कोटला मार्ग (नई दिल्ली) : भारत की बात बाद में, बिहार में महिला-पुरुषों की साक्षरता दर में तक़रीबन 17 फीसदी का फालसा है। कागज पर भले ग्रामीण महिलों के साथ-साथ शहरी महिलाओं के आंकड़े को जोड़-घटा कर महिलाओं को साक्षरता दर में 'अव्वल' होने का दर्जा दिया जाय, वास्तविक रूप से कोई भी राजनीतिक पार्टियां यह नहीं चाहती हैं कि उनके मतदाता, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों के मतदाता 'शिक्षित' हों, 'विचारवान' हों, अपने 'अधिकार-कर्तव्य' के 'मोल' को समझें। क्योंकि प्रदेश में महिला-पुरुष साक्षरता-दर में 17 फीसदी का फासला बहुत होता है और इसी फासले के कारण ग्रामीण महिला मतदाता यह निर्णय नहीं हैं कि उनके लिए 'कौन हितकारी' है और 'कौन नहीं।'
बिहार में महिलाओं की आवादी कुल 6.30 करोड़ है, जिसमें 3.6 करोड़+ महिला 'मतदाता' हैं। पिछले कई चुनावों में महिलाएं अहम भूमिका निभाती हुई नजर आ रही हैं। वैसे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि बिहार की महिलाओं के लिए नीतीश कुमार पसंदीदा नेता हैं (स्थानीय तौर पर) और दिल्ली में नरेंद्र मोदी जी। वजह भी है - दोनों महिलाओं के लिए अनेक योजनाएं लागू किए हैं। लेकिन यह तभी संभव हो पाया है जब दोनों सत्तारूढ़ हैं। सत्ता के बाहर आने पर मतदाताओं को अनेकानेक 'प्रलोभन', 'आश्वासन' देकर उनके मतों को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास किया जाता रहा है, जा रहा है। विगत लोकसभा चुनाव में महिला मतदाताओं का महत्वपूर्ण स्थान रहा है, खासकर उत्तर बिहार में। उस चुनाव में महिलाओं की मतदान का प्रतिशत 60 से भी अधिक थी, जबकि 2019 में भी महिलाओं ने पुरुषों से 4.66% अधिक मतदान किया था। खैर।
सन 1947 से पहले और सं 1947 के बाद, यानी स्वराज भवन, इलाहाबाद से होते हुए 7- जंतर मंतर, नई दिल्ली और फिर 24-अकबर रोड के रास्ते 9-A कोटला रोड, नई दिल्ली तक अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी शायद ही कभी सार्वजनिक रूप से भारत की गली कूचियों में, सड़कों पर, गाँव में, शहरों में स्थित दुकानों से महिलाओं के द्वारा मासिक धर्म के दौरान होने वाले रक्त स्त्राव को सोखने में इस्तेमाल होने वाले 'सेनिटरी पैड' को राजनीति में लाये होंगे।

विगत पांच दशकों में देश से प्रकाशित किसी भी पत्र-पत्रिकाओं में, या टीवी के जन्म के बाद उसके स्क्रीनों पर यह राजनीतिक मुद्दा बना हो, नहीं पढ़ा, नहीं देखा। 'हम-दो, हमारे दो' या फिर 'नसबंदी' का मुद्दा जब दशकों पहले आया था, उसका राजनीतिक गलियारे में क्या हश्र हुआ, सभी परिचित हैं। यह अलग बात है कि अगर उन दिनों तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी या फिर उनके पुत्र संजय गांधी के उस नारे पर देश के लोग अमल किये होते तो आज भारत की आवादी 146 करोड़ नहीं होती, यह भी सच है।
