धनबाद/झरिया : उस दिन शनिवार था। दिसंबर महीने का 27 तारीख और सन 1975 साल। आर्यावर्त - इंडियन नेशन पत्र समूह में नौकरी के नौ महीने हुए थे। प्रूफ रीडिंग विभाग में था। हमारा विभाग प्रेस वाले भवन के अंतिम बाएं छोड़ पर नीचले तल्ले में स्थित था जहाँ समाचार के मोनो-पंचिंग मशीन के ओपेरटर के साथ-साथ हिंदी विभाग के कम्पोजिटर भी बैठते थे। 'जॉब' विभाग भी वहीँ था जहाँ न्यूज प्रिंट रील से निकले कागजों का अम्बार होता था। जॉब वाले कर्मी उसे A /4 आकार में काट कर रह देते थे जिसका उपयोग संस्थान के लोग अपने-अपने बच्चों के पढ़ने के लिए पचास पैसे प्रति किलो खरीद कर ले जाते थे। मैं सबसे आगे होता था।
उस दिन दिन का कोई ढ़ाई बजा था। तभी जमशेदपुर से श्री धरणीधर बाबू का फोन सम्पादकीय विभाग में बजा। फोन का बजना पुरे संस्थान में भूचाल आने के बराबर था। उसी समय अपने ज़माने के पटना के छायाकार कृष्ण मुरारी 'किशन' (केएम किशन) अपनी साईकिल दफ्तर के पोर्टिको में पटकते ऊपर दौड़ कर सम्पादकीय विभाग की ओर जा रहे थे।
मुरारी उन दिनों पटना की सड़कों पर दो-दिन छायाकारों में एक थे जो पटना ही नहीं, दिल्ली और विश्व के पत्र-पत्रिकाओं पर अपनी तस्वीरों के सहारे कब्ज़ा कर रहे थे। अभी तक कोई समझ नहीं पाया था कि आखिर क्या हुआ है? लेकिन लोग इतना समझ गए थे कि जो भी हुआ है वह अच्छा नहीं हुआ है। मुरारी जी विगत 1 फरवरी, 2015 को अनंत यात्रा पर निकले।
धरणीधर बाबू फोन पर कहे: "फ़्लैश कर दें !!! इंडियन आयरन एंड स्टील कंपनी के चासनाला माइंस में पानी घुस गया है। सैकड़ों लोगों की मरने की आशंका है।" और फोन काट दिए।
उन दिनों अल्मुनियम/पतले लोहे के चादरों का अल्फाबेट होता था जिसे क्रिकेट जैसे स्कोर बोर्ड की तरह लिख कर टांगदिया जाता था ताकि आने-जाने वाले राहगीर पढ़ सकें। यह बोर्ड प्रेस के मुख्य भवन में ऊपर फ़्रेज़र रोड के तरफ तत्कालीन पटना केंद्रीय कारा के प्रवेश द्वार के ठीक सामने था।
रेडियो दूसरा साधन था - प्रचार/प्रसार के लिए लेकिन श्री अनंत कुमार जी का समाचार प्रसारण का समय शाम के साढ़े सात बजे होता था जब वे कहते थे "ये आकाशवाणी है। अब आप अनंत कुमार से प्रादेशिक समाचार सुनिए।" उन दिनों एक संवाददाता के लिए ऐसी घटना की सूचना देना और फिर घटनास्थल पर पहुंचना सबसे अधिक महत्वपूर्ण था और चुनौतीपूर्ण भी । उन दिनों ट्रंक कॉल, टेलीग्राम और डाकघर वाला टेलेक्स के अलावे सूचना भेजने का और कोई दूसरा रास्ता नहीं था। अब तक शहर में लोगों के चेहरों पर दर्द झलकने लगा था।
उधर मुरारी इण्डियन नेशन सम्पादकीय विभाग में चासनाला काण्ड की घटना को बता रहा था और प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इण्डिया (पीटीआई) तथा युनाइटेड न्यूज ऑफ़ इण्डिया (यूएनआई) के टेलीप्रिंटर पर कहानियां फ्लैश हो रही थी ATTN EDITOR : ISCO CHASNALA MINES INNUNDATED.... 50 MINERS KILLED (MORE) .... 100 MINERS KILLED .... (MORE) ... 250 MINERS KILLED और अंतिम टिकर पर लिखा था चासनाला में करीब 352 खदान कर्मियों की दर्दनाक मृत्यु। भारत में जब भी कोयला खदान, खनन की बात होगी चासनाला का नाम सुनते ही शरीर के रोंगटे खड़े हो जायेंगे। यह सच है।
