरनौत रेल कारखाना आज तक अस्तित्व में ही नहीं आ सका है। बिहार में काम करने वाले आयु वर्ग की बड़ी आबादी है। काम की तलाश में बिहार के लोग दूसरे राज्यों/देशों में परिवार से दूर रहकर काम की तलाश में जाते है, जहाँ कई जगहों पर उनका शोषण किया जा रहा है।
बहरहाल, गया जिले के राइट टू रिकॉल के महासचिव डी पी सिन्हा, बिहार कामगार श्रमिक संघ के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ विनय कुमार विष्णुपुरी 21-मुख्य बिंदुओं पर भारत के राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद, राज्यपाल फागु चौहान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को एक ज्ञापन प्रेषित किये हैं। साथ ही, यह उम्मीद भी किये हैं कि उन बिंदुओं पर सरकार और व्यवस्था सकारात्मक रुख अपनाएगी।
बिहार सरकार ने 2 अक्टूबर, 2016 से युवाओं को बेरोजगारी दूर करने के उद्देश्य से कुशल युवा कार्यक्रम, स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना एवं मुख्यमंत्रा निश्चय एवं सहायती भत्ता योजना शुरू की है। समय-समय पर रोजगार मेला भी लगाया जाता है। परन्तु ये सब सुविधएँ ‘‘उँट के मुँह में जीरा’’ जैसा है, बेरोजगार को चिढ़ाने वाला जैसा स्कीम है बेरोजगारो की इन स्कीमों से कोई बदलाव नहीं दिखता है। बिहार में बेरोजगारी को पता करने के लिए आँकड़ों की जरूरत नहीं है। बस सिपर्फ किसी गॉव की गलियों से गुजर जाइये, सैकड़ो ग्रेजुएट, बीटेक, एम. बी. ए. और मैट्रिक पफेल तथा अनपढ़ मिल जाएगे। इसलिए बेरोजगारी दूर करने के लिए ठोस व कारगार उपाय निकाला जाए।
इसलिए सब कचरा है। क्योंकि शायद आप भी ध्यान दिए होंगे, नजरअंदाज करने की आदत तो आम-बात है भारत के लोगों में, विशेषकर जो शहर में रहते हैं और जब तक परिस्थितियां उन्हें नहीं जकड़ने लगती है। शहरों में, चाहे लोग संकीर्ण गलियों में रहते हों या रियल इस्टेट के मालिकों द्वारा बनाये गए गगनचुम्बी अट्टालिकाओं में – प्याज के छिलके से लेकर, दो दिन पहले बनी दुर्गन्धित दाल से लेकर, महिलाओं द्वारा माहवारी में इस्तेमाल किये गए नैपकिन पैड, जिसे काले पन्नी में बांधकर, डस्ट बिन में छोड़कर हम-आप दफ्तर चले जाते हैं और फिर मुहल्ले के कुत्ते उसे नोचकर सभी कूड़े को फैला देता हैं – जिसे आपकी, हमारी अनुपस्थिति में कूड़ा बिनने वाला पुरुष या महिला अपने हाथों से उठाकर ले जाते है और उसके बदले कूड़ा बिकने वालों को हम आप प्रत्येक माह ५० रुपये से १०० रुपये तक देते हैं; जिससे उसका जीवन, उसके परिवार का जीवन यापन होता है – स्वच्छ भारत अभियान के तहत सबसे करारी लात उसके पेट पर पड़ी है। आपने कभी ध्यान नहीं दिया होगा।
स्वच्छ भारत अभियान के तहत आपके घरों से, उन भवनों, अट्टालिकाओं के सामने से अब ट्रैक्टर से कूड़ा उठाया जाता है। ट्रैक्टर पर पूर्व रिकार्डेड अपील बार-बार, लगातार सुनाया जाता है – “प्रधान मंत्री से स्वच्छ भारत अभियान में आप अपना भरपूर सहयोग करें। आपके दरवाजे पर कूड़ा लेने आया है। कूड़ा उसी में फेंकें।” लेकिन कभी आपने सोचा है कि आपके दरवाजे या गगनचुम्बी अट्टालिकाओं के द्वार से जो कूड़ा ट्रैक्टर में उठाया जा रहा है वह कितने मूल्य का ठेका है? आपने कभी सोचा की इस ठेके का स्वामी कौन है? आपने कभी सोचा की दसकों से जो कूड़ा बिकने वाला आपके दरवाजे से कूड़ा उठाकर ले जाता था और आपके दिए पैसे से उसका परिवार दो वक्त की रोटी खाता था, उस पैसे से उसके बच्चे स्कूल पढ़ने जाते थे, आपके दिए पैसे से पर्व-त्योहारों में उसके चेहरे पर रौनक आता था, आपको कितनी दुआएं देता था – आज ऐसा नहीं है।
