अभी सुबह के 10.30 बजे हैं। लाल किले की ओर अपना मुख कर ऐतिहासिक फतेहपुरी मस्जिद के सामने खड़ा हूँ। मेरे सामने मेरे उम्र से लम्बी सड़क है, जिसके एक सिरे पर फतेहपुरी मस्जिद और दूसरे सिरे पर ऐतिहासिक लाल किला है।
द सॉवरेन सिटी इन मुगल इंडिया 1639–1739 में, स्टीफन ब्लेक लिखते हैं कि जहाँआरा ने एक बार कहा था: 'मैं हिंदुस्तान में किसी और सराय की तरह एक बड़ी और शानदार सराय बनवाऊँगी। जो मुसाफ़िर इसके आँगन में आएगा, उसे शरीर और आत्मा दोनों में आराम मिलेगा और मेरा नाम कभी भुलाया नहीं जाएगा।' यह सराय (आरामगाह) चांदनी चौक का एक हिस्सा थी, जहाँ अब दिल्ली टाउन हॉल है।
1650 में बना यह बाजार, जिसका शुरू में कोई औपचारिक नाम नहीं था, जहाँआरा ने बनवाया था। यह शाहजहानाबाद के लाहौरी गेट से फतेहपुरी मस्जिद (जिसे शाहजहाँ की पत्नी फतेहपुरी बेगम ने उसी साल बनवाया था) तक फैला हुआ था। 120 फीट चौड़ा यह बाज़ार एक किलोमीटर से ज़्यादा लंबा था। इसमें 1560 दुकानें थीं जहाँ कबाब, माणिक और पन्ने से लेकर फूल, शीशे के हुक्के और चीन के चश्मे जैसी कई तरह की चीज़ें बिकती थीं। उर्दू बाज़ार में मुगल दरबार के सैनिक, कारीगर, क्लर्क और कलाकार रहते थे, जबकि अशरफी या जौहरी बाज़ार फाइनेंशियल हब था। अमीर बाज़ार के कॉफी हाउस में मुशायरों और रोज़ाना की खबरों के लिए इकट्ठा होते थे। हालांकि बाजार मुख्य रूप से व्यापार की जगह थी।
कहते हैं कि बाजार के बीच से एक सुंदर नहर बहती थी, और सड़क के दोनों ओर पेड़ लगे थे, जो आने-जाने वालों को छाया देते थे। इस तालाब के उत्तर में, जहाँआरा ने एक कारवां सराय (कारवां के ठहरने के लिए एक सराय) और दक्षिण में एक हमाम बनवाया। कुछ रातों को, चाँद की रोशनी बीच वाले तालाब में पड़ती थी, जिससे उसे 'चांदनी चौक' नाम मिला।फ्रांसीसी यात्री-डॉक्टर फ्रांस्वा बर्नियर ने चांदनी चौक में बाग साहिबाबाद के पास की सराय को 'जामा मस्जिद के बाद शहर की सबसे शानदार इमारत' माना था। शानदार सराय का वर्णन करते हुए, ब्लेक ने लिखा कि यह 'अपनी तरह का एक बेहतरीन उदाहरण' था और 'वहां सिर्फ़ अमीर और सबसे जाने-माने फ़ारसी और उज़्बेक व्यापारियों को ही रहने की इजाज़त थी'।
जहाँआरा का मकबरा नई निज़ामुद्दीन दरगाह परिसर में स्थित है। उनकी इच्छा के अनुसार अपनी सादगी के लिए जानी जाती है कि उनकी कब्र सिर्फ़ घास से ढकी हो। मकबरे पर एक फ़ारसी शिलालेख है, जिसे जहाँआरा ने खुद लिखा था, जिसमें अनुरोध किया गया है कि उनकी कब्र को सिर्फ़ हरियाली से ढका जाए। 1681 में जहाँआरा की मौत के बाद भी शाहजहानाबाद में चांदनी चौक एक मुख्य रास्ता बना रहा।
हालांकि, 1857 के विद्रोह के दौरान, चांदनी चौक पर भारी बमबारी हुई और कई इमारतें क्षतिग्रस्त हो गईं। एक बार जब अंग्रेजों ने चारदीवारी वाले शहर पर कब्ज़ा कर लिया, तो उन्होंने भविष्य में होने वाले विद्रोहों को रोकने के लिए शाहजहानाबाद की शानदार वास्तुकला को ध्वस्त कर दिया और मुग़ल सत्ता की यादगार निशानी को मिटा दिया। चारदीवारी वाले शहर के अंदर इमारतों की जगह बैरक बना दिए गए। अंग्रेजों ने न सिर्फ नहर को ढक दिया, बल्कि सराय की जगह दिल्ली टाउन हॉल भी बना दिया। 1860 के दशक में दिल्ली में रेलवे लाइन बिछाते समय, बाग साहिबाबाद को गिरा दिया गया। 1877, 1903 और 1911 में हुए तीन ब्रिटिश दरबारों या राज्याभिषेक समारोहों के दौरान नई इमारतें बनाने के लिए चांदनी चौक को और भी बर्बाद किया गया।