चासनाला कांड के चार साल बाद यश चोपड़ा की एक फिल्म आयी - काला पत्थर। इस फिल्म का पटकथा लिखे थे सलीम-जावेद। शशि कपूर, अमिताभ बच्चन, राखी, शत्रुघ्न सिन्हा, प्रेम चोपड़ा जैसे कलाकार कार्य किये थे इस फिल्म में। यह फिल्म भारत के सिनेमा गृहों में 9 अगस्त, 1979 को रिलीज हुआ था। आज तक यह फिल्म तक़रीबन 135 करोड़ रुपये कमा चुकी है। खैर।
चासनाला काण्ड के चौदह साल बाद मेरा दाना पानी दी इण्डियन नेशन अख़बार से उठकर कलकत्ता से प्रकाशित दी टेलीग्राफ अखबार पहुँच गया था। मैं दक्षिण बिहार का, खासकर कोयलांचल का संवाददाता हो गया था। धनबाद में पदस्थापित था। धनबाद पहुँचने पर पहले तो श्री ब्रह्मदेव शर्मा के 'आवाज' अखबार के चाट के नीचे से प्रकाशित 'दी न्यू रिपब्लिक' अख़बार में आया। कुछ चार-पांच महीने में ही धनबाद के स्थानीय अख़बारों के मालिकों का कोयला क्षेत्र के लोगों के साथ 'सम्बन्ध' समझ गया था।
मैं कोयलांचल के 'बालू माफिया' पर एक कहानी लिखकर टेलीग्राफ अख़बार को भेज दिया। दूसरे दिन प्रथम पृष्ठ पर वह कहानी आठ कॉलम में प्रकाशित हुआ। इस कहानी के साथ ही हम टेलीग्राफ के हो गए और धनबाद के पत्रकारों के साथ-साथ कोयला क्षेत्र में जिनका-जिनका हाथ 'काला' था, उनके 'दुश्मन' घोषित हो गए।
धनबाद में पदस्थापित होने के बाद टेलीग्राफ अख़बार के कलकत्ता के वरिष्ठ पत्रकारों का एक ही सलाह था कि 'धनबाद के भूगोल, गणित, नागरिक शास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र को अच्छी तरह समझने की कोशिश करो। जितना अधिक समझोगे, कहानियां लिखने में उतना ही मदद मिलेगा।"
भूगोल से अर्थ था 'टोपोग्राफी', माइनिंग क्षेत्र का भौगोलिक स्थिति। गणित से अर्थ था कोयला और पैसे में सम्बन्ध, नागरिक शास्त्र वहां के लोगों, कर्मचारियों की स्थिति, अर्थशास्त्र वहां की माफियाओं की वर्चस्व, राजनीति शास्त्र में बिहार, बंगाल और देश के नेताओं का कोयला क्षेत्र में मिलीभगत, पैसे की कमाई, माफियाओं का संरक्षण आदि से था।
धनबाद आने के बाद मैं दक्षिण बिहार के कोयला क्षेत्र का शायद ही कोई इलाका बचा था जहाँ से वाकिफ नहीं था। उन दिनों कोयलांचल का शायद ही कोई हिस्सा था, जहाँ दी टेलीग्राफ अखबार नहीं पहुंचा था - चाहे स्थानीय प्रशासन के विरुद्ध कहानी लिखने की बात हो या श्रमिकों के बारे में कहानी लिखने के लिए या तत्कालीन कोयला माफिया और सरगनाओं पर कहानी लिखने के लिए, माइंस फायर पर कहानी लिखने के लिए, कोल इंडिया, भारत कोकिंग कोल, सेन्ट्रल कोलफील्ड्स के भ्रष्ट अधिकारियों के बारे में कहानी लिखने के लिए, पर्यावरण पर कहानी लिखने के लिए, श्रमिकों और उनके परिवारों के स्वास्थ्य पर कहानी लिखने के लिए, जमीन धंसने पर कहानी लिखे के लिए या फिर माइंस फायर पर कहानी लिखने के लिए - कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं था, जिस पर कहानियां लिखकर उजागर नहीं किया गया।