आज कूड़ा का कॉर्पोरेटाइजेशन हो गया है। कूड़ा उठाने के लिए ठेका दिया जाता है जो करोड़ों में है और अरबों में है और इसके स्वामी या ठेकेदार ‘कूड़ा बिकने वाले समुदाय से नहीं है’ – बड़े-बड़े व्यापारी, उच्च जाति के लोग, सक्षम लोग, सत्ता के गलियारों में अपनी उपस्थिति दर्ज किये लोग हैं। भारत में कूड़ा बिनने वालों का एक विशाल समुदाय है । एक अनुमान के मुताबिक उनकी संख्या 15 लाख से 40 लाख के बीच है। ये लोग कूड़ा इकट्ठा करते हैं। फिर से इस्तेमाल में लाए जा सकने वाले सामानों की छंटनी करते हैं और उसे बेच कर जीवन यापन करते हैं। इससे वे भारत में सालाना उत्पन्न 620 लाख टन कूड़े को साफ करने में हमारी मदद करते हैं हालांकि कूड़ा बीनना पूरी तरह से एक अव्यवस्थित क्षेत्र है।
यहां इस बात को मापना कठिन है कि इस तरीके से कितना कचरा एकत्र किया गया है। लेकिन इसके मोटे तौर पर कुछ संकेतक हैं – भारत में उत्पन्न कचरे का केवल 75-80 फीसदी नगरपालिका निकायों द्वारा एकत्र किया जाता है और 90 फीसदी से अधिक भारत के पास उचित अपशिष्ट निपटान प्रणाली नहीं है। इस प्रकार काफी कचरा अनौपचारिक रुप से कूड़ा बीनने वालों द्वारा इकट्ठा किया जाता है। कचरा प्रबंधन योजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले इन कूड़ा बीनने वाले लोगों के पास न तो कोई रोजगार सुरक्षा है, न ही इस पेशे से जुड़ी कोई गरिमा और न ही काम के दौरान खतरों से निपटने का कोई सामान। उनके स्वास्थ्य पर हमेशा जोखिम बना रहता है। उन पर संक्रमण, सांस की बीमारियों और तपेदिक जैसी बीमारी होने का खतरा तो रहता ही है, साथ ही उन्हें गरीबी, अपमान और उत्पीड़न का भी सामना करना पड़ता है।
कचरा बीनने वाले के बच्चे भी अक्सर उसी व्यवसाय में जाते हैं और शायद ही कभी स्कूल जा पाते हैं। सरकार का व्यवहार भी उनके साथ अलग नहीं है। कूड़ा बीनने वालों के लिए समावेशी अधिकार, स्वास्थ्य लाभ, सेफ्टी गियर और सामाजिक सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है। आम तौर पर यदि नाप किसी कूड़ा बिकने वाले से बात करेंगे तो वह मूलतः दो राज्यों का होता है – एक पश्चिम बंगाल सुदूर इलाके से या फिर ओड़िसा और बांग्ला देश के। अपनी कड़ी मेहनत से दो वक्त की रोटी कमा पाते हैं। लेकिन अब इस पर भी समस्या होने वाली है।
2015 में प्रकाश जावड़ेकर जब पर्यावरण मंत्री थे तब नई दिल्ली में कचरा प्रबंधन के एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था की यह अव्यवस्थित और अनौपचारिक क्षेत्र ने देश को बचाया है इसलिए उनके प्रयासों को पहचानने की जरूरत है इसलिए उन्हें नेशनल अवार्ड से नवाजेंगे। साथ ही, तीन कूड़ा बिनने वालों और कचरा प्रबंधन में शामिल तीन संगठनों को 150,000 रुपए का नकद पुरस्कार देंगे। मंत्री पर्यावरण से मानव संसाधन मंत्रालय में आ गए परन्तु उन्हें न तो सम्मान मिला और न ही पुरस्कार। अलबत्ता स्वच्छ भारत अभियान के तहत घर-घर से कूड़ा-अचरा उठाने का ठेका समाज के संभ्रांतों को दिया गया और कूड़ा उठाने वालों को अपनी किस्मत पर रोने के लिए छोड़ दिया गया। पुलिस उत्पीड़न एक आम शिकायत है।