आज आज़ादी के 78 साल बाद, जब बिहार में 18वें विधानसभा का चुनाव होने वाला है, कांग्रेस के नेताओं ने मतदाताओं को, विशेषकर महिलाओं को, लुभाने के लिए 'सेनिटरी पेड' के माध्यम से अपना 'परिचय पत्र' दिखा रहे हैं। यह इस बात का द्योतक है कि वर्तमान कांग्रेस में नेतृत्व से लेकर नीचे तक 'मतदाताओं की परेशानी को समझने की शक्ति शायद नहीं रही। या फिर, कांग्रेस पार्टी के 'नेतृत्व' को मार्ग दर्शाने के लिए जितने लोग पंक्तिवद्ध खड़े हैं, उनकी मानसिकता में इतना ह्रास हो गया है कि वे इससे अधिक सोच नहीं सकते हैं। दुःखद है। आज अगर श्रीमती इंदिरा गांधी या राजीव गांधी होते तो शायद महिलाओं के लिए इस पवित्र उपयोगी वस्तु को राजनीति में नहीं लाते।
आज महिलाओं की समस्याएं हिमालय पहाड़ की चोटी जैसी खड़ी हैं। बिहार की कुल आवादी में अगर 6.80 करोड़ पुरुष हैं तो महिलाओं की संख्या लगभग 6.30 करोड़ ही है। ज्ञातव्य हो कि बिहार में, चुनावों में महिला मतदाताओं के प्रभाव को देखते उन्हें केंद्र में रखे जाने की प्रक्रिया बढ़ गयी है। वे चुनावी नतीजों को आकार देने में अहम भूमिका निभा रही है। अब सरकार के गठन में महिलाओं का योगदान निर्णायक है तो कांग्रेस और आरजेडी वाले महागठबंधन ने सत्ता में आने पर 'माई बहन मान योजना' के तहत महिलाओं के बैंक खातों में 2,500 रुपये महीना ट्रांसफर करेंगे ही, जैसा कि दिल्ली में भाजपा की सरकार की है। वहीं, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जदयू-बीजेपी सरकार ने 2 करोड़ महिलाओं से जुड़ने के लिए गांव-गांव में 'महिला संवाद' कार्यक्रम शुरू किया है।
भारत में महिलाएं और और पुरुष 2023 पुस्तिका
ज्ञातव्य हो कि विगत वर्ष 12 अगस्त को भारत सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने "भारत में महिलाएं और और पुरुष 2023” को लोकार्पित किया था। वह पुस्तिका एक व्यापक और अंतर्दृष्टिपूर्ण दस्तावेज है जो भारत में महिलाओं और पुरुषों की स्थिति के बारे में समग्र दृष्टिकोण प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, चाहे जनसंख्या की बात हो, शिक्षा की बात हो, स्वास्थ्य की बात हो, अर्थव्यवस्था में भागीदारी की बात हो, निर्णय लेने में सहभागिता हो, इस विषयों की एक विस्तृत श्रृंखला पर डेटा प्रदान किया है। इतना ही नहीं, वह जेंडर, शहरी-ग्रामीण विभाजन और भौगोलिक क्षेत्र के आधार पर अलग-अलग डेटा प्रस्तुत किया है, जो महिलाओं और पुरुषों के विभिन्न समूहों के बीच विद्यमान असमानताओं को समझने में मदद करता है। वादे तो राजनीतिक पार्टियां 'घोषणा पत्रों' से चुराती ही हैं, इस पुस्तिका से ही कुछ बातें उठा लेती। खैर।
पुस्तिका के अनुसार, भारत में महिलाएं और पुरुष 2023” न केवल लैंगिक समानता की दिशा में की गई प्रगति को रेखांकित किया है, बल्कि उन क्षेत्रों की भी पहचान कराया है जहां महत्वपूर्ण अंतर बने हुए हैं। विभिन्न सामाजिक-आर्थिक संकेतकों की जांच करके, पुस्तिका समय के साथ रुझानों का कुछ विश्लेषण प्रस्तुत करती है और इस प्रकार नीति निर्माताओं, शोधकर्ताओं और आम जनता को सूचित निर्णय लेने और जेंडर-संवेदनशील नीतियों के विकास में योगदान करने में मदद करती है। यह रिपोर्ट भारत में महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए जनसांख्यिकीय परिवर्तनों और उनके निहितार्थों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संसाधन है। यह लैंगिक समानता को बढ़ावा देने और यह सुनिश्चित करने की वकालत और कार्रवाई करने के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में कार्य करता है कि विकास प्रयास समावेशी और टिकाऊ हों।