चासनाला कांड के बाद तत्कालीन दक्षिण बिहार या यह इलाका एक बार फिर दहला। साल था 1989 और नवम्बर महीने का 13 तारीख। ईस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड (रानीगंज) के महावीर कोलियरी में फिर एक हादसा हुआ। उस दिन सोमवार था। इस हादसे में भी मुख्य कारण 'पानी' ही था। इस हादसे में छह कर्मियों की जान गयी थी जबकि 64 कर्मियों को 'ऐतिहासिक कैप्सूल' के माध्यम से बचाया गया था।
रानीगंज दुर्घटना कांड, जिसे लेकर अक्षय कुमार अभी 'मिशन रानीगंज' भी बनाये और विगत 6 अक्टूबर, 2023 को विश्वव्यापी रिलीज किया गया। यह सिनेमा भारत के बॉक्स ऑफिस नेट में कुल 33.74 करोड़, बॉक्स ऑफिस ग्रॉस 40.17 करोड़, ओवरसीज ग्रॉस 5.49 करोड़ और वर्ल्ड वाइड ग्रॉस 45.66 करोड़ की कमाई की। इससे पहले 'काला पत्थर' धन अर्जित करने में तत्कालीन अंतराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय मुद्रा के मोल के अनुरूप बहुत पैसे कमाए। कोयलांचल के माइंस की स्थिति, श्रमिकों की वेदना, संवेदना, मालिकों का दोहन, माफियाओं का अत्याचार - सभी बातों को दिखाकर 'पैसे कमाए' - भर पेट, भर झोला।
लेकिन मैं नहीं समझता हूँ कि काला पत्थर' या 'मिशन रानीगंज' या कोई अन्य फिल्म की कमाई से उस दुर्घटना के शिकार हुए किसी भी श्रमिक के परिवार या परिजनों को एक पैसा मिला होगा। भारत में फिल्म लिखने वाले, फिल्म बनाने वाले विषय का तो इस्तेमाल करते हैं, लेकिन विषय को नजर अंदाज करने में तनिक भी हिचकी नहीं लेते। इसका सबसे बड़ा कारण है सरकारी स्तर पर भी उन विषयों की उपेक्षा या फिर उसका राजनीतिकरण से लाभ उठाना। खैर।
महावीर कोलियरी हादसे को भी बॉलीवुड वाले भुनाए। फिल्म बनाये - मिशन रानीगंज।'लेकिन मिशन रानीगंज में पटकथा लिखने वाले वह नहीं लिख पाए, दिखा पाए जिसके कारण इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ़ माइंस (आज आईआईटी बन गया है) के तत्कालीन निदेशक डॉ. डी के सिन्हा 'कुख्यात' हुए थे। डॉ. सिन्हा जसवंत सिंह गिल के साथ 'राजनीति' किये थे। डॉ. सिन्हा नहीं चाहते थे कि इस पुरे प्रकरण में जसवंत सिंह गिल को ख्याति मिले। अलबत्ता, वे इस अलंकरण को अपने और इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ़ माईनस के माथे बांधना चाह रहे थे।
मैं उन दिनों दी टेलीग्राफ में एक कहानी भी किया था कि आखिर डॉ. सिन्हा अभियंता गिल के कैप्सूल को उनके नाम से नहीं, बल्कि अपने और आइएसएम के नाम से क्यों 'विख्यात' करना चाहते थे। घटना के कई घंटों के बाद जब गिल साहब उस कैप्सूल को बनाने और श्रमिकों को निकालने की बात कर रहे थे, उनकी बातों को क्यों दबाया जा रहा था ? और बहुत तरह की बातें थी। साथ ही यह भी लिखा था कि डॉ. सिन्हा कैसे संस्थान के एक वित्तीय घोटाले में लिप्त हो गए थे ।