एक कचरा बीनने वाला कहता है, “हम बोरियां खोलते हैं और अख़बारों में गंदे सेनेटरी नैपकिन होते हैं, पॉलिथीन में मानव मल, ग्लास, सिरिंज बंधे होते हैं। हमें संक्रमण होता है। सड़ा हुआ भोजन हमें बीमार बना देता है। लेकिन हमारे पास कोई पेंशन नहीं है, कोई मान्यता नहीं, कोई मेडिकल सुविधाएं नहीं हैं।” जब एक परिवार में मुख्य कमाऊ सदस्य बहुत बीमार हो जाता है, तो उसे ठीक होने के लिए फौरन गांव भेज दिया जाता है। वे आरोप लगाते हैं कि सरकारी अस्पताल उनका इलाज नहीं करना चाहते हैं और महंगा अस्पताल चुनने का विकल्प उनके पास नहीं है।
आने वाले कुछ दशकों में भारत वर्तमान की तुलना में तीन गुना ज्यादा कचरा उत्पन्न करेगा। वर्ष 2030 तक 165 मिलियन टन और वर्ष 2050 तक 450 मिलियन टन। लेकिन वर्तमान में केवल एकत्रित 22-28 फीसदी कचरा संसाधित किया जाता है। यह समस्या शहरों में विशेष रूप से बड़ी है। भारतीय शहरों में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन कचरा उत्पन्न दर 200 से 870 ग्राम के बीच है। यह दर बढ़ ही रही है। वर्ष 2001 और 2011 के बीच बढ़ती शहरी आबादी और प्रति व्यक्ति कचरा उत्पन्न में वृद्धि के परिणामस्वरूप भारतीय शहरों में कूड़े में 50 फीसदी की वृद्धि हुई है। सरकार इसे उपभोग के बदलते तरीकों और रहन सहन की आदतों में बदलाव से जोड़कर देख रही है।
यह माना जाता है कि कूड़ा उत्पन्न करने वाले कूड़े को कूड़ेदान में डालेंगे। उसके बाद, नगरपालिका की यह जिम्मेदारी है कि वह उसे वहां से इकट्ठा करे और लैंडफिल में उसे उपचारित करे। हालांकि स्रोत से कचरा लेने के लिए नगरपालिका की जिम्मेदारी नहीं है। इसलिए इस अनौपचारिक क्षेत्र ने दूरी को भर दिया है। नई दिल्ली स्थित एक पर्यावरणीय गैर सरकारी संगठन ‘टॉक्सिक लिंक’ ने कचरा बिनने वालों को चार श्रेणी में बांटा है । एक तो वे हैं, जो बोरियों में खुले नाले और रेलवे डिब्बे से कचरा इकट्ठा करते हैं। दूसरे कबाडी वाले हैं, जो साइकिल से घरों पर जा कर बेकार सामान इकट्ठा करते हैं और फिर ग्लास, कागज और प्लास्टिक से बोतल अलग करते हैं। तीसरे वे हैं , जो तिपहिया वाहनों से आते हैं प्रत्येक दिन लगभग 50 किलो कचरा इकट्ठा करते हैं और उन्हें बेचने के लिए लंबी दूरी की यात्रा करते हैं। और अंत में वे जो स्क्रैप डीलर के रूप में काम करते हैं। ‘इंटरनेशनल आर्काइव ऑफ आक्यपेशनल एंड इन्वाइरन्मेन्टल हेल्थ’ से पता चलता है कि यह व्यवसाय इन कूड़ा बिनने वालों की जिंदगी में जहर घोल रहा है।
जब भारत में कचरे का निपटान होता है, तो यह उन लोगों के लिए बहुत कठिन हो जाता है जो बाद में इसे संभालेंगे। उदाहरण के लिए गंदे डायपर और सैनिटरी नैपकिन दोनों को मेडिकल नजरिये से बेकार माना जाना चाहिए। जैव-चिकित्सा अपशिष्ट (प्रबंधन और हैंडलिंग) नियम- 1998 के अनुसार मल, रक्त, शरीर तरल पदार्थ के साथ किसी भी कचरे को अलग से उपचारित करना चाहिए। लेकिन आम तौर पर इन्हें एक ही कूड़ेदान में डाल दिया जाता है। (कहानी का कुछ अंश ‘सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज’ के शोधकर्ता (बोस और भट्टाचार्य के सहयोग से)