बहरहाल, पिनकोड 110006 ✍ की शुरुआत फतेहपुरी चौक से करते हैं, जो चांदनी चौक रोड के आखिर में है – यह शाहजहानाबाद का सबसे मशहूर इलाका है। नब्बे के शुरुआती दिनों से लगातार, खासकर जब इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में संवाददाता नियुक्त हुआ, तत्कालीन मेट्रो संपादक श्री अश्विनी सरीन चाहते थे कि उनके संवाददाता कक्ष के सभी संवाददाता सभी क्षेत्रों में जानकार रहे। अपराध बिट पर काम करने वाले भी म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन पर लिख सके और विधानसभा या सरकारी महकमें की खबर लिखने वाला दिल्ली के जीबी रोड पर रहने वाली वेश्याओं के बारे में मानवीय कहानी लिख सके। इसलिए दिल्ली के सभी इलाकों में भ्रमण-सम्मेलन करना, अपना स्रोत बनाना, नितांत आवश्यक था। हम तो दिल्ली आये ही थे कुछ वर्ष पहले और एक अच्छे संवाददाता बनने के लिए यह जरूरी भी था।
इस इलाके में, इस इलाके की गलियों में अनेकों बार आया हूँ। जिन्हें गलियों का ज्ञान है वे पुरानी दिल्ली की गलियों के रास्ते कहाँ से कहाँ निकल जायेंगे, यह सड़क पर चलने वाले सोच भी नहीं सकते। वैसे किला राय पिथौरा जो लालकोट के नाम से जाना जाता है, पहली दिल्ली सल्तनत कहा जाता है, का मुख्यालय मेहरौली (क़ुतुब परिसर) माना जाता है (731 - 1311), इसके बाद सीरी फोर्ट (दूसरा सल्तनत 1304), फिर तुग़लकाबाद (1321-1323), फिर जहाँपनाह (चौदहवीं सदी) फिर फिरोजाबाद (1354), फिर पांचवी सल्तनत शेरगढ़ या दीनपनाह (1534) बना जिसे आज पुराना किला के रूप में भी जानते हैं। सत्रहवीं शताब्दी में शाहजहानाबाद बना यानी लाल किला यानी पुरानी दिल्ली। आज कोई सोच भी नहीं सकता कि पुरानी दिल्ली की गलियां कश्मीरी गेट, दिल्ली गेट, लाहौरी गेट, अजमेरी गेट, तुर्कमान गेट, निगमबोध घाट गेट, के रास्ते कल के शाहजहानाबाद और आज की पुरानी दिल्ली का क्या बेहतरीन स्थान है।
विगत दिनों जब फतेहपुरी मस्जिद पर कहानी कर रहा था चांदनी चौक के अंतिम छोड़ पर खड़ा होकर सोच रहा था जब इसका निर्माण हुआ होगा, यह जगह कैसा दीखता होगा। फतेहपुरी चौक असल में दो चौकों को दिया गया एक ही नाम है जो एक-दूसरे के बहुत करीब हैं। चांदनी चौक रोड और खारी बावली रोड कुछ फीट की दूरी पर हैं, और इस दूरी के कारण बनने वाले दोनों चौराहों को फतेहपुरी चौक नाम से जाना जाता है।