टेलीग्राफ अखबार उन दिनों कलकत्ता ही नहीं पूरे कोयलांचल और दक्षिण बिहार का बहुत ही पसंदीदा और प्रसारित होने वाला अखबार था। पटना के अखबार, मसलन दी टाइम्स ऑफ़ इण्डिया, दी हिंदुस्तान टाइम्स, हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स पढ़ते तो थे, लेकिन अखबार माने स्थानीय अख़बार 'आवाज' और 'जनमत' ही था। टेलीग्राफ और आनंद बाजार पत्रिका तो किसी भी बंगाली परिवार और पाठक के लिए महत्वपूर्ण था ही।
टेलीग्राफ में उन कहानियों के प्रकाशन का परिणाम यह हुआ कि डॉ. सिन्हा, जिनका चयन इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ़ मनैजमेंट, कलकत्ता चैप्टर में आला अधिकारी के पद पर नियुक्ति के लिए 'शॉर्टलिस्ट' हो गया था, 'रद्द' कर दिया गया। बाद में, वे मुझे अपने बंगले पर बुलाये और कहे भी: "आपकी दो कहानी कहानी मेरे कैरियर को समाप्त कर दिया है। आपको क्या मिला? मैं मुस्कुरा दिया।
रानीगंज दुर्घटना के बाद, भारत कोकिंग कोल का घासलीटांड कोलियरी में दुर्घटना हुई। उस दिन मंगलवार था और साल सन 1995 का सितम्बर महीने का 26 तारीख। घासलीटांड़ कोलियरी दुर्घटना के समय मैं दिल्ली आ गया था दी इण्डियन एक्सप्रेस में। लेकिन आनंद बाजार पत्रिका के संडे पत्रिका से, कलकत्ता के या दिल्ली के सम्पदाको से, सम्पादकीय विभाग में कार्य करने वाले लोगों से नाता नहीं टूटा था। कलकत्ता से लेकर आसनसोल, दुर्गापुर, धनबाद आदि इलाकों से संवाददाता घासलीटांड कोलियरी पहुंच गए थे। लेकिन संडे पत्रिका के लोगों के आदेश पर मुझे निजी तौर पर उस क्षेत्र के भूगोल, गणित, नागरिक शास्त्र, अर्थशास्त्र पर लिखने, बताने को कहा गया। यह भी तो एक पुरस्कार ही है - विश्वास।
इन हादसों का जिक्र यहाँ इसलिए कर रहा हूँ कि संसद से दस कदम की दूरी पर कोयला मंत्रालय में बैठे मंत्रियों से लेकर, कोलकाता के कोल इण्डिया लिमिटेड और उसके अधीनस्थ उपक्रमों में बैठे अधिकारियों तक, स्थानीय प्रशासन के लोग/अधिकारी जो भी यह दाबा करते हैं, कर रहे हैं, मोटे-मोटे ग्रन्थ लिख रहे हैं, प्रकाशित कर रहे हैं कि उन्होंने कोयलांचल के विकास के लिए, वहां के श्रमिकों के कल्याण के लिए बहुत कार्य किये हैं - उनकी सत्यता संदेहास्पद है, यह वह भी जानते हैं और अधिकारी, पदाधिकारी तो जानते ही हैं कि कोयला क्षेत्र के खदानों में ऊपर-नीचे काम करने वाले श्रमिकों को वह कुछ भी नहीं मिला जिसका वे हकदार थे।
इसे दूसरे शब्दों आप यह भी कह सकते हैं कि कोयला क्षेत्रों में काम करने वाले हज़ारों-हज़ार श्रमिकों, वहां रहने वाले लाखों परिवारों, महिलों, बच्चों, वृद्धों के जीवन के साथ खिलवाड़ कर अपना-अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। कल तक जिन्हे रोटी और प्याज खाने की कूबत नहीं थी, आज पिज्जा खा रहे हैं - लूट के पैसे से और वे धनी ही नहीं, धनाढ्य और धन्ना सेठ हो गए। लेकिन श्रमिकों के चेहरों पर काली परतें और मोटी होती गयी।