पुस्तिका कहता है कि "2036 तक भारत की जनसंख्या के 152.2 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है, महिला प्रतिशत 2011 के 48.5 प्रतिशत की तुलना में मामूली वृद्धि के साथ 48.8 प्रतिशत होगा। संभवतः प्रजनन क्षमता में गिरावट के कारण 15 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों का अनुपात 2011 की तुलना में 2036 में घटने का अनुमान है। इसके विपरीत, इस अवधि के दौरान 60 वर्ष और उससे अधिक आयु की आबादी के अनुपात में अधिक वृद्धि होने का अनुमान है। 2036 में भारत की जनसंख्या में 2011 की जनसंख्या की तुलना में स्त्रियों की संख्या अधिक होने की उम्मीद है, जैसा कि जेंडर अनुपात में परिलक्षित होता है, जिसके 2011 में 943 से बढ़कर 2036 तक 952 होने का अनुमान है। यह लैंगिक समानता में सकारात्मक प्रवृत्ति को दर्शाता है।"
इस पुस्तिका के अनुसार, यह स्पष्ट है कि 2016 से 2020 तक, 20-24 और 25-29 आयु वर्ग में आयु विशिष्ट प्रजनन दर क्रमशः 135.4 और 166.0 से घटकर 113.6 और 139.6 हो गई है। उपरोक्त अवधि के लिए 35-39 आयु के लिए एएसएफआर 32.7 से बढ़कर 35.6 हो गया है, जो दर्शाता है कि जीवन में व्यवस्थित होने के बाद, महिलाएं परिवार के विस्तार पर विचार कर रही हैं। 2020 में किशोर प्रजनन दर निरक्षर आबादी के लिए 33.9 थी, जबकि साक्षर लोगों के लिए 11.0 थी। यह दर उन लोगों के लिए भी अत्यधिक कम है जो साक्षर हैं, लेकिन निरक्षर महिलाओं की तुलना में बिना किसी औपचारिक शिक्षा के (20.0) के हैं।

यह तथ्य महिलाओं को शिक्षा प्रदान करने के महत्व पर फिर से जोर देता है। मातृत्व मृत्यु दर (एमएमआर) एसडीजी संकेतकों में से एक है और इसे 2030 तक 70 तक लाया जाना एसडीजी ढांचे में स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है। सरकार के निरंतर प्रयासों के कारण, भारत ने समय रहते अपने एमएमआर (2018-20 में 97/लाख जीवित शिशु) को कम करने का प्रमुख मील का पत्थर सफलतापूर्वक हासिल कर लिया है और एसडीजी लक्ष्य को भी हासिल करना संभव होना चाहिए।
बहरहाल, आज अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के मुख्यालय का चक्कर लगा रहे थे। बाहर उपस्थित लोग बहुत महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा कर रहे थे। देखने-सुनने में तो सभी कांग्रेस के छोटे-छोटे कार्यकर्ता दिखे, लेकिन उनकी सोच और उनकी बात को सुनकर, कांग्रेस के सिपा-सलाहकार बौने दिखाई दे रहे थे। ये सभी एक तरफ जहाँ बिहार की महिलाओं में मासिक धर्म के समय जरूरत वाली सेनेटरी पैड पर चर्चा कर रहे थे, वहीं देश की महिलाओं की बांझपन पर भी उतना ही महत्वपूर्ण बहस कर रहे थे। उनका कहना था कि 'सेनेटरी पेड तो ठीक है, चाहिए तो यह कि कांग्रेस इस बात को अपने चुनाव का मुद्दा बनाये, महिलाओं को विश्वास दिलाये कि अगर उनकी सरकार बिहार में आयी तो प्रदेश की ऐसी सभी महिलाओं को, खासकर जो बांझपन के शिकार है, उन्हें मुफ्त में अस्पतालों में चिकित्सा करके, उनके मातृसुख दिलाएगी। प्रदेश में ऐसी कोई महिला नहीं रहेंगी जिन्हें समाज 'बाँझ' शब्द से संबोधित करें।