लालकिले से आती सड़क जो आज चांदनी चौक के नाम से जानी जाती है, के अंतिम छोड़ पर दाहिने हाथ एक ऐतिहासिक भवन है। इस भवन को 'कोरोनेशन बिल्डिंग' कहा जाता है। यह भवन चुनमाल की हवेली के बाद है। इस भवन के सामने फतेहपुरी मस्जिद है। यदि इतिहास के पन्नों को उल्टा जाय तो इस भवन का 'कोरोनेशन' से कोई सम्बन्ध नहीं है। वजह यह है कि जब 1803 में अंग्रेज दिल्ली आए तो लाल किले से उत्तरी दिल्ली के इलाके तक तत्कालीन भूमि, जो शायद जंगल नुमा रहा होगा उन दिनों, अपनी गतिविधियों को यहीं केंद्रित किए, चाहे मनोरंजन का स्थल हो, प्रशासनिक स्थल हो या सैन्य छावनी हो।

समयांतराल दिल्ली को भारत की राजधानी घोषित करने के पहले यहाँ तीन शाही दरबार आयोजित किये गए। साल 1877, 1903 और 1911 था। बीसवीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश साम्राज्य अपने चरम पर था जब राजनीतिक और व्यावहारिक कारणों से राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली ले जाने का फैसला किया गया। 1911 में हुए दरबार में, किंग जॉर्ज V ने ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली लाने की घोषणा की। इस घोषणा के साथ ही दिल्ली की भौगोलिक स्थिति में काफ़ी बदलाव हुए।
फतेहपुरी मस्जिद और स्थानीय लोगों का मानना है कि इस इलाके को 1650 के ज़माने में शाहजहां-मुमताज महल की बेटी जहाँआरा बेगम ने बनवायी थी और यह भवन उसी निर्माण का एक हिस्सा है। शाहजहां-मुमताज महल के अन्य संतानों में जहाँआरा (1614-1681) और रोशनआरा (1617-1671) दो महत्वपूर्ण संतानें थी। यह एक तरह का रहने का, छोटा-मोटा व्यवसाय करने का सराय नुमा स्थान था। इस पुरे इलाके को कारवां सराय भी कहते थे। इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता है कि राज्याभिषेक के दौरान हुए दिल्ली दरबार के कालखंड में इस सराय का भी इस्तेमाल हुआ हो और इसका नाम 'कोरोनेशन बिल्डिंग' रख दिया गया हो। क्योंकि 'कोरोनेशन' और 'बिल्डिंग' शब्द का 'उर्दू', 'फ़ारसी' से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। आज इस भवन में सैकड़ों नहीं, हज़ारों व्यावसायिक दुकाने हैं। आज वास्तविक रूप में उत्तरी दिल्ली में कोरोनेशन पार्क मौजूद है जिसमें तत्कालीन अंग्रेजी सरकार के हुकुमनामाओं की आदमकद मूर्तियां रखी है - कुछ सुरक्षित तो कुछ असुरक्षित ।
यह दृश्य लालकिले की ओर से आने वाली सड़क जब फतेहपुरी मस्जिद से बाएं-दाएं हाथ मुड़ती है, उसमें दाहिने हाथ मुड़ने पर बाएं हाथ फतेहपुरी मस्जिद है और दाहिने हाथ 'कोरोनेशन बिल्डिंग। इस दो ऐतिहासिक भवनों के बीच फूल वालों के बीच आगे की ओर जाने वाली सड़क पर बाएं हाथ कोई सौ कदम की दूरी तक रोजी-रोटी की तलास करते परिवारों द्वारा मुद्दत से वर्तनों का बाजार लगता है। यह महिलाएं अपने व्यवसाय से, आमदनी से बहुत खुश तो नहीं हैं, लेकिन दुःखी भी नहीं हैं। क्योंकि उनकी ख्वाहिशें क़ुतुब मीनार की ऊंचाई हैसी नहीं है। तीन-चार रोटियों में, एक कटोरे दाल में पेट भर जाता है। अपने युद्धरूपी जीवन से इतना तो अनुभव कर ली हैं कि उन्हें जीने के लिए अपनी लड़ाई खुद करनी होगी और राजुयाभिषेक भी स्वयं करना होगा। मोहल्ले के लोग ही काम आएंगे इसलिए चेहरे पर हमेशा प्रसन्नता लिए, मुस्कुराते इस चांदनी चौक के अंतिम छोड़ की महारानी बानी होती हैं।
(फिर मिलेंगे अगले सोमवार को)