अगर कोयला क्षेत्र का विकास किया गया होता तो शायद सत्तर के दशक के बाद से आज तक यह इलाका माफियाओं के हाथों नहीं होता। इन माफिया में कोई भी हो सकता है। कॉल इंडिया के अधिकारी भी हो सकते हैं, कर्मचारी भी हो सकते हैं, भारत कोकिंग कोल के लोग भी हो सकते हैं, ईस्टर्न कोलफील्ड्स, सेन्ट्रल कोलफील्ड्स के लोग हो सकते हैं, सूर्यदेव सिंह, नौरंगदेव सिंह, सकल देव सिंह, पटना, रांची, और दिल्ली में सफेद वस्त्र पहने राजनेता भी हो सकते हैं।
सत्तर-अस्सी-नब्बे के दशक में जो महानुभाव अपनी-अपनी तूती बोलबाना चाहते थे, या जिनके नामों का डंका पीटा जाता था, उनमें नब्बे से अधिक फीसदी लोग ईश्वर को प्यारे हो गए। जो शेष बचे हैं वे गरीब, निरीह, दमित कोयला क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों, कर्मियों की बद्दुआओं का फल भोग रहे हैं। कई बिस्तर पर लेटे हैं। कई बिस्तर पर लघु-दीर्घ शंकाओं से मुक्त हो रहे हैं। कई जो उस ज़माने में 52 ही नहीं 62 फिट की छाती लेकर दहाड़ रहे थे, आज 'डाइबिटीज' के कारण पूरा मुंह भी खोल नहीं पा रहे हैं। कई जो पांच ही नहीं पचास कोस की दूरी दौड़कर तय करते थे, आज बिस्तर से शौचालय तक पहुँचने में कई लोगों की मदद ले रहे हैं - सब समय है। और इस बदलते समय में यह सोचना कि इस क्षेत्र में माफियाओं का साम्राज्य कायम रहेगा, गलत है।
दिल्ली, पटना, रांची, कलकत्ता, या कॉल इण्डिया या भारत कोकिंग कोल लिमिटेड के वातानुकूलित कक्ष में आठ से दस डिग्री तापमान पर बैठकर, चाय की चुस्की लेते, उस काले कोयले के काले धंधों में लगे सैकड़ों माफिआओं के बैंको में पैसों के श्रोतों का बरकरार रखते, अपना जीवन धन्ना सेठ जैसे जीते, कोयला मजदूरों और खदानों में काम करने वाले हज़ारों-हज़ार लोगों और उनके परिवारों का जीवन नर्क बना दिया हैं इन राजनेताओं ने, अधिकारियों ने। अन्यथा इस मद में अब तक अनंत लाख करोड़ रूपये खर्च किये हैं लेकिन कोयला क्षेत्र की जमीनों पर उन खर्चों का फल दिखाता नहीं।
कोयला क्षेत्र के राष्ट्रीयकरण के बाद कोयला मंत्रालय का जबाबदेही सबसे पहले बीजू पटनायक का हाथों आया। श्री पटनायक के बाद श्री एबीए गनी खान चौधरी कोयला मंत्री बने और दीवारों पर कोयला मंत्रियों का नाम लिखाता गया - श्री एन डी तिवारी, श्री वसंत साठे, श्री पी ए संगमा, श्री अजीत कुमार पांजा, श्री जगदीश टाइटलर, श्री अटल बिहारी वाजपेयी, श्री एस आर बोमई, श्रीमती कांति सिंह, श्री आई के गुजराल, श्री दिलीप कुमार रे, श्री एन टी संमुगम, श्री सैयद शाहनवाज हुसैन, श्री राम विलास पासवान, श्री एल के आडवाणी, सुश्री उमा भारती, श्री करिया मुंडा, सुश्री ममता बनर्जी, श्री शिबू सोरेन, श्री मनमोहन सिंह, श्रीप्रकाश जायसवाल, श्री पीयूष गोयल और श्री प्रह्लाद जोशी।