बिहार चुनाव में सेनेटरी पैड की राजनीति
लेकिन, कांग्रेस का यह निर्णय कि वह अपनी "माई-बहिन मान योजना" के तहत जरूरतमंद महिलाओं को 2500 /- रुपये सम्मान राशि देगी। साथ ही, पूरे बिहार में 5 लाख सैनिटरी पैड्स भी बांटेगी, गजब का चुनावी टिकरम है। वैसे बिहार में कांग्रेस का सत्यानाश करने वाले लालू प्रसाद यादव और उनका राष्ट्रीय जनता दल 'कांग्रेस' का दामन छोड़ नहीं पायी, जहाँ तक सत्ता में रहने का सवाल है। प्रदेश में कांग्रेस के लोग, विगत साढ़े तीन दशकों में - लालू के अभ्युदय के बाद - कांग्रेस पार्टी को इस कदर नेस्तोनाबूद कर दिए की आज पार्टी के आला नेताओं को 'सेनेटरी' पैड को 'चुनावी मुद्दा' बनाकर चुनाव में उतरना पर रहा है। कांग्रेस के नेताओं ने अफने अपने बारे में सोचा इन वर्षों में, बाद में पार्टी और प्रदेश के लिए।

वैसे, प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के नवीनतम राजनीतिक प्रयास ने विवाद खड़ा कर दिया है। जब राज्य इकाई ने सैनिटरी पैड वितरण पहल शुरू की, जिसके ऊपर राहुल गांधी की तस्वीर छपी है।बिहार कांग्रेस अध्यक्ष राजेश कुमार ने इस अभियान का अनावरण किया, जिसके तहत राज्य भर में करीब पांच लाख महिलाओं को सैनिटरी नैपकिन बांटे जाएंगे। उन्होंने कहा कि इस पहल की अगुआई महिला कांग्रेस करेगी। कुमार ने सैंपल पैकेट दिखाते हुए संवाददाताओं से कहा, "हम महिला कांग्रेस के माध्यम से महिलाओं को सैनिटरी नैपकिन वितरित करने के लिए एक अभियान शुरू करेंगे। हमारा लक्ष्य इसे लगभग 5 लाख महिलाओं को वितरित करना है, और महिला कांग्रेस कार्यकर्ता इस विषय पर जागरूकता पैदा करेंगी।" कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) बिहार में महागठबंधन का हिस्सा हैं, जो आगामी चुनावों में वापसी की उम्मीद कर रहा है। बिहार में इस साल के अंत में चुनाव होने की उम्मीद है, जिसके लिए पार्टियों ने अपने अभियान तेज कर दिए हैं।
आपको याद होगा कि सेनेटरी पैड को केंद्र बनाकर 2018 में 'पैडमैन' फिल्म बनी थी, जिसमें अक्षय कुमार, सोनम कपूर और राधिका आप्टे काम किये थे। इस सिनेमा की कहानी आर. बाल्की ने लिखा था। वह फिल्म तमिलनाडु के कोयंबटूर के एक सामाजिक कार्यकर्ता और उद्यमी अरुणाचलम मुरुगनाथम के जीवन पर आधारित है, जिन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के लिए कम लागत वाले सैनिटरी पैड बनाए। उनकी यात्रा को ट्विंकल खन्ना ने अपनी काल्पनिक कहानी द लीजेंड ऑफ लक्ष्मी प्रसाद में वर्णित किया है। लगता है, कांग्रेस के किसी खास व्यक्ति यह सुझाव दिए होंगे पार्टी के आला नेताओं को कि अगर सेनेटरी पैड को चुनाव में मुद्दा बनाया जाता है तो राहुल गांधी भी अक्षय कुमार हो जायेंगे, जहाँ तक ख्याति का सवाल है।