यानि सन 1979 से 2024 तक 24 मंत्री कोयला मंत्रालय का नेतृत्व किये। इसमें अपवाद छोड़कर, शायद अधिकतम मंत्री कभी ओपन कास्ट या अंडरग्राउंड माइंस देखे भी नहीं होंगे अपने कार्यकाल में। कोयला मंत्रालय के गठन से लेकर विगत 45 वर्षों में 24 मंत्री आये और गए। औसतन मंत्रियों का कार्यकाल एक साल आठ महीना।
अब आप स्वयं सोचिये इन मंत्रियों में, अधिकारियों में कितनी क्षमता है कि वे अपने कार्यकाल में किसी एक परियोजना का अंतिम स्वरूप दे पाए होंगे। हाँ उस परियोजना के लिए राशि अवश्य निर्गत होती रही। अगर ऐसा नहीं होता तो भारत के नियन्त्रक एवं महालेखापरीक्षक इन विगत वर्षों में दर्जनों बार कोयला मंत्रालय, कॉल इण्डिया और उनके उपक्रमों के बारे में नकारात्मक शब्द नहीं लिखता। लाखों-लाख करोड़ का घपला उजागर नहीं करता। कोल इण्डिया लिमिटेड में अब तक तीन दर्जन से अधिक अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक नियुक्त हुए।
भारतीय स्वतंत्रता के बाद पहली पंचवर्षीय योजना में ही कोयला उत्पादन की काफी आवश्यकता महसूस की जाने लगी। 1951 में कोयला उद्योग के लिए कार्यकारी दल की स्थापना की गई थी जिसमें कोयला उद्योग, श्रमिक संघ के प्रतिनिधियों और सरकार के प्रतिनिधि शामिल किये गये थे। उसने लघु और विभाजित उत्पादन इकाइयों के एकीकरण का सुझाव दिया। इस प्रकार एक राष्ट्रीयकृत एकीकृत कोयला क्षेत्र का विचार पैदा हुआ। कोयला खनन में एकीकृत समग्र योजना आजादी के बाद, एक आवश्यक घटना है। नये कोयला क्षेत्रों की खोज और नई कोयला खदानों के विकास में तेजी लाने के उद्देश्य से 11 कोयला खदानों को मिलाकर नेशनल कोल डेवलॅपमेंट कॉरपोरेशन का गठन किया गया ।
भारत में कोयला उद्योग का राष्ट्रीयकरण 70 के प्रारंभिक दशक में 2 संबद्ध घटनाओं का परिणाम है। पहले उदाहरण में तेल की कीमत का सदमा, जिसने देश को अपनी ऊर्जा विकल्पों की खोज करने के लिए बाध्य कर दिया था। इस उद्देश्य के लिए एक ईंधन नीति समिति का गठन किया गया जिसने वाणिज्यिक ऊर्जा के प्राथमिक स्रोत के रूप में कोयले की पहचान की। दूसरे, इस क्षेत्र के विकास के लिए काफी निवेश की आवश्यकता थी जो कोयला खनन से आ नहीं सकता था क्योंकि यह अधिकांश निजी क्षेत्र के हाथों में था।
राष्ट्रीयकरण की संकल्पना का उद्देश्य था कि देश के दुर्लभ कोयला संसाधन विशेषकर कोकिंग कोयले का संरक्षण करना था। साथ ही, अपव्ययी, चयनात्मक और विध्वंसक खनन को रोकना, उपलब्ध कोयला संसाधनों का सुनियोजित विकास करना, सुरक्षा मानकों में सुधार लाभ, अधिकतम उपयोग हेतु विकास की जरूरत के अनुरूप निरंतर पर्याप्त निवेश सुनिश्चित करना और कामगारों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना।
इसके अलावा अब तक कोयला खनन, जो निजी खान मालिकों के हाथ में था, को वैज्ञानिक तरीके से कोयला खनन न करने तथा अस्वस्थ खनन परम्परा आदि का सामना करना पड़ा। निजी मालिकों के अधीन खनिकों के रहने का स्तर घटिया था। सरकार की राष्ट्रीय ऊर्जा नीति के तहत भारत की कोयला खानों को 1970 के दशक में दो चरणों में पूर्ण रूप से राष्ट्रीय नियंत्रण में लिया गया।
कोकिंग कोयला खान (आपातकाल प्रावधान) अधिनियम 1971 सरकार द्वारा 16 अक्टूबर 1971 को लागू किया गया जिसके तहत, इस्को, टिस्को, और डीवीसी के कैप्टिव खानों के अलावा भारत सरकार ने सभी 226 कोकिंग कोयला खानों का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया और उसे 1 मई, 1972 को राष्ट्रीयकृत कर दिया। इस प्रकार भारत कोकिंग कोल लिमिटेड बना था । इसके अलावा 31 जनवरी 1973 को कोयला खान (प्रबंधन का हस्तांतरण) अध्यादेश – 1973 लागू कर केन्द्रीय सरकार ने सभी 711 नान-कोकिंग कोयला खानों का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया ।
राष्ट्रीयकरण के अगले चरण में 1 मई 1973 से इन खानों को राष्ट्रीयकृत किया गया और इन नॉन- कोकिंग खानों का प्रबंधन करने के लिए एक सार्वजनिक क्षेत्र की कोयला खान प्राधिकरण लिमिटेड (CMAL) नामक कंपनी का गठन किया गया था । दोनों कंपनियों का प्रबंधन करने के लिए कोल इंडिया लिमिटेड के रूप में एक औपचारिक नियंत्रक कंपनी का गठन नवम्बर 1975 में किया गया।
इन विगत वर्षों में कोयला के क्षेत्र में कोयला खनन के लिए जितना ही भूमि के अंदर से कोयला को निकला गया, इस क्षेत्र में सड़क से लेकर कोल इण्डिया के रास्ते, उसके दर्जनों उपक्रमों के रास्ते, माफियागिरी के रास्ते प्रदेश के मंत्रालयों से देश में कोयला मंत्रालय तक बहुत बड़ा 'गिरोह' को भी पोषित और सम्पोषित किया, कर रहा है। अगर देश में यह कहा जाता है कि किसके शरीर में स्टील नहीं है, वैसे स्थिति में कोयलांचल से जुड़े लोगों में साधुओं को ढूँढना मजाक नहीं है - सभी अधिकारियों, पदाधिकारी, नेता, अभिनेता, समाजसेवी, माफिया उसके अंग-प्रत्यंग हैं।
वैसे व्यवस्था की ओर से बारम्बार कोयला उत्पादन, उत्पादन से मुनाफा के बारे में सांख्यिकी जारी किया जाता है लेकिन हकीकत यह है कि आज कोयला क्षेत्र में काम करने वाले सभी जोखिम की जिंदगी जी रहे हैं। तनाव, अवसाद, आत्महत्या, मानसिक समस्याएं, शराब, वेश्यावृति, व्यापसायिक रोग, संक्रामक रोग, मृत्यु, पर्यावरण संबधी बीमारियां, हिंसा, हत्या, बलात्कार, कुपोषण, आदि बीमारियूयों के साथ साथ भूमि बेदखली, सामाजिक समस्याएं, भ्रष्टाचार, मानवाधिकार का उलंघन, भूखलन, सांस लेने में समस्या, उल्टी, फेफड़ों में संक्रमण, न्यूमोकोनियोसिस, अस्थमा, तपेदिक, जल जनित रोग जैसे टाइफाइड, हैजा, पेचिश, दस्त और बच्चों में निमोनिया, वायरल रोग, कुपोषण से ग्रसित हैं। लेकिन और यह 'लेकिन' कई लाख करोड़ का प्रश्न कल भी था और आज भी है।
आगे पढ़ें (कोयला-2) "सर !!! हमारी, आपकी 'पैसे कमाने की आग समाप्त नहीं हुई हैं' इन पांच दशकों में, तो कोयला खदानों की आग कैसे बुझेगी? आप चाहते हैं खदानों की आग सच में बुझ जाय?
तस्वीर: श्रमिकों के शव : Al Jazeera के सौजन्य से