वैसे कांग्रेस इस बात को राजनीतिक षड्यंत्र कहती है, लेकिन सेनेटरी पैड के अंदर कांग्रेस नेता की तस्वीर दिखाने वाली वीडियो से सोशल मीडिया पर उनकी खूब खिल्ली उड़ाई जा रही है। कांग्रेस ने पहले मासिक धर्म स्वच्छता जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से प्रियदर्शिनी उड़ान योजना के तहत 5 लाख सैनिटरी पैड वितरित करने की घोषणा की थी। कांग्रेस ने शनिवार, 5 जुलाई को अपने आधिकारिक एक्स अकाउंट पर एक वीडियो शेयर किया जिसमें ऑल इंडिया महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष अलका लांबा हैं।
मासिक धर्म पैड का जन्म
बहरहाल, सदियों से समाज ने मासिक धर्म सुरक्षा के विभिन्न रूपों का उपयोग किया है। मासिक धर्म पैड का उल्लेख 10वीं शताब्दी की शुरुआत में सुदा में किया गया है, जहाँ हाइपेटिया, जो 4वीं शताब्दी ईस्वी में रहती थी, ने अपने एक प्रशंसक को हतोत्साहित करने के प्रयास में अपने मासिक धर्म के इस्तेमाल किए गए कपड़े में से एक को उस पर फेंक दिया था। प्राचीन मिस्र में, महिलाएं अपने मासिक धर्म के रक्त को सोखने के लिए नरम पपीरस, घास जैसा पौधा इस्तेमाल करती थीं। व्यावसायिक रूप से उपलब्ध मासिक धर्म स्वच्छता उत्पादों से पहले, अधिकांश महिलाएं अपने मासिक धर्म प्रवाह को सोखने के लिए कपड़े के टुकड़ों का इस्तेमाल करती थीं। "ऑन द रैग" एक शब्द है जो मूल रूप से मासिक धर्म के कपड़े को संदर्भित करता है, लेकिन इसका आधुनिक उपयोग मासिक धर्म के व्यंजना के रूप में होता है।
डिस्पोजेबल मासिक धर्म पैड बेंजामिन फ्रैंकलिन के आविष्कार से विकसित हुए, जो घायल सैनिकों को रक्तस्राव को रोकने में मदद करने के लिए बनाए गए थे, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि थॉमस और विलियम साउथॉल के पैड के साथ 1880 के आसपास पहली बार व्यावसायिक रूप से उपलब्ध हुए थे। पहला व्यावसायिक रूप से उपलब्ध अमेरिकी डिस्पोजेबल नैपकिन लिस्टर के तौलिए थे जिन्हें 1888 में जॉनसन एंड जॉनसन द्वारा बनाया गया था। डिस्पोजेबल पैड की शुरुआत नर्सों द्वारा अपने मासिक धर्म प्रवाह को अवशोषित करने के लिए अपने लकड़ी के गूदे की पट्टियों का उपयोग करने से हुई थी, जिससे एक ऐसा पैड बना जो आसानी से उपलब्ध सामग्री से बना था और उपयोग के बाद फेंकने के लिए काफी सस्ता था। इस लकड़ी के गूदे (सेल्यूकॉटन) से बने उत्पादों के लिए कोटेक्स का पहला विज्ञापन जनवरी 1921 में दिखाई दिया। जॉनसन एंड जॉनसन ने 1926 में मोडेस सैनिटरी नैपकिन पेश किए, जिस पर लिलियन गिलब्रेथ ने शोध किया था। 1927 में प्रकाशित लिलियन गिलब्रेथ की बाजार अनुसंधान रिपोर्ट 1920 के दशक में अमेरिकियों के मासिक धर्म के अनुभवों के बारे में बहुमूल्य जानकारी देती है।

1956 में, मैरी केनर ने इनबिल्ट, नमी-प्रूफ नैपकिन पॉकेट के साथ एक समायोज्य सैनिटरी बेल्ट के लिए पेटेंट प्राप्त किया।हालांकि, जिस कंपनी ने सबसे पहले उनके आविष्कार में रुचि दिखाई थी, उन्होंने यह पता लगाने के बाद इसे अस्वीकार कर दिया कि वह अफ्रीकी अमेरिकी हैं। बाद में पैंटी के क्रॉच से जुड़ने के लिए सैनिटरी पैड के निचले हिस्से पर एक चिपकने वाली पट्टी लगाई गई और यह एक पसंदीदा तरीका बन गया। 1980 के दशक की शुरुआत में बेल्टेड सैनिटरी नैपकिन जल्दी ही गायब हो गया। पैड बनाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली एर्गोनोमिक डिज़ाइन और सामग्री भी 1980 के दशक से लेकर आज तक बदल गई है। पहले की सामग्री उतनी शोषक और प्रभावी नहीं थी, और शुरुआती पैड दो सेंटीमीटर तक मोटे थे, इसलिए रिसाव एक बड़ी समस्या थी।
भारत में बांझपन: एक उभरता मुद्दा
बहरहाल, भारत में बांझपन एक उभरता हुआ मुद्दा है। हाल ही तक, इस मुद्दे पर बहुत अधिक ध्यान नहीं दिया गया है और बहुत कम अध्ययनों ने भारत में बांझपन के स्तर, प्रवृत्तियों और परिणामों को समझा है। भारत में परिवार नियोजन कार्यक्रमों में भी बांझपन के बजाय अति बांझपन के पैटर्न और निर्धारकों को ही देखा जाता है। इसके अलावा, वर्तमान में विवाहित बांझ दंपतियों में बांझपन के संबंध में आधुनिक उपचार सुविधा के बारे में जानकारी का अभाव है। सांख्यिकी के अनुसार, भारत में वर्तमान में विवाहित महिलाओं में से लगभग 8% बांझपन से पीड़ित हैं और उनमें से अधिकांश माध्यमिक बांझपन (5.8%) से पीड़ित हैं। हालाँकि दुनिया भर में 8-12 प्रतिशत जोड़े बांझपन से पीड़ित हैं, लेकिन बांझपन की दर देशों और क्षेत्रों के बीच नाटकीय रूप से भिन्न होती है । डब्ल्यूएचओ के अध्ययन के अनुसार, 2002 में विकासशील देशों में प्रजनन आयु की 187 मिलियन से अधिक कभी विवाहित महिलाएं प्राथमिक या द्वितीयक बांझपन से पीड़ित थीं ।
भारत में, महिलाओं की बांझपन दर पश्चिम बंगाल (13.9 प्रतिशत) में सबसे अधिक और मेघालय (2.5 प्रतिशत) में सबसे कम थी। लगभग 80% बांझ महिलाओं ने उपचार की मांग की, लेकिन एक बड़ा हिस्सा (33%) महंगे आधुनिक उपचार और जागरूकता की कमी के कारण गैर-एलोपैथिक और पारंपरिक उपचार प्राप्त करता है। बांझपन प्राथमिक या द्वितीयक हो सकता है। प्राथमिक बांझपन से तात्पर्य ऐसे दंपत्ति के बांझपन से है जो कभी गर्भधारण करने में सक्षम नहीं हुए, जबकि द्वितीयक बांझपन पिछली गर्भावस्था के बाद गर्भधारण करने में विफलता है। दंपत्तियों में बांझपन कई कारकों के संयोजन के कारण हो सकता है। बांझपन का कारण बनने वाले कारक आनुवंशिक, पर्यावरणीय, संक्रामक या परजीवी रोग हो सकते हैं।अशिक्षित या कम शिक्षित महिलाएं अपने प्रजनन स्वास्थ्य परिणामों के बारे में नहीं जानती हैं क्योंकि वे कम उम्र में शादी और प्रजनन कर रही हैं जिससे द्वितीयक बांझपन की संभावना बढ़ सकती है।
इसके अलावा, रोजगार क्षेत्र में लगी महिलाओं में बांझपन की दर अधिक थी। 30 वर्ष की आयु के बाद शादी करने वाली महिलाओं में बांझपन की दर सबसे अधिक (19.7 प्रतिशत) थी। 30 वर्ष की आयु के बाद शादी करने वाली लगभग 6 प्रतिशत महिलाओं में प्राथमिक बांझपन की भी शिकायत थी और उनमें से 13 प्रतिशत में द्वितीयक बांझपन की शिकायत थी। यह तर्क दिया जा सकता है कि 30 वर्ष की आयु के बाद शादी करने वाली महिलाओं में प्रजनन की चरम अवधि यानी 22-29 वर्ष पहले ही पार हो चुकी होती है और इस आयु के बाद महिलाओं की प्रजनन क्षमता या प्रजनन क्षमता कम हो जाती है और इसलिए उन्हें गर्भवती होने में कठिनाई होती है। हालांकि, यह शादी के समय उनके पति की उम्र और जैविक क्षमता पर भी निर्भर करता है।
